दरवाजे पर खड़े लड़के ने हरीश से पूछा, “कुछ ठीक करने आए हैं?”
हरीश ने हाथ में पकड़े कपड़े के थैले को देखा।
“देव से मिलना है।”
“अपॉइंटमेंट है?”
“वह मुझे जानता है।”
लड़के के चेहरे से लगा कि यह जवाब वह पहले भी सुन चुका है। वह दरवाजे के किनारे टिक गया, जैसे इंतजार कर रहा हो कि यह बुजुर्ग किसी और की परेशानी बन जाए।
काँच के उस पार हरीश को कुर्सी दिखाई दे रही थी।
वह छोटे चबूतरे पर रखी थी। ऊपर देव की पुरस्कार लेते हुए तस्वीर थी। बाएँ हत्थे पर गहरा निशान था, जहाँ हरीश के अँगूठे ने बरसों में पॉलिश घिस दी थी।
पीछे के एक पाए पर पीतल की पट्टी लगी थी।
पास रखे कार्ड पर लिखा था: यहीं से सब शुरू हुआ।
वह पाया हरीश ने खुद ठीक किया था।
कुर्सी लेने के लिए वह दो बसें बदलकर आए थे।
* * *
देव हाथ में माइक लिए बाहर निकला।
एक पल के लिए उसके चेहरे पर पुरानी पहचान चमकी।
फिर उसकी नजर काँच के पीछे खड़े मेहमानों पर गई।
“मास्टरजी। फोन कर देते।”
“किया था।”
“बहुत व्यस्त थे।”
“तुम्हारे सहायक ने भी यही कहा।”
देव ने उनके कंधे पर हाथ रखा और दरवाजे से हटाकर किनारे ले गया।
अंदर एक महिला कुर्सी के पास खड़ी होकर तस्वीर खिंचवा रही थी।
हरीश ने चौंतीस साल एक छोटे निजी स्कूल में गणित पढ़ाया था। शाम को कुछ वयस्क दोस्त उनके घर तीन पत्ती सीखने आते थे।
उन्हें ताश पसंद थे। उससे भी ज्यादा यह देखना पसंद था कि हिसाब से दिलासा मिलना बंद हो जाए तो आदमी क्या करता है।
देव पहली बार बाईस साल की उम्र में आया था।
पाँच साल आता रहा।
अब उसका अपना कार्ड क्लब था। अनुशासन पर इंटरव्यू देता था। पैसे लेकर कार्यशालाएँ करता था। रजिस्ट्रेशन डेस्क के पीछे हरीश की रसोई की तस्वीर लगी थी।
“कुर्सी और मेरी कॉपियाँ लेने आया हूँ,” हरीश ने कहा।
देव के हाथ का दबाव थोड़ा बढ़ा।
“आज?”
“तीन महीने के लिए ली थीं। ग्यारह हो गए।”
“यह बात यहाँ न करें।”
“तो सामान बाहर ले आओ।”
देव ने पास से गुजरते मेहमान को मुस्कराकर देखा।
“खाना खाया आपने?”
हरीश ने चाँदी जैसी चमकती ट्रे पर जाते छोटे नाश्ते देखे।
“मैंने वह नहीं पूछा।”
* * *
रसोई वाली तस्वीर गर्मियों की एक शाम ली गई थी।
तब हरीश की पत्नी जीवित थीं।
वह चाय लाई थीं। देव ने उनसे बर्तन सुखाने वाला स्टैंड हटाने को कहा था, ताकि तस्वीर अच्छी आए।
अब क्लब की दीवार पर वही तस्वीर साधारण शुरुआत की कहानी सुना रही थी।
हरीश का नाम उस कहानी में नहीं था।
शायद वह इसे जाने देते।
लेकिन कुछ दिन पहले उन्होंने देव को एक पत्रकार से कहते सुना था कि प्रदर्शित कॉपियों में उसके शुरुआती विचार दर्ज थे।
उन कॉपियों में हरीश के विद्यार्थियों की हाजिरी थी। खरीदारी की याद दिलाने वाली पंक्तियाँ थीं। ताश के अभ्यास थे। देर से आने वालों का इंतजार करते समय लिखी टिप्पणियाँ थीं।
एक पन्ने पर पत्नी ने नींबू के अचार की विधि लिखी थी।
देव ने उसी पन्ने को दिखाकर कहा था कि उसका दिमाग हमेशा प्रयोग करता रहता था।
हरीश ने रिकॉर्डिंग दो बार सुनी।
फिर बस का पास जेब में रखा और निकल पड़े।
अब देव उनकी तरफ एक लिफाफा बढ़ा रहा था।
“आने-जाने की परेशानी हुई है।”
हरीश ने हाथ नहीं बढ़ाया।
“मेरी कॉपियाँ थैले में रख दो।”
दरवाजे वाला लड़का देख रहा था।
देव ने आवाज धीमी की।
“अपनी बेइज्जती मत करवाइए।”
वाक्य का मतलब समझने से पहले हरीश को उसकी चोट लगी।
* * *
घर लौटते समय कुर्सी उनके साथ नहीं थी।
बेटी मीरा सब्जियाँ लेकर आई हुई थी।
“मुझे ले जाते।”
“तुम्हारा काम था।”
“छुट्टी ले सकती थी।”
“एक कुर्सी लेने के लिए?”
मीरा ने खिड़की के पास खाली जगह देखी।
देव के कुर्सी ले जाने के बाद से वह जगह खाली थी। हरीश प्लास्टिक के स्टूल पर बैठते थे। घुटना अकड़ जाता तो खड़े होकर चाय खत्म करते।
मीरा ने सब्जियाँ नीचे रख दीं।
“उसने कहा क्या?”
हरीश ने लिफाफे वाली बात बताई।
यह नहीं बताया कि रिसेप्शन वाले ने ऑटो बुलाने की पेशकश करते हुए कहा था, बुजुर्गों को कभी-कभी भ्रम हो जाता है।
वह बात बाद में निकली, जब मीरा धनिया धो रही थी।
उसने नल बंद कर दिया।
हरीश को लगा कि वह रो देगी।
लेकिन उसने पूछा, “कुछ लिखा हुआ है कि सामान उसने उधार लिया था?”
संदेश थे। प्रदर्शनी की तैयारी की तस्वीरें थीं। देव का खुशी से भरा आवाज वाला संदेश था, जिसमें वह सामान देने के लिए धन्यवाद कह रहा था।
हरीश ने उसे इसलिए सँभालकर रखा था क्योंकि लड़के की खुश आवाज सुनना अच्छा लगता था।
* * *
शाम तक देव ने बयान डाल दिया।
उसमें हरीश का नाम नहीं था।
क्लब के सदस्यों को पुराने संबंधों का अनुचित लाभ उठाने की कोशिशों से सावधान रहने को कहा गया था।
साथ में नए कमरे की तस्वीर थी।
देव के पीछे हरीश की कुर्सी रखी थी।
पुराने विद्यार्थियों के फोन आने लगे। कोई उनके लिए नाराज था। कोई नाराज होने से पहले पूरा किस्सा सुनना चाहता था।
एक ने सलाह दी कि इस उम्र में शांति ज्यादा जरूरी है, लिफाफा रख लेना चाहिए था।
हरीश ने फोन काट दिया।
फिर बुरा लगा तो दोबारा किया।
“मुझे अपने ही फर्नीचर के बदले शांति नहीं चाहिए।”
आदमी हँसा। उसे समझ नहीं आया कि मजाक था या नहीं।
मजाक नहीं था।
अगली सुबह सब्जी वाले के पास पड़ोसी ने पूछा, “आपने उसके कारोबार में हिस्सा माँगा?”
“नहीं।”
“लोग तो कह रहे हैं।”
“जो वहाँ थे?”
पड़ोसी टमाटर चुनने लगा।
हरीश प्याज लिए बिना लौट आए।
उनके पास खर्च चलाने लायक सीमित बचत और नियमित आय थी। देव यह जानता था। लिफाफे से यही जताना था कि पैसे की जरूरत वाले बुजुर्ग की जिद बेकार है।
दो दिन हरीश संदेश लिखते और मिटा देते रहे।
हर बार शब्द या तो भीख माँगते लगते, या गुस्से में काँपते।
उन्हें दोनों पसंद नहीं आए।
* * *
मीरा ने अलमारी के ऊपर से गत्ते का डिब्बा उतारा।
उसमें देव के पहली बार आने से भी पुरानी कॉपियाँ थीं।
जिल्दों के कोने मुलायम हो चुके थे। एक पर छत टपकने का दाग था। एक में लाल पेंसिल से लिखा था, जिसका इस्तेमाल हरीश कब का छोड़ चुके थे।
एक साल की लिखावट छोटी और तंग थी। उस समय कलाई में दर्द रहता था।
“सबको समझाना जरूरी नहीं,” मीरा ने कहा। “पहले तय कीजिए, चाहिए क्या।”
“अपना सामान।”
“और?”
उन्होंने पन्ने पर अँगूठा फेरा।
“अपने काम पर अपना नाम।”
मीरा ने दोनों माँगें अलग लिखीं।
देव को साफ संदेश भेजा गया। उधार लिया सामान वापस करे। कार्यशालाओं में कॉपियों के बारे में गलत विवरण सुधारे।
जवाब उसके मैनेजर ने दिया।
सामग्री को साझा विरासत का हिस्सा बताया गया।
हरीश ने शब्द जोर से पढ़े।
“तुम्हारी माँ ने यह अचार की विधि मुझे डाँटते हुए लिखी थी कि गलत नींबू लाया हूँ। वह भी साझा विरासत है?”
मीरा हँस पड़ी।
इस मामले में पहली बार दोनों को हँसी आई।
फिर हरीश ने सामान की सूची बनाई। कुर्सी पर लगी पीतल की पट्टी तक लिखी।
* * *
एक पुराने सहकर्मी ने उनकी मुलाकात फराह से करवाई।
वह शहर के अध्यापकों, कारीगरों और छोटे कारोबारियों से बातचीत रिकॉर्ड करती थी।
उसे कॉपियों में दिलचस्पी थी।
सार्वजनिक झगड़ा करवाने में कम।
“जो दिखा सकते हैं और जो याद है, दोनों को अलग रखना होगा,” उसने कहा।
हरीश को यह बात अच्छी लगी।
रिकॉर्डिंग उनके खाने की मेज पर हुई।
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उन्होंने तारीख वाली पुरानी कॉपियाँ दिखाईं। तस्वीरें और उधार के संदेश दिखाए। वे अभ्यास दिखाए जो देव के आने से बरसों पहले करवाते थे।
फराह ने पूछा कि उन्होंने किताब क्यों नहीं छपवाई।
“स्कूल पढ़ाता था। पत्नी की देखभाल करता था। और अपना चश्मा ढूँढ़ता रहता था।”
उसने पूछा कि देव ने कभी कुछ जोड़ा था या नहीं।
“हाँ।”
मीरा ने नजर उठाई।
हरीश ने बाद की एक कॉपी खोली। अभ्यास के दौरान लिए गए फैसले दर्ज करने का साफ तरीका देव ने सुझाया था।
उदाहरण के पास उसके नाम के शुरुआती अक्षर थे।
“अच्छा लड़का था,” हरीश ने कहा। “इसीलिए इतना बुरा लग रहा है।”
वह आज की शिकायत आसान बनाने के लिए पुराना सच बदलना नहीं चाहते थे।
* * *
रिकॉर्डिंग जारी होने से पहले देव का फोन आया।
क्लब वाली मुलायम आवाज गायब थी।
“बाहर वालों को बीच में क्यों लाए?”
“मेरे आने को फायदा उठाना कहा, तब तुम किससे बात कर रहे थे?”
“नाम तो नहीं लिया था।”
“बाकी लोगों के लिए काफी जगह छोड़ दी थी।”
देव ने साथ बैठकर बातचीत का प्रस्ताव रखा। कह सकते थे कि दो पीढ़ियों के बीच गलतफहमी हुई।
हरीश ने मना कर दिया।
फिर देव ने क्लब में सार्वजनिक प्रदर्शन मैच की बात की। उसके बाद सामान लौटा दिया जाएगा। प्रायोजक का प्रतिनिधि रहेगा। फराह रिकॉर्ड कर सकती है। कॉपियों की असल शुरुआत पर लिखित विवरण भी रखा जाएगा।
“अगर अब भी उतने ही अच्छे शिक्षक हैं,” देव ने जोड़ा।
हरीश समझ गए।
वह हारते तो सारी चर्चा एक बूढ़े खिलाड़ी के बीत चुके समय पर आ जाती।
मीरा भी समझी।
“अपनी कुर्सी के लिए खेलने की जरूरत नहीं है।”
“नहीं है।”
हरीश ने यही पहली शर्त रखी।
सामान मैच के नतीजे से पहले और उससे अलग लौटेगा। गलत विवरण का सुधार भी किसी जीत पर निर्भर नहीं होगा।
मैच सिर्फ मैच तय करेगा।
दो दिन बाद देव ने शर्तें मान लीं।
* * *
अगले सप्ताह तीन पुराने विद्यार्थियों के साथ अभ्यास हुआ।
सब वयस्क थे। नौकरियाँ थीं, बच्चे थे और हरीश की चाय के बारे में पक्की राय थी।
हरीश को पता चला कि उँगलियाँ पहले से जल्दी थकती हैं।
यह भी पता चला कि कोई कहे उनकी उम्र में वह क्या करता, तो अब भी गुस्सा आता है।
एक शाम वह बार-बार हारे।
एक विद्यार्थी ने दिलासा दिया, “अभी तो हाथ खोल रहे हैं।”
“नहीं। आज तुम मुझसे बेहतर खेल रहे हो।”
उन्होंने ताश समेटे और टहलने निकल गए।
मैच यह प्रमाणित नहीं करने वाला था कि कॉपियाँ किसने लिखीं। यह बात उन्होंने खुद शर्तों में साफ करवाई थी।
फिर भी जीतना चाहते थे।
इतना चाहते थे कि खुद पर थोड़ा शर्मिंदा हुए।
रात के खाने पर मीरा ने पूछा, “हारने से डर लग रहा है?”
“हाँ।”
“लोग गलत समझेंगे इसलिए?”
“देव खुश हो जाएगा इसलिए।”
मीरा ने उनकी थाली में एक और रोटी रखी।
“कम से कम ईमानदार जवाब है।”
हरीश ने रोटी तोड़ी। उन्हें राहत मिली कि बेटी ने इस छोटी और जिद्दी इच्छा को ठीक करने की कोशिश नहीं की।
* * *
मैच की दोपहर किसी ने नहीं पूछा कि वह मरम्मत करने आए हैं।
उसी लड़के ने दरवाजा खोला।
“आइए, सर।”
हरीश ने सिर हिलाया।
कुर्सी अब भी चबूतरे पर थी। कॉपियाँ नीचे डिब्बे में रखी थीं। साथ में हस्ताक्षर वाली सूची और पहले से तय लिखित सुधार था।
फराह ने अनुमति लेकर उनकी तस्वीरें लीं।
फिर हरीश ने खुद हर कॉपी देखी।
अचार वाला पन्ना था।
देव के शुरुआती अक्षरों वाला पन्ना भी था।
उन्होंने सब गिनने के बाद ही सामान मिलने की रसीद पर हस्ताक्षर किए।
पीछे किसी ने कहा कि बुजुर्ग बात को जरूरत से ज्यादा खींच रहे हैं।
हरीश ने सुन लिया।
फिर भी जितना समय चाहिए था, लिया।
इसके बाद ताश की मेज पर साधारण कुर्सी पर बैठे।
देव ने क्लब की कढ़ाई वाली जैकेट पहनी थी।
हरीश अपना पुराना कार्डिगन पहने थे। मीरा कहती थी उसमें प्रधानाचार्य लगते हैं।
उन्होंने इसे तारीफ मानने का फैसला किया था।
* * *
दोनों को बराबर गिनती के काउंटर मिले। खेल की अवधि तय थी। शुरू होने से पहले नियम समझाए गए।
किसी का सामान या अधिकार दाँव पर नहीं था।
शुरुआत में देव बहुत अच्छा खेला।
हरीश को उसकी पकड़ पहचान में आ रही थी। दर्शकों को उसका वर्णन करने का आनंद भी पहचान में आ रहा था।
कैमरा पास आया।
एक हाथ पूरा होने से पहले देव फैसला समझाने लगा। उसके बोलने से हरीश की चुप्पी असमंजस जैसी लग रही थी।
हरीश ने उसे बोलने दिया।
फिर खुद एक गलत निर्णय लिया।
नुकसान इतना था कि कमरे का माहौल बदल गया।
पीछे किसी ने लंबी साँस छोड़ी।
देव मुस्कराया।
“कुछ आदतें रहती ही हैं, मास्टरजी।”
हरीश ने बचे काउंटर देखे।
पहली इच्छा जवाब देने की हुई।
दूसरी, अगला हाथ इतनी जल्दी जीतने की कि लोग पिछली गलती भूल जाएँ।
दोनों इच्छाओं को वह जानते थे।
उनके बारे में उसी कॉपी में लिख चुके थे जिसे देव अपना बताकर दिखा रहा था।
हरीश ने पानी माँगा।
आने पर धीरे-धीरे पिया।
कमरा इंतजार कर सकता था।
* * *
जहाँ से खेल बदला, वहाँ कोई नाटकीय घटना नहीं हुई।
हरीश ने हाथ छोड़ दिया।
अगला भी छोड़ दिया।
दर्शक बेचैन होने लगे। देव उस बेचैनी का जवाब देने लगा। चाल बड़ी होती गई। साथ की बातें और चुभने लगीं।
हरीश देख रहे थे कि जब तुरंत मनचाही प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो देव में क्या बदलता है।
वह बरसों ऐसे बच्चों को पढ़ा चुके थे जो सवाल पूरा पढ़ने से पहले उत्तर चिल्ला देते थे।
समस्या से ज्यादा कमरे के ध्यान का आनंद लेने का खतरा जानते थे।
एक बाद के हाथ में कुछ नुकसान वापस आया।
फिर एक हाथ उनके खिलाफ गया।
वापसी सीधी रेखा में नहीं हो रही थी।
बीच के विराम में मीरा ने पूछा, “घुटना दुख रहा है?”
“हाँ।”
“गद्दी चाहिए?”
“हाँ।”
दोनों ने स्कोर की बात नहीं की।
खेल फिर शुरू हुआ तो देव बताने लगा कि हरीश शायद क्या सोच रहे होंगे।
उस शाम पहली बार हरीश ने उसे रोका।
“बाद में मुझसे पूछ लेना।”
कुछ लोग हँसे।
देव की मुस्कान एक पल ज्यादा अटकी रही।
* * *
आखिरी दौर चुप्पी में बीता।
देव ने दर्शकों को पढ़ाना बंद कर दिया था।
हरीश ने उन्हें सुनना बंद कर दिया था।
समय पूरा होने पर नियुक्त स्कोर रखने वाले ने काउंटर दो बार गिने।
हरीश के पास ज्यादा थे।
फर्क असंभव नहीं था। इससे यह साबित नहीं होता था कि आगे हर मैच वही जीतेंगे।
लेकिन देव जिस शाम को अपना मानकर बैठा था, उस शाम को जीतने के लिए काफी था।
तालियाँ पहले बिखरी हुई आईं, फिर कमरे में फैल गईं।
हरीश सावधानी से उठे।
देव ने हाथ बढ़ाया। फोटोग्राफर ने कैमरा उठाया।
“गुरु तो गुरु ही रहेगा,” देव बोला।
हरीश ने हाथ मिलाया।
फिर इतनी आवाज में कहा कि सामने बैठे लोग सुन सकें, “अच्छे विद्यार्थी थे। फिर तुम्हें लगा कि किसी से सीखना तुम्हें छोटा करता है।”
देव ने फोटोग्राफर की तरफ देखा।
चेहरे पर रखने लायक कोई ठीक भाव इतनी जल्दी नहीं मिला।
फराह ने हरीश से वाक्य दोहराने को नहीं कहा।
उन्हें अच्छा लगा।
अब उन्हें अपनी कुर्सी चाहिए थी।
* * *
बाद की बातचीत में किसी ने पूछा कि क्या जीत से साबित हो गया कि कॉपियाँ उनकी थीं।
“नहीं,” हरीश ने कहा।
“पुरानी तारीखें, पहले की प्रतियाँ और संदेश उनकी कहानी बताते हैं। आज के खेल से बस आज की जीत साबित होती है।”
प्रायोजक के प्रतिनिधि ने सिर उठाया।
हरीश ने कहा, “किसी से सीखकर अलग बन सकते हो। उससे बेहतर भी बन सकते हो। पहले उसका नाम मिटाना जरूरी नहीं।”
उन्होंने अभ्यास दर्ज करने में देव के योगदान का जिक्र किया।
फिर अचार की विधि लिखने वाली अपनी पत्नी का नाम बताया।
इस बार कमरे की हँसी असली कहानी पर थी।
क्लब ने सुधार प्रकाशित किया। कार्यशालाओं का विवरण बदला गया। कुछ सदस्य वहीं रहे। कुछ ने ऐसे सवाल पूछे जिनसे क्लब पहले बचता था।
हरीश हर प्रतिक्रिया देखने नहीं बैठे।
दो पुराने विद्यार्थियों ने कुर्सी चबूतरे से उतारी।
दरवाजे वाले लड़के ने दरवाजा खुला रखा।
इस बार हरीश खाली हाथ बाहर चले।
* * *
कुर्सी फिर खिड़की के पास रख दी गई।
तीन सुबह तक इतना ही काफी था।
फिर हरीश ने कुछ पुराने विद्यार्थियों को छोटे अध्ययन समूह का संदेश भेजा। वयस्कों के लिए ताश, फैसलों और बातचीत की कक्षा। कमरे और चाय का खर्च निकालने के लिए मामूली शुल्क।
मीरा ने पास के सामुदायिक हॉल में जगह तय करवाई।
पहली शाम छह लोग आए।
अतिरिक्त कुर्सियाँ चार थीं।
हरीश माफी माँगने लगे।
एक महिला, जिसकी मरम्मत की दुकान थी, बाहर अपने स्कूटर तक गई और मोड़ने वाला स्टूल लेकर लौटी।
अगले सप्ताह दो लोग अपनी कुर्सियाँ लाए।
फिर अलग-अलग कुर्सियाँ आने लगीं। प्लास्टिक की, बेंत की, लोहे की। एक पर रस्सी से गद्दी बँधी थी।
किसी ने चबूतरा नहीं माँगा।
हरीश की पुरानी कुर्सी घर पर रही।
पीतल की पट्टी दोबारा कसने के बाद आरामदेह हो गई थी।
कभी कक्षा के बाद उसमें बैठकर सड़क देखते। पत्नी का देव से कहना याद आता कि कोहनी हटाओ, चाय गरम है।
वह उस याद को सीख में बदलने की कोशिश नहीं करते।
एक शाम मीरा आई तो हरीश गोद में खुली कॉपी रखे सो गए थे।
उसने चश्मा उतारकर मेज पर रख दिया।
अगली कक्षा की तारीख के नीचे लिखा था:
सबसे पूछना, उन्हें किसने सिखाया।
जवाब सुनने के लिए पर्याप्त समय रखना।