1. MMY: एक बोर्ड से पीछे
दिनेश की आखिरी सफेद गोटी नाखून की चौड़ाई से भी कम अंतर से चूक गई। पॉकेट का किनारा छूकर बाहर लुढ़की और खुली जगह रुक गई। अगली बारी श्रीकांत ने अपनी बची काली गोटी निकाल दी।
स्थानीय पाँच बोर्डों में तीन जीतने वाले चुनौती मैच में श्रीकांत एक से आगे था। कमरे में लोग उन नरम आवाजों में बात करने लगे जो दिनेश को खुले मजाक से भी खराब लगती थीं।
इकसठ साल की उम्र में वह लगभग आधा जीवन इस विरोधी से खेल चुका था। श्रीकांत ने मैच छोटा करने का प्रस्ताव दिया तो चिंता के नीचे छिपा संतोष साफ सुनाई दिया। दिनेश ने कहा, “शर्तों में अधिकतम पाँच बोर्ड हैं। अभी एक खेला है।”
निर्धारित विराम में स्ट्राइकर डिब्बे में रखते समय उसका दाहिना हाथ थोड़ा काँपा। उसने उसे मेज के नीचे नहीं छिपाया। बत्तीस वर्षीय बेटी पूजा दर्शक सीमा के पीछे अपने हाथ बाँधे बैठी थी। श्रीकांत कमरे की तरफ मुड़ा। “मैंने पूछा तो था।”
गोटियाँ दोबारा लग रही थीं। दिनेश बोर्ड देखता रहा। चूक पुराने बल का इस्तेमाल करने से हुई थी, जबकि आज उस शॉट को दूसरा तरीका चाहिए था। गलती तुरंत पहचान ली थी। पहचान बोर्ड नहीं बचा सकी।
दीवार पर मैच की सूचना में दो नाम बराबर अक्षरों में थे। जब श्रीकांत ने दोपहर को विदाई प्रदर्शन के रूप में प्रचारित करना चाहा था, दिनेश ने यही शर्त रखी थी। अब उसी सूचना के नीचे दूसरा बोर्ड लग रहा था।
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2. MMY कथा: जिस हाथ की नकल की गई
तीन महीने पहले दिनेश लंबे अंतराल के बाद क्लब गया था। उसके हाथ की स्थिरता पहले जैसी भरोसेमंद नहीं रही थी। वह समझ रहा था कि किस तरह का खेल आराम से कर सकता है। अपनी स्थिति के बारे में पेशेवर सलाह लेकर उसी में बताई सीमाओं के अनुसार योजना बना रहा था।
शुरुआती वापसी कठिन होगी, यह उम्मीद थी। यह उम्मीद नहीं थी कि श्रीकांत कमरे के सामने हाथ काँपाकर उसके फिसले स्ट्राइकर की नकल करेगा।
“नई शैली,” श्रीकांत बोला। “किसी को नहीं पता कहाँ जाएगी। खिलाड़ी को भी नहीं।”
लोग हँसे। कोई हँसकर शर्मिंदा दिखाई दिया। अगला बोर्ड शुरू होने से पहले दिनेश ने स्ट्राइकर समेट लिया। घर पर पूजा ने उसे पुराने पदक उस गत्ते के डिब्बे में रखते देखा जिसमें कभी जिल्दसाजी का कपड़ा रहता था।
उसने कामकाजी जीवन किताबें सुधारते बिताया था। कार्यशाला अब दूसरे व्यक्ति का व्यवसाय थी। कैरम ऐसी जगह बची थी जहाँ उस शाम से पहले कोई उसे रिटायर नहीं कहता था। दो सप्ताह उसने बुलावे टाले। फिर श्रीकांत का विदाई प्रदर्शन प्रस्ताव आया, जिसमें उसकी अपनी तस्वीर दिनेश से बड़ी थी।
दिनेश ने दो बार पढ़ा और असली मुकाबले की शर्तें भेजीं। बराबर नाम, प्रकाशित नियम, निर्णायक और पाँच में तीन बोर्डों का परिणाम। श्रीकांत मान गया। क्लब में कहा कि पुराने प्रतिद्वंद्वी का मन रखना महँगा नहीं पड़ता। दिनेश ने डिब्बे से एक पदक निकाला और उसकी रिबन से नई अभ्यास कॉपी बाँध दी।
3. वह तैयारी जो काम नहीं आई
पहली कोशिश पुराने खिलाड़ी को वापस पाने की थी। दिनेश लंबे सत्र करता, हाथ से पुराना बल माँगता और शाम बढ़ते बढ़ते निशाना बिगड़ता जाता। कॉपी में ऐसी चूकें भर गईं जिनमें अंतर भी मुश्किल था।
उसने नियम के भीतर अलग स्ट्राइकर आजमाए, बैठने का इंतजाम बदला और युवा खिलाड़ी की रिलीज की नकल की। हर नया तरीका थोड़ी देर जवाब लगता। फिर वही कठिन शॉट कमजोरी सामने ले आता।
पूजा ने यह नहीं कहा कि इच्छा से सब ठीक हो सकता है। उसने पूछा कि कॉपी में केवल सफल पॉकेट क्यों लिखता है। पूरा सत्र गिना तो तस्वीर साफ हुई। साफ कोशिशें पहले आती थीं, आरामदेह व्यवस्था और नियंत्रित स्ट्रोक के साथ। अंत की कोशिशें ज्यादातर झुँझलाहट दोहराती थीं।
दिनेश ने अपनी जरूरत और मिली सलाह के अनुसार अभ्यास बदला। छोटे सोचकर किए समूह, बीच में समीक्षा का समय और परिचित वैध स्थिति। कोई कोशिश उपयोगी नहीं मानी जाती जब तक वह संपर्क, गति और स्ट्राइकर का रास्ता नहीं बता सकता।
हर अभ्यास पुराने सबसे कठिन शॉट की परीक्षा होना भी बंद हुआ। सीधे पॉकेट, संभव कट और स्थिति के व्यावहारिक चुनाव कॉपी में लौटे। कुछ दिन शुरुआत से खराब होते। उन दिनों जल्दी रुककर चित्रों से स्थिति देखता। कैलेंडर मुकाबले की तरफ बढ़ता रहा। पास में स्वीकृत चुनौती रखी थी। उसमें दो बराबर नाम थे। उस दोपहर हाथ कैसा महसूस करेगा, इसकी कोई लिखी भविष्यवाणी नहीं थी।
4. छोटा दायरा, बेहतर इस्तेमाल
सबसे दर्दनाक बदलाव ताकत का था। दिनेश कभी दो रिबाउंड वाला शानदार शॉट पसंद करता था। अभ्यास में भी तालियाँ मिलतीं। अब उसकी सफलता गति और रिलीज के ऐसे संकरे मेल पर निर्भर थी जिसे वह लगातार नहीं दोहरा सकता था।
पूरा एक सत्र उसे वापस लाने में लगा दिया। बाद में कॉपी में दो सफलताओं के आसपास इतनी विफलताएँ थीं कि असली विरोधी को आसान समाप्तियाँ मिल जातीं।
अगले सत्र में वही गोटी उसी जगह रखकर दूसरे रास्ते खोजे। अनुमत बेसलाइन क्षेत्र में स्ट्राइकर की जगह बदलने से कोण बदला। कभी सीधा कट मिलता। कभी नियंत्रित स्थिति सुधार सबसे उचित था, जिससे आगे आसान मौका बनता।
उसने बारी बिना पॉकेट के समाप्त होने को स्वीकार करना सीखा, जब दूसरा विकल्प लापरवाह कोशिश हो। क्वीन पर तभी अभ्यास किया जब वास्तविक कवर रास्ता था। क्वीन नियम के अनुसार सुरक्षित हो चुकी हो, तब अपनी आखिरी गोटी का भी अभ्यास किया, ताकि उत्तेजना में बोर्ड की स्थिति न भूले।
पूजा ने कुछ वयस्क क्लब खिलाड़ियों के साथ सत्र तय करवाए। वे उसके खिलाफ सामान्य ताकत से खेले। शॉट आसान नहीं किए। दिनेश कई बार हारा। फिर उन निर्णयों से बोर्ड जीतने लगा जिन्हें कभी अपनी शैली कहने में संकोच होता।
एक शाम उसने कॉपी से पुराने स्ट्रोक को वापस लाओ वाली पंक्ति काटी। नीचे लिखा, आज का शॉट चुनो। अगले अभ्यास में उसी पन्ने को पहले खोला।
5. दूसरा बोर्ड
चुनौती हॉल में दूसरे बोर्ड की शुरुआत दिनेश ने सीधे सफेद पॉकेट से की। फिर महत्वाकांक्षी संयोजन लेने से खुद को रोका। अगली कोशिश ने भीड़ वाली स्थिति सुधारी, मगर दूसरी गोटी नहीं गिरी। बारी श्रीकांत को गई।
श्रीकांत ने हमला करके दो अच्छे पॉकेट लिए। वह गंभीर विरोधी था। दिनेश बदलता बोर्ड देखता रहा और अपनी पहुँच वाले अवसरों का इंतजार करता रहा। श्रीकांत की चूक के बाद एक सफेद साफ रास्ते में आई। दिनेश ने छोटे नियंत्रित स्ट्रोक से निकाली।
क्वीन उपलब्ध थी, लेकिन स्ट्राइकर फिर छूने से पहले कवर देखा। पास की सफेद गोटी आगे भरोसेमंद शॉट देती थी। उसने क्वीन ली और लगातार मिली बारी में कवर कर दिया। आखिरी सफेद के लिए पुराना दोहरा रिबाउंड नहीं, वैध बेसलाइन से कट था। दिनेश ने स्ट्राइकर की जगह बदली, हाथ जमाया और मारा।
गोटी अंदर गई। बोर्ड उसका था। एक एक।
श्रीकांत ने कवर की पुष्टि माँगी, जबकि क्रम साफ था। निर्णायक ने पुष्टि कर दी। दिनेश ने स्ट्राइकर रखा और निर्धारित विराम लिया। वह दर्शकों के चेहरे पढ़ने में नहीं लगा।
पानी लेने पर पूजा ने हाथ का हल्का कंपन देखा। उसने यह भी देखा कि खेल क्षेत्र के बाहर रखी अभ्यास कॉपी बंद थी। दिनेश उसमें कोई नोट नहीं जोड़ रहा था। अगला बोर्ड सामने था। उसने बोतल रखी, अपनी कुर्सी पर लौटा और गोटियाँ लगने का इंतजार किया।
6. तीसरा बोर्ड चुभ गया
तीसरे बोर्ड में मैच का वह हिस्सा सामने आया जिसे दिनेश नियंत्रित नहीं कर सकता था। पहली रिलीज अस्थिर लगी। आसान सफेद गोटी छोटी रह गई। अगली बारी जरूरत से अधिक सुधार किया और दूसरी गोटी इच्छित रास्ते से आगे चली गई।
श्रीकांत ने मौका पकड़ लिया। क्वीन निकालकर सही कवर किया। अपनी गोटियाँ पहुँच वाले रास्तों में लाता रहा। दिनेश ने दो उपयोगी पॉकेट लिए, लेकिन अंतर नहीं मिटा सका। श्रीकांत ने बोर्ड खत्म किया तो तीन सफेद बची थीं।
दो से एक। श्रीकांत का एक और बोर्ड मुकाबला समाप्त कर देता। निर्धारित विराम में दिनेश खेल क्षेत्र के पास दी गई कुर्सी पर बैठा। कमरे में चर्चा थी कि एक बोर्ड लेकर ही उसने काफी कर दिया। बात ऐसे लगी जैसे कोई विनम्रता से उसके चेहरे पर दरवाजा बंद कर रहा हो।
पूजा केवल दर्शकों की अनुमत सीमा तक आई। कोई रणनीतिक सलाह नहीं दी। दिनेश ने उसकी आँखों में देखकर एक बार सिर हिलाया।
खेल दोबारा शुरू हुआ तो श्रीकांत ने पूछा कि आखिरी बोर्ड से पहले विदाई तस्वीर कर लें क्या। दिनेश ने नई लगी गोटियाँ देखीं। “चौथा बोर्ड,” उसने कहा।
श्रीकांत मुस्कराया जैसे यह अंतर बचकाना हो। अपनी शुरुआत आत्मविश्वास से की। दिनेश गोटियाँ रुकने की जगह देखता रहा। अब वह हाथ को बीस साल पहले जैसा, या एक घंटे पहले जैसा महसूस कराने की कोशिश नहीं कर रहा था। सामने की स्थिति पढ़ रहा था।
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7. जिस बोर्ड में जल्दी नहीं की
चौथे बोर्ड में अवसर धीरे आए। दिनेश ने एक सफेद निकाली। फिर भीड़ में जोर से टक्कर कराने के बजाय एक बारी रास्ता खोलने में लगाई। श्रीकांत ने जवाब में पहला आक्रामक शॉट सफल किया, दूसरा नहीं।
दोनों की गोटियाँ कम हुईं, क्वीन बीच में रही। दिनेश को उसे लेने का अवसर मिला। लेकिन कवर के लिए वही अविश्वसनीय ताकत वाला शॉट चाहिए था जिसे उसने अपनी प्राथमिक पसंद से हटा दिया था। उसने सफेद गोटी चुनी।
श्रीकांत पहले क्वीन तक पहुँचा। कवर चूक गया। निर्णायक की प्रक्रिया के अनुसार क्वीन वापस केंद्र में आई। दिनेश ने फिर पूरा बोर्ड देखा। अब उसकी एक सफेद अपनी तरफ से सँभालने योग्य रास्ते में थी।
उसने क्वीन निकाली और उस सफेद से कवर किया। अपनी एक और गोटी बाकी थी। शॉट अपने आप होने वाला नहीं था। संपर्क के बाद स्ट्राइकर को पॉकेट की तरफ जाने से रोकना था। उसने लौटने का रास्ता जाँचा और अपेक्षा से कम बल लगाया।
सफेद इतनी धीमी चली कि बीच रास्ते किसी ने साँस अंदर खींची। वह पॉकेट पहुँची और गिर गई। दो दो बोर्ड।
श्रीकांत ने मैच सूचना की तरफ देखा। प्रस्तावित विदाई प्रदर्शन अब निर्णायक बोर्ड बन गया था। परिणाम के बाद निर्णायक को उसके हस्ताक्षर चाहिए होते। विराम में दिनेश ने हाथ गोद में रखा और फिर से लगते बोर्ड को देखता रहा। इस बार कमरे की बातचीत पहले जितनी आसान नहीं थी।
8. क्वीन श्रीकांत के पास
पाँचवें बोर्ड में श्रीकांत ने दोपहर की अपनी सबसे अच्छी शुरुआत की। दो काली गोटियाँ निकालीं। साफ रास्ता मिलने पर क्वीन ली और सही कवर कर दिया। लाल गोटी उसके पक्ष में सुरक्षित थी। दिनेश अब बाद में उसे लेने की योजना नहीं बना सकता था।
उसे श्रीकांत की काली समाप्त होने से पहले अपनी सफेद खत्म करनी थीं। बोर्ड खुला था। दोनों के लिए अवसर थे। श्रीकांत की व्यावहारिक बढ़त यह थी कि उसकी बची गोटियाँ अधिक आसानी से पहुँचती दिख रही थीं।
दिनेश ने सरल रास्ते की सफेद निकाली और अगली स्थिति सुधारने की कोशिश की। दूसरा शॉट नहीं गिरा, लेकिन गोटी सीधे रास्ते के करीब आ गई। श्रीकांत तुरंत उसका लाभ उठा सकता था। उसने एक काली निकाली, अगली पर पतला कट चूका।
मिस से गति बदली। दिनेश ने दूसरी सफेद निकाली और फिर सब कुछ एक ही बारी में खत्म करने की इच्छा रोकी। तीन सफेद से दो बचीं। श्रीकांत की दो काली थीं।
दिनेश की एक गोटी पुराने दोहरे रिबाउंड को बुलाती थी। वैध बेसलाइन की दूसरी जगह से लंबा, लेकिन साफ सीधा रास्ता भी था। अपनी बारी की प्रतीक्षा में उसने दोनों देखे। श्रीकांत अगली काली थोड़े अंतर से चूक गया। गोटी पॉकेट के किनारे लगी और मुँह पार करके बाहर रही। दिनेश ने वही आवाज पहचानी जिसने शुरुआती बोर्ड छीना था। इस बार मौका उसकी तरफ आया था।
9. दो सफेद गोटियाँ
दिनेश ने बची दोनों में आसान सफेद के लिए स्ट्राइकर रखा। वैध रास्ता साफ था। कमरा शांत हो जाने से उसने जल्दी नहीं की। छोटे स्ट्रोक से गोटी पॉकेट में गई और स्ट्राइकर बोर्ड पर सुरक्षित रहा।
एक सफेद बची। श्रीकांत आगे झुका। एक चूक बारी उसे लौटा देती। क्वीन विरोधी की तरफ से पहले ही कवर हो चुकी थी। दिनेश को यह बोर्ड जीतने के लिए अपनी आखिरी गोटी नियम से निकालनी थी।
उसने वही दूसरी बेसलाइन जगह चुनी जिसे पहले देखा था। वहाँ सीधा शॉट मापे हुए संपर्क से बनता था। अविश्वसनीय शानदार रिबाउंड की जरूरत नहीं थी। हाथ जमाने से पहले थोड़ा काँपा। अनुमत शॉट समय के भीतर उसने अपना सेटअप उपयोगी महसूस होने तक खुद को स्थिर किया।
स्ट्राइकर चला। सफेद चुने रास्ते पर गई, पॉकेट का अंदरूनी किनारा छुआ और गायब हो गई। स्ट्राइकर खेल में रहा। निर्णायक ने बोर्ड की पुष्टि की। दिनेश ने चुनौती तीन बोर्ड से दो जीती थी।
श्रीकांत ने पॉकेट देखा, फिर वह हाथ जिसकी नकल करके हँसी कमाई थी। अंक पढ़े जा रहे थे। दिनेश कुर्सी के पास हाथ धीरे खोल और बंद कर रहा था।
इस बार तालियाँ दया वाली धीमी नहीं थीं। लोग खड़े हुए। पूजा उसके खेल क्षेत्र से बाहर आने तक रुकी। फिर स्ट्राइकर का डिब्बा ले लिया। दिनेश ने केवल वही चीज उठाने को कहा था। बाकी सामान उसने खुद समेटा।
10. अगली तारीख उसकी थी
श्रीकांत ने पाँच बोर्डों के परिणाम पर हस्ताक्षर किए। आयोजक ने तस्वीर के लिए बीच में ट्रॉफी रखी। फिर पूछा कि पहली सूचना का विदाई वाला शब्द इस्तेमाल करें क्या।
“नहीं,” दिनेश ने कहा। “परिणाम लिखिए।”
तैयार पंक्ति में क्रम था: हार, जीत, हार, जीत, जीत। हार वाले कुल के पास श्रीकांत का नाम था। प्रदर्शन के लिए दी उसकी बड़ी तस्वीर की जगह असली मैच तस्वीर लगी। दोनों बोर्ड से बराबर दूरी पर खड़े थे।
हॉल छोड़ने से पहले बुलावे आने लगे। साप्ताहिक श्रृंखला, बाहर की प्रतियोगिता, दूसरी चुनौती। दिनेश ने अगले महीने की एक स्थानीय खेलने वाली दोपहर चुनी और उसकी शर्तें लिखित माँगीं। बाकी इंतजार कर सकती थीं।
आयोजक के फोल्डर में विदाई का नोटिस था। निकलने से पहले दिनेश ने माँगा। उसके नाम के नीचे अंतिम उपस्थिति लिखा था।
उसने बिना हस्ताक्षर लौटाया। साथ में नई स्थानीय चुनौती की तय तारीख रखी। श्रीकांत ने आयोजक को पुराना नोटिस हटाकर पाँच बोर्ड का नतीजा लगाते देखा।
पूजा ने ट्रॉफी ली। दिनेश ने अपना स्ट्राइकर केस उठाया। दरवाज़े पर नई प्रति एक बार पढ़ी—हार, जीत, हार, जीत, जीत। फिर बाहर चला गया। उसकी विदाई तय करने वाला आदमी अब भी वही पढ़ रहा था।
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