रात बारह बजकर बारह मिनट पर डिलीवरी करने वाली ने निलेश से एक गिलास पानी माँगा।
वह अब भी भुगतान भेजने की कोशिश कर रहा था।
“एक मिनट,” उसने कहा।
“दो ले लो। पानी पहले दे दो।”
सीढ़ियों की रोशनी के नीचे वह दवा का थैला कलाई में फँसाए खड़ी थी। जैकेट के कंधे बारिश से गहरे हो गए थे। नीचे स्कूटर का इंजन ठंडा होते समय हल्की टिक-टिक कर रहा था।
कमरे से पिता ने पुकारा।
निलेश ने दरवाजा देखा, फिर अटकी भुगतान स्क्रीन।
महिला ने थैला मेज पर रख दिया।
“दुकान बंद हो रही थी। बाकी पैसे मैंने दे दिए। बैंक चलने लगे तो भेज देना।”
वह देखता रहा।
“नौ सौ साठ रुपये।”
उसने रकम साफ कही, इससे पहले कि एक उपयोगी व्यवस्था किसी अस्पष्ट वादे में बदल जाए।
“नाम क्या है?”
“रज़िया।”
“कल दे दूँगा।”
“तो कल दे देना।”
उसने पानी लिया और खड़े होकर पिया।
निलेश का फोन बजा।
स्क्रीन पर टीम के उस कप्तान का नाम था जो आठ घंटे बाद उसे बताने वाला था कि उसने जिम्मेदारी कभी सीखी ही नहीं।
* * *
निलेश इकतीस साल का था। स्थानीय कारोबारों के लेबल छापने वाली दुकान पर काम करता था।
पिता सुरेश लंबी बीमारी से उबर रहे थे। दोबारा दिखाने जाना होता। निर्धारित दवाएँ लानी होतीं। कुछ शाम थकान से साधारण भोजन में घंटा लग जाता।
निलेश सूचियाँ बनाने में अच्छा हो गया था।
यह मानने में उतना अच्छा नहीं हुआ था कि सूची दिन को लंबा नहीं बना सकती।
जिस मेज पर क्लिनिक के कागज थे, वहीं तीन पत्ती के अभ्यास नोट रहते। दो साल से मानव की कप्तानी वाले समूह के साथ वयस्क टीम आयोजनों में खेल रहा था।
अगली सुबह चयन सत्र था। क्षेत्रीय प्रदर्शन प्रतियोगिता के लिए टीम की तीन जगहें तय होतीं।
पिता के पास रहने को बुआ बुला ली थीं। दुकान की ड्यूटी बदल ली थी। कपड़े दवाओं वाले फोल्डर के पास रखे थे।
एक नियमित दवा मिलने में देर हुई तो फार्मेसी ने पैकेट देर से भेजा। फिर भुगतान अटक गया।
अकेली कोई बात असाधारण नहीं थी।
सब साथ हुआ तो लगा कि पिछले दिन की सुबह से अगली सुबह की तरफ दौड़ रहा है।
उसने मानव का फोन उठाया।
“नौ बजे ही है न?”
“साढ़े आठ पहुँचना। इंतजार मत करवाना।”
* * *
रज़िया ने खाली गिलास सिंक के पास रखा। निलेश लिफाफे के पीछे समय लिख रहा था।
उसने मानव को अभी हुई बात की पुष्टि भेजी।
साढ़े आठ रिपोर्ट करूँगा। सत्र नौ बजे। बुआ आठ से पहले आ जाएँगी।
जवाब आया: पक्का।
निलेश ने रज़िया को भुगतान की गलती फिर दिखाई।
उसने हाथ हिलाया।
“नंबर भेजो। रसीद भेज दूँगी।”
रसीद पर फार्मेसी का समय था। डिलीवरी के संदेश में थैला सौंपने का समय दर्ज था।
वह इसलिए सँभालती थी क्योंकि पैसे की बात आते ही कभी-कभी अजनबियों को डिलीवरी अलग तरह से याद आती थी।
जाने से पहले पूछा कि दवा रसोई में रखे या कहीं और।
निलेश ने लेबल देखा। फार्मेसी के निर्देश के अनुसार बाकी सामान के पास रख दी।
पिता ने फिर पुकारा।
रज़िया ने हेलमेट उठाया।
“जाओ। सीढ़ियाँ ढूँढ़ लूँगी।”
निलेश थैला लेकर कमरे में गया। शोर के लिए माफी माँगी।
पिता ने पूछा कौन आया था?
“डिलीवरी वाली।”
“इस बारिश में?”
“हाँ।”
“चाय पूछी?”
उसने खाली दरवाजे की तरफ देखा।
सिर्फ पानी दिया था।
एक और छोटी बात छूट गई थी।
* * *
वह आठ बजकर तेईस मिनट पर हॉल पहुँचा।
कुर्सियाँ समेटी जा रही थीं।
पहले लगा गलत कमरे में आ गया।
फिर नया खिलाड़ी दिखा। वही टीम वाली कमीज पहने था जो पिछले महीने निलेश ने मँगवाई थी। थोड़ी बड़ी थी।
मानव स्कोर रखने वाले के पास खड़ा था।
“चयन आठ बजे खत्म हो गया।”
निलेश ने घड़ी देखी।
“नौ कहा था।”
“समय बदला।”
“रात पुष्टि की थी।”
मानव ने बाकी लोगों को देखा।
“तुम्हारी समस्याओं के हिसाब से सब नहीं चल सकता।”
नए खिलाड़ी ने अपनी कमीज देखी।
निलेश ने फोन निकाला।
कप्तान ने नहीं देखा।
“पिता बीमार हैं। समझते हैं। लेकिन यह टीम है।”
वाक्य ठीक वहीं लगा जहाँ लगाना था।
दो साल का अभ्यास, योगदान और चुराए घंटे पिता के शरीर के लिए माँगी जाने वाली माफी में सिमट गए।
निलेश बोला, “जो तुमने किया, उसे समझाने के लिए उनका इस्तेमाल मत करो।”
मानव का चेहरा सख्त हुआ।
“टीम से बाहर हो।”
* * *
निलेश चिल्लाया नहीं।
दरवाजे पर खड़े आदमी को निराशा हुई। वह पहले ही फोन उठा चुका था।
बाहर जाकर खड़ी वैन के पास रुका। अँगूठा इतना काँप रहा था कि अपना फोन नहीं खोल पाया।
बुआ का फोन आया। पूछा कब लौटेगा?
“जल्दी।”
“इतनी जल्दी?”
“हाँ।”
घर पहुँचा तो पिता खिड़की के पास बैठे थे। ऐसे दिन के लिए तैयार थे जिसमें घर से निकलना नहीं था।
“कैसा रहा?”
निलेश ने जरूरत से ज्यादा सँभालकर थैला रखा।
पिता देखते रहे।
फिर बोले, “मेरे कारण हुआ।”
“नहीं।”
“रात खुद कर लेना चाहिए था।”
“नहीं।”
दूसरा जवाब इतना तेज निकला कि दोनों डर गए।
निलेश रसोई में चला गया।
मेज पर रज़िया की रसीद थी।
नौ सौ साठ रुपये।
छोटा, स्पष्ट कर्ज।
बैंक ऐप खोला। अब भेज सकता था। फिर अगले सप्ताह के जरूरी खर्च देखे। उँगली बटन के ऊपर रुक गई।
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चयन के बाद मिलने वाला प्रायोजक खर्च अब मानव की टीम से नहीं आता।
कल का वादा किया था।
कल आ चुका था।
* * *
रज़िया का फोन दोपहर में आया।
न उठाने की वजह सोचने से पहले उठा लिया।
“भूला नहीं हूँ।”
“पूछने वाली थी कि दुकान ने रसीद की बाकी प्रति भेजी?”
बताया कि आ गई।
फिर पैसे की देर समझाई।
“कितनी देर?”
“कुछ दिन चाहिए।”
उसने यह नहीं कहा कि कोई बात नहीं। कई ड्यूटियों के बाद इतनी रकम बचती थी। उसके अपने बिल थे।
ऐसी तारीख बताने को कहा जिसे निभा सके।
निलेश ने काम का कैलेंडर देखा। शुक्रवार कहा।
“शुक्रवार, फिर।”
उसने बताया कि अगली लंबी ड्यूटियों से पहले स्कूटर का पिछला टायर बदलवाना है। उसके लिए पैसे अलग रखे थे। उनमें से कुछ अब निलेश के दवा वाले थैले में थे।
निलेश फिर माफी शुरू करने लगा।
“समय माँगा है इसलिए बता रही हूँ,” वह बोली। “मेरा समय क्या खर्च करवाएगा, वह भी पता रहे।”
उसने रज़िया के नाम के पास तारीख लिखी।
बाकी दोपहर मन होता रहा कि लंबा संदेश भेजकर समझाए वह अच्छा आदमी है। नहीं भेजा। उसने अच्छा होने का प्रमाण नहीं माँगा था। अपने पैसे वापस माँगे थे।
यह अंतर उसे कर्ज की रकम से बड़ा लगा।
फोन रखने से पहले आवाज अलग होने का पूछा।
सुबह की थोड़ी बात बताई। खुद सुनकर बेवकूफी जैसी लगी। बड़ा आदमी समझा रहा था कि उस चीज के लिए समय पर पहुँचा जो उसके बिना हो चुकी थी।
रज़िया को दरवाजे वाला फोन याद था।
“साढ़े आठ कहा था।”
“हाँ।”
“फिर ऐसे क्यों बता रहे हो जैसे तुम भूल गए?”
निलेश देर तक जवाब नहीं दे पाया। पहली बार किसी ने उसकी कहानी से वह दोष निकाला था जो उसने खुद नहीं किया था।
* * *
पहली शिकायत पर क्षेत्रीय आयोजक का जवाब सावधान था।
मानव ने बताया था कि आधी रात से पहले सभी को पहले शुरू होने की सूचना मिल गई थी।
दावा था कि निलेश पारिवारिक आपात स्थिति में उपलब्ध नहीं था। पुराने समय को नया समझ बैठा।
निलेश ने दो बार पढ़ा।
रात कोई आपात स्थिति नहीं थी। साधारण, कठिन शाम थी।
अंतर अचानक महत्वपूर्ण हो गया।
उसने मानव की पूरी बातचीत भेजी। आधी रात के बाद वाली पुष्टि भी।
उसकी सहमति से रज़िया ने अपना डिलीवरी रिकॉर्ड और रसीद दी। दरवाजे पर सौंपे सामान और सुनी समय वाली बातचीत का छोटा विवरण लिखा।
उसका रिकॉर्ड सब कुछ साबित नहीं करता था।
बातचीत को निश्चित समय पर रखता था। ज्यादा महत्वपूर्ण यह था कि मानव की लिखित पुष्टि उससे मेल खाती थी।
आयोजक ने टीम से असली बदलाव की सूचना माँगी।
पिछली शाम जल्दी प्रशासकों को मिल गई थी।
संशोधित संदेश में निलेश शामिल नहीं था।
सिर्फ न आने वाला स्पष्टीकरण अब रिकॉर्ड से नहीं बैठता था।
* * *
समीक्षा ने किसी दूसरे की जगह उसे नहीं दी।
लेकिन ठीक तरह बताए चयन में अनुपस्थित रहने वाला दावा हट गया।
क्षेत्रीय आयोजन में बिना टीम वाले खिलाड़ियों का अलग खुला रास्ता था। अंतिम तारीख बाकी थी।
आयोजक ने सामान्य आवेदन का तरीका बताया।
निलेश ने फीस और तारीखें देखीं।
बुआ एक दोपहर दे सकती थीं, पूरा सप्ताहांत नहीं।
पड़ोसी काम के बाद दो घंटे दे सकता था।
पिता सुनते रहे। बोले, “मैं क्या कर सकता हूँ, मुझसे पूछो।”
निलेश का मुँह दिलासा देने को खुला। फिर रुका।
साथ मिलकर योजना बनाई। न यह नाटक था कि पिता को कुछ नहीं चाहिए, न यह कि सब निलेश को करना है।
पिता ने घर की मुलाकातों की सूची अपने पास रखने को कहा। सामान्य फोन खुद कर सकते थे। हर बार बेटे के उठाने का इंतजार करने के बजाय लोगों को उसके काम का समय बता सकते थे।
शाम को निलेश ने उन्हें बुआ से शनिवार की व्यवस्था करते सुना। दरवाजे पर रुक गया। आदत से बातचीत अपने हाथ में लेने वाला था।
पिता ने फोन पर हाथ रखा।
“बात कर रहे हैं। जाकर चाय पूरी करो।”
निलेश वापस रसोई में गया। चाय अभी गरम थी।
एक छोटा काम उसके किए बिना पूरा हो रहा था। राहत महसूस करके उसे पहले अपराधबोध हुआ। फिर पिता की कमरे से आती सामान्य आवाज सुनी और बैठ गया।
उसने स्वतंत्र नाम लिखवाया।
अभ्यास में पहली चीज मानव की आवाज का न होना था।
चुप्पी तुरंत आरामदेह नहीं लगी।
आदत थी कि कोई बताता था थकान कब बहाना है और कब चरित्र की कमी।
अब उस टिप्पणी के बिना अपना काम जाँचना था।
* * *
प्रायोजन तय होने से पहले शुक्रवार आ गया।
निलेश ने वेतन से कुछ रकम भेजी। ठीक बताया कि कितनी बाकी है।
रज़िया ने जाँचा।
“मिल गए।”
निलेश को लगा था निराशा ज्यादा तेज सुनाई देगी।
इसके बजाय पूछा कि नया आयोजन होगा?
“आगे पहुँचा तो।”
“ठीक।”
वह भुगतान पर कोई प्रभावशाली बात कहना चाहता था। बताना चाहता था कि आधी रात डिलीवरी वाली से सहजता से पैसे लेने वाला आदमी नहीं है।
फिर याद आया कि भरोसेमंद दिखना और होना अलग हैं।
बाकी रकम और अगली सहमत तारीख लिखकर भेजी।
रज़िया ने सीधी पुष्टि की।
शाम को पिता के सोने के बाद अभ्यास किया। खाना लेकर आए दोस्त से बार-बार हारा। दोस्त मुलाकात को प्रेरक भाषण नहीं बना रहा था।
“जल्दी कर रहे हो।”
“पता है।”
“तो पिछले झगड़े का जवाब देते हुए यह हाथ मत खेलो।”
निलेश ने पत्ते देखे।
उस रात पहली बार सच में देखे।
* * *
रविवार दोपहर वह चुना गया।
खबर मिलने पर कैमरा नहीं था। दुकान पर छपी शीट गलत किनारे से काट रहा था।
ठीक से पढ़ने से पहले औजार रख दिया।
स्वतंत्र जगह के साथ छोटा सहभागिता प्रायोजन मिल सकता था, बाकी कागज स्वीकार होने के बाद।
पैसे खाते में नहीं थे।
पहले से खर्च नहीं किए।
पिता को फोन किया।
सुरेश ने पूछा किस दिन प्रसारण देखने के लिए खाली रहें?
निलेश ने समय देखा।
फिर रज़िया को फोन करने लगा। याद आया कि वाहन चला रही हो सकती है। संदेश भेजा।
मुख्य आयोजन में पहुँचा। कागज बाकी हैं। रकम नहीं भूला हूँ।
एक घंटे बाद जवाब आया।
अच्छा। पहले हिस्से की बधाई।
निलेश पढ़कर मुस्कराया।
उसने खुश होने का तरीका ढूँढ़ा था, बिना कर्ज को ऐसा उपहार बनाए जिसका निलेश ने अधिकार नहीं कमाया था।
* * *
मानव आयोजन स्थल पर मिला।
हाथ बढ़ाकर शुरू किया।
निलेश का हाथ नीचे रहा।
“अजीब मत बनाओ।”
“लिखा कि उपलब्ध नहीं था।”
“दबाव था।”
“गलत घंटे की पुष्टि का समय था।”
कप्तान ने प्रवेश की मेज की तरफ देखा।
“खैर, अब आ गए।”
निलेश प्रस्ताव पहचान गया। मान ले कि सब ठीक हो गया, तो किसी को किए का नाम नहीं लेना पड़ेगा।
उसने नहीं माना।
आयोजन में व्यक्तिगत क्रम टीम के सम्मान से अलग था।
निलेश अपने नाम से था। पुरानी टीम के कई खिलाड़ी भी थे, मानव समेत।
प्रारूप में वापस लिए जाने को माँगे बिना उनसे मिल सकता था।
पहली जानकारी देते समय अधिकारी ने जाँचा कि सबको एक ही समय-सारणी मिली है।
निलेश लगभग हँस दिया।
स्पष्ट करने के लिए इतनी छोटी चीज।
किसी और की सुविधा पर छोड़ने की इतनी महँगी कीमत।
* * *
पिता घर पर बुआ के साथ देख रहे थे।
खेल से पहले तस्वीर आई थी। दोनों सोफे पर। रिमोट बीच में ऐसे रखा जैसे किसी को पूरा भरोसा न हो।
निलेश ने फोन रख दिया।
पहले दौर असमान रहे। एक हाथ अच्छा, अगला खराब।
विराम हुआ तो पता चला जबड़ा कस रखा है।
पानी पिया। सिर्फ घर का संदेश देखा।
नहीं था।
इस बार संदेश न होना अच्छा समाचार था।
बाद में पुरानी टीम का खिलाड़ी सामने आया।
धीमे से बोला, “सोचा बदलाव जानते हो।”
“पूछ सकते थे।”
उसने सिर हिलाया।
फिर खेले।
निलेश उससे आगे रहा।
अंतिम सत्र तक मानव मुकाबले में था। बाकी पुराने साथी पीछे हो गए थे।
अब कप्तान उसे अविश्वसनीय अधीनस्थ जैसी सहनशील निगाह से नहीं देख रहा था।
मेज की समस्या की तरह देख रहा था।
निलेश को वही पसंद था।
* * *
आखिरी सत्र बिना गलती का नहीं था।
एक बड़े मुकाबले में नुकसान हुआ। अगला फैसला कप्तान के चेहरे से तय करवाए बिना लौटना था।
मानव बोला, “ध्यान बेहतर हुआ है।”
निलेश ने अधिकारी से आगे बढ़ने को कहा।
मुकाबले को अपनी नौकरी का मूल्यांकन नहीं बनाना था।
बाकी खेल करीब रहा।
अंतिम स्थान पुष्ट हुए तो व्यक्तिगत क्रम में निलेश पहला था। मानव और पुरानी टीम के हर खिलाड़ी से आगे।
कप्तान ने नतीजा दो बार जाँचा।
निलेश ने फोन देखा।
बुआ का आवाज वाला संदेश था। पीछे पिता कह रहे थे कि चिल्लाओ मत, पड़ोसी समझेंगे कुछ हो गया।
वह फिर भी चिल्ला रही थीं।
पुरस्कार के समय निलेश ने उन लोगों का धन्यवाद किया जिन्होंने आना संभव बनाया।
बुआ, पड़ोसी, अभ्यास वाला दोस्त और वह राइडर जिसने उसे बहकाए जाने को भूलना कहने नहीं दिया।
आयोजक ने नाम पूछा।
“रज़िया।”
किसी ऐसी महिला की कहानी नहीं कही जो सिर्फ उसे बचाने के लिए मौजूद हो।
जो किया था, बताया।
* * *
स्वीकृत कागजों की प्रक्रिया के बाद सहभागिता प्रायोजन दो कार्यदिवस में आया।
दुकान पर सूचना खोली।
किसी को बताने से पहले रज़िया को दवा की बाकी रकम भेजी।
हिसाब और पुष्टि भेजी।
उसने ड्यूटी के बाद जवाब दिया।
हिसाब पूरा।
कुछ सेकंड सिर्फ शब्द देखता रहा।
फिर लिखा: खाना खिलाने बुला सकता हूँ? निमंत्रण की तरह। कर्ज चुकाने का दूसरा तरीका नहीं।
उसका फोन आया।
“सबको हिसाब के साथ बुलाते हो?”
“नहीं। आमतौर पर कम व्यवस्थित हूँ।”
वह हँसी।
“गुरुवार। देर नहीं। अगली सुबह जल्दी काम है।”
उसने पसंद पूछी।
उसने अपने रास्ते के पास जगह बताई। कुछ साबित करने के लिए महँगी जगह न चुनने को कहा।
फोन के बाद पिता के पास बैठकर निमंत्रण बताया।
सुरेश ने पूछा कि इस बार पानी से ज्यादा पूछने का इरादा है?
निलेश ने चेहरा हथेलियों में रख लिया।
देखा तो पिता हँस रहे थे।
* * *
रज़िया साधारण कपड़ों में आई। हाथ में हेलमेट था।
निलेश जल्दी उठा और चम्मच गिरा दिया।
उसने दूसरा माँगा। रज़िया इंतजार करती रही।
“अच्छी शुरुआत।”
बस में धन्यवाद का भाषण तैयार किया था। इस्तेमाल नहीं किया।
इसके बजाय दिन पूछा।
उसने गलत पता देने वाले ग्राहक का बताया। आखिर खड़खड़ाता हिस्सा ठीक करने वाले मैकेनिक का बताया।
एक कोर्स करना चाहती थी। ड्यूटी में समय निकालना था।
निलेश ने छपाई की दुकान के बारे में बताया।
रेस्तराँ की चटनी पर असहमति मिली।
भोजन के बीच पिता का संदेश आया। पड़ोसी के साथ खा लिया था। जल्दी आने की जरूरत नहीं थी।
रज़िया ने पढ़ते देखा।
“सब ठीक?”
“हाँ।”
“तो थोड़ा रख दो।”
उसने रख दिया।
बाहर हेलमेट बाँधकर उसने पूछा कि फिर मिलना चाहेगा, किसी ऐसे दिन जब किसी का किसी पर कर्ज न हो?
निलेश मुस्कराया।
“चाहूँगा।”
इस बार वह गई तो निलेश अगली मुलाकात पूछना नहीं भूला था।