King777: घर उसने ले लिया था, आखिरी चाल बड़े भाई की थी
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King777: घर उसने ले लिया था, आखिरी चाल बड़े भाई की थी

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

King777 की मौलिक शतरंज कहानी: पिता के अंतिम संस्कार के बाद निकाला गया प्रकाश चार बाज़ियों के लिए लौटता है और एक अप्रत्याशित चाल से हिसाब बदल देता है।

1. King777 कहानी: दरवाज़े के बाहर खड़ा बेटा

पिता की अंतिम यात्रा से लौटे आखिरी पड़ोसी के जाने तक मेरे भाई ने प्रतीक्षा की। फिर उसने मुझसे चाबियाँ माँगीं। मुझे लगा ऊपर का कमरा खोलना होगा। उसने दोबारा हाथ फैलाया और कहा, “सारी चाबियाँ, प्रकाश।”

नौ साल से मैं उसी घर में रहता था। पिता को पानी चाहिए होता तो उठता। अस्पताल की तारीखों और उनके लकड़ी के बोर्ड पर अधूरी शतरंज की बाज़ियों से दिन गिनता। रोहन टूर्नामेंट के पदक लेकर आता था। मैं बिस्तर की चादरें धोता था। मालाओं से घिरी तस्वीर के पास रखी पारिवारिक तस्वीरों में वह लगभग हर जगह मौजूद था।

उसने कहा कि घर अब उसकी ज़िम्मेदारी है। यहाँ उस व्यक्ति के लिए जगह नहीं जो कुछ योगदान नहीं देता। मेरा बिस्तर गेट के पास एक बोरे में रखा था।

मैंने पिता का बोर्ड उठाना चाहा। रोहन ने उस पर हथेली रख दी।

“यह किसी शतरंज खिलाड़ी के पास रहना चाहिए।”

खुली खिड़कियों से पड़ोसी अब भी सुन सकते थे। मैं अड़तीस साल का था। मेरे छोटे भाई ने जीवन के नौ साल फुटपाथ पर रखे बोरे में बदल दिए थे।

उस रात मैं फोटोकॉपी की दुकान के पीछे सोया, जहाँ काम करता था। पिता की मेज़ समेटते समय लकड़ी का एक प्यादा मेरी कमीज़ की जेब में रह गया था। मैंने उसे कंबल के पास खड़ा कर दिया।

बरसों बाद पहली रात थी जब कोई मुझे पानी माँगने के लिए नहीं जगाने वाला था।

फिर भी नींद नहीं आई।

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2. कॉपी के हाशिये में बचा जवाब

पिता और मैं पुराने हिसाब की कॉपियों के हाशिये में बाज़ियों का विश्लेषण करते थे। रोहन उन्हें बीमार आदमी का समय बिताना कहता था। अंतिम संस्कार के तीन हफ्ते बाद उसने उन्हीं में से एक विश्लेषण अपने नाम से क्लब की पत्रिका में छपवा दिया।

आखिरी हिस्सा गलत था। उसने आकर्षक बलिदान की चाल उतार ली थी, लेकिन वह शांत बचाव छोड़ दिया था जो पिता और मैंने बाद में खोजा था।

मैंने क्लब के चर्चा समूह में यह लिखा। रोहन ने हँसते हुए आवाज़ का संदेश भेजा। उसका सुझाव था कि पहले मैं पिता से अगली चाल पूछे बिना एक पूरी बाज़ी खेलना सीख लूँ।

किसी ने वह बातचीत पुराने क्लब सदस्यों की सार्वजनिक चर्चा में डाल दी। जिन्हें मैं जानता भी नहीं था, वे तय करने लगे कि मैं ईर्ष्यालु हूँ, झूठा हूँ या मूर्ख हूँ। एक आदमी ने मुझे सामान उठाने वाला भाई कहा। उसके बाद पढ़ना बन्द कर दिया।

मैं पुरानी तस्वीरों और तारीखों के पीछे रात बिता सकता था। मैंने गत्ते के बोर्ड पर वही स्थिति लगाई और गायब बचाव की चाल चली। फिर उसके विरुद्ध सबसे अच्छा जवाब। फिर उस जवाब का उत्तर।

आधी रात के पास अपने ही विश्लेषण में दूसरी गलती मिली। उसे सुधारने के लिए प्यादा छोड़ना पड़ता था, लेकिन अंत बच जाता था। मैंने चार पन्ने काटे और फिर शुरू किया।

रोहन को बोर्ड पर चुनौती देनी थी तो मेरे हिस्से की गणना मेरा गुस्सा नहीं करने वाला था।

3. रात की दूसरी ड्यूटी

फोटोकॉपी की दुकान नौ बजे बन्द होती थी। मैं फर्श साफ करता, गत्ते का बोर्ड खोलता और ग्यारह बजे तक पढ़ता। उससे अधिक नहीं। थकान में मुझे ऐसे संयोजन दिखने लगते जो ठीक बचाव के सामने गायब हो जाते थे।

मेरा अभ्यास साथी फरहान था, एक बस कंडक्टर। छुट्टी के दिन वह लम्बी बाज़ियाँ खेलता। हम लगभग बराबर थे, इसलिए कोई गुरु बनकर अपनी गलती नहीं छिपा सकता था। वह बहुत जल्दी हमला करता। मैं स्थिति से डरते ही मोहरे बदलने लगता। हम दोनों एक-दूसरे की कमजोरी पहचानते थे।

हम चालें लिखते और जीती बाज़ियों से पहले हारी हुई बाज़ियाँ खोलते। बुधवार को राजा और प्यादों के अंत पढ़ते। रविवार को घड़ी लगाकर खेलते और बाद में देखते कि किस मोड़ पर सोचने के बजाय आदत से चाल चलने लगे थे।

मैं बदले का बड़ा संयोजन चाहता था। फरहान बार-बार ऐसी सरल स्थिति रख देता जिसमें राजा का एक लापरवाह कदम जीत को बराबरी में बदल देता।

“एक अतिरिक्त प्यादे से नहीं जीत सकते,” वह कहता, “तो पूरी सेना क्यों माँग रहे हो?”

महीने बीत गए। मैंने काम की जगह सोने के बजाय छोटा कमरा किराए पर ले लिया। लकड़ी का प्यादा खिड़की के पास रहता। कभी गत्ते का प्यादा घिस जाता तो उसकी जगह यही लगाता।

रोहन का नाम बातचीत में आता तो मैंने जवाब देने से पहले सामने की स्थिति पूरी करना सीख लिया।

4. चार शाम, एक मेज़

अंतिम संस्कार के तेरह महीने बाद क्लब ने पिता की याद में प्रदर्शनी मैच की योजना बनाई। घोषणा में रोहन को उनकी शतरंज परम्परा का उत्तराधिकारी बताया गया। मेरा नाम कहीं नहीं था।

मैंने आयोजक मालिनी से खेलने की जगह माँगी। उसने दोनों भाइयों के बीच चार बाज़ियों का मैच सुझाया। लगातार चार शाम। दोनों को बराबर समय। रंग बारी-बारी बदलेंगे। मैच बराबर रहा तो परिणाम बराबरी ही लिखा जाएगा; किसी एक की प्रचार वाली जीत नहीं बनेगा।

मेरे जवाब देने से पहले रोहन मान गया। उसने कहा कि यह दुखद पारिवारिक गलतफहमी दूर करने का अवसर होगा।

उद्घाटन के इंटरव्यू में उसकी सावधानी कम थी।

“प्रकाश पिता की बाज़ियाँ इसलिए जानता है क्योंकि हमारे खेलने के बाद मोहरे वही समेटता था।”

दर्शकों में हल्की हँसी हुई। उनमें दो आदमी थे जिन्होंने मुझे बोरा लेकर घर से निकलते देखा था।

पहली बाज़ी मैं हार गया।

उसे अच्छा बनाकर बताने का कोई तरीका नहीं है। रोहन ने तीखी ओपनिंग चुनी, केंद्र पर पकड़ रखी और मेरी खुली स्थिति का लाभ उठाया। अपने राजा की रक्षा करने के बजाय मैं उसकी रानी के पीछे भागा। बीस मिनट उस हमले की गणना की जो चल नहीं सकता था। फिर भी वही हमला कर दिया।

इकतीसवीं चाल पर मैंने हार मान ली। उसने बड़े अंदाज़ से स्कोरशीट पर हस्ताक्षर किए और पूछा कि क्या मैं मैच छोटा करना चाहता हूँ।

मैंने अपना पेन उसके पास रख दिया।

“तीन बाज़ियाँ बाकी हैं।”

5. वह आधा अंक जो वह छीन नहीं पाया

उस रात फरहान खाने का पैकेट लेकर कमरे पर आया। कोई सलाह साथ नहीं लाया। पहले हमने खाना खाया। फिर उसने हारी हुई स्थिति लगाई और मुझे रोहन वाले मोहरों से बचाव करने को कहा।

दस मिनट में समझ आ गया कि मेरा हमला क्यों विफल हुआ था। मैं ऐसी चाल ढूँढ़ रहा था जिसे देखकर दर्शक चौंकें। रोहन ऐसी चालें चल रहा था जिनसे उसके मोहरे बेहतर जगह पहुँचें।

दूसरी बाज़ी में मेरे पास काले मोहरे थे। मैंने ओपनिंग में बयान देना बन्द किया। मोहरे निकाले, कैसलिंग की, और उसकी केंद्रीय प्यादा श्रृंखला को चुनौती दी। उसने एक प्यादा छोड़ा जिससे मेरी रानी बचाव से दूर चली जाती। मैंने उसे नहीं लिया।

फिर भी उसे छोटी बढ़त मिली। एक घंटे तक मैं हाथी वाले अंत में एक प्यादा कम लेकर बचाव करता रहा। अपने कमजोर प्यादे की रखवाली में हाथी को बाँधने के बजाय सक्रिय रखा। वह एक तरफ आगे बढ़ने की धमकी देता तो मैं दूसरी तरफ से शह देता।

दो बार उसने घड़ी की तरफ देखा, जैसे मेरा धैर्य भी समय के साथ खत्म हो जाना चाहिए।

वह खत्म नहीं हुआ। बाकी प्यादे एक-एक करके हट गए। स्थिति बराबरी की बनी और हमने अंक बाँट लिए।

रोहन डेढ़-आधा से आगे था। दर्शकों ने साधारण ताली बजाई। मैं मोहरे समेट रहा था और बराबरी के बाद एक अनपेक्षित खुशी थी। उसने पूरी शाम मुझे बोर्ड से धकेलने की कोशिश की थी। मैं अब भी वहाँ बैठा था।

6. बिना आतिशबाज़ी की जीत

तीसरी बाज़ी में सफेद मोहरे लेकर बैठा तो रोहन को फिर मेरा उतावला हमला अपेक्षित था। मैंने रानियों की अदला-बदली पेश की। उसने पहली बार टाल दी, क्योंकि उलझन बनाए रखना चाहता था। मैंने घोड़ा बेहतर खाने पर पहुँचाया और वही चुनाव उसके लिए अधिक कठिन बना दिया।

आखिर रानियाँ बोर्ड से चली गईं। स्थिति इतनी शांत दिख रही थी कि कुछ दर्शकों ने फोन देखना शुरू कर दिया। रोहन का एक अकेला प्यादा था। मेरे घोड़े को उसके सामने स्थिर जगह मिल गई थी।

मैंने तुरंत प्यादे पर हमला नहीं किया। पहले उसकी सक्रिय योजना रोकी। फिर खुले फाइल पर हाथी लाया। उसके मोहरे बचाव में बँध गए, तब राजा को आगे बढ़ाया।

उसने बराबरी का प्रस्ताव दिया।

मैंने उसका चेहरा नहीं, बोर्ड देखा और मना कर दिया।

अकेला प्यादा गिर गया। रोहन ने मेरे राजा की तरफ जवाबी खेल बनाया और लगभग इतनी अदला-बदली करवा दी कि बच निकलता। अपना हाथी सक्रिय रखने के लिए मुझे एक प्यादा वापस देना पड़ा। फरहान के सरल बताए जाने वाले अभ्यास याद आए, लेकिन यहाँ अभ्यास जैसी शांति नहीं थी।

बासठ चाल के बाद रोहन ने हार मान ली।

अब मैच डेढ़-डेढ़ था। वह इंटरव्यू देने वाले से बात किए बिना निकल गया। मैं रुककर एक दर्शक को समझाता रहा कि पहले प्यादा लेने पर मेरी बढ़त क्यों चली जाती।

पहली बार विश्लेषण के बोर्ड के आसपास खड़े लोग मेरे उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे।

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7. वह बोर्ड जो वह घर से लाया

आखिरी बाज़ी के लिए रोहन पिता का लकड़ी वाला बोर्ड लाया। वह उसे मेरे सामने से ऐसे ले गया जैसे मालिक होने का प्रमाण दिखा रहा हो। मालिनी ने बोर्ड और मोहरे जाँचे, फिर पूछा कि क्या हम दोनों इस पर खेलना स्वीकार करते हैं। मैंने हाँ कहा।

घोषित क्रम के अनुसार इस बार मेरे पास काले मोहरे थे। रोहन सफेद से हमला करेगा। कमरा जल्दी भर गया। किसी ने स्कोर लिखने वाले के पास खाली कुर्सी पर पिता की तस्वीर रख दी।

ओपनिंग केंद्रीय फाइल के संघर्ष में बदली। रोहन ने सुरक्षित सरलीकरण छोड़कर उलझन बढ़ाई। कारण समझ में आता था। पिछली शाम के बाद साधारण बराबरी उसकी सुनाई हुई कहानी को बचा नहीं सकती थी।

उसने मेरे राजा पर हमला किया। कुछ समय तक खतरा सचमुच था। मुझे ऐसा रक्षात्मक आदान-प्रदान ढूँढ़ना पड़ा जिसमें एक प्यादा जाता, लेकिन उसका सबसे ताकतवर आक्रामक मोहरा हटता। दर्शक मेरे पीछे जाते मोहरे देख रहे थे। मुझे ऐसी स्थिति दिख रही थी जिसे अब भी बचाया जा सकता था।

फिर उसने प्यादा बहुत आगे बढ़ाया। उम्मीद थी कि मैं फिर पीछे हटूँगा। मैंने उसे चुनौती दी। बोर्ड खुला। कई अदला-बदलियों के बाद मेरा राजा अधिक सक्रिय हो गया और सी-फाइल पर मेरा पास्ड प्यादा निकल आया।

रोहन ने दर्शकों की तरफ देखना बन्द कर दिया।

बोर्ड के बीच में हल्की खरोंच थी। बरसों पहले पिता की घड़ी के बक्कल से लगी थी। मैंने नज़र उसके आसपास के खानों पर टिकाए रखी।

8. रानी बनाता तो जीत चली जाती

आखिरी हाथियों की भी अदला-बदली हो गई। मेरा बचा प्यादा c2 तक पहुँच गया। मेरा राजा c3 पर उसका साथ दे रहा था। रोहन का राजा a2 पर था। मेरी चाल थी। बोर्ड पर केवल यही तीन मोहरे बचे थे।

कमरे को प्यादे के रानी बनने का इंतज़ार था। अतिरिक्त काली रानी घड़ी के पास रख भी दी गई थी। रोहन पीछे टिक गया। पूरे मैच में पहली बार उसका चेहरा पढ़ना मुश्किल था।

मेरा हाथ रानी की तरफ बढ़ा, फिर बोर्ड पर किसी मोहरे को छूने से पहले रुक गया।

अगर c1 पर रानी बनाता, तो a2 पर उसके राजा को शह नहीं होती। लेकिन बचने के सभी खाने बन्द हो जाते। कोई वैध चाल नहीं। स्टेलमेट। बराबरी।

यह उस स्थिति का उलटा रूप था जिसे फरहान ने मुझसे बार-बार हल करवाया था। तब मैंने कहा था कि इतनी आसान स्थिति पढ़ने का क्या लाभ।

मैंने फिर देखा। c3 पर मेरा राजा b2 और b3 रोक रहा था। c1 पर हाथी a1 और b1 बन्द करता, लेकिन a3 खुला छोड़ता। वही एक खाना सब कुछ था।

“हाथी दीजिए,” मैंने कहा।

स्कोर लिखने वाले ने काला हाथी निकाला। मैंने c1 पर प्यादे को हाथी में बदला और घड़ी दबाई। रोहन के लिए केवल राजा a3 ले जाना सम्भव था। फिर मैंने हाथी a1 पर रख दिया।

शह और मात।

ए-फाइल पर उसके राजा को हाथी रोक रहा था। पास के बी-खाने मेरे राजा के नियंत्रण में थे। बीच में आने के लिए कोई दूसरा मोहरा बचा ही नहीं था।

चार बाज़ियाँ। ढाई अंक बनाम डेढ़।

मेरा भाई इस्तेमाल न हुई रानी को देखता रह गया।

9. मात के बाद पूछा गया सवाल

तालियाँ मेरे पीछे से शुरू हुईं और आगे तक फैल गईं। रोहन ने तुरंत हाथ नहीं बढ़ाया। उसने निर्णायक से पूछा कि इस तरह पदोन्नति करना वैध था या नहीं। उसे नियम पूरी तरह मालूम था।

मालिनी ने परिणाम की पुष्टि की और स्कोरशीट उसकी तरफ कर दी।

तेरह महीने से मैंने इस पल की कल्पना किसी बड़े भाषण के साथ की थी। कमरे में पहुँचकर बहुत छोटा, अधिक सीधा सवाल पूछना चाहा।

“आज मोहरे किसने जमाए?”

उसने नीचे देखा।

इंटरव्यू लेने वाला, जिसने आरम्भ का अपमान सुना था, चुप रहा। दोनों पड़ोसी भी। रोहन ने पहले हस्ताक्षर किए, फिर बोला, “तुम बहुत अच्छा खेले।”

मैंने कहा, “ये चार शब्द पत्रिका में भी आ जाएँगे।”

इस बार हँसी मेरी पीठ के पीछे नहीं थी।

मालिनी ने विजेता के रूप में मेरा नाम घोषित किया। उसने पिता की तस्वीर के पास मुझे बुलाया। रोहन आदत से आगे बढ़ा, फिर उसे समझ आया कि केंद्र की जगह उसके लिए खाली नहीं की जा रही थी।

समारोह के बाद उसने बोर्ड घर ले जाने दिया। मैंने ले लिया। लकड़ी की वस्तु लौटाने से घर, सेवा के साल और वह छीना हुआ वर्ष अपने आप बराबर नहीं हो जाते थे।

लेकिन जब वह एक दर्शक को आखिरी स्थिति समझाने लगा, महिला ने विनम्रता से रोक दिया।

“मैं प्रकाश से सुनना चाहूँगी। चाल उन्होंने खोजी थी।”

मैं बैठा और a3 वाले खाने से समझाना शुरू किया।

10. प्यादा फिर अपने खाने में

क्लब ने चारों बाज़ियाँ प्रकाशित कीं। पहली बाज़ी की मेरी हार भी। दोनों के नाम सही थे। जिस चर्चा ने मुझे सामान ढोने वाला भाई कहा था, वहाँ अब आखिरी स्थिति का लिंक था। कुछ लोगों को हाथी बनाने का कारण तुरंत समझ आया। दूसरे तब तक बहस करते रहे जब तक बोर्ड पर मोहरे नहीं रखे।

मुझे यही ठीक लगा। अब वे खेल देख रहे थे।

अगली पत्रिका में रोहन का सुधार छपा। उसने माना कि पिता का पुराना विश्लेषण हम दोनों ने मिलकर बनाया था। मैंने पन्ना एक बार मोड़ा और उसी हिसाब की कॉपी में रख दिया जिसमें पहली बार वह लाइन लिखी गई थी।

हफ्ते बाद उसने घर पर मिलने के लिए फोन किया। मैंने कहा कि व्यावहारिक बातों पर अलग चर्चा होगी। शतरंज के रीमैच से वह उस बातचीत को नहीं टाल सकता था जो अब भी बाकी थी।

फिर फरहान कमरे पर आया। उसने लकड़ी का बोर्ड देखा, हाथी वाला अंत लगाया और मुझे इतनी साफ तरह से हराया कि समाप्त होने से पहले दोनों हँस पड़े।

“एक भाई के विजेता,” उसने कहा। “बस कंडक्टरों से अभी सावधान रहना।”

उसके जाने पर मैंने खिड़की वाला प्यादा उठाया और डिब्बे में उसकी खाली जगह पर रख दिया। एक साल से अधिक वह उधार जैसे जीवन के पास अकेला खड़ा रहा था।

मैंने ढक्कन बन्द किया। मेज़ पर अगले दिन की अभ्यास वाली स्थिति अधूरी पड़ी थी।

कमरा छोटा था। लेकिन उसकी हर कुर्सी पर किसे बैठाना है, यह मैं तय कर सकता था।

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