1. Maha Games कहानी: चार बजकर ग्यारह मिनट
चार बजकर ग्यारह मिनट पर रेवा ने अपनी पुरानी सहेली को बराबरी का प्रस्ताव दिया। देविका ने टूर्नामेंट की तालिका देखी, फिर सामने बैठी विश्वविद्यालय की पुस्तकालयाध्यक्ष को, और सिर हिला दिया।
उसे आखिरी दौर की जीत वाली तस्वीर चाहिए थी। बराबरी से भी काल्पनिक डेक्कन स्टाफ इनविटेशनल का खिताब उसके नाम हो जाता। लेकिन बीस साल से वह रेवा को ऐसी व्यक्ति बताती आई थी जो दूसरों की उपलब्धियाँ अलमारी में सजाती है।
रेवा ने घड़ी दबाई और प्रतीक्षा की।
बाज़ी सुबह से चल रही थी। अंक तालिका में देविका आधा अंक आगे थी। दूसरी मेज़ों पर अब कोई इन दोनों से आगे नहीं निकल सकता था। रेवा को पहला स्थान पाने के लिए जीत चाहिए थी। बराबरी माँगना यह स्वीकार करना था कि उस क्षण स्थिति उसे जीत की ईमानदार उम्मीद नहीं दे रही थी।
उसकी रानी असुविधाजनक जगह थी। राजा को बचाव चाहिए था। उसके पास एक घोड़ा बचा था और एक प्यादा कम था। ऊपर पंखा ढीली आवाज़ के साथ घूम रहा था।
देविका ने स्थिति सरल करने वाला रास्ता छोड़ दिया और आगे बढ़ी।
दर्शकों की रेखा से परिचित फुसफुसाहट आई, “लाइब्रेरियन का खेल खत्म है।”
रेवा ने नज़र नहीं उठाई। दो साल पहले भी उसने यही शब्द सुने थे। तब कमरे में शतरंज का बोर्ड नहीं था। उसकी पुरानी सहेली माइक्रोफोन पकड़े मुस्करा रही थी।
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2. पुनर्मिलन की काटी हुई तस्वीर
कॉलेज के पुराने छात्रों के मिलन में रेवा पुस्तकालय को दान देने वाली किताबें लेकर आई थी। देविका दो सहायकों और अपनी नई शतरंज अकादमी का बैनर लेकर पहुँची।
कभी दोनों छात्रावास का कमरा साझा करती थीं। रेवा को कैलेंडर के पीछे बनाए बोर्ड पर खेलना याद था, जहाँ खोए मोहरों की जगह बटन रखे जाते थे। लोग सुन रहे होते तो देविका की याद बदल जाती।
“रेवा को हमारे खेलों का आयोजन हमेशा पसंद था,” उसने मंच से कहा। “कुछ लोग खेलते हैं। कुछ लोग स्कोर लिखते हैं।”
पीछे स्लाइड पर पुरानी टीम की तस्वीर आई। उसे इस तरह काटा गया था कि चैम्पियनशिप की शील्ड दिखे, लेकिन रेवा न दिखे। उस साल निर्णायक अंक रेवा ने लिया था।
उसने पूरी तस्वीर दिखाने को कहा। देविका माइक्रोफोन पर हँसी।
“लाइब्रेरियन को सुधार चाहिए। और क्या!”
बाद में सहायक ने खाली गत्ते के डिब्बे रेवा को पकड़ाए और अकादमी की तस्वीरों से पहले हटाने को कहा। पुरानी रूममेट सुनने की दूरी पर खड़ी थी। उसने कैमरे की तरफ चेहरा कर लिया।
रेवा डिब्बे बाहर ले गई। एक नीचे से फट गया। पुराने कार्यक्रमों के पन्ने पानी में फैल गए। एक आदमी मदद करने के बजाय किनारे से निकल गया।
घर पर रेवा ने टीम की असली तस्वीर निकाली। गुस्से वाला संदेश लिखकर पोस्ट नहीं किया। उसे उस शतरंज बोर्ड के पास रख दिया जिसे सात साल से ठीक तरह नहीं खोला था।
3. पुस्तकालय खुलने से पहले के घंटे
अब टूर्नामेंट की मेज़ पर रेवा ने राजा के पास एक खाना बचाने के लिए घोड़ा चलाया। देविका ने तेज़ जवाब दिया। वह चाहती थी कि रेवा उसकी गति पकड़ ले और अपनी स्थिति देखना छोड़ दे।
मिलन समारोह के बाद शुरुआती अभ्यास में रेवा यही करती थी। उसने विश्वविद्यालय के वयस्क शतरंज समूह में लौटकर पाया कि पहले कैसे खेलती थी, यह याद होना और अब वैसे खेल पाना अलग बातें हैं।
एक ही शाम वह प्रयोगशाला तकनीशियन, इतिहास की अध्यापिका और छात्रावास के अकाउंटेंट से हारी। किसी ने देविका का मज़ाक नहीं सुना था। उनकी उदासीनता अजीब तरह से उपयोगी थी।
हर सुबह पुस्तकालय खोलने से पहले रेवा चालीस मिनट रक्षात्मक स्थितियाँ पढ़ती। अपनी आकर्षक चाल खोजने से पहले विरोधी की धमकियाँ देखती। भोजन के समय एक हारी बाज़ी दोहराती। हफ्ते में दो बार इतनी धीरे खेलती कि हर निर्णय लिख सके।
कोई एक गुरु उसे बदलने नहीं आया। तकनीशियन ने छूटा हुआ फोर्क दिखाया। अकाउंटेंट ने तीन हफ्ते लगातार उसी कमजोर खाने का लाभ उठाया। एक अतिथि अध्यापिका ने समझाया कि तुरंत राहत देने वाली अदला-बदली अंत में प्यादों का हारा खेल छोड़ सकती है।
रेवा ने दो खाने बनाए: मैं क्या चाहती थी, और बोर्ड क्या करने देता था।
पहला आसानी से भर जाता। अधिक मेहनत दूसरा माँगता।
चार बजकर अठारह मिनट पर देविका अब भी हमला कर रही थी। रेवा ने आकर्षक चाल से नज़र हटाई और वह चाल खोजी जिसकी स्थिति अनुमति देती थी।
4. तालियों के पीछे छिपी गलती
देविका ने रेवा के राजा की तरफ प्यादा बढ़ाया। समझ में आने वाला हमला देखकर दर्शक करीब खिसके। रेवा ने अपने एक रक्षक को उसके हमलावर से बदला। प्यादों की बनावट खराब हुई, लेकिन तत्काल खतरा हटा।
स्थिति बदसूरत लग रही थी। फिर भी टिक रही थी।
छह महीने पहले रेवा ऐसी अदला-बदली मना कर देती। उसे लगता था कि अच्छे खेल की स्थिति ऐसी नहीं दिखनी चाहिए। उस दिखावे की कीमत उसे साफ याद थी।
एक स्थानीय अभ्यास प्रतियोगिता में उसने मोहरे बहुत सुंदर तरीके से रखे थे, जबकि सामने वाले ने उसके राजा के सामने फाइल खोल दी। घर लौटती ट्रेन में वह स्कोर देखती रही। समझ नहीं पा रही थी कि इतनी व्यवस्थित स्थिति कैसे टूट गई।
अगली सुबह उसने बोर्ड दूसरी तरफ से लगाया। हमला तुरंत दिखा। वह स्थिति का बचाव नहीं कर रही थी, एक तस्वीर बचा रही थी।
उसके बाद उसने असुविधाजनक अंत पढ़े: कमजोर प्यादा, खुला राजा, कम खाने वाला घोड़ा। कौन-सी कमी सहन की जा सकती है और कौन-सी तुरंत खेल खत्म करेगी, यह पूछना सीखा।
अब देविका पीछे टिकी। उसे झुंझलाहट थी कि आराम छोड़ने से रेवा ने पूरी बाज़ी नहीं छोड़ी।
रेवा के बचाव के पीछे तालियाँ नहीं थीं। दर्शकों को खराब प्यादे दिख रहे थे। यह अभी नहीं दिख रहा था कि देविका का आसान हमला रास्ता खो चुका है।
रेवा देख सकती थी। उसने कुर्सी ठीक की और गणना जारी रखी।
5. जोड़ी की सूची पर लिखा नाम
दोपहर को अंतिम दौर की जोड़ी घोषित हुई थी तो देविका ने पानी की मशीन के पास रेवा को अकेले बात करने बुलाया था।
“जो भी हो, इसे व्यक्तिगत मत बनाना।”
रेवा ने उसकी जैकेट पर अकादमी का बैज देखा था। नीचे छोटे अक्षरों में लिखा था: प्रमुख खिलाड़ी और संस्थापक।
“तुमने मुझे तस्वीर से निकालते समय इसे व्यक्तिगत बनाया था।”
देविका ने ऐसे साँस छोड़ी जैसे रेवा घर से कोई अनावश्यक परेशानी ले आई हो। उसने कहा पुरानी तस्वीर स्लाइड में फिट नहीं होती थी। दर्शक मज़ाक समझते थे। ऐसी बातें कोई याद नहीं रखता।
रेवा को हर शब्द याद था।
लेकिन उसे अपनी ओपनिंग की तैयारी भी याद थी। देविका सक्रिय रानियों वाली स्थिति पसंद करती थी। बिना साफ नुकसान दिखाए उसका हमला रोक लिया जाए, तो उसे अच्छा नहीं लगता था। यह पसंद अपने आप कमजोरी नहीं थी। रेवा को इतने समय टिकना पड़ता कि अधीरता उसे कमजोरी बनाए।
बोर्ड पर उसने सुरक्षित, संयमित ढाँचा चुना। फिर भी देविका ने दबाव बना लिया। मध्य खेल में रेवा सचमुच खराब स्थिति में थी।
कोई गुप्त तैयारी खेलना आवश्यक होने की शर्त नहीं हटा सकती थी।
अब चार बजकर बीस मिनट के बाद उसने पहली बार देखा कि देविका स्थिति के साथ दर्शकों का भी हिसाब लगा रही है। सुरक्षित चाल उपलब्ध थी। देविका ने राजा की अधिक महत्वाकांक्षी चाल चुनी।
6. वह शह जिसे उसने बचाकर रखा
रेवा ऐसी शह खोजने लगी जो दो काम करे: देविका का हमला रोके और अपनी रानी को बचाव के करीब रखे। बेकार शह विरोधी राजा को बेहतर जगह पहुँचा सकती थी। उपयोगी शह उसे ज़रूरी खाना दिला सकती थी।
एक बरसाती रविवार उसने यह अन्तर सीखने में बिताया था। बिना सोचे शह देते रहने से तीन बाज़ियाँ हार गई थी। कॉपी के बचाव वाले हिस्से में लिखा था: शह एक सवाल है, उपलब्धि नहीं।
लिखते समय उसे वाक्य बहुत साधारण लगा था। विश्वविद्यालय में खेल चुकी व्यक्ति को ऐसी बात क्यों लिखनी पड़े? ठीक इसी वजह से उसे इसकी ज़रूरत थी।
मेज़ पर देविका एक शह से हटी और फिर धमकी बनाई। रेवा ने विरोधी राजा को अपने मोहरों के सहारे से दूर जाकर पीछा करने के बजाय रानी वापस लाई। पुराना गुस्सा रक्षात्मक सवाल को निजी पीछा बनाने की कोशिश कर रहा था।
एक और चाल बच गई। फिर अगली भी।
दर्शक ने तालिका देखी और धीरे कहा कि देविका को तो सिर्फ बराबरी स्वीकार करनी है। देविका ने सुन लिया। प्यादे के ऊपर हाथ रुका, फिर उसने वही प्यादा चला दिया।
रेवा उसे हद से आगे जाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती थी। वह ऐसी स्थितियाँ बनाए रख सकती थी जहाँ आगे बढ़ना उसका अपना चुनाव हो।
घड़ी चलती रही। रानी शह देने वाली तिरछी रेखा पर लौटी। पहली बार देविका उत्तर सोचने में उससे अधिक समय ले रही थी जितना रेवा ने सवाल रखने में लिया था।
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7. राजा क्या चाहता था
स्थिति सरल होते-होते दोनों के पास एक-एक रानी रह गई। रेवा का घोड़ा भी बचा था, जबकि देविका के पास अधिक प्यादे थे। कुल सामग्री में देविका की बढ़त सच थी, लेकिन उसका राजा प्यादों की सुरक्षा से आगे निकल आया था।
रेवा का राजा g1 पर था। घोड़ा h4 पहुँच चुका था। f2, g2 और h3 के तीन प्यादे राजा को तुरंत खुलने से बचा रहे थे। देविका के सात प्यादे a7, b7, c6, d6, f7, g7 और h5 पर थे। उसकी रानी d4 पर और राजा h7 पर था।
रेवा ने रानी c2 पर रखी। तिरछी रेखा से h7 पर शह लगी।
पीछे हटने का सुरक्षित रास्ता था। देविका ने उसे देखा, फिर दर्शकों की तरफ देखा। पीछे हटती तो रेवा वही रक्षात्मक प्रश्न फिर पूछ सकती थी। देविका राजा आगे लाकर शह से निकलना चाहती थी, फिर अतिरिक्त प्यादों से ऐसी जीत बनाना चाहती थी जिसे सब समझें।
उसका राजा h6 गया।
चाल वैध थी। महत्वाकांक्षी थी। रेवा ने सावधानी से यही मानने से परहेज़ किया था कि वह अवश्य यह चलेगी।
रेवा ने फिर बोर्ड देखा। विचार जाँचने से पहले खुशी नहीं मनानी थी। h4 का घोड़ा f5 जा सकता था। वहाँ से एक साथ h6 और d4 पर हमला होता।
राजा। रानी।
ऊपर पंखा खटका।
रेवा ने घोड़ा f5 पर रखा और घड़ी दबाई।
8. एक साथ दो खाने
“शह।”
देविका ने घोड़ा देखा, फिर रानी। पल भर लगा जैसे वह किसी और मोहरे के आकर स्थिति बदल देने की प्रतीक्षा कर रही हो।
घोड़े की शह को बीच में मोहरा रखकर नहीं रोका जा सकता था। रानी उस घोड़े को नहीं मार सकती थी। राजा को हटना था। हटते ही घोड़ा d4 की रानी ले लेता।
फिर भी देविका खोजती रही। कमरे में इतनी शांति हो गई कि रेवा को स्कोर लिखने वाले का पन्ना पलटना सुनाई दिया।
देविका ने राजा g5 पर रखा। रेवा ने रानी ली। फोर्क पूरा हो गया। जिस हमले को बचाए रखने पर देविका अड़ी थी, उसमें अब उसका सबसे शक्तिशाली मोहरा ही नहीं था।
रेवा के पास रानी और घोड़ा दोनों थे। हाथ बोर्ड से हटाने से पहले उसने तत्काल धमकियाँ देखीं। मुश्किल हिस्से की दिशा बदल जाने का अर्थ यह नहीं था कि अब जल्दी करना चाहिए।
देविका ने कुछ चालें और खेलीं। रेवा ने राजा सुरक्षित किया, प्यादे का बढ़ना रोका और रानी ऐसी जगह लाई जहाँ से वास्तविक वापसी का रास्ता नहीं बचा।
फिर देविका ने घड़ी रोकी और हार मान ली।
रेवा के सात अंक थे। देविका के साढ़े छह। अंतिम तालिका को किसी टाईब्रेक की बहस की ज़रूरत नहीं थी।
दर्शकों के पीछे वह आदमी परिणाम देख रहा था जिसने कहा था कि लाइब्रेरियन खत्म है। उसके चेहरे पर ऐसा भाव था जैसे उसकी नज़र हटते ही किसी ने पूरी अलमारी का क्रम बदल दिया हो।
रेवा ने अपना नाम धीरे लिखा, ताकि अपनी लिखावट पहचान सके।
9. पूरी तस्वीर
आयोजक ने दोनों को पुरस्कार के लिए बुलाया। देविका माइक्रोफोन की तरफ बढ़ी। शायद किसी और के बताने से पहले वह बाज़ी समझाना चाहती थी। आयोजक ने कहा कि पहले विजेता बोलेंगी।
दो साल से रेवा ऐसे भाषण की कल्पना करती थी जिससे पुराने दर्शक शर्मिन्दा हो जाएँ। अब उसे केवल एक सही वाक्य चाहिए था।
“मैं रेवा मेनन हूँ। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में काम करती हूँ। और आज मैंने यह टूर्नामेंट जीता है।”
आगे कुछ कहने का निर्णय लेने से पहले तालियाँ आ गईं।
छात्र फोटोग्राफर ने ट्रॉफी ऊँची करने को कहा। रेवा ने उससे फ्रेम चौड़ा करने को कहा। प्रयोगशाला तकनीशियन, अकाउंटेंट और शतरंज समूह के दूसरे सदस्य किनारे पर खड़े थे।
“सबको रखिए,” उसने कहा।
देविका से निर्णायक मोड़ पूछा गया। उसने घोड़े का फोर्क समझाया और स्वीकार किया कि पहले बराबरी मान लेने से पहला स्थान मिल जाता। स्वीकार करना दर्दनाक लग रहा था। बात सही भी थी।
तस्वीरों के बाद वह बिना माइक्रोफोन रेवा के पास आई।
“मिलन समारोह में मुझे वह बात नहीं कहनी चाहिए थी।”
“नहीं,” रेवा ने कहा। “नहीं कहनी चाहिए थी।”
उसने सहेली को अपना ही उत्तर सुनने की असुविधा से बचाने के लिए वाक्य नरम नहीं किया। देविका ने उसके अपमान पर पूरे कमरे की हँसी स्वीकार की थी। अब शांत, पूरा उत्तर भी सह सकती थी।
10. सोमवार, सुबह नौ बजे
सोमवार सुबह रेवा ने रोज़ के समय पुस्तकालय खोला। साथी ने लौटाई किताबों की ट्रे के पास बधाई का छोटा कार्ड रखा था। देर से आने वाली किताबें अब भी थीं, खिड़की से पानी टपकता था और पत्रिका के गायब अंक पर विवाद भी था।
एक पाठक कार्ड के पास रुका और फाइनल के बारे में पूछा। शतरंज के सेट वाली अलमारी खोलने से पहले रेवा ने तस्वीर दिखाई। दोपहर तक तीन और लोग पूछ चुके थे कि समूह कब मिलता है।
दोपहर में शतरंज समूह ने अंतिम बाज़ी खोली। उन्हें देविका की एक बेहतर चाल मिली और रेवा की ऐसी रक्षात्मक गलती भी जिसे खेलते समय किसी ने नहीं देखा था। रेवा ने दोनों लिख लीं।
छात्र फोटोग्राफर पुस्तकालय आया और उसने पूछा कि क्या रेवा ने ओपनिंग से ही घोड़े का फोर्क सोचा था। रेवा ने कहा, नहीं। उसकी योजना इतना सही खेलते रहने की थी कि सामने वाली गलती करे, तो वह उसे देखने के लिए अभी बोर्ड पर मौजूद हो।
दोपहर बाद पुरानी पूरी तस्वीर ईमेल में आई। देविका ने बिना काटे भेजी थी। रेवा ने प्रति निकालकर नई टूर्नामेंट तस्वीर के पास रख दी।
पुरानी तस्वीर में वह बाईस साल की थी, शील्ड का एक किनारा पकड़े हुए। नई तस्वीर में तैंतालीस की थी और अपनी ट्रॉफी पकड़े थी।
दोनों के बीच इक्कीस साल थे। किसी फ्रेम का किनारा खींचकर उन्हें हटाया नहीं जा सकता था।
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