1. Joy Rummy कहानी: जिस विदाई पर वह सहमत नहीं थी
घोषक ने सावित्री को विदाई का उपहार लेने बुलाया। वह कुर्सी पर बैठी रही। बासठ साल की उम्र में इतने क्लब समारोह देख चुकी थी कि पहचान सके, शिष्टाचार कब सवाल रोकने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। सौतेला बेटा रोहित मंच पर शाल और तस्वीर पकड़े था।
“बड़ों को यादों का आनंद लेते समय सम्मान देना चाहिए,” उसने कहा। सावित्री ने सुबह भरा खिलाड़ी पंजीकरण देखा। प्रवेश स्वीकार था। शायद विदाई समिति को नहीं बताया गया था।
“मैंने खेलना छोड़ा नहीं है,” उसने कहा। पहली पंक्ति की आवाज़ माइक्रोफोन तक पहुँची। कुछ लोग प्यारी आपत्ति समझकर हँसे। रोहित उतरकर कान के पास बोला, “हमें शर्मिंदा मत कीजिए। सब तय हो चुका है।”
“किसके लिए?”
उसने कोहनी पकड़ी। सावित्री ने हाथ हटा दिया। उसके पिता से शादी के बाद वर्षों तक रोहित के गुस्से, पढ़ाई और कठिन पहली नौकरी के लिए जगह बनाई थी। पति की मृत्यु के बाद परिवार के अनुरोध दयालु फैसले बनकर आने लगे। यात्रा असुविधाजनक थी। देर की शामें अनावश्यक। पुरानी खेलने की जगह किसी युवा के काम आ सकती थी।
मंच पर तस्वीर के पास शाल इंतज़ार कर रही थी। सावित्री ने पंजीकरण रसीद बैग पर रखी। “धन्यवाद दे सकते हो। मेरे लिए समाप्त नहीं कर सकते।”
कमरे की हँसी रुक गई। उसने कुर्सी नहीं छोड़ी। उस दिन पहली बार सबको तय करना पड़ा कि उसके कहे वाक्य को गंभीरता से सुनना है या नहीं।
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2. जगह पहले ही दे दी गई थी
रोहित ने उसकी टीम जगह गौतम को देने का वादा किया था। वह मजबूत वयस्क खिलाड़ी था जिसे क्लब लाना चाहता था। विदाई से बदलाव विवाद की जगह उदारता लगता। यह बात बाद में समिति सदस्य से पता चली। उसे हैरानी थी कि सावित्री सहमत नहीं थी।
घर पर रोहित ने कहा क्लब को ऊर्जा चाहिए। हाल की हार और घोषणा जाँचने में लगे समय का जिक्र किया।
“जाँचना खेल का हिस्सा है।”
“लोग इंतज़ार कर रहे थे।”
“नियम के भीतर इंतज़ार कर सकते हैं।”
उसने जिद्दी कहा। सावित्री ने शब्द अब अलग सुना। बचपन में जिद्दी का अर्थ था कि कठिन होमवर्क समझ आने तक उसके साथ बैठी रहती। अब अर्थ था सुविधाजनक बनने से इनकार। बहू पूजा बहस में नहीं आई। बाद में पूछा कि कार्यालय से चयन नियम लाए या नहीं।
“हाँ।”
उपलब्ध यात्रा स्थानों के लिए खुले ट्रायल थे। पुराना नाम चयन सुनिश्चित नहीं करता था। पारिवारिक घोषणा स्वीकृत प्रवेश हटाती भी नहीं थी। सावित्री ने हिंदी प्रति ध्यान से पढ़ी और रिपोर्टिंग समय पर निशान लगाया। जगह अर्जित करनी होगी। वह उचित था। अनुचित यह तय करना था कि कोशिश का अवसर भी न मिले।
उसने विदाई निमंत्रण दराज में रखा और ट्रायल सूचना नाश्ते की मेज़ पर छोड़ी। सुबह चाय के साथ वही पढ़ी। रोहित ने दूसरी ओर देखा, लेकिन कागज़ उठाकर नहीं हटाया। इस छोटे घरेलू दृश्य में भी फैसला अब केवल उसका नहीं था।
3. जिन बातों पर सवाल भूल गई थी
पहले अभ्यास ने दिखाया कि रोहित की आलोचना में असुविधाजनक सच था। वह पहले जितना अच्छा नहीं खेल रही थी। इससे उसका फैसला सावित्री का फैसला नहीं बनता था।
वह वयस्क अभ्यास मंडली में गई, जिसका कोई एक गुरु नहीं था। खिलाड़ी कठिन हाथ लाते, खेल के बाद बनाते और उस समय उपलब्ध फैसलों पर बहस करते। सावित्री परिचित व्यवस्था पर अधिक भरोसा करती थी। क्वीन का सेट बन गया तो तोड़ना बुरा लगता, भले एक क्वीन दूसरे समूह को मजबूत करे। जोकर पहली जगह रखा तो वहीं आश्वस्त करता।
समूह ने वही तेरह पत्ते कई तरह जमाने को कहा। ऐसी संभावनाएँ दिखीं जो पहली साफ व्यवस्था ने ध्यान रोककर छिपा दी थीं। एक आदत और मिली: हर सीक्वेंस तीन पत्तों का होना चाहिए, ऐसा सोचती थी। लंबा सही सीक्वेंस उपयोगी हो सकता था। केवल समान आकार दिखाने के लिए तोड़ने की जरूरत नहीं थी।
समीक्षा में बड़े हाथ से बने कार्ड चिन्ह इस्तेमाल किए। उनसे मेज़ के पार बदलाव समझना आसान था। खेल में सामान्य कार्ड और सबके समान नियम रहे। अभ्यास थकाता था। ध्यान की कीमत पर सहनशक्ति साबित करने के बजाय छोटे सत्र रखे।
हर सत्र के बाद सबसे अधिक चौंकाने वाला निर्णय लिखा। कॉपी यादों से नहीं, सुधारों से भरी। उसे यह बदलाव अच्छा लगा, हालांकि शुरुआत में स्वीकारना कठिन था कि दशकों का अनुभव भी किसी गलत ढंग से पकड़े जोकर को सही जगह नहीं पहुँचा देता। उसे खुद पत्ता हटाना पड़ता था।
4. अपना समय
रोहित अभ्यास की शामों को अस्थायी विरोध समझता था। उसी समय काम बताता और उपलब्ध न होने पर हैरान होता। सावित्री ने हर बार पूरा इतिहास समझाना छोड़ा।
“गुरुवार शाम तय है।”
“किसके लिए?”
“तुम जानते हो।”
पूजा ने घर के काम बदले, ताकि भोजन के लिए सावित्री को सत्र छोड़ना जरूरी न हो। बदलाव व्यावहारिक था, नाटकीय नहीं। उससे रोहित का दावा कमजोर हुआ कि उसके बिना सब बिखर जाएगा।
मेज़ पर अलग समस्याएँ थीं। उसने जुड़े छोटे पत्तों और अकेले ऊँचे पत्तों की उपयोगिता तुलना की। खुला कार्ड लेने से हाथ इतना सुधरता है या नहीं कि बाद का डिस्कार्ड उचित हो, देखा। विरोधी ने वास्तव में क्या उठाया और वह उसका कौन सा पूरा हाथ कल्पना करना चाहती है, अलग किया।
एक शाम खास क्वीन का इंतज़ार करते अच्छा हाथ बिगाड़ा। नई ड्रॉ ने दूसरा रास्ता दिया था, मगर उसने फिर विचार नहीं किया। आगे के कार्ड छिपाकर उसी क्षण से दोबारा खेला। विकल्प खुद खोज लिया।
लौटते समय छोटा कैलेंडर खरीदा। ट्रायल तारीख और बाकी अभ्यास शामें लिखीं। परिवार के कामों के बीच अपने चुने समय की जगह थी। उसे रोहित के पुराने कैलेंडर के पास टाँगा। उसके देखने पर हटाया नहीं।
अगली सुबह किसी ने किराना लाने को कहा तो उसने समय बताया। काम से इनकार नहीं किया था। केवल यह मानने से इनकार किया था कि हर दूसरा काम पहले से उसके खेल से महत्वपूर्ण है।
5. नया खिलाड़ी अच्छा था
गौतम खुली अभ्यास बैठक में आया। पैंतीस साल का, व्यवस्थित और रोहित की डींगों से अनुमान किए से बेहतर खिलाड़ी था। उसने अपमान नहीं किया। पूरे सत्र में हराया और पूछने पर एक निर्णय समझाया। मुलाकात ने आरामदेह बहाना हटा दिया। उसे खाली पसंदीदा व्यक्ति नहीं कह सकती थी। कठिन विरोधी होगा, क्योंकि अच्छा खेलता है।
सावित्री अपनी समीक्षा पर लौटी। दो डील में महँगे पत्ते देर रखे। दूसरी में उचित फैसला लेकर भी हारी। अगला अभ्यास सही समस्या सुधारे तो अंतर जरूरी था।
उसने ट्रायल के प्रकाशित प्रारूप में पूरे सत्र खेलने शुरू किए। तय डीलों की कुल पेनल्टी से चयन होता और हर स्कोर जाँचा जाता। एक शानदार घोषणा पूरे दोपहर की लापरवाही नहीं मिटाती। अभ्यास परिणाम सुधरे, फिर गिरे। एक खराब सप्ताह में सोचा कि रोहित को सार्वजनिक हार का आनंद मिलने से पहले नाम वापस ले ले।
पूजा ने पूछा कि वह हटना चाहती है या चयन की गारंटी। सावित्री ने तुरंत जवाब नहीं दिया। अगले दिन अभ्यास गई। दोनों इच्छाओं का फर्क समझती थी। केवल एक पर अपनी ओर से कार्रवाई कर सकती थी।
उस शाम गौतम नहीं आया। विरोधी अलग थे और हाथ भी। वह फिर हारी, मगर किसी क्वीन के इंतज़ार में पूरा रास्ता बंद नहीं किया। समीक्षा में उस छोटे सुधार को दर्ज किया। बेहतर खिलाड़ी बनने का रास्ता हमेशा जीत की पंक्ति से नहीं दिखता था। कुछ पन्नों पर केवल बेहतर वजहें लिखी थीं।
6. शाल डिब्बे में रही
ट्रायल सुबह रोहित ने पूछा विदाई की शाल पहनेगी या नहीं। सावित्री ने कहा खेलने का कमरा गर्म होगा। उसे उत्तर पसंद नहीं आया। पंजीकरण पर अपना नाम दिया और मेज़ जाँची। गौतम वहीं था। दो दूसरे वयस्कों से मेज़ पूरी थी। तय डीलों का सत्र चलता और सबसे कम कुल पेनल्टी वाले उपलब्ध स्थान लेते।
सावित्री ने स्थिर शुरुआत की। एक वैध घोषणा की, अगली डील सीमित पेनल्टी से हारी और तीसरी को सम्मान की तत्काल भरपाई नहीं बनाया। गौतम अच्छा खेला। पहले हिस्से की बढ़त कई अच्छे फैसलों से थी, डराने से नहीं।
रोहित दर्शकों की जगह से देख रहा था। सावित्री पत्ते फिर जमाने में समय लेती तो घड़ी देखता। अधिकारी चिंतित नहीं था। वह अनुमत गति में थी।
ब्रेक में पानी पिया और प्रकाशित स्कोर देखा। चयन के पास थी, सुरक्षित नहीं। गौतम ने पूछा कि हवा के सीधे रास्ते से कुर्सी हटवाना चाहेगी या नहीं।
“नहीं, धन्यवाद।”
साधारण शिष्टाचार प्रोत्साहन से ज्यादा आरामदेह था। वास्तविक विरोधी उसे अपना उत्तर देने योग्य मान रहा था। उसने कुर्सी वहीं रहने दी और अगली डील के लिए लौटी। रोहित कुछ कहना चाहता दिखा, लेकिन खेल के समय कोई सलाह नहीं माँगी गई थी। सावित्री ने उसकी ओर जवाब का संकेत नहीं किया। मेज़ पर अभी बाकी काम था।
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7. जो हाथ पूरी कहानी नहीं बना
अगली डील खराब गई। उलझे कार्ड मिले और उपयोगी संरचना जल्दी नहीं बनी। तैयार होने से पहले दूसरे खिलाड़ी ने वैध घोषणा की। पेनल्टी से स्थान बिगड़ा। सावित्री को विदाई भाषण फिर बनता सुनाई देने लगा: यादें, आराम, युवा ऊर्जा, उपहार के रूप में बंद दरवाज़ा। अधिकारी स्कोर लिख रहा था। उसने विचार जाने दिए।
कार्ड उठाए गए। अगली डील दूसरा हाथ थी। उसमें प्योर सीक्वेंस जल्दी मिला। उसने बचाया और बाकी विरोधी योजनाओं की संख्या घटाई। नया हाथ पुराने का बदला लेने नहीं भेजा। फिर भी पहले समाप्त नहीं हुई। लेकिन बची पेनल्टी छोटी थी। दूसरे की बड़ी पेनल्टी से अंतर कम हुआ। गौतम ने कुल स्कोर देखा। चयन स्थान पास आ रहे थे।
सावित्री ने उँगलियाँ फैलाने को छोटा अनुमत ब्रेक लिया और लौटी। उसने पूरे सत्र के ध्यान की योजना बनाई थी, थकान न दिखाने की नहीं। अगली डील वैध घोषित की। अधिकारी ने हर समूह देखकर परिणाम दर्ज किया।
पहली बार रोहित ने समय देखना छोड़कर स्कोर देखना शुरू किया। आख़िरी डील अंतिम उपलब्ध जगह तय करेगी। सावित्री ने पानी का कप दूर रखा। उसे कई वर्षों में इतना स्पष्ट काम नहीं मिला था: सामने आए पत्तों को ठीक समझना। कमरे की राय बाद में बदल सकती थी। पहले हाथ की संरचना बदलनी थी, और उसके लिए कोई दर्शक सहायता नहीं कर सकता था।
8. गलत काम में लगा जोकर
आख़िरी हाथ में कई उपयोगी समूह और एक परेशानी वाला अतिरिक्त पत्ता था। सावित्री ने दिल का प्योर सीक्वेंस, हुकुम का प्योर सीक्वेंस, अलग सूट की तीन क्वीन और दो जुड़े चिड़ी के पत्तों के साथ प्रिंटेड जोकर जमाया। ईंट का अकेला किंग बचा।
कई बारी व्यवस्था लगभग पूरी दिखी, पूरी हुई नहीं। उसने दूसरे रूप देखे, मगर उचित सुधार नहीं मिला। फिर चिड़ी का नौ आया। चिड़ी का सात और आठ अब उसके साथ नैचुरल सीक्वेंस बना सकते थे। प्रिंटेड जोकर दूसरे काम के लिए मुक्त था।
उसे तुरंत अकेले किंग के पास नहीं रखा। उससे पूरा हाथ हल नहीं होता। उसने सेट की हुकुम क्वीन देखी। उसे हुकुम के नौ, दस, जैक से जोड़ने पर चार पत्तों का प्योर सीक्वेंस बनता। बची दिल और ईंट की क्वीन जोकर के साथ सही सेट बना सकती थीं।
उसने धीरे जमाया ताकि कोई कार्ड दो जगह इस्तेमाल न हो। दिल का प्योर क्रम बना रहा। नया चिड़ी सीक्वेंस पूरा था। ईंट का किंग छोड़ा जा सकता था। सामने गौतम इंतज़ार कर रहा था। उसे अंदर का पुनर्गठन नहीं दिख रहा था, केवल सावधानी से चल रहे हाथ दिखे।
सावित्री ने फिर गिना। इस बार परिचित व्यवस्था ने उत्तर पूरा होने से पहले सवाल बंद नहीं किया था। उसने आख़िरी बार समूह अलग किए और बाहर जाने वाला कार्ड चुना। पहले से रखा जोकर अब भी उपयोगी था, लेकिन उसी पुराने काम में नहीं।
9. तेरह पत्ते, चार सही समूह
ईंट का किंग छोड़कर सावित्री ने हाथ खोला। दिल का चार, पाँच, छह एक प्योर सीक्वेंस था। हुकुम का नौ, दस, जैक, क्वीन दूसरा। चिड़ी का सात, आठ, नौ तीसरा। दिल की क्वीन, ईंट की क्वीन और प्रिंटेड जोकर का बाकी सेट। तीन, चार, तीन, तीन। तेरह कार्ड।
अधिकारी ने समूह देखकर घोषणा सही मानी। दूसरे हाथ प्रकाशित नियम के अनुसार जाँचे गए। पूरे सत्र के अच्छे खेल से गौतम पहला चयन स्थान लेता रहा। अंतिम परिणाम से सावित्री ने दूसरी और आख़िरी जगह ली, उस खिलाड़ी से आगे जिसे रोहित गौतम के साथ जाने वाला मान चुका था। उसके लिए लिए गए फैसले को हराने के लिए कमरे के हर व्यक्ति को हराना आवश्यक नहीं था।
अंतिम शीट पर हस्ताक्षर होते समय रोहित बैरियर पर आया। “लंबे सीक्वेंस के बारे में निश्चित हैं?” उसने अधिकारी से पूछा। अधिकारी ने नियम और हाथ दिखाया।
गौतम ने सावित्री की ओर हाथ बढ़ाया। “यह पुनर्गठन अच्छा था।”
उसने हाथ मिलाया। “लगभग जोकर वहीं छोड़ दिया था।”
“लेकिन छोड़ा नहीं।”
बात फैसले की थी, उम्र की नहीं। सावित्री ने चयन शीट देखी। नाम उसी सत्र में अर्जित जगह पर था जहाँ बाकी खेले थे। विदाई के मंच पर दिखाया चित्र उसकी पुरानी उपलब्धि का था। यह कागज़ आज की उपलब्धि का था। दोनों में अंतर छोटा नहीं था और आज उसे कोई स्मृति कहकर नहीं दे रहा था।
10. यात्रा का फॉर्म
घर पर रोहित ने यात्रा फॉर्म खाने की मेज़ पर रखकर अपनी व्यवस्था समझानी शुरू की। सावित्री ने रुकने को कहा। तारीखें, मिलने की जगह और संपर्क खुद पढ़े। फिर अपने निर्णय वाले भाग भरे। पूछा तो पूजा ने छोटे अक्षर जाँचे, फॉर्म हाथ से नहीं लिया।
रोहित ने कहा कि परिवार उसका भला चाहता है। “तो घोषणा से पहले पूछो।” आवाज़ ऊँची नहीं थी। वाक्य उसके बिना ही कठिन था।
क्लब ने विदाई प्रस्तुति रद्द की। सचिव ने पारिवारिक आदेश को खिलाड़ी की सहमति मानने पर माफी माँगी। शाल डिब्बे में रही, जब तक सावित्री ने ठंडी सुबह उसे पहनना नहीं चुना। शाल की तरह, निष्कर्ष की तरह नहीं।
अंतरजिला यात्रा से पहले गौतम और उसने अभ्यास तय किया। वह मजबूत हाथ लाया। सावित्री ट्रायल वाला अंतिम विन्यास लाई, उस क्षण सहित जब जोकर का काम बदला था।
रवाना होते समय रोहित आयोजक को बताने लगा कि सावित्री कहाँ बैठे। उसने पहले उत्तर दिया और टीम के सामान के पास खिड़की की सीट ली।
आयोजक ने रोहित से पूछा, वह भी जा रहा है क्या? उसने सिर हिलाकर मना किया और बस से पीछे हट गया। सावित्री ने यात्री सूची पर अपना नाम जाँचा, फिर शीशे से हाथ हिलाया।
विदाई वाला शॉल ठंडी यात्रा के लिए बैग में था। अब वह इस्तेमाल की साधारण चीज था। बाहर उसका खेल जीवन खत्म करने वाला बेटा टीम को उसे अगली प्रतियोगिता तक ले जाते देख रहा था।
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