Love Rummy: उसके नाम के आगे खाली जगह
Love Rummy

Love Rummy: उसके नाम के आगे खाली जगह

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

पिता के पचहत्तरवें जन्मदिन के खाने पर महेश की थाली में एक कलम रखी थी। खाना अभी आया नहीं था। जीजा ने कलम का ढक्कन पहले ही खोल दिया था। “हाथ खराब होने से पहले…

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पिता के पचहत्तरवें जन्मदिन के खाने पर महेश की थाली में एक कलम रखी थी। खाना अभी आया नहीं था। जीजा ने कलम का ढक्कन पहले ही खोल दिया था।

“हाथ खराब होने से पहले कर दे,” प्रदीप ने कहा।

थाली के नीचे एक कागज़ मोड़कर रखा था। महेश ने शीर्षक पढ़ने से पहले दस्तखत के खाने पहचान लिए। सात साल पहले इसी आदमी ने इसी मेज़ पर दूसरा कागज़ उसकी ओर सरकाया था।

तब घर में शादी थी। बगल के कमरे में उसकी बहन की चूड़ियाँ अभी कागज़ में लिपटी रखी थीं। पिता ने कहा था कि बहुत सवाल करने से लगता है परिवार में भरोसा नहीं है।

महेश ने कलम पानी के गिलास के पास रख दी।

“पहले खाना खा लेते हैं।”

प्रदीप ने उसे छोड़कर बाकी सबको देखा। “देख रहे हैं? अब इनसे समय लेना पड़ेगा।”

माँ सामने बैठी कागज़ के रुमाल की पतली पट्टियाँ फाड़ने लगीं। महेश ने उनकी उँगलियाँ देखीं। कमरे में बात अभी शुरू ही हुई थी, लेकिन वह यह खामोशी पहले से जानता था।

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पहला कर्ज नाशिक में छपाई का छोटा कारोबार शुरू करने के लिए था। प्रदीप ऐसी मशीन लेना चाहता था जिस पर रेस्तराँ के मेनू, चुनाव के पर्चे और क्रिकेट के बड़े पोस्टर छप सकें। ग्राहक तैयार हैं, उसने कहा था।

महेश उन दिनों उनतीस साल का था। बिजली के सामान की थोक दुकान में नौकरी करता था। तनख्वाह नियमित थी। उसकी गारंटी इसी वजह से काम की थी।

उसने पूछा, कारोबार नहीं चला तो क्या होगा?

जवाब आने से पहले बहन अंजलि का चेहरा उतर गया। “आज के दिन ऐसा क्यों बोल रहा है?”

प्रदीप ने कहा, बस औपचारिकता है। पिता बोले, बेटे पर कुछ आने ही नहीं देंगे। महेश कागज़ लेकर बरामदे में गया। पढ़ने की कोशिश करता रहा। रिश्तेदार बड़े बर्तन लेकर उसके सामने से निकल रहे थे।

फिर परिवार की तस्वीर के लिए बुलाया गया।

उसने दस्तखत कर दिए। खुश घर में अड़चन बनकर खड़े रहने से थक गया था। बाद में उसे स्याही से ज्यादा उस पल की राहत याद रही। सब फिर मुस्कराने लगे थे। वह राहत एक मिनट भी नहीं टिकी थी।

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मशीन चली। हिसाब नहीं चला।

प्रदीप ने बड़े ऑर्डर उधार पर लिए। पुरानी मोटरसाइकिल खराब होने से पहले नई खरीद ली। शामें उन लोगों के साथ गुजरने लगीं जो क्रिकेट के भाव पर इतनी ऊँची आवाज़ में बहस करते थे, जैसे ज़ोर से बोलने पर अंदाज़ा सच हो जाएगा।

कितना पैसा कहाँ गया, महेश नहीं जानता था। बाद में हर व्यक्ति ने अलग वजह बताई। कर्ज देने वाले के लिए बात सीधी थी। किस्तें रुकी थीं। नोटिस आने लगे थे।

प्रदीप ने पहले घबराने से मना किया। फिर अनजान नंबर उठाने बंद कर दिए। महेश का नंबर वही रहा। दुकान वाले उसी पर माल पहुँचाने की खबर देते थे।

दूसरे नोटिस के बाद वह वकील के पास गया। उन्होंने गारंटी की जिम्मेदारी समझाई और लिखित भुगतान समझौता करवाने में मदद की। अब कोई घरेलू बात कहकर उस दस्तखत को मिटाया नहीं जा सकता था।

पिता को बताया तो वे टीवी देखते रहे। “कुछ न कुछ कर लेंगे।”

सोमवार को पहली किस्त महेश के खाते से कट गई।

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तीस महीने में उसने समझौते के तहत चार लाख बीस हज़ार रुपये दिए। हर रसीद बिस्कुट के डिब्बे में रखता था। किराए के कमरे में वही जगह थी जहाँ बरसात का पानी कागज़ तक नहीं पहुँचता था।

बेहतर काम के लिए जो कोर्स करना चाहता था, छोड़ दिया। रविवार को भी दुकान में माल गिनने जाता। एक बार बुखार में स्विच के डिब्बों वाली शेल्फ से टिककर सो गया।

पूजा नाम की अध्यापिका से शादी की बातचीत चुपचाप बंद हो गई। उसके घरवाले ऐसी जिम्मेदारी से डर गए थे जिसका अंत साफ नहीं था। महेश उन्हें गलत भी नहीं कह सकता था। इसलिए गुस्सा करना और मुश्किल था।

प्रदीप त्योहारों पर नई कमीज़ पहनकर आता। कहता, हालात बदल रहे हैं। फिर कमर दर्द बताकर अच्छी कुर्सी ले लेता।

एक बार अंजलि ने भाई की हथेली में पाँच हज़ार रखे। उसने रख लिए। बाद में पता चला, बहन ने अपनी बचत से दिए थे। अगले वेतन के बाद दो बार में उसने उसे वापस भेज दिए। जीजा का कर्ज चुकाने के लिए बहन की छोटी बचत भी खत्म नहीं करवाना चाहता था।

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आखिरी किस्त के बाद आज़ादी महसूस होनी चाहिए थी। उस शाम वह बार-बार खाते का बैलेंस देखता रहा। लगता था कोई रकम और कट जाएगी।

कर्ज बंद होने का पत्र लेकर डिब्बे में रखा। घर में पिता बोले, “अब भूल जा। रिश्तों में हिसाब रखने से मन खराब होता है।”

महेश ने पूछा, उधार लेते समय प्रदीप को भी यही समझाया था?

माँ साड़ी के पल्लू में खाँसने लगीं। अंजलि बच्चों को बाहर ले गई। एक बार फिर खाने का माहौल महेश ने बिगाड़ा था।

उसने जल्दी खाना सीख लिया। घर थोड़ा देर से पहुँचता। किसी को कुछ चाहिए हो, उससे पहले निकल जाता। परिवार ने कहना शुरू किया, बहुत चुप रहने लगा है। दुकान पर जिन लोगों ने उसे दोपहर के खाने के लिए सिक्के गिनते देखा था, उन्होंने कभी यह बात नहीं कही।

एक साथी ने बड़े क्रिकेट फाइनल के दिन पूछा, “आज भी छुट्टी नहीं? घर में बहुत काम है?”

“यहाँ शांति है,” महेश ने कहा। फिर माल का रजिस्टर खोल लिया।

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उसकी हालत बदलने वाला पैसा किसी मैच से नहीं आया।

माँ और उनके दो भाइयों की साझा जमीन का छोटा हिस्सा था। सीमा के झगड़े वर्षों बाद सुलझे और जमीन बिकी। माँ ने अपने हिस्से से बारह लाख रुपये महेश को दिए। उपहार से जुड़े कागज़ उनके अकाउंटेंट की सलाह से बने।

वे अमरूद और पैसे भेजने की रसीद लेकर उसके कमरे पर आईं।

“तेरे पिता खुद बताना चाहते थे।”

“लेकिन पैसा आपका है।”

माँ ने सिर झुकाए हामी भरी।

दोनों खिड़की के पास बैठे। महेश ने पूछा, अपने लिए पर्याप्त रखा है? माँ ने अलग जमा करवाई रकम और अपनी जरूरतों के लिए बचा पैसा दिखाया। इस बार परिवार में पैसे की बात भरोसा रखो से नहीं, साफ रकमों से हुई।

“मुझे तब बोलना चाहिए था,” माँ ने कहा।

महेश कुंद चाकू से अमरूद छील रहा था। कोई ऐसा जवाब नहीं सूझा जिससे माँ रो न पड़ें। लेकिन सबको जवाब की तकलीफ से बचाते-बचाते वह भी थक चुका था। उसने अमरूद का आधा हिस्सा उनकी ओर बढ़ाया।

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उसने नौकरी नहीं छोड़ी। दो दाँत ठीक करवाए। गद्दा बदला। शाम के उस कोर्स में नाम लिखवाया जिसे टाल दिया था। कुछ पैसा आपात जरूरतों के लिए अलग रखा। बाकी को हाथ नहीं लगाया। एक साथी के साथ मरम्मत और छोटे सामान की दुकान खोलने पर विचार कर रहा था।

तीन हफ्ते नींद फिर खराब रही। अब डर अलग था। कहीं यह तय करने से पहले कि उसे क्या चाहिए, कोई उसे पैसा दे देने के लिए मना न ले।

चौथे रविवार प्रदीप का फोन आया। “खुशखबरी सुनी। आखिर तेरी किस्मत भी खुली।”

महेश दरवाज़े पर खड़ा बिजली के मीटर के ऊपर सीलन देख रहा था।

“माँ ने दिए हैं।”

“वही बात है। जश्न होना चाहिए। पापा का जन्मदिन मैं करवा रहा हूँ।”

पहले उसने रेस्तराँ बताया, फिर कहा घर में अच्छा रहेगा। महेश ने खाने वाले को सीधे पैसे देने की पेशकश की।

“इतना हिसाब क्यों? सब साथ में देख लेंगे,” प्रदीप ने कहा। महेश ने जवाब नहीं दिया। अब उसे साथ में शब्द सुनकर तसल्ली नहीं होती थी।

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जन्मदिन से पहले अंजलि दुकान पर आई। चाय के समय तक रुकी। पूछा, माँ-पिता के लिए बड़ा घर लेने की सोची है?

“उन्होंने कहा?”

“वे खुद थोड़े कहेंगे।”

यह वाक्य महेश पहचानता था। अक्सर इसका मतलब होता था कि किसी और ने तय कर लिया है, उसे क्या देना चाहिए।

प्रदीप की नई योजना बस अड्डे के पास मैच दिखाने वाला कैफे खोलने की थी। एक साझेदार स्क्रीन देगा। दूसरा खाना संभालेगा। कर्ज के लिए अतिरिक्त गारंटी चाहिए। महेश के नए जमा पैसे से आवेदन मजबूत होगा।

“सबको सहारा मिल सकता है,” अंजलि ने कहा।

महेश ने कागज़ का कप दबाकर चपटा किया। “नहीं।”

बहन ने ऐसे देखा जैसे सुनने में गलती हुई हो। “कम से कम देख तो ले।”

“भेज दो। पढ़ूँगा। गारंटी नहीं दूँगा।”

वह चाय पिए बिना चली गई। शाम को पिता का फोन आया। पूछा, बहन को दुकान के बाहर भीख माँगने क्यों खड़ा किया? महेश कुछ देर फोन पकड़े रहा। वही बात फिर किसी और कहानी में बदल गई थी।

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दो दिन बाद कागज़ आए। महेश उन्हें उसी वकील के पास ले गया जिन्होंने पिछला समझौता करवाया था। उन्होंने गारंटी और जमा रकम को सुरक्षा के रूप में रखने वाला हिस्सा चिन्हित किया। फिर पूछा, क्या वह सहमत होना चाहता है?

“नहीं।”

“तो कोई चालाक दलील नहीं चाहिए। साफ जवाब चाहिए।”

महेश ने उनसे वित्त प्रतिनिधि को छोटा ईमेल लिखवाया। उसमें साफ था कि उसने गारंटर बनने या अपनी जमा राशि देने की सहमति नहीं दी है। महेश को भी उसकी प्रति भेजी गई। वकील ने कहा, जवाब आए तो संभालकर रखना।

उसने पुराने पैसे वापस पाने के बारे में भी पूछा। उन्होंने बताया कि तारीखों और दस्तावेजों को अलग से देखना होगा। जन्मदिन की मेज़ पर इसका फैसला नहीं होगा।

बाहर निकला तो राहत और गुस्सा साथ थे। सात साल पहले ऐसा एक घंटा उसकी ज़िंदगी बदल सकता था। तब फीस देने से ज्यादा डर यह था कि परिवार इसे अपना अपमान कहेगा।

काम पर लौटने से पहले उसने बैठकर खाना खाया। जल्दी-जल्दी नहीं।

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अब जन्मदिन की थाली के नीचे वही नया फॉर्म पड़ा था।

“मैं जवाब दे चुका हूँ,” महेश ने कहा।

प्रदीप ने आवाज़ धीमी की। “पापा को शर्मिंदा मत कर।”

पिता ने महेश का खरीदा नया कुर्ता पहना था। दुकान के टैग का छोटा धागा गले के पास अटका था। गुस्से के बीच उसका मन हुआ आगे बढ़कर धागा निकाल दे। उसे अपनी यही नरमी कभी-कभी समझ नहीं आती थी।

उसने कागज़ खोला। प्रदीप बोला, शुरुआती फॉर्म है। बैंक बाद में सब समझाएगा। आज पैसे तो नहीं माँग रहे।

महेश ने चिन्हित पन्ना सामने रखा। “फिर मेरी जरूरत क्यों है?”

“क्योंकि जमा रकम तेरे पास है।”

जवाब इतनी जल्दी निकला कि उसे सजाने का समय नहीं मिला। माँ की उँगलियाँ रुक गईं।

महेश ने पन्ना मेज़ पर सीधा किया। उसके नाम के आगे छोटी सी खाली जगह थी। इतनी छोटी जगह से किसी की ज़िंदगी के इतने साल चले जाएँ, यह सोचकर उसे अजीब लगा। इस बार उसने कलम नहीं उठाई।

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पिता बोले, “तेरी बहन के बच्चे हैं।”

महेश ने सिर हिलाया। “उनके नाम जानता हूँ।”

“ऐसे बात मत कर।”

“तो ऐसे मत कहिए जैसे मैं उनसे मिला ही नहीं।”

अंजलि बोली, वह बेरहम हो गया है। महेश ने पूछा, किसी और का कर्ज भरने के लिए तीस महीने रविवार को भी काम करने को क्या कहते हैं?

“तकलीफ सबने उठाई है,” बहन ने कहा।

वह लगभग चुप हो गया। उसकी ज़िंदगी भी आसान नहीं थी। बंद कमरे के झगड़े, देर से जाती स्कूल फीस, वह सब जानता था। फिर उसने देखा, प्रदीप कागज़ समेट रहा है। बिना जवाब दिए बात निकल जाने देना चाहता है।

महेश ने पन्ने पर हाथ रख दिया।

“तुम्हें भी तकलीफ हुई। इससे यह जिम्मेदारी दोबारा मेरी नहीं हो जाती।”

दरवाज़े पर खाने वाले का लड़का दाल का बर्तन लिए खड़ा था। सब उसे देखने लगे। उसने पूछा कहाँ रखूँ। महेश उठकर जगह बनाने लगा। किसी को तो उस लड़के के सीधे सवाल का सीधा जवाब देना था।

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लौटने तक प्रदीप ने नई बात ढूँढ़ ली थी।

“माँ ने परिवार का पैसा तुझे दे दिया। किसी ने सवाल नहीं किया।”

माँ ने सिर उठाया। “मेरे पिता की जमीन में मेरा हिस्सा था।”

प्रदीप हल्का हँसा। “मेरा वह मतलब नहीं था।”

“मतलब समझ गई।”

आवाज़ तेज़ नहीं थी। महेश ने माँ को गैस और टपकते नल पर चिल्लाते सुना था। यह अलग था। उन्होंने गोद से फटा रुमाल उठाकर थाली के पास रख दिया।

“मैंने इसे दिया। अपने लिए रखा है। तुम उसे दोबारा खर्च नहीं कर सकते।”

पिता ने उनका नाम लेकर टोका। माँ ने कहा, खाना ठंडा हो रहा है, परोस लेने दीजिए।

महेश उन्हें चम्मच उठाते देखता रहा। उसे लगता था कि सबसे अच्छा पल प्रदीप को शर्मिंदा होते देखना होगा। उसने नहीं सोचा था कि माँ को अपनी बात बिना माफी माँगे पूरी करते देखना उससे ज्यादा अच्छा लगेगा।

माँ ने उसकी थाली में दाल डाली। उसने मना नहीं किया। उस दिन पहली बार उसे भूख का एहसास हुआ।

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महेश पुराने समझौते और कर्ज बंद होने के पत्र की प्रतियाँ लाया था। थालियाँ हटने के बाद उन्हें नए फॉर्म के पास रख दिया।

“चार लाख बीस हज़ार। मैंने चुकाए। कर्ज देने वाले का खाता बंद है। तुम्हें मुझे क्या लौटाना है, वह अलग बात है।”

प्रदीप बोला, मशीन घाटे में बिकी। महामारी से काम खराब हुआ। तनख्वाह पाने वाला कारोबार का जोखिम नहीं समझता।

“तुम्हारा जोखिम हर वेतन के दिन समझता था।”

महेश ने उससे उसी समय कोई नया कागज़ नहीं भरवाया। वकील का संपर्क दिया। कहा, रकम लौटाने का प्रस्ताव लिखित भेजना। पिता के जन्मदिन के केक पर बैठकर मोलभाव नहीं करेगा।

फिर उसने लिफाफे से एक साधारण पन्ना निकाला। वही इनकार था जो वित्त प्रतिनिधि को भेजा जा चुका था।

उस पर दस्तखत किए।

प्रदीप उसकी चलती कलम देखता रहा। जिस दस्तखत के लिए सुबह से इंतज़ाम था, वह आखिर हुआ था। बस उस कागज़ पर नहीं जिसकी उसे जरूरत थी। महेश ने कलम का ढक्कन बंद करके मेज़ पर रख दिया।

14

किसी ने ताली नहीं बजाई। अंजलि जल्दी चली गई। पिता ने कहा, उसने खुशी में कड़वाहट घोल दी। महेश ने तय रकम खाने वाले को दी और उधार की कुर्सियाँ समेटने लगा।

दरवाज़े पर भांजा रोहन पीछे आया। “मुझसे भी नाराज़ हो?”

महेश ने कुर्सियाँ नीचे रखीं। “नहीं।”

“फिर मेरा प्रोजेक्ट क्यों नहीं देखा?”

वह भूल गया था। बच्चा गत्ते का पुल लिए दोपहर से इंतज़ार कर रहा था। महेश वापस अंदर गया। दोनों ने सिक्के रखकर पुल जाँचा। बीच से झुक गया।

महेश ने नीचे सहारा लगाने को कहा। रोहन बोला, नदी का रास्ता रुक जाएगा। बीस मिनट नदी को लेकर बहस हुई। पूरे दिन घर में उसकी वही सबसे अच्छी बातचीत थी।

निकलते समय रोहन ने हाथ हिलाया। अंजलि ने नहीं। दोनों बातें एक साथ सच थीं। बच्चे से प्यार करने के लिए उसे उसके पिता की गारंटी बनने की जरूरत नहीं थी। उसे यह बात समझाने के बजाय उस दिन बस निभानी थी। वह पुल सुरक्षित जगह रखकर बाहर निकल आया।

15

वित्त प्रतिनिधि ने इनकार मिलने की पुष्टि भेजी। प्रदीप की योजना उस रूप में आगे नहीं बढ़ी। बाद में उसे छोटी जगह और दूसरा साझेदार मिला जो महेश के बिना पैसा लगाने को तैयार था।

परिवार ने इसे सबूत बनाया कि महेश बेकार अड़ रहा था। उसने इस बहस का जवाब देना छोड़ दिया।

वकील ने पुराने कागज़ देखे। पत्रों और एक असहज बैठक के बाद प्रदीप ने पहले चालीस हज़ार देने और बाकी के लिए मासिक भुगतान का प्रस्ताव रखा। सलाह लेकर महेश ने लिखित व्यवस्था मानी। वादा हो जाना और पैसा मिल जाना एक बात नहीं थी।

पहले चालीस हज़ार आए। एक मासिक किस्त देर से आई। उसने तय माध्यम से याद दिलाया। रात को बहन को फोन करके बीच में नहीं डाला।

सब आसान नहीं हुआ। मगर अब कर्ज की जिम्मेदारी में सिर्फ उसका नाम नहीं था।

नए कागज़ उसने फोल्डर में रखे। बिस्कुट का डिब्बा फिर बिस्कुट रखने के काम आया। यह छोटा बदलाव था, लेकिन खोलते समय अब उसे हर बार वही तीस महीने याद नहीं आते थे।

16

मरम्मत की दुकान खुले तीसरा दिन था जब पिता आए। महेश और उसके साथी ने पतली सी किराए की जगह ली थी। घर की सुरक्षित बचत कारोबार से अलग रखी थी। फीता काटने का कार्यक्रम नहीं हुआ। पहला ग्राहक पंखे का खर्च ज्यादा बता रहा था।

पिता स्टूल पर बैठे रहे। महेश तार जाँचता रहा। काफी देर बाद पिता बोले, “इतनी बुरी हालत थी तो बता सकता था।”

महेश ने टेस्टर रख दिया। “बताया था।”

पिता छड़ी की मूठ पर अँगूठा फेरने लगे। “सोचा था मामला सुलझ जाएगा।”

“सुलझा। मेरी तनख्वाह से।”

बाहर खराब साइलेंसर वाला स्कूटर निकला। महेश आवाज़ कम होने तक रुका। पिता को सहज करने के लिए चुप्पी भरने नहीं लगा।

जाते समय पिता ने पूछा, अगली बार आएँ तो स्टूल दरवाज़े के पास रख सकते हैं?

महेश ने हाँ कहा। स्टूल रखने से हर पुरानी बात का जवाब नहीं मिल जाता था। लेकिन उन्हें बैठने देना और अपनी कमाई फिर सौंप देना अलग बातें थीं। अब वह दोनों का फर्क रख सकता था।

17

तीन महीने बाद अंजलि ने रोहन की स्कूल प्रदर्शनी के लिए फोन किया। तारीख बताकर रुकी।

“बुला रही हूँ। कुछ माँग नहीं रही।”

महेश ने कहा, दुकान बंद करके आएगा।

प्रदर्शनी में पुल के नीचे नया मेहराब था। खिलौने की नावें अब भी निकल सकती थीं। रोहन अध्यापक को समझा रहा था। अंजलि भाई के बगल में आकर खड़ी हुई।

“बच्चों को बीच में नहीं लाना चाहिए था।”

महेश ने गत्ते के किनारे अटकती कागज़ की नाव देखी।

“नहीं लाना चाहिए था।”

अंजलि ने सिर हिलाया। कमरे को दिखाने के लिए गले मिलने का दृश्य नहीं बना। महेश ने रोहन की पूरी बात सुनी। उसने बताया कि सिक्के अब बीच में रखने पर भी पुल नहीं झुकता।

बाहर अध्यापक ने आगंतुकों की किताब आगे की। महेश ने कलम ली। इस बार पेट में गाँठ नहीं पड़ी। अपने नाम के नीचे लिखा कि पुल पहले से बेहतर हुआ है।

छोटा सा दस्तखत था। अपनी इच्छा से किया था। उस पन्ने को उससे और कुछ नहीं चाहिए था।

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