MBM Bet — मेरा धन्यवाद भाषण ठीक कर देना
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MBM Bet — मेरा धन्यवाद भाषण ठीक कर देना

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

संदेश उस समय आया जब मंच पर उसका पति दूसरी औरत का हाथ पकड़े खड़ा था। तीसरा पैराग्राफ देखो। has होगा या have? अंतिम भाषण भेज रहा हूँ। माधवी ने फोन से नजर…

संदेश उस समय आया जब मंच पर उसका पति दूसरी औरत का हाथ पकड़े खड़ा था।

तीसरा पैराग्राफ देखो। has होगा या have? अंतिम भाषण भेज रहा हूँ।

माधवी ने फोन से नजर उठाकर मंच देखा। ऋत्विक के एक हाथ में ट्रॉफी थी। दूसरे से वह पल्लवी को छोटे मंच पर चढ़ने में मदद कर रहा था, जबकि वह सीढ़ियाँ चढ़ चुकी थी।

संचालक ने पल्लवी को उसके शानदार सीजन के पीछे खड़ी शख्सियत बताया।

उस सीजन के बत्तीस कॉलम माधवी ने लिखे थे।

मेज पर वेटर प्लेटें उठा रहा था। माधवी ने खाना पूरा नहीं किया था, फिर भी उसकी प्लेट उठ गई। पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन देर हो चुकी थी। बचा हुआ मछली का टुकड़ा किसी और के मुड़े नैपकिन के नीचे गायब हो गया।

मंच से ऋत्विक ने उसे ढूँढ़ लिया। फोन की तरफ इशारा किया।

माधवी ने भाषण खोला। तीसरे पैराग्राफ में उसकी सोच को चुनौती देने के लिए पल्लवी का धन्यवाद था। आखिरी में पत्नी का, जो घर को इतना शांत रखती थी कि वह हर शाम सुकून से लौट सके।

माधवी ने have बदलकर has कर दिया। फिर देर तक अपनी की हुई चीज देखती रही।

* * *

सात साल पहले उसने एक कॉलम बचाने को कहा था। ऋत्विक कैमरे के सामने अच्छा था। देर से पहुँचे, तीन लोगों के नाम याद कर ले और कमरे को लगे कि उसी का इंतजार हो रहा था। माधवी घंटे भर की बातचीत सुनकर वह वाक्य पकड़ लेती थी जो बाकी लोगों से छूट गया हो।

नई शादी हुई थी। वह कोलकाता की छोटी शोध एजेंसी में काम करती थी। ऋत्विक हर पखवाड़े क्रिकेट का कॉलम लिखता था। एक बार जमा करने की रात उसे बुखार हो गया।

माधवी ने लिख दिया। संपादक उसे जानता था, इसलिए ऋत्विक ने अपने नाम से भेजा। अगली बार साझा नाम पर बात करेंगे, उसने कहा।

अगली बार एक व्यस्त महीना बना। व्यस्त महीना उसका पहला टेलीविजन निमंत्रण बना। फिर माधवी की एजेंसी बंद हो गई। उसके कॉलम से आने वाला पैसा घर की भरोसेमंद आमदनी बन गया।

“हालात जरा सँभल जाएँ,” वह कहता।

आखिर माधवी ने पूछना छोड़ दिया कि कब सँभलेंगे।

* * *

हर शाम खाने की मेज उसकी कॉपियों के नीचे दब जाती थी। वह स्कोर रखने वालों को फोन करती, अभ्यास मैदानों तक जाती और हर बातचीत की तारीख दर्ज रखती। ऋत्विक इसे उसकी फाइल बनाने की आदत कहता था।

कॉलम उन पाठकों के लिए क्रिकेट पर बात करता था जो टीमों, अनुमानों और सट्टे पर बहस करते थे। किसी अनिश्चित बात को पक्की घोषणा वाली सुर्खी बना देना माधवी को पसंद नहीं था। वह लेख में जरूरी शर्तें रहने देती थी। ऋत्विक कभी-कभी उन्हें हटा देता। कहता, शुरुआत की रफ्तार टूटती है।

कोई बात गलत निकले तो हमारी गलती होती थी। किसी लेख की प्रशंसा हो तो वह दिल वाला निशान लगाकर संदेश आगे भेजता और पूछता, अब किस पर काम कर रही हो?

घर के बिल वह भरता था। इसलिए किसी को यह समझाना कठिन था कि वह इस व्यवस्था में इतने साल क्यों रही। उसे उसके साथ मिलकर कुछ बनाने में अच्छा लगता था। कई साल यही बात इतनी सच्ची रही कि बाकी सवाल उसी के पीछे छिपते गए।

* * *

पुरस्कार से आठ महीने पहले पल्लवी कार्यक्रम से जुड़ी थी। छोटे वीडियो बनवाती, शूट का समय तय करती और जानती थी कि कौन-सा कॉलर माइक से रगड़ेगा। माधवी को शुरुआत में वह बुरी नहीं लगी।

बुरा यह लगा कि पल्लवी का परिचय संपादकों से हो चुका था, जबकि वह अब भी बस एक ईमेल पता थी जिसे ऋत्विक कभी-कभी इस्तेमाल करता था।

पुरस्कार वाले खाने में किसी मेहमान ने माधवी से पूछा, क्या करती हैं?

“शोध और लेखन।”

पीछे से आते ऋत्विक ने हँसकर कहा, “मतलब मेरा शोध। घर में हर चीज की फाइल रखती हैं।”

मेहमान मुस्कराया। पूछा, मोजे भी जमाकर रखती हैं क्या?

माधवी इंतजार करती रही कि ऋत्विक मजाक में छिपी गलत बात सुधारेगा। उसने कंधे पर हाथ रखा और उसी हाथ से उसे फोटोग्राफर की तरफ मोड़ दिया। बाद में कैमरे की चमक से ज्यादा साफ उसे अंगूठे का दबाव याद रहा।

* * *

वापसी में ऋत्विक साउंड सिस्टम की शिकायत करता रहा। माधवी ने पूछा, पल्लवी को मंच पर क्यों बुलाया?

“उसने कार्यक्रम में काम किया है।”

“मैंने भी किया है।”

“बात को खराब मत करो।”

ट्रॉफी उसके जूतों के बीच थी। कार गड्ढे से गुजरी तो उसने उठाकर गोद में रख ली।

माधवी ने पूछा, निर्णायकों को बताया था कि उसके नाम से भेजे कॉलम किसने लिखे हैं?

“वे काम देखते हैं, हमारी शादी नहीं।”

उसने खिड़की से बंद मिठाई की दुकान देखी। उसी हफ्ते उन लेखों में से एक पूरा करने के लिए पिता के जन्मदिन के खाने पर नहीं गई थी।

“किसका काम?”

उसने लंबी साँस ली। बोला, सोचा था वह दोनों के लिए खुश होगी। घर पहुँचकर ट्रॉफी कहीं सुरक्षित रखने को कहा। सुबह साक्षात्कार था, सोना चाहता था।

माधवी ने ट्रॉफी खाने की मेज पर कॉपियों के बीच छोड़ दी।

* * *

अगला काम इंतजार कर रहा था। मंगलवार तक विशेषांक के लिए लंबा लेख चाहिए था। माधवी ने कहा, नाम और भुगतान का समझौता हुए बिना नहीं लिखेगी।

उसके बोलते समय ऋत्विक ने फ्रिज खोल लिया। अंदर देखता रहा, जैसे दूध के पीछे कोई आसान बातचीत रखी हो।

“हम एक-दूसरे को बिल नहीं भेजते।”

“उन्हें तुम भेजते हो।”

उसने कहा, कॉलम की फीस से किराया जाता है। माधवी ने कहा, हिसाब देखना चाहती है और कौन-सा काम करेगी, यह तय करना चाहती है।

उसकी आवाज बदल गई।

“अपने नाम से भेजकर देखो। पता चल जाएगा कितनी जल्दी जवाब आता है।”

पानी की बोतल लेकर वह ऊपर चला गया। माधवी मेज पर बैठी रही। दूसरे फोन पर उसकी हँसी सुनाई देने लगी।

आधी रात को उसने तीन संपादकों को लिखा। अगली शाम तक एक ने मना कर दिया। दूसरे ने जवाब नहीं दिया। तीसरे ने उसके नाम से छपे पुराने लेख माँगे।

उस संदेश का जवाब दिए बिना उसने बंद कर दिया।

* * *

बीना पाल का जवाब गुरुवार को आया। उनका साप्ताहिक अखबार मोहल्लों के विवाद, स्थानीय खेल और वे बातें छापता था जो बड़े अखबारों को किसी कांड के बाद याद आती थीं।

माधवी ने मैदानों की जगह बदलने और मैच की सूचियों में पुराने नाम चलते रहने पर लेख भेजा था। कोई भविष्यवाणी नहीं थी। गलत दरवाजे पर पहुँचते लोगों की रिपोर्ट थी।

बीना ने सुधार के बाद मामूली पारिश्रमिक की पेशकश की।

“दूसरे हिस्से में तीन बड़े वाक्य हैं, बस का नंबर नहीं,” उन्होंने लिखा। “स्कूली बच्चे आखिर किस बस से गए थे?”

कई मिनट माधवी को बुरा लगा। फिर नोट्स देखे। उसने पूछा ही नहीं था। अगली सुबह फोन किया, दूसरे व्यक्ति से रास्ते की पुष्टि की और हिस्सा दोबारा लिखा।

बीना ने स्वीकार कर लिया। रकम से राशन आ सकता था, नई जिंदगी नहीं। फिर भी उसने ईमेल छाप लिया। बरसों बाद कोई स्वीकृति सीधे उसके नाम आई थी।

* * *

ऋत्विक ने प्रिंटर के पास कागज देखा।

“उस अखबार में?”

माधवी ने पन्ने समेट लिए। उसने अखबार की प्रसार संख्या ऐसे बताई जैसे बीमारी का नाम हो। बोला, घर का झगड़ा बाहर ले जाकर उनके काम का मूल्य घटा रही है।

“उस पर मेरा नाम होगा।”

“और क्यों होगा, इसकी हर बातचीत में मेरा नाम घसीटा जाएगा।”

पहली बार उसने साफ सुना कि उसका अपना अस्तित्व भी कितनी आसानी से ऋत्विक के साथ घट रही घटना बन जाता था।

उसने निजी कॉपियाँ, अपनी रिकॉर्डिंग और अपने पत्राचार की प्रतियाँ लीं। उसके उपकरण और कंपनी की साझा सामग्री वहीं रहने दी। पुराने काम के सवाल सलाह लेकर सुलझाए जा सकते थे। गुस्से में अलमारी खाली करके सात साल का फैसला नहीं करना था।

दोस्त नसीम के घर छह हफ्ते के लिए खाली कमरा था। माधवी ने दो बैग बाँधे। रेनकोट भूल गई। लेने लौटी तो ऋत्विक नहा रहा था। उसके दोबारा निकलने तक नीचे नहीं आया।

* * *

पहला लेख सोमवार को छपा। टूटे नाले की खबर के नीचे। उसका नाम सही लिखा था।

उसने चार प्रतियाँ खरीदीं और तुरंत बेवकूफी महसूस हुई। नसीम ने बिना टिप्पणी एक ले ली। नाश्ते के समय चम्मच से पन्ना दबाकर पढ़ने लगी।

“इस रखवाले की पत्नी से बात की थी?” उसने पूछा।

“क्यों?”

“यह कह रहा है जगह बदलने से खास परेशानी नहीं हुई। बच्चों को लंबा रास्ता कौन ले जाता है?”

माधवी ने अपना पैराग्राफ फिर पढ़ा। बाद में रखवाले को फोन करके पूछा कि और किससे बात करनी चाहिए। अगली रिपोर्ट बेहतर बनी। वह भी उसकी थी, उस सवाल समेत जो पहली बार पूछना चाहिए था।

ऋत्विक के संदेशों का जवाब शाम तक नहीं दिया। उसे क्षेत्रीय अंतिम मैच के नए नोट्स चाहिए थे।

माधवी ने एक वाक्य भेजा—मैं तुम्हारे कॉलम पर काम नहीं कर रही हूँ।

* * *

उसके बिना लिखा गया पहला लेख पुरानी सामग्री जोड़कर बना था। माधवी ने शुरुआत पहचान ली। दो गर्मियाँ पहले उमस भरे हफ्ते में लिखी थी। जिस खिलाड़ी को चोट से लौटता बताया गया था, उसे लौटे एक पूरा सीजन बीत चुका था। बीच में बताए अभ्यास मैदान पर ताला लग चुका था।

पाठकों ने उससे पहले पकड़ लिया। बीना ने प्रकाशित सुधार दिखाया और पूछा, कुछ कहना चाहती है?

माधवी ने मना किया। वह अभी से सोच सकती थी कि हर साक्षात्कार में पति को असफल होते देखकर कैसा लगता है, यही पूछा जाएगा। उसका अपना अगला लेख बाकी था। मैदान में काम करने वाले व्यक्ति की बेटी शाम छह बजे पाली खत्म होने के बाद बात कर सकती थी।

पाँच बजकर अट्ठावन मिनट पर अनजान नंबर से ऋत्विक का फोन आया।

“एक पन्ना देख लो। इसे सिद्धांत मत बनाओ।”

“छह बज रहे हैं।”

“तो?”

“मेरा इंटरव्यू है।”

दूसरी कॉल आने से पहले उसने फोन बंद कर दिया।

* * *

हर हफ्ता संतोष देने वाला नहीं था। बीना ने एक प्रस्तावित कॉलम लौटा दिया। माधवी ऋत्विक के लिए बनाई अपनी पुरानी शैली से अलग सुनाई देने की जरूरत से ज्यादा कोशिश कर रही थी। दूसरे लेख में दो बार सुधार करना पड़ा। एक भुगतान ग्यारह दिन देर से आया। बिजली के बिल में अपना हिस्सा देने के लिए नसीम से इंतजार करने को कहना पड़ा।

रात में कभी ऋत्विक के नए लेख खोलकर परिचित वाक्य खोजती। एक बार अपना इंटरव्यू तैयार करने के बजाय चालीस मिनट यही करती रही। नसीम ने दरवाजा खटखटाकर खाने को पूछा।

“एक मिनट।”

“चावल चढ़ाते समय भी यही कहा था।”

माधवी ने स्क्रीन बंद की। खाने पर बता दिया कि क्या कर रही थी। नसीम ने सब्जी आगे की। कोई गहरी या उपयोगी सलाह नहीं दी। काम से थकी थी और प्लंबर की बात करना चाहती थी।

माधवी को अच्छा लगा कि एक ऐसी परेशानी भी है जिसमें उसकी राय चाहिए, उसकी पूरी जिंदगी नहीं।

* * *

घर छोड़ने के पाँचवें हफ्ते निमंत्रण आया। रिकॉर्ड की जाने वाली एक चर्चा-श्रृंखला क्रिकेट लेखन और मैच से पहले छपने वाले लेखों के पीछे के लोगों पर कार्यक्रम चाहती थी। माधवी और ऋत्विक दोनों को बुलाया गया था।

निर्माता ने उसकी मैदान वाली रिपोर्टें पढ़ी थीं। संचालक हरित पुराने कार्यक्रमों से ऋत्विक को जानते थे। माधवी ने पूछा, क्या उद्देश्य उनकी शादी पर बात करना है?

निर्माता ने मना किया और विषय लिखकर दिया। दोनों अपने प्रकाशित काम और रिपोर्टिंग के तरीकों पर बात करेंगे। व्यक्तिगत सवाल को मना कर सकेंगे।

ऋत्विक ने उससे पहले हामी भर दी। संदेश भेजा कि साथ शांत ढंग से दिखना सबके लिए अच्छा रहेगा।

माधवी ने बीना को निमंत्रण पढ़ाया। बीना ने कहा, फैसला उसका है। लेकिन अपनी जगह लेने की अनुमति कब है, यह किसी संपादक से पूछते रहना छोड़ना चाहिए।

माधवी ने स्वीकार कर लिया। अपने हाल के लेखों पर नोट्स बनाए, पुरस्कार वाले खाने पर नहीं।

* * *

स्टूडियो के इंतजार वाले हिस्से में पल्लवी ने कॉफी पूछी। माधवी ने मना किया। फिर हाँ कहा। उसे कॉफी चाहिए थी और दूसरों के हिसाब से जवाब देते-देते थक गई थी।

पल्लवी कप ले आई।

“उन्होंने कहा था, तुम बस आँकड़े देखती हो।”

माधवी ने उसे देखा।

“तुमने मुझे उनके लिए पूरे पैराग्राफ रिकॉर्ड करते सुना है।”

पल्लवी की उँगलियाँ अपने कप पर कस गईं।

“पूछना चाहिए था।”

माधवी ने वाक्य वहीं रहने दिया। दूसरी औरत ने आखिर अपने लिए स्थिति थोड़ी असुविधाजनक बना ली थी, इसलिए उसे तुरंत माफी नहीं देनी थी।

ऋत्विक ट्रॉफी लेकर आया। किसी ने लाने को नहीं कहा था। मेकअप के समय कुर्सी पर रखी। फिर पूछा, इंटरव्यू में पास रख सकते हैं?

हरित ने कहा, मेज खाली रख रहे हैं। ट्रॉफी बैग में रह गई।

* * *

शुरुआती सवाल आसान थे। ऋत्विक जिम्मेदारी, अनुशासन और पाठक के सम्मान पर बोला। पिछली सर्दी में उसके लिए लिखे भाषण की लय माधवी पहचान रही थी।

फिर हरित ने एक छपा कॉलम खोला। पुरस्कार के लिए भेजे गए लेखों में से था। सबसे असरदार हिस्सा रात के रखवाले की बातचीत से आया था। वह बंद होने वाले मैदान के पास काम करता था। मैच दूसरी जगह जाने के बाद भी बच्चे पुराने बंद दरवाजे पर पहुँचते रहे थे।

“उनसे मुलाकात कैसे हुई?” हरित ने पूछा।

ऋत्विक मुस्कराया।

“ऐसी जगहों पर समय बिताइए। लोग खुलकर बात करते हैं।”

“कौन-सा मैदान था?”

ऋत्विक ने उस मैदान का नाम दिया जहाँ मैच भेजे गए थे। हरित ने पन्ना देखा।

“लेकिन यह तो बंद होने वाला है।”

ऋत्विक ने अपना जवाब सुधारा। फिर गलत नाम दिया।

माधवी के गले में परिचित हरकत उठी। मदद के लिए बीच में बोलने वाला पहला शब्द आने को था। उसने कॉफी पी ली।

* * *

हरित ने पश्चिमी दरवाजे वाले वाक्य के बारे में पूछा। मुख्य प्रवेश के बजाय उसका जिक्र क्यों था?

यह इंटरव्यू के बारे में सवाल था, क्रिकेट के ज्ञान की छिपी परीक्षा नहीं। माधवी को जवाब इसलिए याद था क्योंकि वह खुद गलत दरवाजे पर इंतजार कर चुकी थी। सड़क के काम के कारण मुख्य प्रवेश बंद था। रखवाले ने फोन पर घूमकर आने का रास्ता बताया था।

ऋत्विक ने कहा, दरवाजा महत्वपूर्ण नहीं है। व्यापक बात महत्वपूर्ण है।

“मैं जानना चाहता हूँ आपने रिपोर्ट कैसे की,” हरित बोले। “खुद गए थे?”

“हमारे पास सामग्री जुटाने वाले लोग हैं।”

“यह बातचीत किसने की थी?”

ऋत्विक ने माधवी की तरफ देखा।

“पत्नी ने मदद की थी।”

हरित उसकी तरफ मुड़े। पूछा, लेख में उसने क्या किया था?

“इंटरव्यू, रिपोर्टिंग और लेखन।”

ऋत्विक एक बार हँसा। माधवी नहीं हँसी।

* * *

“हम टीम की तरह काम करते थे,” उसने कहा।

माधवी ने माना कि दोनों ने काम किया था। प्रकाशन तय करना, कार्यक्रम प्रस्तुत करना और कारोबारी संबंध सँभालना ऋत्विक का काम था। वह उन कामों का दावा नहीं कर रही थी।

हरित ने पूछा, प्रकाशन को पता था कि कॉलम उसने लिखा है? ऋत्विक बोला, संपादक समझते हैं कि पति-पत्नी साथ कैसे काम करते हैं।

“इस संपादक को बताया था?”

उसने रिकॉर्डिंग रोकने को कहा। निर्माता ने रोक दी। माधवी ने कप ध्यान से रखा। हाथ काँप रहा था।

ऋत्विक उसके करीब झुका।

“मेरा मतलब समझा सकती थीं।”

उसने दोनों के बीच रखा कॉलम देखा।

“तुमसे पूछा था किसका इंटरव्यू लिया।”

वह बोला, कार्यक्रम दोनों को हास्यास्पद बनाएगा। माधवी ने कहा, उसके जवाब सही हैं और वह चाहती है कि रखे जाएँ। प्रसारण से पहले संपादक की जाँच के लिए संबंधित सामग्री देगी।

निर्माता ने दोनों का पक्ष दर्ज किया। अच्छी टेलीविजन कहानी बन जाने से कोई आरोप प्रसारित करने का वादा नहीं हुआ।

* * *

विराम के बाद रिकॉर्डिंग शुरू हुई। हरित ने माधवी से नए काम के बारे में पूछा। वह सात मिनट बोली। बीच में उन्होंने पूछा कि पहली मैदान वाली रिपोर्ट में क्या गलत किया था। उसने छूटे हुए पक्ष और अगली रिपोर्ट के बारे में बताया।

ऋत्विक जोड़ना चाहता था कि बारीकियों पर ध्यान देने के लिए वह हमेशा उसे प्रोत्साहित करता रहा है। हरित ने कहा, उसके पास लौटेंगे। फिर माधवी से अगली रिपोर्ट पूछी।

उसने बगल में देखे बिना जवाब दिया।

बाद में कार्यक्रम के संपादक ने उसके पत्राचार, रिकॉर्डिंग और मसौदों की जाँच उन लोगों से की जो पुष्टि कर सकते थे। लेखन से असंबंधित निजी सामग्री बाहर रखी गई। मूल प्रकाशन को भी जवाब देने का अवसर दिया गया।

दस दिन बाद कार्यक्रम प्रकाशित हुआ। रिकॉर्डिंग रोकने का उल्लेख था। जाँची हुई बातचीत बनी रही। पहली बार किसी चुप्पी को न भरने से कुछ काम हुआ था, बिना उसके लिए एक और भाषण लिखे।

* * *

जिन लेखों की पुष्टि हो सकी, प्रकाशन ने उनमें लेखकीय श्रेय सुधारा। बाकी की समीक्षा का विवरण दिया। ऋत्विक के नाम से आए काम पर जवाब माँगा गया और अगला लेख फिलहाल रोक दिया गया। पुरस्कार देने वालों ने अपनी समीक्षा शुरू की। ऐसा कोई समारोह नहीं हुआ जिसमें ट्रॉफी एक हाथ से दूसरे में गई हो।

माधवी उसे अपने कमरे में चाहती भी नहीं थी।

बीना ने तीन महीने का समझौता दिया। हफ्ते में दो रिपोर्टों के लिए हर महीने अट्ठाईस हजार रुपये। नाम से लेख छपेंगे, जमा करने और भुगतान की तारीखें साफ होंगी। माधवी ने पारिवारिक काम के कारण एक तारीख बदलने को कहा।

बीना ने बदल दी।

उस समझौते के लिए ऋत्विक से नाराज बने रहना जरूरी नहीं था। हस्ताक्षर करने की एक वजह यह भी थी।

जिस बस मार्ग का वह इस्तेमाल करती थी, उसके पास साझा फ्लैट में कमरा मिला। पेशेवर सलाह लेकर दोनों के पैसे अलग करने और पुराने काम के अनसुलझे सवाल लिखने लगी। उन्हें सुलझने में साक्षात्कार से ज्यादा समय लगना था।

पहले महीने का भुगतान तय दिन आया।

* * *

उसी शाम ऋत्विक ने प्रकाशन को भेजने वाला जवाब भेजा।

भेजने से पहले भाषा देख लोगी? हमारी बातें एक-दूसरे के खिलाफ नहीं जानी चाहिए।

माधवी ने खोला। पहले वाक्य में जहाँ मैं होना चाहिए था, वहाँ हम लिखा था।

कुछ बदले बिना दस्तावेज बंद कर दिया। अपनी मेज पर नया प्रूफ रखा था। पहले पैराग्राफ के ऊपर उसका नाम था। सुर्खी के नीचे बीना ने तारीख पर सवाल लगाया था।

माधवी ने रिकॉर्डिंग जाँची, तारीख सुधारी और प्रूफ वापस भेज दिया। फिर पिता को फोन किया। उनके टले हुए जन्मदिन के खाने के लिए बस बुक कर ली थी। उन्होंने पूछा, मछली खाएगी या चिकन?

“मछली।”

“तुम्हारा पति आ रहा है?”

“नहीं।”

एक पल चुप रहे। फिर पूछा, लेने कितने बजे आना है?

उसने पहुँचने का समय बताया और टिकट बैग में रख दिया।

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