रिसेप्शन वाली ने कबीर को किनारे होने को कहने से पहले उसका कलाईबंद काट दिया।
नीली पट्टी जूतों के बीच गिरी।
पीछे लोग इंतजार कर रहे थे। वह उठाने को झुका। बाद में यही याद रहा। स्क्रीन पर लिखे शब्द नहीं, यह कि सब उसे कालीन से अपना निष्कासन उठाते देख रहे थे।
“प्रायोजक वाली जगह वापस ले ली गई है।”
“पुष्टि है मेरे पास।”
“समझ रही हूँ, सर।”
आवाज उस आदमी की थकान जैसी थी जिसे सिर्फ जवाब पहुँचाने को छोड़ दिया गया हो।
कबीर ने फोन पर संदेश खोला।
उसी संदेश से पिछली शाम पंजीकरण हुआ था।
“प्रायोजन विभाग को फोन कर सकती हैं?”
जवाब से पहले लॉबी के दूसरे सिरे पर मिताली दिखाई दी।
उसने कबीर को देख लिया था। चेहरे पर बहुत हल्का बदलाव आया। सावधानी से लाई नरमी, जिससे उसे और बुरा लगा।
“ऊपर आओ,” बोली। “बात कर सकते हैं।”
कबीर ने हाथ की कटी पट्टी देखी।
“मेरे प्रवेश के बारे में?”
“सबके बारे में।”
* * *
दोनों सात महीने पहले अलग हुए थे।
तीस साल का कबीर व्यावसायिक रेफ्रिजरेशन मशीनों की सर्विस करता था। काम और बचत से समय मिलता तो वयस्कों की तीन पत्ती प्रतियोगिताओं में खेलता।
मिताली घरेलू सामान बनाने वाली कंपनी के क्षेत्रीय प्रायोजन सँभालती थी। उसी ने आमंत्रण वाले प्रतियोगिता समूह से परिचय करवाया था।
वह आभारी था।
कुछ समय तक आभार और प्रेम अलग पहचानना आसान रहा।
फिर तस्वीरें अनुमति से पहले उसकी प्रस्तुतियों में आने लगीं।
रिश्ते की कहानी प्रचार में इस्तेमाल करने का विरोध किया तो कहा कि काम मुश्किल बना रहा है।
एक और प्रायोजित डिनर के बजाय सप्ताहांत बहन के साथ बिताना चाहा तो याद दिलाया कि जगह किसने दिलवाई।
आखिरी बहस तेज नहीं थी।
मिताली ने कहा था कि उसके किए कामों की कमी महसूस होगी।
कबीर ने कहा था कि दूसरी चीजों की ज्यादा होगी।
अब होटल की लॉबी में था जहाँ हर उपयोगी आदमी उसका नाम जानता लगता था।
* * *
ऊपर बैठक के कमरे में मिताली ने कॉफी पूछी।
कबीर को प्रवेश वापस चाहिए था। कहा।
उसने फोन उल्टा रखा।
“प्रायोजक की जगहें बदली हैं।”
“पुष्टि के बाद?”
“होता है।”
“किसने तय किया?”
“टीम ने।”
“देखने वाले से बात कर सकता हूँ?”
“कर रहे हो।”
मेज पर तीन बंद पानी की बोतलें और मिठाई का कटोरा था। किसी ने छुआ नहीं था।
कबीर ने देखा कि वह एक बोतल सीधी कर रही है, ताकि लेबल उसकी तरफ रहे।
कहा कि शायद अतिथि जगह निकाल सकती है।
उसने मतलब पूछा।
“प्रदर्शन कार्यक्रम में। कम औपचारिक। अच्छे लोगों के सामने आने का मौका।”
“प्रतियोगिता में नाम था।”
“समाधान दे रही हूँ।”
फिर फाइनल के बाद डिनर का जिक्र किया। पुराने दोस्त होंगे। साथ बैठें तो सबको असहज नहीं होना पड़ेगा।
कबीर ने परिचित दबाव महसूस किया। उसे निर्देश को उदार प्रस्ताव बनवाने में मदद करनी थी।
“डिनर का जगह से संबंध है?”
“अपमान मत करो।”
वह उठ गया।
मिताली सचमुच चौंकी।
“इतनी दूर आए हो।”
“हाँ,” उसने कहा। “आया हूँ।”
* * *
पहले वाली ट्रेन लेने के ज्यादा पैसे थे। कबीर शाम की ट्रेन तक स्टेशन पर बैठा रहा।
सामने बेंच पर बच्ची सोई थी। पिता के हाथ से उसकी एक चप्पल लटक रही थी।
चाय वाला आवाज लगाता रहा। कबीर ने कप खरीदा। फिर पता चला, पीने का मन नहीं।
बहन रितु का फोन आया।
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“आगे पहुँचे?”
उसने बताया।
कुछ देर चुप रही। फिर पूछा कि लौटते समय उसके घर आना चाहेगा?
“दूसरी बस लेनी पड़ेगी।”
“लेने आ सकती हूँ।”
इतना चाहा कि बहुत जल्दी मना कर दिया।
रितु समझ गई।
“ठीक। ट्रेन में बैठकर फोन करना।”
मिताली का संदेश आया।
जानते हो, रुक सकते थे।
कबीर ने लिखा: मेरा प्रवेश था, अनुमति माँगने नहीं आया था।
मिटा दिया।
फिर सहायता और नियंत्रण का अंतर समझाते तीन अनुच्छेद लिखे।
वे भी मिटा दिए।
ट्रेन आई। फोन रखा। अपना थैला खुद लेकर चढ़ गया।
* * *
अगले सप्ताह स्वतंत्र खुली प्रतियोगिता मिली। क्वालिफाइंग दौर दूसरे शहर में था।
प्रायोजक की सिफारिश नहीं चाहिए थी। फीस थी। घोषित समय था। सीधे जगह की पुष्टि का तरीका था।
खर्च दो बार जाँचा।
यात्रा, प्रवेश, रहना, खाना। सबसे सस्ता संभव हिसाब भी बचाए पैसों से ज्यादा था।
रितु ने उधार देने को कहा।
उसने धन्यवाद कहा और एक दिन माँगा।
मालिक दो अतिरिक्त सर्विस कॉल दे सकता था, लेकिन भुगतान देर से आता।
सहकर्मी ऐसे आदमी को जानता था जिसे हस्ताक्षर वाली क्रिकेट जर्सी चाहिए थी।
कबीर के पास थी। पलंग के नीचे डिब्बे में तह रखी।
इक्कीसवें जन्मदिन पर पिता ने महीनों बचत करके खरीदी थी।
उसने पलंग पर फैलाई।
जन्मदिन टुकड़ों में याद आया। सूती डोरी से बँधा भूरा कागज। बस खराब होने से पिता का देर से पहुँचना। माँ का कहना कि पहले खाना खाएँगे, फिर अपना नियम खुद छोड़ देना क्योंकि उसका चेहरा देखना चाहती थीं।
उसने जर्सी सिर्फ एक बार पहनी थी। उसके बाद तह करके रख दी। डर था कि धोने से हस्ताक्षर खराब होंगे।
नौ साल खास दिन के लिए सँभाली थी।
पास बैठकर सोचता रहा कि खास दिन का मतलब हमेशा खुशी ही क्यों होना चाहिए।
कपड़े पर हाथ फेरा। पुरानी तह खुलती नहीं थी। जैसे चीजें बहुत देर तक सुरक्षित रखने से भी अपनी जिद सीख जाती हैं।
पिता जीवित थे। रिटायर हो चुके थे। एक वाक्य में फैसला और कठिन कर सकते थे।
फोन किया तो पूछा, “खरीदार सही पैसे देगा?”
“लगता है।”
“तो कमीज से अपने फैसले करवाना बंद करो।”
कबीर एक साथ हँसा और रोया। खुद पर झुँझलाहट हुई।
पिता ने न सुनने का अभिनय किया।
* * *
खरीदार कैफे के बाहर मिला।
हस्ताक्षर देखा। हालत जाँची। साथ रखे कागज देखे।
विनम्र था।
इससे बेचना कठिन हुआ। जिस चीज को बेचने का फैसला कबीर ने किया था, उसे चाहने वाले में दोष देने लायक खलनायक नहीं था।
सौंपने से पहले एक मिनट माँगा।
एक तस्वीर ली।
फिर जर्सी ठीक से तह की।
पैसों से बजट की कमी पूरी हुई। अपने संपर्क से पंजीकरण किया। आयोजन के पास डॉरमिटरी में एक बिस्तर बुक किया।
निकलने से पहले एक पुराने ग्राहक की मशीन देखने की जिम्मेदारी भी सौंपनी थी।
सहकर्मी तैयार हुआ, लेकिन काम का भुगतान भी उसी को मिलता।
कबीर ने वह नुकसान बजट में लिखा। पहली योजना से यात्रा और महँगी हो गई।
फिर हिसाब किया। खाने की रकम घटाई। कुछ देर बाद ठीक भोजन लायक पैसा वापस रखा। रितु से इतना वादा किया था।
छुट्टी की पुष्टि पर मालिक ने पूछा कि किस दिन लौटेगा?
“शुक्रवार।”
“ठीक। शनिवार को फ्रीजर लगाना है।”
साधारण उम्मीद अच्छी लगी। नतीजे के बाद भी कोई काम रहेगा।
रात को मिताली का फोन आया।
“सुना फिर जा रहे हो।”
“हाँ।”
“उस खुले आयोजन में?”
“हाँ।”
“मुझसे कह सकते थे।”
कबीर खाली डिब्बे के पास फर्श पर बैठा था।
“पता है, मेरे माँगने का इंतजार कर रही हो।”
लाइन पर इतनी लंबी चुप्पी हुई कि उसके कार्यालय में किसी और की आवाज सुनाई दी।
आखिर मिताली बोली, “मदद को हमेशा खराब बना देते हो।”
कबीर ने डिब्बे के भीतर देखा।
“हर मदद को नहीं।”
* * *
डॉरमिटरी में आठ बिस्तर थे। पंखा हर चक्कर में खटकता था। बाथरूम का दरवाजा उठाकर बंद करना पड़ता था।
नीचे वाला बिस्तर मिलने से देर से पहुँचा।
थैला लेकर ऊपर चढ़ा। पिंडली टकराई। नीचे कोई डिलीवरी वाले से फोन पर बहस कर रहा था।
रात दो बजे सोचा, शायद मिताली ठीक थी।
साफ होटल का बिस्तर मिल सकता था। गाड़ी, खाना और हर मेज पर व्यवस्था करने वाला कोई आदमी होता।
इन चीजों की कमी महसूस हुई।
उस औरत की भी हुई जो डोसे का कुरकुरा किनारा उसके लिए बचा देती थी।
बुरा हुआ याद रखने से पुरानी कोमलता आदेश पर खत्म नहीं होती थी। यह चिढ़ाता था।
सुबह दरार वाले बेसिन पर मुँह धोया। चाय की दुकान के पास खड़े होकर नाश्ता किया।
पंजीकरण वाली मेज पर कोई निजी इतिहास नहीं जानता था।
नाम जाँचा। कार्यक्रम दिया। हॉल की तरफ इशारा किया।
साधारण व्यवस्था से लगभग गला भर आया।
* * *
क्वालिफायर में ऐसा कुछ किए बिना आगे पहुँचा कि कमरा उसे याद रखे।
शुरुआत अच्छी थी। बीच खराब था। फिर बेचैनी में बार-बार स्थान देखता रहा।
चुने जाने वाली सीमा के भीतर रहा।
शाम को डॉरमिटरी के बाहर फुटपाथ से रितु को फोन किया।
“हो गया।”
वह इतनी जोर से चिल्लाई कि फोन दूर करना पड़ा।
“जुलूस मत सोचने लगना।”
“हाथी बुक कर लिए।”
कलाईबंद कटने के बाद पहली बार खुलकर हँसा।
फिर उसने पूछा कि बाकी दिनों के पैसे पर्याप्त हैं?
“हाँ।”
“सच्ची हाँ?”
जवाब देने से पहले बटुआ देखा।
“हाँ। गुरुवार तक महँगी पसंद पैदा न हो तो।”
रितु ने पुराने क्रिकेट कैप में पिता की तस्वीर भेजी।
नीचे लिखा था: कमीज बेची है, समर्थक रखा है।
कबीर ने सुरक्षित की।
किसी ऐसे को नहीं भेजी जो प्रेरक पोस्ट बना देता।
उसकी अपनी होना काफी था।
* * *
अंतिम चरण गुरुवार दोपहर दो सत्रों में था। शाम के शुरू में खत्म होता।
मिताली की कंपनी का उसी दिन दूसरा आमंत्रण प्रदर्शन कार्यक्रम और डिनर था।
कबीर इसलिए जानता था क्योंकि नया प्रस्ताव आया।
प्रतिस्पर्धी अतिथि जगह आरक्षित। इस बार पुष्टि के साथ। जरूरत हो तो उसके शहर से गाड़ी। होटल का कमरा। प्रवेश फीस नहीं।
साढ़े पाँच बजे पहुँचना था।
तब उसका अंतिम सत्र चल रहा होता।
बताया तो कहा कि पहले सत्र के बाद हट सकता है। दूसरे आयोजन में ज्यादा महत्वपूर्ण लोगों के सामने जाएगा।
“यहाँ के नतीजे का क्या?”
“जरूरत नहीं।”
“इसके लिए खेला हूँ।”
“और बेहतर जगह खेल सकते हो।”
बेहतर शब्द दोनों के बीच रहा।
कमरा, संपर्क, पैसे और अकेले तय न करनी पड़ने वाली दूरी।
उनमें कुछ सच में बेहतर थे।
इसीलिए प्रस्ताव कठिन था।
कबीर ने दोनों समय कागज पर लिखे। बीच में दूरी लिखी। कोई छूटा रास्ता नहीं था। एक जगह जाने के लिए दूसरी छोड़नी थी।
* * *
उसने स्वतंत्र आयोजक से पूछा कि गुरुवार के समय में कोई अनिश्चितता है?
प्रकाशित समय की पुष्टि मिली। खिलाड़ियों को दोनों सत्र पूरे करने थे। बीच में जाना मतलब नतीजा छोड़ना।
कबीर ने धन्यवाद कहा।
निजी झगड़े के हिसाब से आयोजन बदलने को नहीं कहा।
रात को मिताली ने डिनर की बैठने वाली सूची भेजी।
उसका नाम अपने पास था।
तुम्हारी जगह रखी है।
कबीर देर तक देखता रहा।
फिर फोन किया।
“नहीं आऊँगा।”
“सोचा भी नहीं।”
“और बहुत कम सोचा है।”
“ठीक करने की कोशिश है।”
“तो बताओ पिछली पक्की जगह क्यों वापस ली?”
कहा कि स्थिति जटिल थी।
“लिखकर जवाब दोगी?”
“अब हम यहाँ आ गए?”
कबीर ने आँखें बंद कीं।
ऐसे सवालों से थक गया था जो जवाब माँगने को क्रूर बना देते।
“मेरा फाइनल पूरा करना है।”
उसने दोपहर तक प्रस्ताव खुला रखने को कहा।
कबीर ने कहा कि जवाब नहीं बदलेगा।
* * *
गुरुवार का पहला सत्र खराब गया।
बढ़त वाले समूह से नीचे रहा।
ऊपर आने की संभावना थी। जितनी चाही थी, उससे कम।
विराम में हॉल के पीछे प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठकर सुबह रखा खाना खाया।
फोन चमका।
बीस मिनट में गाड़ी ले सकती है।
उसे पता नहीं था कि गाड़ी भी तय कर दी है।
एक पल पूरा दूसरा दिन दिखाई दिया। एसी। परिचित चेहरा। होटल में प्रेस की साफ कमीज। कोई कहता कि अच्छा हुआ समझ आ गई।
खराब सत्र समझाना नहीं पड़ता।
हटने को बेहतर अवसर कह सकता था।
खाना ठंडा हो गया था।
डिब्बा रखा। रितु को फोन किया।
“जाने का मन है।”
“प्रस्ताव की वजह से?”
“हार रहा हूँ इसलिए।”
उसने जल्दी दिलासा नहीं दिया।
“उसका फोन न आता तो जाना चाहते?”
कबीर ने पानी का डिब्बा ले जाते स्वयंसेवक को देखा।
“नहीं।”
“तो इस जवाब पर भरोसा करती हूँ।”
* * *
दूसरे सत्र से पहले मिताली ने फिर फोन किया।
इस बार प्रवेश के बाहर उठाया।
“अपना नुकसान करके बात साबित कर रहे हो।”
“हाँ।”
दोनों को सहमति से आश्चर्य हुआ।
नरम करने से पहले कबीर आगे बोला।
“खर्च हो रहा है। कमरा खराब है। जो रखना चाहता था, बेचा। हो सकता है तुम्हें दिखाने लायक कुछ लेकर न लौटूँ।”
“कुछ दिखाने को नहीं चाहिए।”
“तो मना करने पर हर बार नया मंच मत दो।”
मिताली ने उस आवाज में नाम लिया जो अकेले में इस्तेमाल करती थी।
एक पल उसके पीछे कहीं भी जाने का मन हुआ।
फिर अधिकारी ने खिलाड़ियों को भीतर बुलाया।
“जाना है।”
“बाद में फोन करोगे?”
कबीर ने दरवाजे के भीतर देखा।
“पता नहीं।”
फोन रखा। बंद कर दिया।
अब जो जगह इंतजार कर रही थी, उसके पास मिताली का नाम नहीं था।
तीन उल्टे पत्ते थे। अधिकारी देख रहा था कि सब तैयार हैं।
* * *
कबीर एक साथ शांत नहीं हुआ।
पहले हाथों में उँगलियाँ ठंडी थीं। एक घोषणा गलत समझी। दोहराने को कहा।
उम्मीद थी कोई खीझेगा।
अधिकारी ने दोहरा दिया।
सत्र चला।
कुछ फैसलों पर तुरंत पछतावा हुआ। कुछ बाद में समझे।
लेकिन वास्तविक खेल के साथ मिताली से काल्पनिक बातचीत खेलना बंद किया।
धीरे-धीरे स्थिति सुधरी।
पास की मेज पर पानी गिरा। स्वयंसेवक ने कपड़ा बदला।
हॉल की घड़ी रुकी तो अधिकारी ने चलती कलाई घड़ी दिखाई। कोई हँसा।
अधूरा कमरा था। लोग दोपहर पूरी करने की कोशिश कर रहे थे।
कबीर वहीं रहना चाहता था।
अंतिम स्थान जाँचे गए तो दूसरा था।
एक बार पढ़ा। फिर दोबारा।
पुरस्कार से यात्रा निकलती और कुछ बचता।
आयोजन नहीं जीता था।
जिसमें आया था, उसे पूरा किया था।
उस शाम यह अंतर सांत्वना पुरस्कार नहीं लगा।
* * *
मिताली के डिनर में पास की कुर्सी खाली रही।
बाद में परिचित ने बिना विवरण के तस्वीर भेजी तो कबीर को पता चला।
वह बस स्टेशन के पास तीन खिलाड़ियों के साथ खाना खा रहा था।
तस्वीर में कुर्सी पर उसकी जैकेट थी। प्लेटें हटाई नहीं गई थीं।
नहीं बता सकता था कि गुस्से में है, निराश है या तस्वीर से बाहर किसी से बात कर रही है।
इस बार आगे क्या करना है, उससे पहले चेहरे का अर्थ हल करना जरूरी नहीं था।
फोन रख दिया।
विजेता आलू में ज्यादा नमक की शिकायत कर रहा था।
पाँचवें स्थान वाला पूरे उत्साह से बचाव कर रहा था।
कबीर से पूछा।
एक चखा।
“ज्यादा नमक।”
सब एक साथ विरोध करने लगे।
वह बिल आने तक बैठा रहा।
उसे वहीं बाँधने के लिए किसी ने सीट नहीं बचाई थी।
आया तो थोड़ी जगह खिसका दी थी।
यह फर्क समझाने की जरूरत नहीं पड़ी। उसने पानी माँगा। सामने वाले ने बोतल बढ़ा दी और आलू का विवाद जारी रखा।
* * *
घर लौटकर काम पर गया।
पुरस्कार की प्रक्रिया हुई। यात्रा का खर्च चुकाया। बैंक की रकम बेहतर हुई, जीवन का प्रकार नहीं बदला।
पिता के रितु से मिलने जाने का ट्रेन टिकट लिया।
दूसरी जर्सी नहीं खरीदी।
खाली डिब्बे में वे औजार रहने लगे जिन्हें कमरे में खो देता था।
मिताली का डिनर पर आखिरी संदेश आया।
इंतजार किया।
कबीर ने अगली सुबह जवाब दिया।
बताया था कि नहीं आऊँगा।
भेजने से पहले दो बार पढ़ा।
सूखा लगा।
आदत थी कि हर सीमा के चारों ओर इतनी सफाई लपेटे कि दूसरा आदमी सहज रहे।
यह वाक्य वैसा ही रहा।
कुछ सप्ताह बाद नए आयोजक ने आगामी कार्यक्रम के लिए प्रायोजक का संपर्क पूछा।
कबीर ने नहीं कहा। खुली प्रवेश प्रक्रिया पूछी।
फॉर्म था।
रसोई की मेज पर भरने लगा। पिता चाय हल्की होने की शिकायत कर रहे थे।
बाहर डिलीवरी वाले ने गलत घंटी बजाई।
शाम में कुछ भी बड़ी वापसी जैसा नहीं लग रहा था।
कबीर को अच्छा लगा।
पुष्टि आई तो सीधे उसके पास आई।
तारीख कैलेंडर में रखी। चाय की तरफ लौट गया।