रात के खाने से पहले पिता ने निखिल को अंगूठी साफ करने को दी।
वह बड़े भाई की थी।
उभरे हुए अक्षरों के नीचे सूखी तरी लगी थी। निखिल मुलायम कपड़े का कोना मोड़कर निकाल रहा था। सामने वरुण किसी मेहमान को पिछले टूर्नामेंट की तस्वीरें दिखा रहा था।
“परिवार का साथ,” वरुण ने कहा। “सब कुछ वही है।”
निखिल पूरी दोपहर अपनी प्रवेश फीस वाला लिफाफा ढूँढ़ता रहा था।
पिता उसे अंगूठी रगड़ते देख रहे थे।
“तुम्हें भी मौका मिलेगा।”
“पैसे कहाँ हैं?”
“तुम्हारे भाई को जरूरत थी।”
मेहमान की मुस्कान रुक गई।
वरुण एल्बम के पन्ने पलटता रहा।
माँ दाल लेकर आईं और धीमे से कहा, “मेहमानों के सामने नहीं।”
निखिल ने हथेली पर रखी साफ अंगूठी देखी।
उस पर उसकी उँगलियों के निशान रखने की जगह थी।
शायद उतनी ही।
* * *
वह पच्चीस साल का था। वरुण तीस का।
दोनों ने खाने की इसी मेज पर तीन पत्ती सीखी थी। काउंटर बिस्कुट के पुराने डिब्बे में रखे जाते थे।
बाद में दोनों वयस्क खिलाड़ियों के आयोजनों में हिस्सा लेने लगे। वरुण ने एक स्थानीय आमंत्रण प्रतियोगिता जीती थी। उसी में मिली अंगूठी परिवार की सबसे ज्यादा तस्वीरें खिंचवाने वाली चीज बन गई।
निखिल पिता की दुकान पर फोन ठीक करता था।
वरुण अवसर तलाशता था।
इसका मतलब आयोजनों में जाना, आयोजकों से मिलना और उस बड़े मौके की बात करना था जो लोगों के उसकी काबिलियत पहचानते ही आने वाला था।
निखिल शटर खोलता। टूटी स्क्रीन बदलता। ग्राहकों को समझाता कि पानी पड़ने और बैटरी बैठने में फर्क होता है।
हर शाम वरुण के साथ अभ्यास भी करता।
वरुण गलती करता तो पिता कहते, निखिल ने ध्यान भटका दिया।
निखिल जीतता तो कहते, अभ्यास असली मुकाबला नहीं होता।
वरुण जीतता तो कहते, अभ्यास में ही असली चरित्र सामने आता है।
निखिल ने एक बार ये बातें लिख ली थीं।
एक साथ देखकर उलझन कम हुई थी।
रात का खाना आसान नहीं हुआ था।
* * *
लिफाफे के पैसे दुकान बंद होने के बाद किए गए काम से आए थे।
पुर्जे उसने खरीदे थे। हिसाब अलग रखा था। लिफाफे पर अपना नाम लिखा था।
पिता जानते थे कि रकम किसलिए है।
उसी सुबह याद भी दिलाया था कि अंतिम तारीख से पहले नाम दर्ज करवा दे।
फिर वरुण की यात्रा की बुकिंग जरूरी हो गई।
पिता ने दराज खोली। लिफाफा निकाला। समस्या खत्म कर दी।
निखिल ने पूछा कि उसे फोन क्यों नहीं किया।
पिता ने हाथ फैला दिए।
“काम कर रहे थे।”
“फोन है मेरे पास।”
“ऐसे मत बोलो जैसे लूट लिया हो।”
वरुण ने आखिर एल्बम बंद की।
“वापस कर दूँगा।”
“कल से पहले?”
चुप्पी हुई।
“हर बात में तारीख मत पकड़ो।”
“कल नाम लिखवाने का आखिरी दिन है।”
माँ ने कटोरी जोर से रखी।
“बहुत हुआ। भाई पर पहले से दबाव है।”
निखिल इंतजार करता रहा कि कोई पूछेगा उस पर क्या है।
माँ ने कटोरी सीधी कर दी।
* * *
मेहमान के जाने के बाद वरुण दुकान पर आया।
निखिल मेज वाली रोशनी के नीचे चार्जिंग पोर्ट बदल रहा था।
“पापा को ऐसे नहीं करना चाहिए था,” वरुण ने कहा।
निखिल ने सिर उठाया।
“लेकिन तुम बात बिगाड़ रहे हो।”
उसने फिर काम देखना शुरू कर दिया।
वरुण काउंटर पर बैठ गया।
यह पुराना दृश्य था। बचपन में वह वहीं पैर झुलाता रहता और निखिल उसे आकार के हिसाब से अलग किए हुए पेंच पकड़ाता था।
तेरह साल की उम्र में निखिल को लगता था कि किसी को उसकी जरूरत होना, उसे साथ रखना ही है।
“तुम्हें इससे बेहतर जगह दिलवाऊँगा,” वरुण बोला।
“मैंने यह चुनी थी।”
“मदद कर रहा हूँ।”
“तो पैसे लौटा दो।”
वरुण काउंटर से उतर गया।
“बहुत छोटी सोच हो गई है तुम्हारी।”
उसके जाने तक निखिल ने सोल्डरिंग आयरन हाथ में पकड़े रखा।
फिर नीचे रख दिया।
हाथ काँपने लगा था।
Telegram · WhatsApp Channel · WhatsApp Group
नाम लिखवाने की तारीख निकल गई।
अगली सुबह पिता ने पूछा कि इतना चुप क्यों है। उसके मूड की वजह से ग्राहकों को परेशानी क्यों होनी चाहिए?
* * *
सबसे बुरा रविवार को हुआ।
एक चचेरा भाई मिठाई लेकर आया था। खाने के बाद किसी ने अभ्यास का सुझाव दिया।
निखिल थका था। बिजली जाने पर भी काम करता रहा था। रात में नींद ठीक नहीं हुई थी।
वरुण कई हाथ हारा। फिर एक लापरवाह फैसले में सामने रखे काउंटर खत्म कर बैठा।
पिता ने मेज पर हाथ मारा।
“उसे बताया क्यों नहीं?”
निखिल देखता रह गया।
“हाथ के बीच में?”
“तुम्हें पता था क्या कर रहा है।”
“मेरे खिलाफ खेल रहा था।”
कमरा शांत हो गया।
वरुण ऐसे हँसा जैसे छोटे भाई को साधारण बात समझ नहीं आई।
“परिवार हैं हम, निखिल।”
पिता ने रसोई की तरफ इशारा किया।
“इस लहजे के लिए माफी माँगो।”
निखिल ने माँ को देखा।
उन्होंने पूरी बात सुनी थी।
“माफी बोल दो,” उन्होंने कहा। “फिर चाय पी लेंगे।”
पहली बार उसे समझ आया कि माफी से कोई गलती ठीक नहीं होनी थी।
चाय परोसी जा सके, बस इतना होना था।
उसने कुर्सी पीछे की।
“मेरी बिना चीनी की,” आदत से निकला।
फिर दरवाजे पर खड़े होकर अपनी ही पुरानी आदत से शर्मिंदा हुआ।
“नहीं। मैं बाहर जा रहा हूँ।”
* * *
वह स्टेशनरी की दुकान के ऊपर एक दोस्त के कमरे में रहने चला गया।
फैज मोबाइल मरम्मत के कोर्स से परिचित था।
कमरे में एक सँकरा पलंग और मोड़ने वाली खाट थी।
मकान मालिक को जमा रकम चाहिए थी। फैज ने आधी कुछ समय के लिए देने को कहा। कॉपी से पन्ना फाड़कर राशि लिख दी।
निखिल लगभग कहने वाला था कि दोस्त हिसाब नहीं रखते।
फिर साफ संख्या, तारीख और लौटाने की जगह देखी।
उसने हस्ताक्षर किए।
अजीब तरह से यह अपनापन लगा।
दूसरे मरम्मत काउंटर पर काम मिल गया। घंटे लंबे थे। लेकिन मालिक ने शुरू करने से पहले वेतन साफ बताया।
रात में वह वयस्क खिलाड़ियों के स्थानीय समूह में अभ्यास करता। वहाँ कोई नहीं जानता था कि किसका छोटा भाई है।
पहला छोटा आयोजन हार गया।
एक खिलाड़ी ने कहा कि कोई उसकी हिम्मत पर सवाल करे तो वह जल्दी फैसला कर देता है।
निखिल का मन बहस करने को हुआ।
इसके बजाय पूछा, कौन से हाथ में?
खिलाड़ी ने समझाया।
जवाब में अपमान नहीं था।
इसकी आदत डालनी पड़ी।
* * *
पहले सप्ताह माँ हर शाम फोन करती रहीं।
खाने का पूछतीं। कपड़े धोने का पूछतीं। कमरे में पंखा है या नहीं।
फिर कहतीं कि पिता को दुख हुआ है।
“उन्होंने पूछा कि पैसे वापस मिले?”
“तुम्हारे पिता हैं।”
“पता है।”
“भाई कह रहा था जवाब नहीं देते।”
“तस्वीरें भेजता रहता है।”
वरुण के संदेशों में होटल थे। मेजें थीं। अनजान लोगों के साथ खाना था।
नीचे लिखा होता कि जल्द हम दोनों यहाँ होंगे।
लिफाफे का जिक्र कहीं नहीं था।
दस दिन बाद निखिल ने एक जवाब भेजा।
मेरे प्रवेश के लिए रखी रकम वापस कर दो। मेरे खाते में भेजना।
वरुण ने हँसता चेहरा भेजा।
फिर लिखा कि पैसों के लिए पराया मत बनो।
निखिल ने फोन फैज के उधार वाले पन्ने के पास रख दिया।
इस बार इतना लंबा जवाब नहीं लिखा कि अपना इनकार दूसरे को नरम लगे।
कुछ देर बाद फोन फिर चमका। उसने उल्टा कर दिया और अगले दिन के लिए ग्राहक का पता लिखने लगा।
* * *
बाद के क्वालिफाइंग आयोजन में उसने अपने बचाए वेतन से नाम लिखवाया।
पुष्टि अपने ईमेल पर आई।
क्षेत्रीय फाइनल में पहुँचने पर कोई समारोह नहीं हुआ।
नतीजा देखा। आयोजक से तारीख की पुष्टि की। काम पर लौट गया।
एक ग्राहक बदली हुई बैटरी का इंतजार कर रहा था।
निखिल ने बैटरी लगाई और चार्ज होने का निशान दो बार जाँचा।
शाम को फैज दो चाय लेकर ऊपर आया।
“भाई भी फाइनल में है।”
“देखा।”
“ठीक हो?”
“अभी पता नहीं।”
आयोजन का तरीका पहले से घोषित था। अंतिम सत्र बराबर काउंटरों से शुरू होता। हाथों की संख्या तय थी।
विजेता को नकद पुरस्कार और अंगूठी मिलनी थी।
निखिल ने कार्यक्रम तीन बार पढ़ा।
उस समय पैसे की कल्पना नहीं कर रहा था।
कल्पना कर रहा था कि वरुण के सामने बैठेगा और पिता बीच में नहीं बता सकेंगे कि उसे क्या करना चाहिए था।
* * *
फाइनल से दो दिन पहले वरुण का फोन आया।
आवाज खुश थी।
“देखो। दोनों पहुँच गए।”
“हाँ।”
“पापा आ रहे हैं।”
निखिल रुका।
“परिवार की तस्वीर चाहते हैं।”
“बाद में।”
थोड़ी चुप्पी हुई।
“हर बात अजीब बनाने की जरूरत नहीं।”
“काम पर लौटना है।”
वरुण ने आवाज धीमी की।
“सुनो। आखिर में हम दोनों बचे तो समझदारी से करेंगे।”
“मतलब?”
“जानते हो। मेरी जिम्मेदारियाँ हैं। लोग उम्मीद रखते हैं।”
“मुझसे भी।”
“अभी शुरुआत कर रहे हो तुम।”
पीछे किसी की हँसी आई।
निखिल ने कल्पना की कि भाई आराम से बैठा फोन कर रहा है। मानकर कि घर की पुरानी व्यवस्था हर कमरे में लागू हो जाएगी।
“खेलने से पहले नतीजा तय नहीं करूँगा।”
वरुण की खुशी खत्म हो गई।
“अब खुद को मुझसे अच्छा समझते हो?”
“नहीं। लगता है तुम खेले बिना पता करना चाहते हो।”
अपनी हिम्मत जवाब देने से पहले निखिल ने फोन रख दिया।
* * *
फाइनल की सुबह माँ स्टील का डिब्बा लेकर कमरे के बाहर आ गईं।
पिता को बताए बिना ऑटो से आई थीं।
“पराठे बनाए।”
निखिल ने अंदर आने दिया।
उन्होंने खाट देखी। रस्सी पर सूखते कपड़े देखे। खिड़की के पास औजारों की छोटी कतार देखी।
“घर लौट सकते हो।”
“कुछ बदला है?”
उन्होंने डिब्बा खोला।
खुशबू ने एक पल के लिए उसकी तरफ से लगभग जवाब दे दिया।
फिर माँ बोलीं, “पिता को कुछ बातें कहना नहीं आता।”
“मुझसे माफी मँगवाना आता है।”
वह खाट पर बैठ गईं।
निखिल फर्श पर बैठा। और जगह नहीं थी।
दोनों ने खाया।
जाने से पहले माँ ने कहा, “आज कुछ भी हो, भाई से लड़ना मत।”
निखिल ने ढक्कन लगाया।
“उसके खिलाफ पूरा खेलना लड़ाई नहीं है।”
उनके चेहरे पर असहमति आई।
लेकिन डिब्बा उठाकर सिर्फ इतना कहा कि वहाँ मिलेंगी।
निखिल उन्हें सीढ़ियाँ उतरते देखता रहा। उनके जाने के बाद कमरे में पराठों की खुशबू देर तक रही।
* * *
निखिल पहुँचा तो वरुण पहले से मौजूद था।
लोगों से हाथ मिलाते समय चैंपियनशिप वाली अंगूठी चमक रही थी।
पिता जैकेट पकड़े एक अधिकारी से परिचय करवा रहे थे।
निखिल को देखकर चौड़ा मुस्कराए।
“मेरा छोटा वाला।”
निखिल ने सिर हिलाया।
उसके कहने के बावजूद तस्वीर फाइनल से पहले ही खिंच गई। एक स्वयंसेवक ने तीनों को साथ खड़ा होने को कहा।
पिता ने उसकी गर्दन के पीछे हाथ रखा।
“ठीक से मुस्कराओ।”
वह मुस्कराया।
फिर पंजीकरण की मेज पर जाकर अपनी जानकारी की पुष्टि की।
पिता पीछे आ गए।
“दूसरे संपर्क में मेरा नंबर डाल दो।”
“दे दिया है।”
“किसका?”
“फैज का।”
पिता के चेहरे का सवाल लगभग बच्चों जैसा था।
बरसों से वह हर जगह पहुँच होने को अपनापन समझते रहे थे।
अब फॉर्म की एक जगह बता रही थी कि दोनों एक चीज नहीं हैं।
निखिल ने हस्ताक्षर किए और पेन लौटा दिया।
* * *
फाइनल शुरू होते ही दो भाइयों का मुकाबला नहीं बन गया।
दूसरे खिलाड़ी भी थे। एक महिला ने नियम दोहराने को कहा क्योंकि समझाते समय दो लोग बात कर रहे थे।
निखिल मन ही मन उनका आभारी हुआ।
उसे चाहिए था कि कमरा प्रतियोगिता बना रहे। कैमरों वाला पारिवारिक झगड़ा न हो जाए।
वरुण अच्छा खेल रहा था।
इससे बात कठिन हुई।
निखिल के लिए आसान होता अगर भाई कभी किसी चीज के लायक ही न रहा होता।
लेकिन वरुण की समझ तेज थी। याददाश्त अच्छी थी। चाहे तो मेज पर गुस्सा रोक सकता था।
आखिरी हिस्से तक दोनों भाई बाकी दावेदार रह गए।
दर्शकों में पिता आगे झुक गए।
निखिल ने फिर उनकी तरफ नहीं देखा।
एक बड़े हाथ में नुकसान हुआ। चेहरे पर पुरानी गर्मी चढ़ गई।
गलती।
वह उस आवाज का इंतजार करने लगा जो बताती कि दोष किसका है।
अधिकारी ने अगले हाथ की घोषणा की।
कोई और नहीं बोला।
निखिल ने साँस ली और आगे खेला।
* * *
आखिरी विराम में वरुण पानी की मशीन तक उसके पीछे आया।
पिता भी आ गए।
निखिल को लगा शायद पिछले हाथ की बात करेंगे।
वरुण बोला, “अभी भी ठीक कर सकते हैं।”
पिता ने आवाज नीचे रखी।
“भाई की प्रतिष्ठा है।”
निखिल ने कागज का गिलास भरा।
“मेरा नाम है।”
“नाटक मत करो।”
वरुण ने उसकी बाँह छुई।
“बाद में तुम्हारा देख लूँगा।”
निखिल ने आस्तीन पर रखा हाथ देखा।
नौ साल का था तो बाढ़ के पानी में वरुण उसे पीठ पर उठाकर ले गया था। उसने भाई की गर्दन इतनी कसकर पकड़ी थी कि वरुण दिन भर शिकायत करता रहा।
वह याद सच थी।
यह हाथ भी सच था।
निखिल ने बाँह हटा ली।
“नहीं।”
पिता ने तीखे स्वर में नाम पुकारा।
उसने पानी पिया।
फिर मेज पर लौट गया, इससे पहले कि इनकार को फिर से उसके संस्कारों की चर्चा बना दिया जाए।
* * *
अंतिम तय हाथ से पहले वरुण आगे था।
निखिल को आखिरी मुकाबला अपने पक्ष में चाहिए था।
उसने पत्ते देखे। फिर काउंटर।
वरुण ने पिता की तरफ देखा।
बहुत थोड़ी देर के लिए।
निखिल ने देख लिया।
खुद उस तरफ नहीं देखा।
पत्ते खोले गए तो वरुण के पास तीन गुलाम थे।
निखिल ने तीन बेगम रख दीं।
एक पल उनके हिस्से में कोई नहीं हिला।
स्कोर रखने वाले ने अंतिम हिसाब जाँचा।
फिर अधिकारी ने निखिल का नाम घोषित किया।
पीछे फैज इतनी जोर से चिल्लाया कि सभ्य नहीं लगा।
निखिल सोचने से पहले हँस पड़ा।
वरुण बैठा रहा।
पिता ने देर से ताली शुरू की। फिर खड़े होकर आसपास सबसे जोर से बजाने लगे।
निखिल ने विजेता बनने का पहला क्षण यह तय करने में खर्च नहीं किया कि ताली सच्ची है या नहीं।
भाई से हाथ मिलाने गया।
वरुण ने पत्ते एक बार और देखे।
फिर हाथ दिया।
पकड़ ठंडी थी।
* * *
पुरस्कार चार लाख रुपये और मखमली डिब्बे में अंगूठी थी।
आयोजक ने कुछ शब्द कहने को कहा।
निखिल ने कर्मचारियों, खिलाड़ियों, अभ्यास वाले वयस्क समूह और फैज का धन्यवाद किया। कमरे में जाने के समय मिले अस्थायी उधार का जिक्र किया।
पिता मंच के किनारे खड़े थे।
एक परिचित वाक्य का इंतजार कर रहे थे।
निखिल ने वह नहीं कहा।
कहा कि सोमवार को काम पर होगा और मालिक ने ड्यूटी बदलने में मदद की है।
लोग हँसे।
वह सच कह रहा था।
तस्वीरों के बाद अधिकारी ने अलग से भुगतान की जानकारी जाँची।
पिता ने हाथ बढ़ाया।
“मुझे दे दो। पुष्टि वाला कागज सुरक्षित रखूँगा।”
निखिल ने कागज मोड़कर अपने बैग में रख लिया।
“मैं रखूँगा।”
“अपने पिता पर भरोसा नहीं?”
अधिकारी ने मेज की तरफ देखा।
निखिल ने जिप बंद की।
“यह मेरा है।”
आवाज ऊँची नहीं हुई।
पिता के पास ऐसा जवाब नहीं था जो वहाँ खड़े लोगों के सामने अच्छा लगे।
* * *
वरुण ने एक सप्ताह बाद पुरानी प्रवेश फीस लौटा दी।
पैसे भेजने के साथ हँसता चेहरा नहीं था।
निखिल ने मिलने की पुष्टि की।
बस।
माँ फिर कमरे पर आईं। इस बार घर लौटने का आदेश नहीं दिया। पूछा कि रात के खाने पर आना चाहेगा?
वह रविवार को गया।
चाय आई तो वरुण की पुरानी अंगूठी टेलीविजन के पास पड़ी थी।
निखिल से साफ करने को किसी ने नहीं कहा।
उसकी अपनी अंगूठी महीने के अधिकतर दिन डिब्बे में रही। फैज का उधार लौटाया। रकम अलग रखी। फोन ठीक करता रहा।
बाद में लिखित किराया समझौते और सोचकर बनाए बजट के साथ अपना छोटा काउंटर लिया।
पहला बोर्ड टेढ़ा लगा।
फैज ने सीढ़ी पकड़ी। निखिल ने उसे सीधा किया।
अंदर एक ग्राहक ने टूर्नामेंट की तस्वीर देखकर पूछा कि अंगूठी असली है?
“हाँ।”
“पहनते क्यों नहीं?”
निखिल ने हाथ में पकड़ा खराब फोन उठाया।
“काम में अटकती है।”
शाम को काउंटर बंद किया। दिन की कमाई लिफाफे में रखी।
उस पर तारीख लिखी।
फिर अपना नाम।
लिफाफा अपने साथ घर ले गया।