1. Max Rummy कथा: अलमारी के पीछे की तस्वीर
प्रदीप को अपनी कोचिंग वाली तस्वीर अलमारी के पीछे मिली। उसका चेहरा दीवार की तरफ था। नए कर्मचारियों ने प्रायोजक के आने पर लाउंज साफ किया था। उन्हें नहीं मालूम था कि प्रदीप को कहाँ रखा जाए।
बाईस साल उसने क्लब के वयस्क खिलाड़ियों को सिखाया था। छप्पन की उम्र में पत्नी की मृत्यु और नौकरी के साथ मिले छोटे फ्लैट के चले जाने के बाद उसे कभी-कभी मेज़ें लगाने का काम मिलता था।
पुराने शिष्य विक्रांत ने उसे कुर्सियाँ ढोते देखा। साथ खड़े लोगों से बोला, “सर अभी भी जीतने वाली पोजीशन जमाना जानते हैं।”
वे कुर्सियों पर हँसे।
प्रदीप चलता रहा। कुर्सी के पाए कलाई में गड़ रहे थे। रुकता तो दर्द चेहरे पर आ जाता।
गलियारे में चयन सूची लगी थी। सबसे नीचे उसका नाम रिज़र्व में था। आगे लिखा था—उम्र और सहनशक्ति के अनुसार उपलब्धता। उससे किसी ने पूछा भी नहीं था कि इनमें कोई समस्या है या नहीं।
उसने सचिव से पूछा तो वह धीमे बोली। “सम्मान के लिए रखा है। विक्रांत तस्वीर में कोई पुराना परिचित चेहरा चाहता था।”
शाम को वह पत्नी का स्टील का डिब्बा लेकर बंद दुकान के ऊपर किराए के कमरे में पहुँचा। उसमें एक रोटी थी। बाकी खरीदना भूल गया था।
उसने खड़े-खड़े खाया और फर्श पर तेरह पत्ते लगाए।
सालों तक उसने दूसरों को हाथ पूरा करना सिखाया था। कहीं रास्ते में अपना हाथ पूरा करने की उम्मीद छोड़ दी थी।
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2. जो पाठ वह खुद भूल गया
अकेले पहला अभ्यास दूसरी तरह अपमानजनक था। दर्ज की हुई डील दोबारा खेलते हुए उसने देखा कि बड़े पत्ते उपयोग खत्म होने के बहुत बाद तक उसके हाथ में रहते थे।
राजा के पास रानी संभावना लगती थी। इक्कों की जोड़ी तोड़ना नुकसान लगता था। वह इसे धैर्य कहता था। स्कोर शीट इसे महँगा कहती थी।
उसने शुरुआती विद्यार्थियों को दिया पुराना अभ्यास निकाला। हर ड्रॉ के बाद बताओ कि हाथ में रखा हर पत्ता किस काम का है।
वह कितना सुंदर है, यह नहीं। कल्पना के आदर्श भविष्य में क्या बन सकता है, यह नहीं। अभी उसका काम क्या है?
कुछ पत्तों के दो उपयोगी संबंध थे। कुछ के पास सिर्फ याद थी।
प्रदीप ने दूसरे प्रकार के पत्तों पर नोट्स में लाल निशान लगाए। आधी रात तक पन्ने घायल लगने लगे।
उसने नए रिकॉर्ड एक फोल्डर में रखे। उसके कवर पर सीधा सवाल लिखा—इंतज़ार करते हुए यह पत्ता मुझसे क्या कीमत ले रहा है?
अगले दिन कोने मुलायम पड़ चुकी सस्ती गड्डी से अभ्यास किया। पहले प्योर सीक्वेंस बनाया। फिर अकेले बड़े पत्तों को आदतन बचाने के बजाय दोबारा जाँचा।
हर डील वह नहीं जीता। ऐसा कभी संभव नहीं था।
लेकिन हारने वाले हाथों की पेनल्टी कम होने लगी। महीनों में पहली बार कोई संख्या उसके पक्ष में बढ़ी या घटी थी, बिना किसी की अनुमति के।
3. वह शिष्या जो सर नहीं बोली
पुरानी शिष्या अनीता अब अपना शाम का समूह चलाती थी। उसने प्रदीप को खेलने बुलाया। वह सलाह देने के लिए तैयार होकर पहुँचा। अनीता ने उसे स्कोर शीट पकड़ा दी।
“आज आप प्रतिद्वंद्वी हैं।”
पहली डील हारकर वह अपनी सोच समझाने लगा। अनीता ने उसे पूरा बोलने दिया।
“आपने राजा इसलिए रखा क्योंकि पुरानी योजना पसंद थी। हाथ बदल चुका था।”
वाक्य चुभा। लगभग यही बात प्रदीप ने पंद्रह साल पहले उससे कही थी।
उन्होंने आठ डील खेलीं। अनीता ने अधिक हाथ जीते, लेकिन प्रदीप की कुल पेनल्टी कम रही। फिर अभ्यास उलटा। पीछे होने पर प्रदीप को अधिक सक्रिय होना था और अनीता को नुकसान सीमित करना था।
सावधानी अपने आप में अच्छी नहीं थी, अगर वह हर स्थिति का यांत्रिक जवाब बन जाए।
प्रदीप के नए नोट्स में नारों की जगह परिस्थितियाँ आने लगीं। खराब हाथ की शुरुआत में अकेला राजा एक फैसला था। लगभग पूरे हाथ में सीक्वेंस पूरा करने वाला राजा दूसरा।
पूरा ढाँचा, सार्वजनिक रूप से फेंके पत्ते और मुकाबले का स्कोर देखकर निर्णय लेना था।
अंत में अनीता ने बिना औपचारिकता शीट लौटा दी। “गुरुवार को आइए। और जब तक कोई पूछे नहीं, पढ़ाइए मत।”
प्रदीप हँस पड़ा। अपनी हँसी सुनकर उसे खुद आश्चर्य हुआ।
गुरुवार को वह नई गड्डी लाया, भाषण नहीं। तीन घंटे तक किसी ने उससे कुर्सी हटाने को नहीं कहा।
4. रिज़र्व को बुलावा आया
शहर की आमंत्रण प्रतियोगिता से दो दिन पहले एक खिलाड़ी बुखार के कारण हट गया। तीन दूसरे विकल्पों से बात करने के बाद सचिव ने प्रदीप को फोन किया।
“पूरा दिन अभी भी संभाल लेंगे?”
“हाँ।”
“नए नियम पढ़ने होंगे।”
उसने पहले ही छाप लिए थे।
हर आमने-सामने का मुकाबला आठ डील का था। कम कुल पेनल्टी वाला खिलाड़ी जीतता। अलग-अलग डील की जीत दर्ज होती, लेकिन फैसला उससे नहीं होता था। अधूरे हाथ के अंक प्रकाशित नियमों से गिने जाते और एक डील की अधिकतम हार अस्सी अंक थी।
प्रदीप अपने नाम से उतरा। उसके आगे कोच नहीं लिखा था।
पहले मुकाबले में उसने सिर्फ तीन डील जीतीं। बाकी में नुकसान छोटा रखा और कुल अंक से आगे गया। दूसरा विरोधी उसकी पद्धति समझ गया। उसने बंद गड्डी से अधिक पत्ते उठाए ताकि सार्वजनिक जानकारी कम मिले।
प्रदीप छिपे पत्ते नहीं पढ़ सकता था। उसने चुप्पी को कमजोरी मानने के बजाय अपने हाथ के लचीलेपन को अधिक महत्व दिया।
देर की एक ड्रॉ पर चुनाव मिला। बड़ी जोड़ी बचाए या दूसरा सीक्वेंस बनाए। उसने जोड़ी तोड़ी। दो चाल बाद सही घोषणा हुई।
वह सेमीफाइनल में पहुँच गया।
हॉल के पार विक्रांत ने सूची देखी और मुस्कराया। “किसी की विदाई पार्टी अच्छी चल रही है।”
प्रदीप ने स्कोर शीट एक बार मोड़ी और जेब में रख ली। अब उसे जवाब देने के लिए शेष मुकाबले थे।
5. जो मुकाबला लगभग हाथ से गया
सेमीफाइनल की खिलाड़ी इतनी धैर्यवान थी कि दूसरे के धैर्य को सज़ा दे सके। उसने दो हाथ जल्दी पूरे किए और प्रदीप को पीछा करने पर मजबूर कर दिया।
पाँच डील बाद वह तीस अंक पीछे था। सिर्फ महँगे पत्ते हटाता रहता तो हार सम्मानजनक दिखती। नतीजा नहीं बदलता।
उसने अपनी नई आदत का जाल पहचान लिया। उपयोगी सुधार फिर कठोर नियम बन रहा था।
छठी डील में उसने दो जीवित संबंधों वाला बड़ा पत्ता रखा। उसे फेंकता तो तत्काल जोखिम कम होता। लेकिन प्योर सीक्वेंस और दूसरा सीक्वेंस पहले से थे। बाकी समूहों के पूरे होने का वास्तविक रास्ता था।
वह खास जोखिम स्वीकार कर रहा था। पसंदीदा पत्ते को भावुकता से बचा नहीं रहा था।
अगली ड्रॉ उपयोगी नहीं हुई। उसने फिर योजना बदली। पहले निर्णय को हमेशा सही साबित करने की ज़िद नहीं की। दूसरा पत्ता सेट बना रहा था। उसने उसी अनुसार डिस्कार्ड चुना और डील जीत ली।
सातवीं डील के बाद अंतर सिर्फ चार अंक था।
आठवीं में सामने वाली ने मन में इम्प्योर सीक्वेंस गलत गिना, लेकिन घोषणा से पहले खुद गलती पकड़ ली। प्रदीप ने उसे पत्ते बदलते देखा। कारण नहीं जान सकता था।
उसने अपने तेरह पत्तों पर ध्यान रखा। अगली उपयोगी ड्रॉ से अंतिम समूह पूरा हुआ। दोनों सीक्वेंस जाँचकर उसने घोषणा की और फाइनल में गया।
दरवाज़े पर अनीता मिली। “आखिर याद आया कि अंक बचाना और खेल से बचना अलग बातें हैं।”
6. एक कागज़ पर पाँच छोटी ट्रॉफियाँ
विक्रांत फाइनल में वही ब्लेज़र पहनकर आया जिसे चुनने में वर्षों पहले प्रदीप ने मदद की थी। कॉलर पर उसकी पहली बड़ी क्लब जीत का बैज था।
बैठते समय उसने बैज छुआ। “जीतना आपने ही सिखाया है, सर।”
प्रदीप ने पत्तों की ओर देखा। “तो देखते हैं क्या सीखा।”
पहली छह डील विक्रांत की लग रही थीं। पाँच वह जीता। उसके एक समर्थक ने हर जीत के पास अपनी कॉपी में छोटी ट्रॉफी बना दी।
लेकिन प्रदीप हर हार के पीछे महँगा मलबा छोड़ने से मना कर रहा था। एक हाथ में सामने वाला पूरा होने से पहले उसने अकेला इक्का निकाल दिया। दूसरे में उपलब्ध जानकारी के बाद बड़ी जोड़ी की उपयोगिता कम लगी तो उसे तोड़ दिया। वास्तविक सीक्वेंस बचाए। सिर्फ महत्वपूर्ण दिखने वाले पत्ते छोड़े।
उसकी पाँच हारों का जोड़ साठ था।
विक्रांत की अकेली हार बयालीस अंक की थी। उस डील में प्रदीप पूरा हो गया था और युवा खिलाड़ी शानदार अंत के लिए कई बड़े पत्ते बचाए बैठा था।
छह डील बाद स्कोर था—प्रदीप 60, विक्रांत 42।
बुजुर्ग खिलाड़ी अठारह अंक पीछे था। दो डील बाकी थीं।
विक्रांत के पीछे किसी ने कहा, “पाँच-एक।”
अधिकारी ने कुल अंक वाले खाने की ओर इशारा किया।
विक्रांत ने हाथ हिलाया। उसे नियम समझ आते थे। वह नतीजे के साथ पूरी तरह हावी दिखना भी चाहता था।
प्रदीप को नतीजा चाहिए था।
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7. राजा पहले गया
सातवीं डील में प्रदीप को चार पत्तों का प्योर सीक्वेंस और कई अलग-अलग संभावनाएँ मिलीं। किनारे एक अकेला राजा था।
उसे बचाकर रखता तो आगे कुछ बन सकता था। लगभग हर पत्ते से आगे कुछ बन सकता था। उसने बाकी संबंध जाँचे और राजा पहले फेंक दिया।
विक्रांत ने बंद गड्डी से उठाया। तत्काल नई जानकारी नहीं मिली।
प्रदीप छोटे पत्तों के आसपास बना जिनके एक से अधिक दिशाओं में संबंध थे। एक ड्रॉ पर सेट बना तो उसे और सुंदर करने के लिए पूरा प्योर सीक्वेंस नहीं तोड़ा। सेट अपना काम कर रहा था।
विक्रांत ने खुले ढेर से पत्ता उठाया। प्रदीप ने पसंद याद रखी। फिर देखा कि अगला इच्छित डिस्कार्ड संभवतः उसी समूह में मदद करेगा या नहीं। उसने अपने हाथ के लिए उतना ही बेकार दूसरा पत्ता चुना।
इससे निश्चित सुरक्षा नहीं मिली थी। उपलब्ध जानकारी पर वह बेहतर फैसला था।
दो चाल बाद दूसरा सीक्वेंस पूरा हुआ।
उसने चार, तीन, तीन और तीन पत्तों के समूह रखे। दोनों सीक्वेंस सही थे। बचे सेटों में अलग-अलग सूट थे। पूरे तेरह पत्ते, हर पत्ते की अपनी जगह।
विक्रांत के अधूरे पत्तों से पच्चीस अंक जुड़े।
अधिकारी ने 60 के सामने 67 लिखा।
दर्शक की कॉपी की पाँच छोटी ट्रॉफियाँ अब भविष्यवाणी जैसी नहीं लग रही थीं।
फाइनल में पहली बार विक्रांत ने पानी मँगाया और उसे बिना छुए छोड़ दिया। प्रदीप ने बोतल नहीं देखी। वह अगली गड्डी की जाँच देख रहा था।
8. सम्मान के लिए रखी सीट नहीं
अंतिम डील शुरू हुई तो रस्सी के पीछे लोग भर गए थे। प्रदीप सात अंक आगे था। इतना अंतर किसी सामान्य अधूरे हाथ को हल्के में लेने के लिए पर्याप्त नहीं था।
विक्रांत ने बात शुरू की। पुरानी प्रतियोगिता याद दिलाई जिसमें प्रदीप निर्णायक ड्रॉ चूक गया था। फिर क्लब के फ्लैट का जिक्र किया।
“इतने साल बाद दुकान के ऊपर रहना अजीब लगता होगा।”
प्रदीप ने अधिकारी को देखा। “कृपया मेज़ की बातचीत खेल तक रखिए।”
चेतावनी दी गई। कमरे की आवाज़ कम हो गई।
शुरुआती हाथ में तीन पत्तों का प्योर सीक्वेंस, दूसरे संभावित सीक्वेंस का हिस्सा और दो जोड़ियाँ थीं। एक बड़ा पत्ता फिलहाल किसी उपयोगी जगह नहीं बैठता था।
उसने उसे जल्दी फेंक दिया।
विक्रांत ऐसे मुस्कराया जैसे डर साबित हो गया हो। प्रदीप को उसकी सही व्याख्या की जरूरत नहीं थी।
अगली ड्रॉ पर दूसरा सीक्वेंस बनने लगा। एक पत्ता रन में भी काम आ सकता था, सेट में भी, लेकिन दोनों में नहीं। प्रदीप ने अपनी जाँच में समूह अलग किए ताकि मन में एक पत्ता दो जगह न गिने।
उसने एक सुंदर दिखने वाले रास्ते के बजाय दो उपयोगी अंतिम रास्तों वाली जमावट चुनी।
विक्रांत अब तेजी से खेल रहा था। उसका हाथ मजबूत संभावनाएँ रखता था। बूढ़े को साँस लेने से पहले खत्म कर देने की इच्छा उसके हाथों में दिख रही थी।
प्रदीप ने उसे जल्दी करने दी। दूसरों की सुविधा के लिए वह बहुत जल्दी कर चुका था।
9. पत्तों के ऊपर बदलता चेहरा
प्रदीप को रानी मिली। कुछ महीने पहले वह उसे पास के पत्ते के साथ रखकर गायब पत्ता आने की कल्पना करता।
अब उससे महत्वपूर्ण सुधार नहीं हो रहा था। उसे रखने के लिए छोटे पत्तों का अधिक लचीला समूह तोड़ना पड़ता। उसने रानी जाने दी।
विक्रांत ने डिस्कार्ड देखा, बंद गड्डी से उठाया और दो पत्ते खिसकाए। वह पास था। प्रदीप तैयारी देख सकता था, उसकी सामग्री नहीं।
अगली ड्रॉ ने वही चुनाव दिया जिसका वह दर्जनों बार अभ्यास कर चुका था। एक जमावट सुंदर सेट रखती थी, लेकिन दूसरा सीक्वेंस अधूरा रहता। दूसरी में सेट टूटता और सीक्वेंस पूरा होता। बची छोटी जोड़ी के दो उपयोगी जुड़ाव संभव थे।
उसने दूसरी जमावट चुनी।
विक्रांत अपनी चाल पर पूरा नहीं हुआ।
प्रदीप ने पत्ता उठाया, जाँचा और हाथ मेज़ की ओर बढ़ाने से पहले रोक लिया। फिर गिना। तेरह। एक प्योर सीक्वेंस। दूसरा सही सीक्वेंस। दो सही सेट।
तब घोषणा की।
अधिकारी ने समूह देखे। विक्रांत आगे झुका। कोई दो बार गिना पत्ता, झूठा सीक्वेंस, सेट में दोहराया सूट खोजा। कुछ नहीं था।
उसका अपना हाथ अधूरा था। पेनल्टी दर्ज हुई और मुकाबले का परिणाम अंतिम हो गया।
विक्रांत ने फेंकी हुई रानी देखी। “आपने वह फेंक दी?”
“मेरे हाथ की मदद नहीं कर रही थी।”
सालों तक उसने यह वाक्य शुरुआती पाठ की तरह सुना था। अब वही उसके और उस ट्रॉफी के बीच खड़ा था जिसे उठाने की तस्वीर वह पहले सोच चुका था।
10. अलमारी में खाली जगह
सचिव ने प्रदीप को सम्मानित वरिष्ठ खिलाड़ी कहा। अधिकारी ने छूटा शब्द बताया।
“चैंपियन।”
उसने दोबारा परिचय दिया। विक्रांत उपविजेता पुरस्कार लिए नीचे खड़ा था। मुड़ी बाँह ने ब्लेज़र की पिन छिपा रखी थी।
प्रदीप ने कप अनीता की ओर किया। वह हँसी, फिर ठीक से उठाने को कहा ताकि पीछे वाले भी देखें। उसने उठा दिया। अनीता के पास बैठे पुराने शिष्य खड़े हो गए।
तस्वीरों के बाद सचिव ने कप की ओर हाथ बढ़ाया।
“आज रात अलमारी में सुरक्षित रख देंगे।”
प्रदीप के दोनों हाथ कप पर रहे। “यह घर जा रहा है।”
“आपकी तस्वीर भी वापस लग रही है।”
“तो नतीजा उसके पास लगाइए।”
विक्रांत इतना पास था कि सुन सके। सचिव ने उसे देखा, फिर बिना चैंपियन शब्द बदले अनुरोध लिख लिया।
बंद दुकान के ऊपर अनीता ने दरवाज़ा पकड़ा। प्रदीप कप भीतर ले गया और पत्नी की तस्वीर के पास जगह बनाई। खाने से पहले क्लब का संदेश आया। तस्वीर वापस लगी थी, नीचे पूरी अंकतालिका थी। अलमारी में वह जगह खाली थी जहाँ उन्होंने उसका कप रखने की सोची थी।
प्रदीप ने फोटो उतनी बड़ी की कि नाम क्रम से पढ़ सके। फिर फोन थालियों के पास रख दिया।
“पहले खाना,” उसने कहा। क्लब में कोई उसके कुर्सियाँ समेटने का इंतज़ार नहीं कर रहा था।
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