Jaiho777 VIP — उसने सबसे पहले जिसका नाम लिया
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Jaiho777 VIP — उसने सबसे पहले जिसका नाम लिया

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

साहिल जीता तो पहला फोन चचेरे भाई का आया। पिता का नहीं। उस दोस्त का भी नहीं जिसने बस का किराया उधार दिया था। रजत का। पिछले महीने इसी नाम के नीचे तेईस…

साहिल जीता तो पहला फोन चचेरे भाई का आया।

पिता का नहीं। उस दोस्त का भी नहीं जिसने बस का किराया उधार दिया था।

रजत का।

पिछले महीने इसी नाम के नीचे तेईस अनुत्तरित संदेश पड़े थे।

अब स्क्रीन पर वही चमक रहा था। प्रतियोगिता का अधिकारी उससे अपने नाम की वर्तनी जाँचने को कह रहा था।

साहिल ने फोन उल्टा रख दिया।

“सब सही?” अधिकारी ने पूछा।

उसने कागज देखा।

“हाँ।”

पीछे किसी ने कहा कि परिवार को बहुत गर्व होगा।

साहिल को इमरान की दुकान के बाहर छोटी मेज याद आई। एक पाए के नीचे मुड़ा गत्ता लगा रहता था।

फिर उसने पूछा कि पुरस्कार का भुगतान वास्तव में कब होगा।

* * *

छह सप्ताह पहले इमरान उस बिजली के सामान की दुकान पर आया था जहाँ साहिल काम करता था।

ग्राहक पंखे के रेगुलेटर पर बहस कर रहा था। उसके जाने तक रुका। फिर हेलमेट काउंटर पर रखा।

“एक मिनट है?”

साहिल वयस्कों की बड़ी तीन पत्ती प्रतियोगिता का प्रवेश देख रहा था। महीनों से बचत की थी। फीस भर चुका था।

यात्रा, रहने और घर पर इतना छोड़ने के पैसे चाहिए थे कि पूरा सफर घबराहट में न जाए।

इमरान को दो हजार चार सौ रुपये चाहिए थे।

जूते ठीक करने वाले उसके ठेले की मशीन खराब हो गई थी। मरम्मत वाला बाकी भुगतान के बाद ही लौटाता। बिना मशीन कुछ काम देर से होते या दूसरी जगह चले जाते।

“अगले महीने लौटा सकता हूँ,” उसने कहा। “तुम्हारे लिए संभव हो तो।”

साहिल मना कर सकता था।

बाद में समझता कि माफी इनकार के लिए नहीं माँगनी थी।

उस समय चचेरा भाई रजत स्पीकर पर था। परिवार की खरीद पर बात का इंतजार कर रहा था।

साहिल भूल गया, या भूलने का नाटक किया, कि आवाज बाहर जा रही है।

“किसी को दिख जाए कुछ बचाया है तो देने की वजह आ जाती है।”

इमरान ने फोन देखा।

“पता नहीं था फोन पर हो।”

रजत हँसा।

साहिल को वहीं रुक जाना चाहिए था।

इसके बजाय बोला, “सबका आपातकालीन बटुआ नहीं हूँ।”

* * *

इमरान ने हेलमेट उठाया।

“ठीक है।”

स्कूल के साल नहीं गिनाए। साथ के भोजन नहीं गिनाए। दुकान बंद होने के बाद रुककर शटर ठीक करवाने वाली शामें नहीं गिनाईं।

माँग को पूरी दोस्ती पर अधिकार नहीं बनाया।

बस चला गया।

रजत अब भी फोन पर था।

“अच्छा किया। सीमा रखनी पड़ती है।”

साहिल ने हेलमेट वाली खाली जगह देखी।

चाहता था कोई सहमत हो।

हो गया तो और खराब लगा।

रात को इमरान को लिखा।

बुरा लगा हो तो माफ करना। मैं भी दबाव में हूँ।

पढ़ा। ठीक लगा। भेज दिया।

जवाब आया: समझ गया।

कई दिन तक साहिल ने उस जवाब को बातचीत के बारे में न सोचने की अनुमति बनाया।

वह तीस साल का था। किसी और का बहाना पहचान सकता था।

अपने बहाने स्पष्टीकरण लगते थे।

* * *

अगले रविवार रजत ने खरीद का प्रस्ताव रखा।

गोदाम खाली होने पर बिजली के इस्तेमाल हुए फिटिंग का माल मिल रहा था। बताया, उठाने के बाद दूसरा खरीदार लेने को तैयार है।

माल रोकने के लिए कुछ समय पैसे चाहिए थे।

साहिल बिजली का सामान जानता था। सवाल पूछे।

रजत के पास जवाब, तस्वीरें और बिल था।

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यह लाभ भी था कि तीस साल से एक ही परिवार की मेजों पर खाता आया था।

“तुम्हारी बचत खतरे में डालूँगा?”

साहिल को सवाल पसंद नहीं आया।

जवाब फिर भी दिया।

अट्ठावन हजार रुपये भेज दिए। प्रतियोगिता की फीस के बाद बचाई लगभग पूरी रकम।

रजत ने एक सप्ताह में लौटाने को कहा। यात्रा तय करने का समय बचता।

सातवें दिन माल उठने में देर थी।

दसवें दिन खरीदार सफर पर था।

चौदहवें दिन फोन नहीं उठा।

साहिल ने कागज पर लिखे गोदाम के संपर्क को फोन किया।

जवाब देने वाले ने कहा ऐसी बिक्री हुई ही नहीं।

कुछ देर साहिल एक सवाल अलग शब्दों में पूछता रहा।

जवाब नहीं बदला।

* * *

पहली भावना गुस्सा नहीं थी।

इच्छा थी किसी को पता न चले।

पिता पूछेंगे इतनी रकम क्यों दी। मालिक सिर हिलाएगा। सबसे खराब, इमरान को आपातकालीन बटुए वाला वाक्य याद आएगा।

रजत जीवन में घुसकर नहीं आया था।

साहिल ने खुद खाता खोला, रकम लिखी और भेजी थी।

इस अंतर से शर्म को धोखे की जिम्मेदारी समझना आसान हो गया।

उसने संदेश, भुगतान का रिकॉर्ड और रजत के कागज इकट्ठे किए। सलाह लेकर औपचारिक शिकायत की।

पैसे वापस नहीं आ गए।

रिश्तेदार ने कहा परिवार की बात भीतर रखो।

साहिल ने पूछा क्या परिवार पैसे लौटाएगा?

कहा गया ऐसे बात नहीं करनी चाहिए।

दुकान पर साधारण ऑर्डर गलत होने लगे। एक बार गलत लंबाई का तार दे दिया। ग्राहक पकड़ने को गली में भागना पड़ा।

प्रतियोगिता की तारीख पास आती रही।

प्रवेश पक्का था।

वहाँ पहुँचना असंभव होता जा रहा था।

रात को पुष्टि का संदेश खोलता और बंद करता। नाम सही था। तारीख सही थी। कोई छोटी गलती नहीं थी जिसे ठीक करके बाकी समस्या मिट जाए।

* * *

गुरुवार को इमरान के ठेले के सामने से निकला।

गली से बच रहा था। उस दोपहर डिलीवरी का रास्ता बंद था। स्विच का डिब्बा लेकर उधर आना पड़ा।

इमरान बाहर हाथों से गोंद साफ कर रहा था।

“साहिल।”

अनसुना कर सकता था।

रुक गया।

“तैयारी कैसी?”

“ठीक।”

इमरान ने देखा।

आरोप की नजर नहीं थी। उससे खराब थी। उस आदमी का परिचित धैर्य था जो पहचानता है कि जवाब का अभिनय हो रहा है।

साहिल ने डिब्बा रखा।

रजत का किस्सा खराब तरह निकला। पहले कागज बताए। फिर बंद फोन। रकम आखिर में कही।

इमरान मुस्कराया नहीं।

यह नहीं कहा कि अब मदद की जरूरत समझी।

पूछा प्रतियोगिता कब शुरू है?

“अगले शनिवार।”

“जा रहे हो?”

“नहीं लगता।”

इमरान ने दुकान के भीतर शेल्फ देखी।

“कल बंद होने के बाद आना।”

साहिल सिर हिलाने लगा।

“मैंने माँगा नहीं—”

“जानता हूँ।”

* * *

अगली शाम इमरान ने छोटी मेज पर बारह सौ रुपये रखे।

“बस का किराया निकलता है। पूछा है।”

साहिल नोट देखता रहा।

“मशीन का क्या?”

“खाला ने मदद की। वापस आ गई।”

“तो यह नहीं ले सकता।”

“क्यों?”

क्योंकि लेने के बाद पुरानी बातचीत की सफाई के पीछे छिपना मुश्किल होता।

क्योंकि उसने माफी मिलने की कल्पना भाषण जैसी की थी। इन नोटों को उसमें रखने की जगह नहीं थी।

कहा, “पता नहीं कब लौटा पाऊँगा।”

“तो अच्छा महसूस करने के लिए बनाई तारीख मत देना।”

तय हुआ कि अगले महीने की तनख्वाह से लौटाना शुरू करेगा। प्रतियोगिता अच्छी जाए या खराब।

इमरान ने छोटी कॉपी में रकम लिखी। उसे दिखाई।

“उधार है।”

“हाँ।”

“किसी जीत का हिस्सा नहीं।”

“हाँ।”

साहिल ने ध्यान से पैसे रखे।

उसे वहीं ठीक से माफी माँगनी चाहिए थी।

मुँह खोला।

इमरान का अगला ग्राहक टूटी पट्टी वाला स्कूल बैग लेकर आ गया।

साहिल रुका। फिर हिम्मत गई।

धन्यवाद कहकर अधूरी माफी साथ ले गया।

* * *

बाकी व्यवस्था भी थी।

मालिक ने अगले महीने के तय काम के बदले वेतन का छोटा अग्रिम दिया।

अभ्यास का परिचित खिलाड़ी आयोजन के पास साझा कमरे में अतिरिक्त बिस्तर रखता था। योगदान साफ तय हुआ।

साहिल ने खर्च गिने। गायब होने का नाटक नहीं किया।

सस्ता सफर होगा। लौटते ही काम पर आएगा। हारा तो पैसे लौटने में समय लगेगा।

पहली बार ऐसी योजना बनाई जिसमें हार की जगह थी।

रजत के प्रस्ताव से पहले की कल्पना से कम रोमांचक थी।

संभव भी थी।

जाने से पहले पिता थैले के पास बैठ गए।

“पहले बताना चाहिए था।”

“पता है।”

“हो सकता था पैसे न होते मेरे पास।”

“पता है।”

पिता ने घिसे हैंडल पर अँगूठा फेरा।

“बताने की सिर्फ वही वजह नहीं होती।”

साहिल ने नीचे देखा।

दोनों चुप बैठे रहे। चुप्पी का उपयोगी काम नहीं निकाला।

फिर पिता उठे और बस के लिए खाना बाँधा।

उन्होंने यह नहीं कहा कि जीतकर आना। डिब्बा अच्छी तरह बंद किया और पूछा कि पानी की बोतल भरी है या नहीं।

* * *

आयोजन में अट्ठावन हजार के बारे में कोई नहीं जानता था।

राहत मिली। फिर समझा कि संख्या साथ लाया है।

हर फैसले के पीछे खड़ी थी।

जीता तो सफर का मतलब होगा।

हारा तो दो बार मूर्ख बनने वाला आदमी लौटेगा।

पहले सत्र में जल्दी फैसला किया। पीछे हुआ।

अगला हाथ पैसे, इज्जत और रजत पर भरोसा करने वाले पंद्रह दिन वापस लाने की कोशिश बन गया।

खराब गया।

विराम में बाहर बैठा। फोन पर इमरान की कॉपी का फोटो खोला।

बारह सौ। वेतन से वापसी।

कहीं नहीं लिखा था कि जीतना है।

इमरान को फोन किया।

“अच्छा नहीं चल रहा।”

“ठीक।”

“ठीक?”

“क्या कहूँ?”

साहिल कमजोर हँसी हँसा।

“पता नहीं।”

पीछे मशीन चली।

इमरान बोला, “मेरा काम है। तुम्हारा खेल। अपना करो। बाद में फोन करना।”

फिर सामने के ग्राहक के पास लौट गया।

* * *

साहिल धीरे सुधरा।

एक शानदार हाथ से पिछला महीना गायब करवाना बंद किया।

अधिकारी ने क्रम स्पष्ट किया तो सुना। समय लेने की माफी के बिना सवाल पूछा।

फिर हारा। उस भावना को फैसला बनाए बिना सहा।

दिन के अंत में अगले चरण तक पहुँच गया।

साधारण खाना खरीदा। साझा बाथरूम में कमीज धोई। घर फोन किया।

पिता ने पूछा पंखा चलता है?

चलता था।

इमरान ने पूछा बस समय पर पहुँची?

पहुँची थी।

दोनों ने नहीं पूछा कितना जीतने की उम्मीद है।

आयोजन की तस्वीर देखकर रजत का संदेश आया।

अच्छे लग रहे हो भाई। गर्व है।

साहिल ने एक बार पढ़ा।

बाकी संदेशों के साथ सुरक्षित किया। फोन रखा।

सही जवाब बनाने में रात नहीं बिताई।

अलार्म लगाना था। कमीज ऐसी जगह टाँगनी थी जहाँ सुबह तक सूख सके।

* * *

दो दिन बाद अंतिम सत्र में पहुँचा।

प्रतियोगिता वैसी वास्तविक हुई जैसी पुरानी कल्पनाओं में नहीं थी।

दूसरे खिलाड़ियों की अपनी वजहें थीं। थके थे। उम्मीद रखते थे। देर से चिढ़ते थे। उसके जीवन से असंबंधित अच्छे फैसले कर सकते थे।

बटन ढीला हुआ तो एक महिला ने सेफ्टी पिन दी, जिससे मुश्किल से बात हुई थी।

पहले हराने वाले आदमी ने आगे पहुँचने की बधाई दी।

साहिल को उनका साथ अच्छा लगने लगा।

आखिरी सत्र में बढ़त के करीब आया। फिर इतना पीछे हुआ कि परिणाम फिर अनिश्चित हो गया।

पानी पिया।

मेज देखी।

बाकी हाथ खेले।

हिसाब की पुष्टि हुई तो पहला था।

कुछ सेकंड घोषणा ऐसे लगी जैसे पीछे खड़े किसी आदमी की हो।

फिर पास वाले खिलाड़ी ने हाथ मिलाया।

साहिल उठा।

घुटने कमजोर लगे।

पुरस्कार चार लाख रुपये था।

अधिकारी नाम जाँचता, उससे पहले चचेरे भाई का फोन आ गया।

* * *

प्रस्तोता ने पूछा किसने साथ दिया?

कई रिश्तेदार लिख चुके थे कि परिवार हमेशा जानता था वह कर सकता है।

चाचा ने अपने घर जश्न रखने को कहा।

रजत का दूसरा संदेश था। किसी से बात करने से पहले फोन करे।

साहिल ने पुरस्कार देखा।

जूते की दुकान वाली छोटी मेज याद आई।

“दोस्त इमरान ने किराया उधार दिया।”

प्रस्तोता ने पूछा पीछे कोई कहानी है?

“हाँ।”

अपना खराब बर्ताव बता सकता था। भावुक भाषण बनता।

निजी चोट को अपनी सार्वजनिक छवि सुधारने में भी इस्तेमाल करता।

नहीं किया।

“उसने यहाँ पहुँचाया। पैसे लौटाने हैं। एक बातचीत भी बाकी है। वह उससे करूँगा।”

प्रस्तोता ने सिर हिलाया। आगे बढ़ा।

साहिल ने पिता, मालिक और कमरा साझा करने वाले खिलाड़ी का धन्यवाद किया।

उनका नाम नहीं लिया जो अचानक उसकी खुशी आयोजित करना चाहते थे।

हॉल में ताली हुई। उसने पहली बार समझा कि धन्यवाद बोलते समय भी चुनना पड़ता है कि किसकी निजी बात अपनी कहानी में लेने का अधिकार है।

* * *

पुरस्कार उसी दोपहर नहीं आया।

कागज पूरे करने थे। भुगतान की व्यवस्था जाँचनी थी।

साहिल घर गया। तय अनुसार काम पर लौट गया।

दो दिन बाद रजत दुकान आया।

मिलकर राहत महसूस करता लगा। जैसे जीत ने दोनों के बीच कुछ हल कर दिया हो।

“भाई, क्या नतीजा!”

साहिल काउंटर के पीछे रहा।

“मेरे पैसे कहाँ?”

“ठीक करने की कोशिश है।”

“ऐसी बिक्री का बिल दिया जो हुई नहीं।”

रजत ने दूसरे सिरे के कर्मचारी को देखा।

“अलग बात करते हैं।”

“भुगतान लिखकर तय कर सकते हैं। शिकायत अभी है।”

“अब ऐसा मत बनो। जीत गए।”

साहिल देर तक देखता रहा।

पैसा तब लिया गया था जब खोना दुखा था।

दूसरा कुछ जीत लेने से हुआ काम नहीं बदला।

“मेरा नतीजा तुम्हारा भुगतान नहीं।”

रजत के पास काम का जवाब नहीं था।

इस बार साहिल ने ढूँढ़ने में मदद नहीं की।

* * *

पुरस्कार आया तो कुछ खरीदने से पहले दो भुगतान किए।

इमरान के बारह सौ लौटाए।

फिर मालिक का अग्रिम समझौते के अनुसार चुकाया।

दोनों को पुष्टि भेजी।

कुछ मिनट बाद इमरान ने मिलने की खबर दी।

साहिल ने पूछा बंद होने के बाद आ सकता है?

“चाय लाना। मिठाई नहीं। अच्छा होता है तो सब मिठाई लाते हैं। खाला का आधा डिब्बा अब भी है।”

साहिल दो चाय लाया।

लगभग महँगा उपहार भी खरीद लिया था।

फिर सोचा कि इमरान को तय करना पड़ेगा क्या उपहार लेना बातचीत से बचने देना है?

बिना उपहार दुकान से निकला।

ठेले पर इमरान ने छोटी मेज लगाई।

एक पाया हिला।

साहिल ने गत्ता मोड़कर नीचे रखा।

बरसों बिना सोचे किया था।

अब परिचित हरकत से गला कस गया।

चाय का गिलास रखते समय जाँचा कि मेज स्थिर है। वह थोड़ी देर इसी छोटे काम में लगा रहना चाहता था। फिर बैठ गया।

* * *

“माफी माँगनी है,” उसने कहा।

“पैसे लौटा दिए।”

“उसके लिए नहीं।”

इमरान रुका।

साहिल ने बिजली की दुकान वाली दोपहर कही।

शुरुआत अपने दबाव से नहीं की। अंत भूल जाने के अनुरोध से नहीं किया।

“पूछा था मदद कर सकता हूँ। मैंने ऐसा दिखाया जैसे फायदा उठाने आए हो। रजत को हँसने दिया। फिर ऐसा संदेश भेजा जैसे तुम्हारी चोट गलतफहमी हो।”

इमरान ने चाय देखी।

“पैसा सबसे बुरा हिस्सा नहीं था।”

“जानता हूँ।”

“जानते हो?”

साहिल रुक गया।

जल्दी कह दिया था।

इमरान बोला कि एक खास परेशानी वाला दोस्त बनकर आया था। गया तो लगा बीच के सारे साल एक उधार की माँग तक छोटे हो सकते हैं।

साहिल ने किस्सा बेहतर बनाने की कोशिश किए बिना सुना।

खत्म हुआ तो बोला, “ऐसा करने के लिए माफी चाहता हूँ।”

वाक्य कम लगा।

बहाने जोड़ने के बजाय कम रहने दिया।

इमरान ने चाय पी।

“नाराज था इसलिए बस छूटने नहीं देता।”

साहिल ने सिर हिलाया।

इस बार दूसरे की भलाई को अपनी गलती छोटी होने का प्रमाण नहीं बनाया।

* * *

दोस्ती बिल्कुल पहले जैसी नहीं हुई।

भरोसा साधारण मुलाकातों, निभाए समय और बिना माँग से शुरू हुई बातचीत में लौटा।

रविवार को साहिल ने नई काम की मेज उठवाने में मदद की।

कहाँ रखनी है, उसका पहला सुझाव इमरान ने मना किया।

बहस की। दरवाजा नापा। इमरान सही निकला।

रजत की शिकायत अपनी प्रक्रिया में चली। साहिल ने रिकॉर्ड रखे। जो वापस नहीं मिला था, उसे अपने पैसे में नहीं गिना।

बचे पुरस्कार का सोचकर इस्तेमाल किया। कुछ अलग रखा। काम करता रहा।

प्रतियोगिता के निमंत्रण थे। बिल भी। परिवार की जिम्मेदारियाँ भी। ऐसी सुबहें भी जब खास महसूस नहीं होता।

एक बार कठिन ड्यूटी के बाद ठेले पर पहुँचा तो इमरान बात करने के लिए बहुत थका था।

“कल,” उसने कहा।

साहिल को पुराना डर हुआ कि शायद मतलब कुछ बड़ा है। फिर अधूरे मरम्मत के सामान और मशीन के पास ठंडे होते भोजन को देखा।

शुभरात्रि कहा। चला गया।

अगली शाम बात हुई।

सीख रहा था कि दोस्त का खराब दिन पूरी दोस्ती का फैसला नहीं होता। हर चुप्पी में अपना नाम ढूँढ़ना जरूरी नहीं था।

बाद में मोहल्ले की शादी में चाचा ने मुख्य मेज पर बुलाया।

“चैंपियन यहाँ बैठता है।”

रजत वहीं था।

साहिल ने धन्यवाद कहा। बताया किसी और से बैठने का वादा है।

बाहर इमरान खाला को कागज की प्लेटों में नाश्ता बाँटने में मदद कर रहा था।

साहिल ने प्लेट ली। पास की नीची दीवार पर बैठ गया।

भाषण नहीं था।

चाय बहुत गरम थी।

दोनों ने ठंडी होने का इंतजार किया।

इस बार साहिल जानता था कि शाम के किस हिस्से के लिए आया है।

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