आशा ने आदमी से पहले अपनी जैकेट पहचानी।
तस्वीर उसी सुबह ली गई थी।
टीम के बैनर के नीचे पाँच लोग खड़े थे। वीरेन ने क्वालिफिकेशन का प्रमाणपत्र पकड़ा था। मानव ने गहरे नीले रंग की जैकेट पहनी थी, जिसकी बाईं कलाई पर धागा ढीला था।
आशा उसे दो बार सिल चुकी थी।
नीचे लिखा था—हमें यहाँ तक पहुँचाने वाले पाँच खिलाड़ी।
उसने तस्वीर बड़ी की।
छठा नाम नहीं था।
उन चार मुकाबलों का जिक्र नहीं था जिनमें किसी के बीमार, बाहर या बस अनुपलब्ध होने पर वह खेली थी।
ऑफिस की रसोई में केतली बंद हुई।
सहकर्मी ने पूछा, चाय चाहिए?
आशा ने हाँ कहा, जबकि बना चुकी थी।
फोन बजा।
वीरेन।
“फोटो देखी?”
“हाँ।”
“अच्छा। लोकल पेपर में भेज दोगी? जो सूची दी थी, उसी पर।”
“मेरी जैकेट किसने पहनी है?”
कुछ देर चुप्पी।
“मानव की आई नहीं थी। मुद्दा मत बनाओ।”
वह स्क्रीन देखती रही।
“आज रात कमरों की बुकिंग भी पक्की चाहिए,” उसने कहा। “नाम भेजता हूँ।”
आशा ने बिना पी हुई चाय सिंक में रख दी।
“फोटो खुद भेजो।”
“क्या?”
उसने फोन काट दिया।
अगले दस मिनट तस्वीर देखना बंद नहीं कर पाई।
उसे ठीक मालूम था कि कहाँ खड़ी होनी चाहिए थी।
* * *
तीन सीजन से कुछ बिगड़ता तो आशा को फोन आता।
बत्तीस साल की उम्र में वह गोदाम के माल की आवाजाही का समन्वय करती थी। उलझी व्यवस्था आसान बना देती थी। वीरेन ने जल्दी पहचान लिया।
पहले एक ट्रेन बुक की।
फिर पहचान पत्र जमा किए।
फिर कार्यक्रम सँभाला, भुगतान जाँचे, गायब कमीज़ों के पीछे भागी और लंबे मुकाबलों से पहले खिलाड़ियों को खाना याद दिलाया।
खेलती भी थी।
यह बात स्वीकार करना धीरे-धीरे असुविधाजनक होने लगा।
उनकी क्षेत्रीय रम्मी लीग में तय व्यक्तिगत मेज़ों के नतीजों से टीम का कुल परिणाम बनता था। मुकाबलों की सूची और खिलाड़ी सूची जमा करने की आखिरी तारीखें प्रकाशित होती थीं। टीम को सिर्फ एक अच्छा खिलाड़ी नहीं, भरोसेमंद लोग चाहिए थे।
आशा भरोसेमंद थी।
वीरेन का पसंदीदा खिलाड़ी नहीं आया तो वह खेली।
अच्छा किया तो उपयोगी योगदान कहा गया।
खराब किया तो प्रमाण कि मुख्य टीम की मदद करना उसके लिए बेहतर है।
किसी और का ध्यान हमेशा रखना था।
कोई कम उम्र का। कोई प्रायोजक वाला। कोई जिसकी जान-पहचान काम आ सकती थी।
आशा से कहा जाता, वह जानती है टीमें कैसे चलती हैं।
जानती थी।
इसीलिए जरूरत से ज्यादा देर रुकी रही।
* * *
क्वालिफिकेशन मुकाबला रविवार को था।
मानव ने शनिवार शाम मना किया।
आशा सब्जियाँ खरीद रही थी जब वीरेन का फोन आया।
“तुम्हारी जरूरत है।”
उसने आधा सामान टोकरी में छोड़ा, काम की शिफ्ट बदली और सुबह की बस ली।
वहाँ वीरेन ने जैकेट दी।
“रजिस्ट्रेशन में पहन लेना।”
उसी की थी।
क्लब के ऑर्डर में कम पड़ने पर उसने अपने पैसे से खरीदी थी।
दिन मुश्किल था। एक और खिलाड़ी खराब खेल रहा था। वीरेन ने अधिकारी से बहस में समय खोया। आशा ने अपनी मेज़ों पर इतना अच्छा किया कि टीम दौड़ में रही।
थोड़े अंतर से चयन हो गया।
वापसी में वह खिड़की से सिर टिकाकर सो गई।
वीरेन ने जगाया।
“अंतिम चरण की तारीखें देखोगी?”
उसने देखीं।
“ग्रुप में डाल दो।”
डाल दीं।
“आज अच्छा काम किया।”
एक पल उसे लगा खेल की बात कर रहा है।
फिर उसने रसीदें पकड़ा दीं।
दो हफ्ते बाद मानव तस्वीर में उसकी जैकेट पहने था।
* * *
मंगलवार को आशा क्लब के बाहर वीरेन से मिली।
वह हेलमेट लिए देर से आया।
“फोटो की बात है तो दूसरी ले लेंगे।”
“अंतिम सूची की बात है।”
“सबसे मजबूत संयोजन चुना है।”
“कैसे चुना, दिखाओ।”
वह मुस्कराया।
“हर बात गिनने वालों जैसी मत बनो।”
“फीस मैंने गिनी थी, जब कोई और नहीं गिनना चाहता था।”
“वह अलग है।”
“लग रहा है।”
उसने हेलमेट छोटी दीवार पर रख दिया।
“आशा, तुम जरूरी हो। लेकिन सबको सामने खड़ा नहीं होना पड़ता।”
पीछे बस गुजरी। सड़क पर धूल उठी।
उसने गुजरने दिया।
“जैकेट वापस चाहिए। और खर्च के बकाया पैसे।”
मुस्कान गायब हुई।
“अब हिसाब करेंगे?”
“पहले कर लेना चाहिए था।”
उसने कहा, दूसरे लोग उसे प्रभावित कर रहे हैं।
कोई दूसरे लोग नहीं थे।
एक तस्वीर थी और कलाई पर ढीला धागा।
* * *
उस रात आशा नहीं गई।
दो दिन सोचती रही कि जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया तो नहीं दी।
पुराने संदेश खोले। दोनों जवाबों के प्रमाण मिले।
मुश्किल यात्रा के बाद वीरेन का धन्यवाद। चयन के सवाल को अनदेखा करता वीरेन। बीमारी में खाना भेजता साथी। वही साथी टीम की माँ कहे जाने पर हँसता हुआ।
वह इन लोगों को पसंद करती थी।
नफरत करती तो छोड़ना इतना मुश्किल नहीं होता।
शुक्रवार को उसने बिना भुगतान वाले प्रशासनिक काम छोड़ने की स्पष्ट लिखित सूचना दी और लीग की रिलीज प्रक्रिया पूछी।
आयोजक ने प्रकाशित नियमों का रास्ता बताया।
उसने प्रक्रिया पूरी की, पुष्टि ली और प्रतियाँ रखीं।
वीरेन ने अनावश्यक कागज़ी काम कहा।
फिर क्लब की रिलीज पर दस्तखत किए।
“ठीक है। लगता है कोई और तुम्हारे इर्द-गिर्द टीम बनाएगा तो जाओ।”
उसने कागज़ बैग में रखा।
“तुमसे भी ऐसा नहीं कहा था।”
जैकेट सुपरमार्केट के थैले में वापस मिली।
गलत धुलाई से एक बाँह छोटी हो गई थी।
वह फिर भी घर ले आई।
* * *
एक हफ्ते शामें बहुत लंबी लगीं।
फोन पर पुरानी टीम के संदेश आते रहे।
बुकिंग नंबर कहाँ है?
अतिरिक्त ताश किसके पास है?
ड्राइवर को किसी ने पैसे दिए?
पहले दो का जवाब दिया।
तीसरे पर उँगली स्क्रीन के ऊपर रुक गई।
ड्राइवर के पास टीम के संपर्क थे। वीरेन के पास बुकिंग की पुष्टि थी। वह सब सौंप चुकी थी।
फोन दराज में रख दिया।
फिर निकाला कि किसी ने उत्तर दिया या नहीं।
नहीं दिया था।
उसने खाना बनाया, खड़े होकर खाया और थाली धोते समय रो पड़ी।
ट्रेन बुक करना याद नहीं आ रहा था।
यह विश्वास याद आ रहा था कि सब कुछ करती रहेगी तो एक दिन उसे छोड़ना असंभव हो जाएगा।
* * *
अगले सोमवार लता देशपांडे ने संपर्क किया।
एक मुकाबले में मिली थीं, जहाँ आशा ने उनकी टीम को पावर बैंक दिया था।
चौवन साल की सेवानिवृत्त शिक्षिका लता छोटे क्लब नॉर्थ रूम की कप्तान थीं।
“शरदकालीन श्रृंखला के लिए जगह खाली है।”
“खेलने की या व्यवस्था करने की?”
“खेलने की। व्यवस्था सब करते हैं।”
आशा लगभग हँस पड़ी।
“कहते सब हैं।”
“गुरुवार आओ। बाद में तय कर लेना।”
नॉर्थ रूम स्टेशनरी की दुकान के ऊपर अभ्यास करता था।
पंखा खिलाड़ियों से ज्यादा शोर करता।
चार नियमित खिलाड़ी थे। लता। प्रिंटिंग के कारोबार में शिफ्ट करने वाला इमरान। शांत अकाउंटेंट काव्या। ऑफिस के उपकरण ठीक करने वाला बिमल।
किसी ने चाय बनाने को नहीं कहा।
बिमल ने बैग हटाने को जरूर कहा क्योंकि उसे कुर्सी चाहिए थी।
वह तुरंत अच्छा लगा।
नतीजे प्रभावशाली नहीं थे।
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पहली शाम अभ्यास में इतना खराब हारे कि लता कैलकुलेटर लाईं। शायद जुर्माना अंक जोड़ने में गलती हुई हो।
नहीं हुई थी।
“फिर गुरुवार?” उन्होंने पूछा।
सबने सिर हिलाया।
आशा ने भी।
* * *
वह उन्हें ठीक करने लगी।
एक हफ्ते में टाइमटेबल बना दिया, यात्रा सूची दोबारा लिख दी और वे काम याद दिलाने लगी जिनकी जिम्मेदारी सब पहले ले चुके थे।
एक शाम शिफ्ट बदलने से इमरान देर से आया।
आशा ने तेज आवाज़ में बात की।
उसने माफी माँगी। फिर पूछा कि उसके संदेश का इंतज़ार करने के बजाय प्रिंटिंग ऑफिस में फोन क्यों किया।
“पक्का कर रही थी कि आ रहे हो।”
“मुझ पर निगरानी कर रही थीं।”
कमरा शांत हो गया।
आशा का मन हुआ किए हुए सारे काम गिना दे।
लता ने कॉपी बंद की।
“साथ खेलने को कहा था।”
“कोशिश कर रही हूँ कि खेल सकें।”
“जानते हैं।”
“तो फिर—”
“क्योंकि मदद और सब अपने हाथ में लेना अलग हैं।”
आशा जल्दी चली गई।
बस में उसने संदेश लिखा कि वह सही क्यों है।
भेजा नहीं।
सुबह इमरान से माफी माँगी।
उसने मान ली।
फिर खुद की हुई यात्रा व्यवस्था का विवरण भेजा।
उसने एक बार जाँचा।
सिर्फ एक बार।
* * *
श्रृंखला में सुधरने की गुंजाइश थी और साधारण लगने के भरपूर मौके भी।
पहले मुकाबले में आशा अच्छी खेली।
दूसरे में काव्या और अच्छी।
तीसरे में आशा खराब खेली। उसे लगा बाद की बातचीत इस पर होगी कि टीम में जगह बनती भी है या नहीं।
बिमल ने पानी दिया।
“नाश्ता अपना खरीदना पड़ेगा। भूल गया।”
बस इतना।
बाद में सबने नतीजे देखे। उसके भी।
किसी ने अच्छे खेलने का दिखावा नहीं किया। किसी ने यह भी नहीं कहा कि एक मुश्किल दोपहर का मतलब अगली बार सिर्फ रसीदें जमा करना है।
वह अजीब एहसास लेकर घर गई।
असफल हुई थी, फिर भी कमरे में उसकी जगह थी।
अगली सुबह ऑफिस में अगले आयोजन की छुट्टी माँगी। पहले माफी के वाक्य नहीं दोहराए।
* * *
वीरेन की टीम भी उसी श्रृंखला में थी।
इतना अच्छा खेली कि ऊपर बनी रही।
नॉर्थ रूम पहले नीचे था, फिर पास आया।
पुराने साथी आयोजन स्थलों पर मिले। आशा ने सीखा चुप्पी भी कितनी तरह की होती है।
एक वीरेन के न होने पर गर्मजोशी से मिलता।
दूसरा नई कमीज़ को देखने से बचता।
मानव ने पूछा, जैकेट का मामला ठीक हुआ?
“तुमने पहनी थी।”
“ओह। मुझे लगा क्लब की थी।”
“अब पता है।”
वह सिर हिलाकर चला गया।
वीरेन ज्यादा दोस्ताना था।
“मौके मिल रहे हैं, अच्छा है।”
वह सुन सकती थी कि वाक्य से क्या कहलवाना चाहता है—जैसे अनुमति उसी ने दी हो।
“मजा आ रहा है,” उसने कहा।
वह इंतज़ार करता रहा।
उसने धन्यवाद नहीं कहा।
* * *
आखिरी सप्ताहांत से पहले परेशानी शुरू हुई।
नॉर्थ रूम क्वालिफाई कर चुका था। वीरेन की टीम भी।
पुरानी टीम के होटल कमरे पक्के करने का संदेश आशा को आया।
उसने काम सौंपने वाला दस्तावेज़ भेज दिया।
वीरेन ने हँसता चेहरा भेजा।
इतनी औपचारिक मत बनो।
फिर फोन किया।
“शुक्रवार प्रायोजक का डिनर है। व्यवस्था के लिए भरोसेमंद आदमी चाहिए।”
“शनिवार टीम के साथ पहुँचूँगी।”
“एक दिन पहले आ सकती हो।”
“नहीं।”
“जानती हो कितना जरूरी है।”
“हाँ।”
वह उस शब्द के सहमति बनने का इंतज़ार करता रहा।
नहीं बना।
दो दिन बाद उसके ऑफिस के पास वाले सप्लायर से अतिरिक्त जैकेट उठाने को कहा।
उसने नंबर दे दिया।
अगला अनुरोध गायब खिलाड़ी दस्तावेज़ का था।
उत्तर नहीं दिया। वह उसके पास कभी था ही नहीं।
गुरुवार को लता ने बार-बार फोन देखना देखा।
“कोई व्यवस्था करनी है?”
आशा ने स्क्रीन देखी।
“नहीं।”
फोन उल्टा रख दिया।
* * *
शनिवार सुबह नॉर्थ रूम साथ निकला।
इमरान ने गाड़ी की थी। काव्या के पास दस्तावेज़ों की फाइल थी। बिमल आपात नकदी सँभाल रहा था। इतना भद्दा पाउच लिया था कि सब तुरंत पहचान लेते।
लता नाश्ता लाई थीं।
आशा ने अपना बैग उठाया।
आधे रास्ते में खयाल आया कि ड्राइवर का बुकिंग नंबर उसे नहीं पता।
हाथ फोन की तरफ गया।
फिर खिड़की से सिर टिकाए सोता इमरान दिखा।
उसके पास था।
इतना काफी था।
वहाँ टीम ने चेक-इन पूरा किया।
आशा का फोन बजा।
वीरेन।
उसने रुकने दिया।
फिर संदेश।
कहाँ हो?
लिखा—अपने रजिस्ट्रेशन पर।
मदद चाहिए। ड्राइवर गलत होटल पर है। मानव निकला नहीं। उसे फोन करो।
आशा देखती रही।
सालों से ये छोटे वाक्य आदेश थे।
उसने एक बार वीरेन को फोन किया।
“ड्राइवर और मानव से सीधे बात करो।”
“आयोजक से बात कर रहा हूँ।”
“मैं भी।”
“पाँच मिनट में ठीक कर दोगी।”
“तो तुम कर सकते हो।”
वह चुप हो गया।
दोबारा बोला तो आवाज़ नीचे थी।
“शुरुआत छूट गई तो याद रखना किसने मदद नहीं की।”
इल्जाम ठीक उसी जगह लगा जहाँ लगाना चाहता था।
आशा ने काँच के पार देखा।
काव्या उसके लिए खाली कुर्सी रखे थी।
“जाना है,” उसने कहा।
* * *
पहले सत्र में वह अच्छी नहीं खेली।
इसकी उम्मीद नहीं की थी।
ना कहने से शांति नहीं मिल गई थी।
हर ठहराव में पुरानी टीम के फँसे होने, नाराज होने और उसके रोक सकने की बातें सोचने का समय मिलता।
टाली जा सकने वाली गलती हुई।
फिर एक और।
सत्र खत्म हुआ तो उसके नतीजे ने नॉर्थ रूम पर दबाव डाल दिया था।
वह हर बात की माफी तैयार करती लता के पास गई।
लता ने परिणाम देखा।
“ठीक है। पता है कहाँ खड़े हैं।”
“मुझे—”
“देखेंगे। पहले खाओ।”
आशा ने पुरानी टीम की तरफ देखा।
देर से पहुँची थी। प्रकाशित नियमों के अनुसार शुरुआती एक मेज़ छोड़नी पड़ी थी। पूरा कार्यक्रम उनके लिए नहीं बदला गया।
वीरेन किसी से बहस कर रहा था।
फिर उसने आशा को देखा।
दोनों हाथ फैला दिए।
देखो क्या किया।
आशा ने नज़र फेर ली।
जैसे घाव में फँसी चीज़ खींचनी पड़ रही हो।
* * *
दोपहर को इमरान पास बैठा।
“अब भी जवाब दे रही हो?”
“नहीं।”
“अच्छा।”
“उनकी एक मेज़ छूट गई।”
“उनका कप्तान है।”
“जानती हूँ।”
“सच में?”
उसका मन हुआ झिड़क दे।
इसके बजाय संदेश खोले।
बारह बिना पढ़े संदेश थे।
कुछ गुस्से में। कुछ जल्दी वाले। एक उस साथी का था जिसे आशा दो बार दिखा चुकी थी कि हर फाइल कहाँ है।
उसने बातचीत म्यूट की।
फोन बैग में रख दिया।
“सच में कुछ हो गया तो?”
इमरान ने सोचा।
“आयोजक से संपर्क कर सकते हैं। जैसे हम करेंगे।”
उसने खाना पूरा किया।
अगले सत्र में सँभलने लगी।
चमत्कारिक तरीके से नहीं।
जितना जरूरी था।
* * *
रविवार दोपहर तक अंक पास-पास थे।
नॉर्थ रूम इसलिए दौड़ में था क्योंकि आशा के संघर्ष के समय काव्या बहुत अच्छी खेली। बिमल ने अप्रत्याशित अच्छा नतीजा दिया। इमरान खराब शुरुआत से उबरा।
लता की आखिरी बारी खराब गई।
लौटीं तो खुद पर गुस्सा थीं।
आशा चेहरा पहचानती थी।
पानी दिया। पूछा साथ चाहिए या शांति।
“शांति।”
वह पास चुप बैठी रही।
नतीजे का मतलब था कि बाकी मेज़ों से मजबूत अंत चाहिए।
एक मेज़ आशा की थी।
उसी पर वीरेन भी था।
सामने बैठकर मुस्कराया।
“आ गई।”
उसने सामान कुर्सी के नीचे रखा।
“अगले सीजन लौटने का समय अभी है,” वह बोला।
उत्तर से पहले अधिकारी ने निर्देश शुरू किए।
आशा को राहत हुई।
आखिरी शांत मिनट अपनी जिंदगी समझाने में नहीं बिताना था।
* * *
मेज़ पर दो और खिलाड़ी थे। उनकी टीमों को भी उनसे उम्मीद थी।
यह निजी बहस नहीं थी।
आशा ने उनके नाम याद किए।
अधिकारी बोले तो सुना।
पहला नतीजा वीरेन के पक्ष में गया।
वह पीछे टिक गया।
पुरानी आवाज़ें याद आईं। उपयोगी योगदान। मदद करने में बेहतर। सबसे मजबूत संयोजन।
उसने अगला हाथ शुरू होने दिया।
बाद में स्थिति सुधरी। फिर तीसरा खिलाड़ी दोनों से आगे रहा।
मेज़ वही बनी जो होनी चाहिए थी। घोषित प्रारूप में चार वयस्क अच्छा खेलने की कोशिश कर रहे थे।
वीरेन ने बात बंद कर दी।
आखिरी डील पूरी हुई तो आशा ने अपनी मेज़ से नॉर्थ रूम को जरूरी नतीजा दिया था।
टीम का खिताब फिर भी निश्चित नहीं था।
काव्या अब भी खेल रही थी।
आशा खड़ी हुई, दर्ज अंक देखे और दर्शकों की ओर चली।
पीछे वीरेन बोला।
“जिद्दी हमेशा से थीं।”
वह मुड़ी।
“जानती हूँ।”
फिर साथी को देखने चली गई।
* * *
काव्या को दूसरों का देखते रहना पसंद नहीं था।
एक बार कहा था, लगता है अधूरा काम कंधे के ऊपर से पढ़ रहे हैं।
अब आधा कमरा उसकी मेज़ के आसपास लग रहा था।
आशा इतनी दूर खड़ी रही कि दबाव न बढ़े।
बिमल दोनों हाथों से भद्दा पाउच दबाए था।
लता जमीन देख रही थीं।
इमरान फुसफुसाया कि कोई उसे साँस लेना याद दिलाए।
अंतिम घोषणा जाँची गई।
काव्या ने कर दिखाया।
अधिकारियों ने टीम के कुल अंक पूरे किए।
नॉर्थ रूम पहले स्थान पर था।
कुछ पल कोई नहीं हिला।
फिर बिमल की ऐसी आवाज़ निकली कि काव्या चौंक गई।
लता ने गले लगा लिया। फिर याद आया पुरस्कार भी लेने हैं।
आशा हँसने लगी।
आँसू भी थे, लेकिन किसी से छिपाने नहीं पड़े।
काव्या पास पहुँची तो बोली, “तुम सँभलती नहीं तो बाहर हो जाते।”
आशा ने सिर हिलाया।
“तुम टिकाए नहीं रखतीं तो भी।”
दोनों बातें सही थीं।
* * *
आयोजक ने विजेता कप्तान से टीम के नाम पूछे।
लता ने पाँचों की तरफ इशारा किया।
“पूरी सूची पढ़िए।”
साधारण आयोजन बैनर के नीचे सब खड़े हुए।
किसी को बैग पकड़ने नहीं कहा गया।
किसी बेहतर चेहरे के लिए किनारे नहीं किया गया।
आशा काव्या और इमरान के बीच थी।
नई जैकेट ठीक बैठ रही थी।
बाद में सामान समेटते समय वीरेन आया।
“बधाई।”
“धन्यवाद।”
“बकाया खर्च पर बात करनी चाहिए।”
“भुगतान का विवरण भेज दो।”
“कंपनी की तरह बात नहीं करनी पड़ेगी मुझसे।”
आशा ने देखा।
“और बहुत तरह से बात कर चुकी हूँ।”
उसने साथियों की तरफ देखा।
“बदल गई हो।”
दरवाज़े से बिमल ने बुलाया।
गाड़ी तैयार थी।
“हाँ,” उसने कहा।
फिर चली गई।
* * *
अगले महीने पुराने खर्च का भुगतान हुआ।
साथ कोई नाटकीय माफी नहीं थी।
आशा ने अपने हिसाब से रकम मिलाई और मिलने की पुष्टि कर दी।
नॉर्थ रूम अगला मुकाबला हार गया।
सबने नतीजों पर बहस की, खाना खाया और अगला अभ्यास तय किया।
जीत ने उन्हें परफेक्ट नहीं बनाया।
एक तस्वीर दी।
आशा ने छपवाकर फ्लैट में केतली के पास रखी।
पाँच लोग। पाँच नाम।
एक शनिवार अलमारी खोलते समय पुरानी नीली जैकेट मिली।
एक बाँह अब भी छोटी थी।
फोन बजा।
आधे पल के लिए पेट कस गया।
फिर देखा।
लता।
“बिमल चाबियाँ भूल गया।”
आशा ने आँखें बंद कीं।
“होना ही था।”
“लेने गया है। इंतज़ार में नाश्ता कर लें सोचा। पास हो?”
“दस मिनट में आती हूँ।”
“अच्छा। क्या लोगी?”
आशा ने हाथ में पुरानी जैकेट देखी।
फिर दान वाले थैले में रख दी।
“अपने लिए मँगवा लो,” उसने कहा। “पहुँचकर चुन लूँगी।”