1. JW777 कहानी: चार कुर्सियाँ खाली रहीं
दीपा ने विवाह के दोपहर के भोजन में चार अतिरिक्त कुर्सियाँ मँगाई थीं। सत्तावन वर्ष की उम्र में समझती थी कि उम्मीद मेज़ के आसपास करीने से रखी जाए तो कितनी मूर्ख दिख सकती है। उसने कुर्सियाँ फिर भी रखीं।
बेटी अन्वी नहीं आई। उसका पति संतोष भी नहीं। मिठाई लाने का वादा करने वाले दो रिश्तेदार भी नहीं। इस्तेमाल न हुई प्लेटें हटाने से पहले भोजन वाले ने दीपा के सिर हिलाने की प्रतीक्षा की।
नए पति अनिल ने अतिरिक्त मेज़पोश मोड़ दिया। दोबारा फोन करना चाहती है क्या, नहीं पूछा। वह साठ वर्ष का था और जानता था कि दीपा पहले कितनी बार कोशिश कर चुकी है।
शाम को अन्वी का संदेश आया—मुझसे उन्हें पिता कहने की उम्मीद मत रखना।
मैंने कभी नहीं कहा, दीपा ने लिखा।
अगली सुबह पुस्तकालय में उसकी मेज़ पर पार्सल था। अन्वी ने तय किया था कि माँ की कुछ चीज़ें पुराने पारिवारिक घर में अब नहीं रहनी चाहिए। ऊपर दीपा का क्लब बैज पड़ा था।
पड़ोस की रमी लीग का पंजीकरण संतोष सँभालता था। उसने कई सदस्यों से कहा था कि दीपा अब परिवार का प्रतिनिधित्व नहीं करेगी। शुरुआती सूची में उसका नाम नहीं था।
दीपा ने घिसे फीते से बैज उठाया। अठारह वर्षों से पुस्तकालय की चाबियों के पास उसी हुक पर टँगा था।
काम खत्म होने पर वह क्लब गई। पूरा भरा फॉर्म मेज़ पर रखा और सचिव से अपना नाम दर्ज करने को कहा।
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2. सूची में नाम
सचिव ने अंतिम तारीख जाँची और फॉर्म स्वीकार कर लिया। दीपा ने नाम वापस नहीं लिया था। उसकी शादी पसंद न होने पर संतोष को दूसरे वयस्क खिलाड़ी की ओर से हटने का अधिकार नहीं था।
नाम जोड़ा जा रहा था तभी संतोष आया।
“लोग बात करेंगे,” उसने कहा।
“शुरू कर चुके हैं।”
“इंतज़ार कर सकती थीं।”
“किस बात का?”
उसने बाकी मेज़ों की तरफ देखा। पसंद का जवाब मिलने से पहले दीपा रसीद लेकर निकल गई।
लीग के पहले चरण में निर्धारित आमने-सामने मुकाबले थे। सबसे ऊपर के चार खिलाड़ी आठ डील की अंतिम मेज़ पर पहुँचते। वहाँ सबसे कम कुल पेनल्टी वाले को सीज़न कप मिलता। प्रारूप प्रवेश फॉर्म के साथ लगाया गया था।
पति की मृत्यु के बाद के वर्षों में दीपा कभी-कभी खेलती रही थी, मगर पूरे सत्र का अभ्यास छूट गया था। अच्छी संभावित सीक्वेंस जल्दी दिख जाती। कभी वह वर्षों पुराने हाथ में अटक भी जाती और नए पत्ते ऐसे जमाती जैसे पुराने साथी अपने आप आ जाएँगे।
गंभीर तैयारी की पहली शाम बहुत लंबी चली। शुरू अच्छा किया, फिर सरल वैकल्पिक व्यवस्था छूट गई। अनिल ने खाना पूछा तो नाराज़ हो गई।
उसने प्लेट ढककर मेज़ पर छोड़ दी। बाद में दीपा ने माफी माँगी। अगले अभ्यास पन्ने पर रुकने का समय लिखा। वह उसे अपने जीवन के साथ चाहती थी, अंतहीन खराब मनोदशा के बाहर प्रतीक्षा करते नहीं।
3. पुस्तकालय की अधूरी सूची
पुस्तकालय में दीपा सूची की गलती सामने रखी पुस्तक से मिलाकर सुधारती थी। अब वही धैर्य पत्तों पर लगाया। मगर खेल को किताबों की अलमारी की तरह नियंत्रित मानने की भूल नहीं की।
अभ्यास साथी रफीक चौंतीस वर्ष का भाषा शिक्षक था। काम के बाद वाचनालय इस्तेमाल करता था। दोनों छोटे पूर्ण सत्र खेलते, फिर पत्ते रखने के बाद चुनी बारियाँ दोबारा बनाते। खेलते समय दीपा छिपे हाथों का निजी लिखित रिकॉर्ड नहीं रखती थी।
समीक्षा में केवल दिखी जानकारी लिखती—खुला पिकअप, डिस्कार्ड, अपने पत्ते। हर अनुमान के आगे प्रश्नचिह्न लगाती। सामने वाला किसी ऐसे व्यक्ति जैसा लगता जिसे समझना चाहती थी, तो वह अनिश्चित बात निश्चित मान लेती थी।
उन्होंने सीक्वेंस की सीमाएँ बदलना भी सीखा। लंबी प्राकृतिक रन हमेशा एक समूह नहीं रहनी थी। उसे बाँटने से दो वैध सीक्वेंस बनती हों तो संभव था। लेकिन बीच के खाली स्थान व्याख्या से गायब करके हर मनचाहे समूह को बाँटा नहीं जा सकता था।
रफीक तेरह पत्तों की व्यवस्था देता। हर पत्ते का हिसाब माँगता। एक पत्ता दो समूहों में आता तो व्यवस्था असफल। जोकर इस्तेमाल होता तो वह उसकी जगह स्पष्ट करती।
अब दीपा अभ्यास से ऐसे प्रश्न लेकर लौटती जिन्हें समझा सके। केवल यह धुँधली शिकायत नहीं होती कि ध्यान उसका साथ छोड़ गया है।
4. पहली मुलाकात बेटी जीतती है
शुरुआती कार्यक्रम में दीपा का मुकाबला अन्वी से पड़ा। बेटी बत्तीस वर्ष की थी। कई लोग उसे केवल संतोष की पत्नी समझते, जबकि वह उनसे बेहतर खेलती थी। दीपा ने बहुत पहले नियम सिखाए थे, जब दोनों ने पारिवारिक विवाद के दो तरफ बैठना नहीं सोचा था।
अन्वी अकेली आई। बैग कुर्सी और दीवार के बीच रखा। सहज बातचीत की जगह नहीं छोड़ी।
मुकाबला दीपा हारी। चौथी डील में बड़े ढीले पत्ते के उपयोगी रास्ते कम होने के बाद भी उसे पकड़े रही। समीक्षा में गलती दिखी। मेज़ पर वह अपने विकल्पों की जगह अन्वी का चेहरा देख रही थी।
बेटी ने जश्न किए बिना परिणाम पर हस्ताक्षर किए। “यह करना ज़रूरी नहीं,” उसने कहा।
“खेलना?”
“सब कुछ सार्वजनिक बनाना।”
दीपा ने स्कोरपत्र देखा। “यह पहले से कार्यक्रम में था।”
अन्वी ने कलम कैप में दबाई। खाली विवाह कुर्सियों का नाम किसी ने नहीं लिया।
घर में दीपा ने चौथी डील दोबारा लगाई। अनिल पास अखबार लेकर बैठा रहा। दीपा ने दर्ज पिकअप पढ़ने को कहा तो पढ़े। उसे इतना रमी नहीं आता था कि कौन सा पत्ता फेंकना है बताए। वह वही जानकारी दे सकता था जो उस समय वास्तव में उपलब्ध थी।
इस बार दीपा ने बड़ा पत्ता छोड़ दिया। फिर अगला ड्रॉ बदलकर निर्णय दोबारा परखा।
5. पारिवारिक मुलाकातों के बीच मेहनत
बाकी मुकाबलों में छोटी-छोटी गलतियाँ सुधरीं। जल्दी घोषणा करने वाले प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ उसने एक अच्छे सेट को निहारते हुए बाकी बिखरे हाथ को भूलना छोड़ा। सावधान खिलाड़ी के सामने उपयोगी लचीलापन बचाया। तुरंत अंत न दिखे तो उसे बेकार समझकर नहीं फेंका।
एक और मुकाबला हारी। फिर इतनी जीत मिलीं कि चयन की दौड़ में रही। रफीक ने देखा कि समीक्षा के पन्ने छोटे होने लगे। सामने वाले के चेहरे का अर्थ क्या होगा, इस पर लंबे अनुच्छेद नहीं थे। संबंधित पत्ते और चुनाव दर्ज थे।
एक शाम उसने छह प्राकृतिक लगातार पत्तों की रन दी। दीपा उसे एक साथ रखकर बोली कि दूसरी सीक्वेंस नहीं दिख रही।
“सीमा देखिए,” रफीक ने कहा।
उसने छह पत्तों को तीन-तीन के दो समूहों में बाँटा। रंग और क्रम दोनों का समर्थन करते थे। जो शर्त गायब लग रही थी, वह हाथ के अंदर थी।
फिर पाँच पत्तों की रन दी गई जिसे ऐसे नहीं बाँटा जा सकता था। दीपा को आकर्षक नकल अस्वीकार करके दूसरा रास्ता खोजना पड़ा।
अंतिम क्वालिफाइंग मुकाबले में सभी तेरह पत्ते दो बार जाँचकर उसने वैध घोषणा की। नतीजे से चौथे स्थान पर पहुँची। अन्वी, संतोष और नगरपालिका कर्मचारी सुशील बाकी स्थानों पर थे।
परिवार अंतिम मेज़ साझा करने वाला था। इस बार दीपा की कुर्सी सूची में छपी थी।
6. आठ डील, चार अलग हाथ
अंतिम दोपहर अनिल दीपा के साथ आया, मगर सार्वजनिक बाधा के पीछे बैठा। संतोष ने उसे देखा और पूछा कि समर्थकों का पंजीकरण होना चाहिए क्या।
आयोजक ने सबके लिए पहले से चिह्नित दर्शक क्षेत्र दिखाया। अनिल खुद संतोष को उत्तर दिए बिना बैठ गया।
मेज़ पर चारों ने अपनी जगहें निकालीं। आठ डील अलग से गिनी जातीं। पहले चरण के नतीजों से सीट मिली थी, कोई छिपी बढ़त नहीं। हर खिलाड़ी का हाथ अलग था और चुनाव अलग।
दीपा की शुरुआत खराब रही। पहली डील में दो अनिश्चित रास्ते बहुत देर पकड़े रहने से बड़ी पेनल्टी लगी। दूसरी में ढीला बोझ घटाया और नुकसान कम रखा। सुशील ने साफ घोषणा करके याद दिलाया कि मेज़ पर केवल पारिवारिक विवाद नहीं बैठा है।
तीसरी डील तक संतोष आगे था। कुल अंक बताए गए तो उसने कलम से स्कोरपत्र थपथपाया।
दीपा ने पानी पिया और अगले तेरह पत्ते देखे। एक बनी हुई प्योर सीक्वेंस सुरक्षित शुरुआत देती थी। आसपास विकल्प थे, वादा नहीं। महँगा अलग पड़ा पत्ता उसने छोड़ दिया, इससे पहले कि वह दूसरा भावनात्मक लगाव बन जाए।
वह डील उसने पूरी की। पत्ते जाँचे गए तो बेटी की तरफ देखने की जगह हाथ स्थिर रखे और अंक सुनने की प्रतीक्षा की।
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7. अन्वी जो पत्ता छोड़ती है
पाँचवीं डील में अन्वी ने किंग फेंका। इससे पहले संतोष ने उससे संबंधित पत्ता उठाया था। अपनी बारी आने पर उसने उसे तीखी नज़र से देखा। वह नज़र अनुचित थी। अन्वी को अपना हाथ सँभालना था और संतोष की पूरी व्यवस्था छिपी थी।
दीपा ने बेटी का जबड़ा कसते देखा। यही चेहरा उन भोजनों में देखा था जहाँ संतोष उन फैसलों की व्याख्या करता जिन्हें अन्वी ने उससे करने को कहा ही नहीं था।
चलती मेज़ पर दीपा के कहने लायक उपयोगी बात नहीं थी। उसने अपने पत्ते देखे। फेंका किंग हाथ को इतना नहीं सुधारता था कि उठाना उचित हो। उसने बंद ढेर से लिया।
डील के बाद संतोष अन्वी से पूछने लगा कि वह पत्ता क्यों छोड़ा। सुशील ने स्कोर लिखने वाले से सबके कुल अंक पढ़ने को कहा। बातचीत भाषण बनने से पहले अगली डील शुरू हो गई।
छठी डील दीपा की घोषणा बिना खत्म हुई, मगर बची वैध संरचना से पेनल्टी नियंत्रित रही। सातवीं में साफ अंत मिला और वह संतोष से थोड़ा आगे आ गई। अन्वी और सुशील पीछे थे। एक डील बची थी।
छोटे विराम में पानी की मेज़ पर अन्वी माँ के पास खड़ी हुई। अकेले बैठे अनिल को देखा।
“पूरे समय के लिए आए?”
“हाँ,” दीपा बोली।
अन्वी ने गिलास भरा। माँ के पानी पी लेने तक वहीं रही।
8. एक लंबी रन दो बनती है
अंतिम डील ने तैयार अंत नहीं दिया। दीपा पान की लंबी रन की तरफ बढ़ी। दो उपयोगी समूह बचाए और वास्तव में सामने छोड़े गए पत्ते देखे।
अंत में उसके पास पान के तीन, चार, पाँच, छह और सात थे। चिड़ी, ईंट और हुकुम के किंग थे। चिड़ी, ईंट और पान के नौ प्रिंटेड जोकर के साथ थे। एक ईंट की क्वीन थी।
तेरह पत्ते। पाँच पत्तों की पान सीक्वेंस प्योर थी। तीन किंग सेट बनाते थे। नौ और जोकर चार पत्तों का वैध सेट बना सकते थे। लेकिन क्वीन अलग थी और दूसरी सीक्वेंस चाहिए थी।
बंद ढेर से पान का आठ आया।
एक पल उसने सुंदर छह पत्तों की रन देखी और वही गायब दूसरी सीक्वेंस। फिर दिमाग में सीमा खिसकी। पान के तीन, चार, पाँच एक प्योर सीक्वेंस थे। छह, सात, आठ दूसरी।
किंग साथ रहे। नौ और जोकर का चार पत्तों वाला सेट वैध रहा। जोकर गायब चौथे रंग की जगह था। तीन जोड़ तीन जोड़ तीन जोड़ चार से तेरह पूरे हुए। ईंट की क्वीन फेंकी जा सकती थी।
हाथ में समूह एक-दूसरे पर चढ़े थे तब उसने घोषणा नहीं की। स्पष्ट अलग रखे, हर पत्ता एक बार जाँचा और क्वीन डिस्कार्ड के ढेर पर रख दी।
“घोषणा,” उसने कहा।
9. विजेता के पास की जगह
संतोष आगे झुका, जैसे दोनों पान सीक्वेंस के बीच कोई खाली क्रम मिल जाएगा। आयोजक ने समूह जाँचे, फिर पूरी संख्या। दीपा की घोषणा वैध थी।
अंतिम पेनल्टी दर्ज हुई। उसकी बढ़त बढ़ गई। आठ डील का कुल पुष्ट हुआ तो सीज़न कप उसका था।
अन्वी ने अलग हुई दोनों पान की सीक्वेंस देखीं। “मुझे छह साथ ही दिखते रहे,” उसने कहा।
“पहले मुझे भी।”
सुशील ने बधाई दी और बाद के विश्लेषण के लिए अंतिम व्यवस्था की तस्वीर माँगी। संतोष ने अपने पत्ते एक ढेर में रखे। बराबर किए। फिर बराबर किए।
पुरस्कार के समय उससे कप के पास परिणाम पत्र रखने को कहा गया। कई सप्ताह से वह ऐसे बोलता था जैसे दीपा की भागीदारी उसकी दी जाने या हटाई जाने वाली पारिवारिक अनुमति हो। अब उसका नाम पढ़ा जा रहा था और संतोष कागज़ सीधा पकड़ रहा था।
दीपा ने कप लेकर दर्शकों की तरफ देखा। इशारा करने पर अनिल उठा। इतनी धीरे आया कि उसे दोबारा हाथ से बुलाना पड़ा।
अन्वी ने मंच के पास अतिरिक्त कुर्सी हटाई ताकि उसके लिए जगह बने। उसने उसे कोई संबोधन नहीं दिया। केवल हटकर माँ के पास खड़े होने दिया।
तस्वीर हो जाने के बाद संतोष खाली प्रदर्शन स्टैंड पकड़े रह गया।
10. बिना शर्त मुलाकात
दो शाम बाद पुस्तकालय बंद होने से पहले अन्वी आई। दीपा पुस्तक का ढीला पन्ना जोड़ रही थी। बेटी ने गोंद लग जाने की प्रतीक्षा की।
“मुझे भोजन में आना चाहिए था,” उसने कहा।
दीपा ने पन्ने पर हाथ रखा ताकि सीधा बैठे। “चार कुर्सियाँ रखी थीं।”
“पता है। मौसी ने बताया।”
कुछ देर दोनों छत का पंखा सुनती रहीं।
अन्वी बोली कि याद वाले परिवार में अनिल को कैसे रखे, समझ नहीं आता। दीपा ने कहा समय ले सकती है। मगर माँ से हमेशा उसी स्मृति के अंदर रहने को नहीं कह सकती।
बेटी ने सिर हिलाया। रविवार आने की बात पूछी तो यह शर्त नहीं लगाई कि कौन मौजूद हो।
घर में दीपा ने लीग कप पुस्तकालय की किताबों के पास शेल्फ पर रखा। अनिल ने विवाह वाला मोड़ा मेज़पोश अलमारी में रखा था। रविवार के लिए निकाला तो वह क्रीज़ मिली जहाँ इस्तेमाल न हुआ सिरा अंदर किया गया था।
रविवार को भोजन लगने से पहले बेटी आ गई। अनिल मेज़ के सिरे पर खड़ा था, समझ नहीं पा रहा था कि वह कहाँ बैठेगी। दीपा ने उसकी प्लेट अपनी प्लेट के पास रखी और तीसरी सामने छोड़ी।
बेटी तीसरी कुर्सी पर बैठी। उसने अनिल से पानी माँगा। विवाह के मेज़पोश का मोड़ा सिरा अब तीनों प्लेटों के नीचे खुला था। दीपा ने हथेली से पुरानी सिलवट ठीक की और पूछा कि पहले किसे परोसे।
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