Maha Games — बहन ने फिर कलम बढ़ाई
Maha Games

Maha Games — बहन ने फिर कलम बढ़ाई

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

कलम नीली थी। ढक्कन पर दाँतों के निशान थे। तारा ने स्टेशन पर खरीदी थी क्योंकि पता था कि पंजीकरण मेज पर हस्ताक्षर माँगेंगे। बैग की छोटी सामने वाली जेब में…

कलम नीली थी। ढक्कन पर दाँतों के निशान थे।

तारा ने स्टेशन पर खरीदी थी क्योंकि पता था कि पंजीकरण मेज पर हस्ताक्षर माँगेंगे। बैग की छोटी सामने वाली जेब में रखती थी, जहाँ जल्दी मिल जाए।

अधिकारी ने फॉर्म रखा तो नेहा ने हाथ बढ़ाया।

“मैं कर दूँगी।”

फॉर्म पर तारा का हस्ताक्षर चाहिए था।

बहन ने घुमाया, पंक्ति दिखाई और कहाँ लिखना है बताया।

तारा ने हस्ताक्षर किया।

अगला हिस्सा पढ़ने से पहले नेहा ने वापस लिया। प्रतिनिधि का विवरण भरा और अधिकारी को दे दिया।

“मेरे बिना दोपहर तक यहीं खड़ी रहती।”

अधिकारी शिष्टता से मुस्कुराया।

तारा ने कलम रख ली।

वह सत्ताईस साल की थी। छोटे कारोबारों के लेबल बनाती थी। ग्राहक के नाम के तीन डिजाइन एक दोपहर में बना सकती थी।

बहन के पास अपना नाम लिखने में भी निगरानी चाहिए थी।

* * *

पिता की मृत्यु पर नेहा इक्कीस की थी।

तारा बारह की।

कई वर्षों तक बड़ी बहन ने सब सँभाला। स्कूल के फॉर्म, घर के बिल, माँ के अस्पताल के चक्कर और उन रिश्तेदारों से कठिन बात जो पैसों से ज्यादा आसानी से सलाह देते थे।

तारा को याद था कि नेहा काम से लौटकर जूते उतारती और राशन की सूची पकड़े-पकड़े सो जाती।

यह भी याद था कि फॉर्म भर जाते थे।

काम इसलिए होते क्योंकि नेहा करती थी।

आभार घर का हिस्सा बन गया। दीवार से लगी अलमारी जैसा सामान्य, जिस पर सवाल नहीं होता।

तारा ने बीस साल पार करने के बाद वयस्क इंडियन रमी आयोजन में प्रवेश शुरू किया तो यात्रा और पंजीकरण बहन को देना समझदारी लगा।

नेहा को व्यवस्था पसंद थी।

तारा को खेलना।

पहले दोनों को राहत थी।

नेहा कमरे बुक करती, समय देखती, साझा यात्रा तय करती। तारा सहमत खर्च देती और भरोसा करती कि बची पुरस्कार राशि का हिसाब होगा।

बाद में हिसाब परिवार का पैसा बन गया।

फिर वह ऐसी बात हुई जिसे पूछने में तारा स्वार्थी थी।

* * *

भोपाल के फ्लैट में बालकनी दो कुर्सियों के लिए छोटी थी।

नेहा आयोजन प्रशासन में काम करती थी। अलग काम भी लेने लगी थी। खाने पर फोन बजता। प्रिंटर वाले को देर तक रुकवा सकती थी। बीस मिनट में दूसरा माइक्रोफोन खोज सकती थी।

तारा उन क्षमताओं की प्रशंसा करती थी।

उनका प्रदर्शन बनने में आनंद नहीं था।

पारिवारिक मुलाकात में हर परिणाम नेहा की बनाई चीज होता।

“वह आयोजन मैंने चुना।”

“मुझे पता था कौन सा अभ्यास समूह चाहिए।”

“मैंने घबराने से रोका।”

कुछ बातें सच होती थीं।

समस्या थी कि साथ में क्या गायब होता।

तारा का अभ्यास। डिजाइन की कमाई से दिए सत्रों के पैसे। वे फैसले जो तब लिए जब नेहा कहीं होटल कर्मचारी से बहस कर रही थी।

उनका जिक्र करती तो रिश्तेदार अच्छी टीम कहते।

पैसा कैसे बाँटा पूछती तो कमरा असहज हो जाता।

नेहा कहती, घर पर बात करेंगे।

घर में बहुत थकी होती।

तारा ने सीखा कि बाद में बहुत लंबा समय हो सकता है।

* * *

ग्राहक ने गलत बातचीत में उत्तर दिया तो अनुबंध साझा ईमेल फोल्डर में आया।

तारा लेबल वाले काम का संलग्न दस्तावेज खोज रही थी।

इसके बजाय नेहा और आयोजन कंपनी का प्रस्तावित समझौता मिला।

कंपनी स्थानीय प्रतिभा तैयार करने और वयस्क कार्ड आयोजन सँभालने पर भुगतान वाले भाषण चाहती थी। साथ की परिचय सामग्री में तारा के परिणाम नेहा के पेशेवर कार्यक्रम का प्रमाण थे।

पुरस्कार पकड़े तारा की तस्वीर थी।

कभी नहीं पूछा गया था कि प्रस्ताव में इस्तेमाल कर सकते हैं क्या।

शुल्क नेहा के कारोबार को मिलना था।

अपने प्रशासन के काम का भुगतान लेने में कुछ गलत नहीं था। तारा जानती थी।

लेकिन प्रस्ताव तारा को प्रचार में प्रस्तुत करने की बात भी करता था। उसकी आगामी मौजूदगी ऐसे लिखी थी जैसे सहमति पहले हो चुकी हो।

नाम बार-बार था।

सहमति कहीं नहीं थी।

संबंधित पन्ने छापे।

बहन के घर आने का इंतजार किया।

* * *

नेहा ने कागज देखे और पूछा कि उसकी ईमेल क्यों पढ़ रही थी?

“साझा फोल्डर में था।”

“पता था तुम्हारे लिए नहीं है।”

“मेरा नाम है।”

“क्योंकि तुम्हारे लिए मेहनत की है।”

तारा ने पूछा कि कंपनी जानती है, कार्यक्रम में आने की सहमति नहीं दी?

नेहा बोली, तारीखें तय कर लेंगे।

“शायद करना ही न चाहूँ।”

“क्यों नहीं चाहोगी?”

यह ऐसा सवाल था जिसका पर्याप्त अच्छा जवाब कभी नहीं दे पाती।

इनकार के पीछे संकट न हो तो नेहा को तकनीकी खराबी लगता था जिसे ठीक कर सकती है।

तारा ने आयोजन व्यवस्था अलग करने और पुराने पुरस्कार का हिसाब देखने को कहा।

नेहा साल गिनाने लगी।

स्कूल। अस्पताल। किराया।

तारा को सब याद था।

यह भी याद था कि तब किसी को उसके भविष्य की खरीद नहीं कहा गया था।

“रिकॉर्ड चाहिए।”

नेहा ने अनुबंध उलटा रख दिया।

“सब अकेले करना है? ठीक है।”

अकेले शब्द सजा लगा।

* * *

कई दिन खाने और वॉशिंग मशीन के अलावा बात नहीं हुई।

माँ ने चाय पर बातचीत रखनी चाही। तारा ने कहा कि बात करेगी, लेकिन जवाब से पहले असहमति गायब कराना उद्देश्य नहीं हो सकता।

नेहा ने रटी पंक्ति कहा।

शायद थी।

तारा ने दाँत साफ करते हुए अभ्यास किया था। नहीं तो बहन नाराज होती और शब्द खो जाते।

आखिर पुराने प्रतियोगिता भुगतान समर्थन रिकॉर्ड के साथ देखे।

कुछ खर्च सहमत थे। कुछ नहीं। बाकी रकम पर और काम चाहिए था। अगले आयोजन से अलग रखा।

तारा ने कंपनी से प्रस्ताव ठीक करने को कहा ताकि उसके नाम से वादा न हो। पुष्टि मिली कि उसकी मौजूदगी के लिए उसकी अपनी सहमति चाहिए।

नेहा अपने वास्तविक काम की सेवाओं पर बातचीत कर सकती थी।

तारा उसका कारोबार नहीं छीन रही थी।

यह मानना खत्म कर रही थी कि परिवार होने से बिना पूछे नाम जोड़ा जा सकता है।

अगला प्रवेश उसका होगा।

* * *

कई चीजें गलत हुईं।

स्थान से बहुत दूर सस्ता कमरा चुना। यात्रा का जोड़ गलत समझा। पहली शाम थकी और चिढ़ी रही। गलत चार्जर रखा।

इससे बहन उसके फैसलों की मालिक नहीं हो गई।

सप्ताहांत अप्रिय जरूर हुआ।

आयोजन में पता चला कि पहले की चिंता ने उम्मीद से ज्यादा ताकत ले ली। तैयारी उन चीजों की सूची बन गई थी जो गलत नहीं होनी चाहिए। खेल पर लगभग सोचा ही नहीं था।

शुरुआत खराब हुई।

फिर जल्दी सँभलने की कोशिश की।

चार सत्र बाद स्थान सबसे नीचे वालों के पास था।

छिपा सांत्वना पुरस्कार नहीं मिला। ऐसा प्रभावित आयोजक नहीं आया जो परिणाम के पार देखकर बेहतर अवसर दे दे।

सामान लिया। अधिकारी का धन्यवाद किया। सिरदर्द के साथ बस स्टॉप चली।

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फोन बजा।

नेहा थी।

“कैसा गया?”

तारा ने सड़क देखी।

“खराब।”

विराम हुआ।

“घर आओ। अगली बार ठीक करेंगे।”

* * *

प्रस्ताव इतना परिचित था कि तारा लगभग पूरा अर्थ स्वीकार कर गई।

घर। सुधरा कार्यक्रम। बहन का चुना कमरा। कोई और बताने वाला कि आगे क्या होना चाहिए।

दस सेकंड सब चाहा।

फिर पूछा, “खाने की बात है या अगले प्रवेश को सँभालने की?”

नेहा को बुरा लगा।

“मदद की बात है।”

“खाने घर आ रही हूँ।”

“अगली प्रतियोगिता?”

“तय नहीं किया।”

बस में टिश्यू में चुपचाप रोई। उँगलियों पर छोटे सफेद टुकड़े रह गए।

जीत के साथ अलग होना आसान होता।

अलग हुई, हारी और अब भी चुनना था।

घर में नेहा ने पसंद की सब्जी बनाई थी। धन्यवाद कहा और खाया।

परिणाम की बात नहीं हुई।

अगली सुबह आयोजन का रिकॉर्ड खोला।

कुछ खास तरीकों से खराब था।

हर संभव तरीके से हमेशा खराब होने से बेहतर था।

जो बदल सकती थी, लिखने लगी।

पहला पन्ना पूरा होने से पहले बुआ का फोन आया।

“बहन की सुननी चाहिए। अनुभव की कीमत होती है।”

तारा ने पूछा कि परिणाम कैसे मालूम हुआ।

नेहा ने भेजा था।

पहले के अच्छे प्रदर्शन नहीं। तैयारी की मेहनत नहीं। बस यह आयोजन और संदेश कि मदद मानती नहीं है।

तारा ने फोन खत्म किया और बहन के कमरे में गई।

“क्यों भेजा?”

“कोई और समझाए तो शायद समझो।”

एक पल बोल नहीं पाई। सामान खोला भी नहीं था। खराब सप्ताहांत हॉल से निकलकर परिवार में अवज्ञा की चेतावनी बनकर घूम रहा था।

उसने कहा कि परिणाम को उसकी तरफ से बहस बनाकर न बाँटे।

“सार्वजनिक परिणाम है।”

“हाँ। उसके साथ कौन सी कहानी लगानी है, तुमने चुना।”

नेहा ने नजर हटा ली।

बाद में तारा ने बुआ को वापस फोन किया। हर खराब सत्र का बचाव नहीं किया। अगली बार जीतने का वादा भी नहीं किया।

“खराब खेली थी। अगली व्यवस्था भी खुद कर रही हूँ।”

बुआ के पास और सलाह थी।

तारा ने एक वाक्य सुना। कहा कि काम पूरा करना है और फोन रख दिया।

हाथ फिर काँपे।

अधूरे पन्ने पर लौटी। पहले तो वही पंक्ति दो बार पढ़ी। फिर अगला बिंदु लिखा। फोन की वजह से गलती की समीक्षा छोड़ देना आसान था। लेकिन लोगों के उसकी असफलता के बारे में बोलने से उसे खुद समझने का काम खत्म नहीं हो गया था।

* * *

पहली सूची व्यावहारिक थी।

दूरी। पहुँचने का समय। आने-जाने को जोड़ने पर कमरे का असली खर्च। कागज। चार्जर। खाना।

अक्सर यात्रा करने वाले दोस्तों की सलाह ली। किसी को जिंदगी चलाने के पद पर नहीं बैठाया।

दूसरी सूची खेल की थी।

अभ्यास साथी संजय के साथ सत्र देखे। वह उनतीस का था। होटल में रात का काम करता था। रिकॉर्ड पर बात कर सकता था। नया प्रबंधक बनने को उपलब्ध नहीं था।

समय मिलाना कठिन था।

फिर भी मिला।

एक बार उसने खराब फैसले के लिए इस्तेमाल हो रहे स्पष्टीकरण पर सवाल किया। तारा बचाव में आई। फिर माफी माँगी और देखा।

स्वतंत्र होने का मतलब आलोचना न लेना नहीं था।

यह चुनना था कि उसके साथ क्या करना है।

अगली बार छोटा स्थानीय आयोजन लिया।

बीच में रही।

परिवार में किसी ने तस्वीर नहीं माँगी।

तारा ने परिणाम छापा क्योंकि सत्रों की तुलना में मदद थी।

फिर सिर्फ अपने नाम के फोल्डर में रखा।

* * *

नेहा दूर से बदलाव देख रही थी। दूरी दोनों के लिए कठिन थी।

अब भी अविश्वसनीय स्थानों और महँगे कमरों की चेतावनी भेजती। कभी तारा धन्यवाद करती क्योंकि जानकारी उपयोगी थी।

कभी कहती, जाँच चुकी हूँ।

एक बार नेहा ने बिना पूछे यात्रा बुक की।

तारा ने दोबारा न करने को कहा और बुकिंग की शर्तों से रद्द करने को कहा। सिर्फ मौजूद होने से उपयोग नहीं किया।

रद्द करने का खर्च नेहा को चुभा।

तारा ने बिना मंजूर व्यवस्था का खर्च नहीं दिया।

दो दिन फ्लैट बहुत छोटा लगा।

फिर माँ की घर की खरीद लाने में मदद चाहिए थी। दोनों बहनें बड़े डिब्बे के दोनों सिरे पकड़कर सीढ़ियाँ चढ़ीं।

“तुम्हारी तरफ ऊँची है,” नेहा बोली।

“जरूरी है। रेलिंग है।”

ठीक किया और दरवाजे से निकालीं।

डिब्बा पकड़े किसी ने बहस की माफी नहीं माँगी।

जानना उपयोगी था कि असहमति से हर सामान्य सहयोग असंभव नहीं होता।

* * *

अगले बड़े खुले आयोजन तक कई महीने लगे।

इस बार पिछली दोपहर पहुँची। स्थान जाँचा। नोट देखने से पहले खाया।

कमरे की चाबी कहाँ है, जानती थी।

पहला सत्र कब है, जानती थी।

यह भी जानती थी कि इतनी तैयारी के बाद परिणाम फिर खराब हो सकता है।

फैसले का हिस्सा था। उसे किसी और को सौंपने की वजह नहीं।

घर फोन किया।

माँ ने खाना पूछा।

“खा लिया।”

नेहा आई और यात्रा पुष्टि जाँचने को पूछा।

“जाँच ली।”

थोड़ी खामोशी हुई।

फिर कमरा साफ है क्या पूछा।

“हाँ। पंखा आवाज करता है।”

“देखने को कहो।”

“कहा है।”

फिर खामोशी।

“शुभरात्रि,” नेहा ने कहा।

“शुभरात्रि।”

गरमजोशी वाला मेल नहीं था।

ऐसी बात थी जिसमें विराम भरने के लिए नए निर्देश स्वीकार नहीं हुए।

तारा सो गई।

* * *

चयन चरण ने धैर्य जाँचा।

शुरुआत अच्छी थी। बीच साधारण था। एक सत्र में लय नहीं मिली। जरूरी बात देखी। बाकी समय मिलने तक छोड़ी।

संजय का एक संदेश आया कि खेल के बाद कुछ चर्चा चाहिए क्या?

उसने कल कहा।

उत्तर में ठीक है मिला।

जल्दबाजी का न होना लगभग विलासिता लगा।

अगली दोपहर अंतिम चरण तक पहुँची।

बिना स्पष्टीकरण परिणाम घर भेजा।

नेहा का फोन आया।

तारा खा रही थी। बजने दिया। बाद में लौटाया।

बहन ने अंतिम समय पूछा।

“कार्यक्रम में छह है। बदल सकता है।”

“जगह भेजो।”

“क्यों?”

“देखना चाहूँगी।”

तारा ने अपनी पंजीकरण पुष्टि वाला संदेश देखा।

फिर पता और दर्शकों की जानकारी भेजी।

“व्यवस्था नहीं करनी है।”

“सुन लिया,” नेहा बोली।

तारा ने उम्मीद की कि सच में सुना है।

* * *

अंतिम दौर से पहले नेहा दिखी।

प्रवेश के पास बैग लिए किसी से उपयोगी सवाल पूछने को खोज रही थी।

तारा मुद्रा पहचानती थी।

नेहा ने उसे देखा और रुकी।

“कुछ चाहिए?”

“पानी अच्छा होगा।”

बोतल खरीदकर दी।

साथ फॉर्म नहीं था।

अंतिम मुकाबला करीबी और थकाने वाला था। तारा को अचानक संदेह से आजादी नहीं मिली। दो बार दरवाजे की तरफ देखना चाहा। कोई चेहरा बताए कि कैसी खिलाड़ी है।

इसके बजाय सामने की जानकारी पर लौटी।

एक खराब फैसला किया। उसे पूरा सप्ताहांत नहीं बनने दिया। कुछ अंतर लौटाया और आखिरी सत्र तक ध्यान रखा।

परिणाम पक्का हुआ तो नाम पहला था।

नेहा खड़ी थी।

एक पल डर लगा कि बिना बुलाए तस्वीर की व्यवस्था करने आएगी।

बहन वहीं रही।

तारा मुस्कुराई।

फिर पुरस्कार लेने गई।

* * *

भुगतान की औपचारिकता अलग मेज पर थी।

अधिकारी ने जरूरी विवरण समझाया। प्राप्तकर्ता की जानकारी खुद जाँचने को कहा।

नेहा पास आई थी।

फॉर्म आया तो बैग से कलम निकाली।

“लो।”

तारा के पास नीली थी।

ढक्कन पर दाँतों के निशान अब भी थे।

अपनी कलम कागज पर रखी।

“मेरे पास है।”

नेहा का हाथ एक पल बढ़ा रहा।

फिर नीचे हुआ।

तारा ने हर हिस्सा पढ़ा। अपना नाम लिखा। जरूरी खाते का विवरण भरा। बहन को दिए बिना जाँचा।

अधिकारी ने भुगतान पुष्टि पर सवाल किया।

तारा ने उत्तर दिया।

फिर हस्ताक्षर किया।

किसी ने ताली नहीं बजाई।

मेज व्यस्त थी। दूसरा खिलाड़ी इंतजार कर रहा था।

तारा ने धन्यवाद कहा और हटी।

दिन का सबसे कम नाटकीय हिस्सा था।

जानती थी कि सबसे लंबे समय तक याद रहेगा।

* * *

बाहर नेहा ने साथ की तस्वीर पूछी।

तारा ने हाँ कहा।

पुरस्कार तारा के हाथ में था। नेहा का हाथ कंधे पर हल्का रखा था।

बाद में बहन ने वाक्य शुरू किया।

“आखिर हमने—”

रुक गई।

“अच्छा किया तुमने।”

तारा ने देखा।

“धन्यवाद।”

स्टेशन जाते समय नेहा ने कहा कि डर था तारा को उसकी जरूरत नहीं रहेगी।

तारा कुछ देर चुप रही।

“बहन चाहिए। हर फैसला किया हुआ नहीं चाहिए।”

नेहा ने सिर हिलाया। आसान बनाने वाला उत्तर नहीं मिला।

यात्रा का खाना खरीदा।

पुरस्कार आया तो तारा के बताए खाते में गया। अपनी चुनी घरेलू रकम दी और साफ दर्ज की। बाकी अपनी योजनाओं के लिए रहा।

आजादी दिखाने के लिए खर्च नहीं किया।

डिजाइन के सॉफ्टवेयर का नवीनीकरण किया, बचत अलग रखी और काम लौटी।

* * *

पुराने खाते निपटाने में दो बैठकें और लगीं।

सहमत यात्रा खर्च, घर के योगदान और तारा को बाकी रकम अलग की। नेहा ने गायब रिकॉर्ड दिए। बाकी लौटाया। दोनों ने हिसाब की प्रति रखी।

तारा ने बहन का किया प्रशासन का काम भी माना। कभी फिर साथ काम चुना तो काम का दायरा और भुगतान पहले तय होगा।

पूछे जाने का विचार नेहा ने तुरंत खुशी से नहीं लिया। पहले तो उसका होना ही पर्याप्त समझा जाता था।

लेकिन पखवाड़े बाद दूसरे आयोजन का प्रस्ताव घर लाई। उसमें उसकी व्यवस्था वाला काम था। तारा के परिणाम इस्तेमाल नहीं थे।

लेआउट देखने में मदद चाहिए थी।

तारा ने समय पूछा।

“शुक्रवार।”

“कल देख सकती हूँ।”

नेहा कहने लगी कि एक मिनट ही लगेगा। फिर तारा की स्क्रीन पर खुला लेबल देखा।

“कल ठीक है।”

अगली शाम तारा ने देखा। बदलाव सुझाया। नेहा असहमत हुई। दूसरा रूप मिला।

एक को उपयोगी होने के लिए दूसरा असहाय नहीं हुआ।

अगली पारिवारिक मुलाकात में किसी ने नेहा को एक और चैंपियन बनाने की बधाई दी।

उसने तारा को देखा।

फिर कहा, “अंतिम मुकाबला उससे पूछिए। मैंने देखा था।”

तारा कहानी बताने लगी।

नेहा ने सुना।

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