पिता अखबार में लिपटी माला लेकर आए।
रोहन ने बैग से पहले उसे देखा।
कुछ दबे गेंदे बाहर निकले थे। बस अड्डे से लाए थे। सड़क पार करते समय एक हाथ से बचाए रखा था।
रोहन गोदाम के बाहर पैकिंग वाली कमीज़ में खड़ा था।
पिता को बताया था कि प्रशिक्षण केंद्र में है।
“यही जगह है?” दीनानाथ ने पूछा।
रोहन ने शटर, डिलीवरी वैन और दरवाजे के पास डिब्बे देखे।
“हाँ,” कहा।
फिर पिता अंदर गए और सामान की अलमारियों के पीछे पतला गद्दा देखा।
अखबार हाथ में ढीला हो गया।
माला के बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा।
* * *
रोहन छब्बीस साल का था।
दो साल पहले शहर आया था। नौकरी के साथ वयस्कों की भारतीय रमी प्रतियोगिताओं में गंभीर भागीदारी करना चाहता था।
योजना बेतुकी नहीं थी।
छोटे स्थानीय आयोजनों में नतीजे उम्मीद वाले थे।
पैकेजिंग गोदाम में काम मिल गया था। सावधानी रखे तो किराए का कमरा उठा सकता था।
कुछ महीने सावधान रहा।
फिर काम के घंटे बदले।
बहुत पास-पास आयोजन चुने। अभ्यास छूटा। पर्याप्त तैयारी के बिना यात्रा पर पैसे लगे।
एक निराशा के बाद अगला आयोजन जरूरी लगने लगता।
ऐसा नतीजा चाहिए था जिससे पिछले हफ्ते उद्देश्यपूर्ण दिखें।
इसके बजाय अपनी योजनाओं से पीछे रह गया।
भारी रकम बाकी नहीं थी।
इतनी थी कि हर हफ्ते ठीक हूँ कहने के लिए नई बातें गढ़नी पड़ती थीं।
* * *
पिता छोटे कस्बे में रहने वाले सेवानिवृत्त स्कूल लिपिक थे।
रविवार को फोन करते।
खेल से पहले काम, खाना और मौसम पूछते।
रोहन आखिरी सवाल का जवाब पहले देने लगा।
अच्छा नतीजा हो तो बाकी बताना आसान होता।
अच्छा नतीजा न हो तो उत्साह वाला अभ्यास बताता।
फिर सफलता के पास पहुँचना।
फिर ऐसी रैंक जो मिली ही नहीं।
पिता खुश सुनाई देते।
वह खुशी वापस लेना रोहन से सहा नहीं जाता था।
किराए का कमरा छोड़कर मालिक की सहमति से गोदाम में अस्थायी सोना स्वीकार किया, तब पिता को बेहतर प्रशिक्षण के पास जाने की बात बताई।
दीनानाथ ने पता पूछा।
रोहन बोला, व्यवस्थित होकर भेजेगा।
* * *
झूठा प्रमाणपत्र एक बात से शुरू हुआ।
तीन हफ्ते जिस आयोजन की चर्चा की थी, उसमें आगे नहीं गया।
पिता का फोन आया।
उसने कहा, जीत गया।
झूठ के बाद थोड़ी चुप्पी थी।
फिर दीनानाथ ऐसे हँसे जैसे महीनों से नहीं हँसे थे।
“सच?”
“हाँ।”
प्रमाणपत्र पूछा।
रोहन ने कहा, अभी आया नहीं।
छह दिन अधूरा वादा हर विचार के पास बैठा रहा।
फिर उसने अपने लिए पुरस्कार जैसा पन्ना बनाया। छपी प्रति घर भेज दी।
दूसरे आयोजन में प्रवेश या नौकरी लेने के लिए इस्तेमाल नहीं किया।
एक व्यक्ति को गर्व देने के लिए किया।
इससे नुकसान रहित नहीं हो गया।
* * *
दीनानाथ ने सस्ते फ्रेम में लगाया।
तस्वीर भेजी।
कैलेंडर के पास लटका था। बेटे के घर आने की अपेक्षित तारीख पर लाल घेरा था।
रोहन ने गोदाम के गद्दे पर बैठे देखा।
बाहर मशीन की चेतावनी की आवाज आई।
फोन उलटा रख दिया।
पुराने कमरे का साथी सागर फोन करके पूछ रहा था कि बेहतर जगह मिली?
रोहन ने हाँ कहा।
सागर ने पूछा, धातु के डिब्बे में बैठे जैसा क्यों सुनाई दे रहा है?
रोहन ने खराब संपर्क कहा। फोन रखा।
फिर बिना हिले बैठा रहा, जब तक मालिक ने नहीं पूछा कि बत्ती जली छोड़नी है क्या।
* * *
पिता ने अचानक आने की योजना बनाई थी।
पुराना परिचित शहर आ रहा था। बस में साथ मिल गया।
पहले भेजे पार्सल से गोदाम का पता था।
सोचा, बेटा वहाँ से नई जगह बता देगा।
रास्ते में माला खरीदी।
बाद में रोहन छोटी तैयारियों के बारे में सोचने वाला था।
बैग में अतिरिक्त कमीज़।
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सुबह जल्दी उठना।
गर्मी बढ़ने से पहले खरीदे फूल।
पिता उस जीवन की खुशी मनाने आए थे जिसका रोहन ने वर्णन किया था।
असली जीवन में गत्ते और गोंद की गंध थी।
* * *
गोदाम मालिक बालन आए।
“पिता हैं?”
रोहन ने सिर हिलाया।
बालन ने स्वागत किया। कहा, खाने के लिए एक घंटा ले सकता है।
दीनानाथ ने पैकिंग मेज देखी।
“मेरा बेटा यहाँ काम करता है?”
जवाब से पहले सवाल लगा।
बालन ने हाँ कहा। काम बताए।
वर्णन में तिरस्कार नहीं था।
रोहन ने फिर भी सुना।
महीनों से वह इस काम को ऐसा बना रहा था जिसे पिता को नहीं दिखाना है।
दीनानाथ ने बालन को धन्यवाद दिया।
उनके सामने प्रमाणपत्र नहीं पूछा।
बैग गद्दे के पास रखा। पानी माँगा।
रोहन ले आया।
माला अखबार में रही।
* * *
दो गलियाँ दूर छोटी जगह पर खाया।
कुछ देर दीनानाथ ने व्यावहारिक सवाल पूछे।
कब से यहाँ सो रहा है?
मालिक से व्यवस्था तय है?
कमाता कितना है?
क्या देना बाकी है?
रोहन ने पहले खराब जवाब दिए।
ज्यादा समय नहीं।
काफी।
गंभीर कुछ नहीं।
पिता ने गिलास रख दिया।
“रकम और तारीख बताओ।”
निर्देश में गुस्सा नहीं था।
रोहन को ज्यादा कठिन लगा।
असली जवाब दिए।
दीनानाथ सुनते रहे।
फिर पूछा, “प्रमाणपत्र में क्या सच है?”
रोहन प्लेट देखता रहा।
पिता ने इंतजार किया।
“नतीजा कुछ भी नहीं।”
* * *
दीनानाथ ने आँखें बंद कीं।
बस एक पल।
रोहन आयोजन, निराशा और फोन समझाने लगा।
व्याख्या तेज होती गई।
पिता की उन अपेक्षाओं की बात की जो उन्होंने कही नहीं थीं।
उस शर्म की जो ढोने को उन्होंने नहीं कहा था।
फिर खुद को सुना।
रुक गया।
“झूठ बोला।”
दीनानाथ ने आँखें खोलीं।
“हाँ।”
शब्द के साथ भाषण नहीं था।
रोहन चाहता था, होता।
भाषण होता तो सह सकता था।
तथ्य के साथ बैठना पड़ रहा था।
अगली मेज पर बिल पर बहस थी।
वेटर पानी लाया।
दीनानाथ ने पूछा, काम फिर जल्दी शुरू होगा?
हाँ कहा।
“तो खाना पूरा करो।”
* * *
पिता साधारण लॉज में दो रात रहे।
रोहन ने सस्ता खोजने को कहा।
दीनानाथ ने बताया, खर्च देख लिया है।
शाम को लिखा कि क्या देना है, क्या रुक सकता है और वास्तव में कितना कमा सकता है।
पिता कमरे की जमा रकम में थोड़ी मदद कर सकते थे।
हर खर्च वापस नहीं ला सकते थे।
रोहन ने कहा, कर लेगा।
पिता ने देखा।
“मतलब योजना है या बातचीत बंद करवानी है?”
रोहन ने पन्ना देखा।
इस बार योजना बनाई।
वास्तव में कर सकने वाला काम शामिल था।
कुछ समय कम प्रतियोगिताएँ थीं।
जरूरी समय पर काल्पनिक पुरस्कार आने की जगह नहीं थी।
* * *
अगली सुबह पाली शुरू होने से पहले दीनानाथ गोदाम आए।
बालन ने कुर्सी पूछी।
उन्होंने कहा, रास्ते से हटकर खड़े रहेंगे।
रोहन सोचता था पिता के सामने काम असहनीय लगेगा।
पहले लगा भी।
हर डिब्बा जैसे बताता था कि अपने बनाए वर्णन से कितना नीचे आ गया है।
फिर ऐसा ऑर्डर आया जिसमें चीजों की गिनती गलत थी।
उसने देखा। दोबारा गिना। वैन निकलने से पहले अंतर पकड़ लिया।
बालन ने भेजने वाला पन्ना सुधारा।
दीनानाथ दरवाजे के पास से देख रहे थे।
चाय के विराम में पूछा, ध्यान कैसे गया?
“वजन अलग लगा। फिर गिना।”
पिता ने सिर हिलाया।
रोहन ईमानदार काम के बारे में दिलासा देने वाला वाक्य सुनने को तैयार था।
नहीं आया।
पिता ने पूछा कि उसी ऑर्डर में अक्सर समस्या होती है क्या।
दस मिनट पैकिंग पर बात हुई।
रोहन जवाब दे सकता था।
याद नहीं करना पड़ा कि पिछले हफ्ते अपनी जिंदगी का कौन-सा रूप सुनाया था।
निकलने से पहले पिता की आस्तीन पर पैकिंग टेप चिपकी मिली।
निकालकर उसकी तरफ की।
“कहाँ डालनी है?”
रोहन ने कूड़ेदान दिखाया।
दीनानाथ ने वहीं डाली।
पिता को सड़क तक छोड़ने गया तो इस बार पीछे मुड़कर गोदाम देखने में उतनी शर्म नहीं आई। अंदर अधूरा काम था। वापस जाकर वही पूरा करना था।
* * *
जाने से पहले दीनानाथ ने पूछा कि झूठा नतीजा किसने देखा।
सागर और दो चचेरे भाइयों को रोहन ने बताया था।
पिता ने फ्रेम कई पड़ोसियों को दिखाया था।
रोहन का पेट कस गया।
“बता दूँगा।”
दीनानाथ ने कहा, जो आगे बताया है उसे वह भी ठीक करेंगे।
रोहन ने सबके सामने खड़े होकर घोषणा न करने को कहा।
“बैठक बुलाने की योजना नहीं थी।”
रोहन ने ऊपर देखा।
“जिन्हें कहानी मिली, उन्हें सुधार मिलना चाहिए। भीड़ नहीं चाहिए।”
उसने सिर हिलाया।
पिता ने फीके फूल अखबार में मोड़ दिए।
तस्वीर के लिए रोहन को पहनने को नहीं कहा।
* * *
पहला सुधार वाला फोन सबसे खराब था।
सागर ने सुनकर पूछा, इतने समय गोदाम में रह रहा था?
“हाँ।”
“बताया क्यों नहीं?”
ऐसा जवाब नहीं मिला जो मूर्खतापूर्ण न लगे।
शर्म आ रही थी, कहा।
सागर नाराज था।
अपनी इमारत में खाली होते कमरे के बारे में बताने को भी तैयार था।
दोनों हो सकते थे।
चचेरे भाइयों के जवाब अलग थे।
एक दयालु रहा। दूसरे ने मजाक किया जो रोहन को अच्छा नहीं लगा।
मजाक को यह सबूत नहीं बनाया कि सच बताना गलती थी।
गलत जानकारी दी थी।
ठीक की।
फिर काम पर गया।
* * *
फ्रेम वाला प्रमाणपत्र फिलहाल पिता के घर रहा।
दीनानाथ ने सार्वजनिक जगह से उतारकर दराज में रखा।
रोहन ने फेंकने को कहा।
पिता ने कहा, घर आएगा तो तय करेंगे।
अब उपलब्धि की तरह नहीं लटक रहा था।
यह जरूरी था।
अगले रविवार अभ्यास पूछा।
रोहन ने कहा, गया नहीं।
निराशा की उम्मीद की।
पिता ने कारण पूछा।
“अतिरिक्त काम। पाली मानी थी।”
“तो वही कहो।”
रोहन ने कहा।
बात घर के टूटे नल पर चली गई।
साधारण विषय राहत बन गया था।
* * *
तय खर्च उठा सका तो सागर वाला कमरा लिया।
साझा और संकरा था।
गद्दा सामान की अलमारियों के पीछे नहीं था।
बालन ने पहले वाला काम दिया।
पिता के आने को उसकी निजी जिंदगी सबको बताने की अनुमति नहीं बनाया।
रोहन समय के बारे में ज्यादा भरोसेमंद हुआ।
आवेदन अधूरे छोड़कर उनके नतीजे सोचते रहना बंद किया।
कुछ समय प्रतियोगिता की बहुत खबर नहीं थी।
कम खबर दी।
रविवार के फोन में उपलब्धि नहीं थी तो दुनिया नहीं रुकी।
पिता फिर भी उठाते थे।
* * *
व्यवस्थित अभ्यास में लौटना असहज था।
अपने समय के अनुकूल वयस्क समूह में गया।
संयोजक शालिनी ने पुराना अनुभव पूछा।
वास्तव में गए आयोजनों का वर्णन किया।
नतीजे पूछे तो असली दिए।
सामान्य खिलाड़ी को काम चाहिए, इससे कोई चकित नहीं था।
उसी ने इसे असंभव बना लिया था।
पहले महीने खुद से धैर्य टूटता रहा।
चाहता था नई ईमानदारी से तुरंत सुधार हो।
नहीं हुआ।
गलतियाँ दोहराता था।
समझाया जाना अब भी पसंद नहीं आता था।
शालिनी ने कहा कि गलती सच बताना उसकी समीक्षा की शुरुआत है, समीक्षा का विकल्प नहीं।
रोहन ने लिखा।
फिर असली काम शुरू किया।
* * *
वापसी का पहला आयोजन बिना पुरस्कार खत्म हुआ।
बाहर से पिता को फोन किया।
“स्थान नहीं मिला।”
“ठीक।”
रोहन इंतजार करता रहा।
दीनानाथ ने पूछा, क्या गलत हुआ मालूम है?
कुछ।
उसने समझाया।
तकनीकी विवरण पिता उतना नहीं समझते थे जितना रोहन ने कभी मान लिया था।
साधारण सवाल पूछा। जवाब सुना।
फिर कहा कि पड़ोसी की छत की मरम्मत आखिर पूरी हुई।
रोहन हँसा।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं। बताइए।”
सालों सोचा था पिता को असाधारण सफलता का प्रमाण चाहिए।
कभी आदमी बस छत की बात सुनाना चाहता था।
* * *
अगले महीनों की खबरें अलग रहीं।
ठीक अभ्यास।
खराब सत्र।
खर्च न बैठने से छोड़ा आयोजन।
पिछली बार से अच्छा नतीजा।
एक बार स्थान के पास पहुँचा। अंतर पर एक घंटे ठगा महसूस किया।
संदेश शुरू किया कि लगभग जीत गया।
फिर असली नतीजा लिखा।
सटीक बात बताए तो लगभग उपयोगी हो सकता था।
उसके मुँह में छिपने की जगह बन गया था।
संदेश भेजा।
पिता का जवाब आया। पढ़ लिया। घर पहुँचकर फोन करना।
माला नहीं।
ऐसी प्रदर्शित निराशा नहीं जिसे उसे ठीक करना हो।
रोहन बस में चढ़ गया।
* * *
एक रविवार फोन से पहले पिता की तस्वीर आई।
गली से ठीक हुई छत दिखाई थी।
पड़ोसी बीच में आ गया था। आधा चित्र आसमान था।
रोहन मुस्कराया।
कितने समय तक दोनों के बीच तस्वीरें घोषणाएँ रही थीं।
अब खराब ढंग से खींची छत थी।
जो थी, उससे आगे समझाने की जरूरत नहीं थी।
उसने साझा कमरे की छोटी शेल्फ भेजी।
नई कॉपी थी। पास टूटा हैंडल वाला कप था।
दीनानाथ ने पूछा, कप से पानी टपकता है?
नहीं।
फिर तकिया पूछा।
रोहन ने कहा, बहुत चपटा है।
रुका।
आदत से लगभग कह दिया था कि बिल्कुल ठीक है।
पिता ने कहा, पैसे बैठें तो बदल लेना।
तकिए की इतनी ही बात हुई।
रोहन ने खरीदारी की सूची में जोड़ दिया।
उसे एहसास हुआ कि छोटे दुख सीधे कहे जा सकते हैं। उन्हें बड़ी सफलता के पीछे छिपाना जरूरी नहीं था। नया तकिया उसी दिन नहीं आया, मगर रविवार का फोन खत्म होने पर उसे किसी और कहानी की तैयारी नहीं करनी पड़ी।
* * *
पुरस्कार वाला आयोजन गोदाम की मुलाकात के नौ महीने बाद आया।
वयस्कों का स्थानीय खुला आयोजन था। प्रवेश की शर्तें प्रकाशित थीं।
समय और खर्च ठीक थे।
शालिनी को लगा, तैयारी फिर परख सकता है।
जीत की भविष्यवाणी नहीं की।
रोहन ने भी नहीं।
शुरुआती सत्र अच्छे हुए।
फिर एक खराब।
पुरानी जल्दी उठी। पूरी कहानी तुरंत बचाओ।
अगले विराम में किसी को फोन नहीं किया।
जरूरी बात लिखी। लौटा।
आयोजन अभी पूरा करना था।
वह उसमें बना रहा।
* * *
आखिरी हिस्से तक इतना पास था कि हर खबर दर्दनाक ढंग से जरूरी लगी।
अंक लगे तो जाँचे।
पुष्टि का इंतजार किया।
पहला स्थान।
पन्ना देखा।
अधिकारी देखा।
फिर पन्ना।
इस क्षण की कल्पना धमाके जैसी की थी।
पहले लगा जैसे दोनों फेफड़ों से साँस लेने की अनुमति मिली है।
पुरस्कार में प्रमाणपत्र ध्यान से लिया।
आयोजक के हस्ताक्षर थे।
नाम सही था।
भीड़ से अलग होने से पहले फोटो नहीं ली।
फिर पिता को फोन किया।
* * *
दीनानाथ ने देर से उठाया।
बाहर थे।
“जीत गया,” रोहन बोला।
विराम।
रोहन समझा।
इस बार बुरा नहीं माना।
“नतीजा पुष्ट है। प्रमाणपत्र है। आयोजन का परिणाम पन्ना भी भेजूँगा।”
पिता एक सेकंड और शांत रहे।
फिर पूछा, “कैसा खेले?”
रोहन ने कठिन सत्र से शुरू किया।
बताया कहाँ लगभग जल्दी कर दी थी। फिर क्या हुआ।
झूठी घोषणा से लंबा फोन था।
अंत में दीनानाथ ने खुशी कही।
रोहन ने विश्वास किया।
यह भी ठीक मालूम था कि खुशी किस बात की है।
* * *
अगले सप्ताहांत घर गया।
बस अड्डे पर माला नहीं थी।
पिता छाता लाए थे। बारिश की उम्मीद थी।
घर में फोल्डर खोलने से पहले चाय पी।
रोहन ने असली प्रमाणपत्र मेज पर रखा।
दीनानाथ ने नाम की वर्तनी जाँची।
फिर दराज से पुराना फ्रेम निकाला।
झूठा पन्ना काँच के पीछे था।
रोहन ने पीछे का हिस्सा ध्यान से हटाया।
कुछ देर दोनों कागज साथ रखे।
पुराना सवाल खत्म करने के लिए बनाया गया था।
नया देखकर पूरा दिन बताने का मन होता था।
झूठा पन्ना मोड़ा। अलग रखा।
* * *
असली प्रमाणपत्र फ्रेम में लगाया।
दीवार का हुक थोड़ा ढीला था।
रोहन ठीक करता रहा। दीनानाथ ने फ्रेम पकड़ा।
पीछे हुए तो एक कोना ऊपर था।
पिता ने दिखाया।
रोहन ने थोड़ा खिसकाया।
अब भी गलत।
फिर कोशिश की।
किसी को जल्दी नहीं थी।
आखिर सीधा टँगा।
रोहन ने मोड़ा हुआ झूठा पन्ना बैग में रखा।
दूसरे बेकार निजी कागजों के साथ नष्ट करेगा।
ऐसी जगह नहीं छोड़ेगा जहाँ फिर उपलब्धि समझ लिया जाए।
पिता केतली रखने गए।
रसोई से अगला आयोजन पूछा।
रोहन ने कहा, प्रवेश का फैसला नहीं किया।
“करो तो बताना।”
उसने कहा, बताएगा।