केक पर लिखा था, इमरान को खत्म मत करने देना।
चार मोमबत्तियाँ थीं। टीम के हर साल के लिए एक।
अरविंद ने डिब्बा उसकी तरफ घुमाया ताकि शब्द पढ़ सके। लीना की मुस्कान रुक गई। प्रणव ने फोन उठाया, फिर जैसे विचार बदल दिया।
“अरे,” कप्तान बोला, “अपने ऊपर हँसना आना चाहिए।”
इमरान ने प्लास्टिक का चाकू लिया।
तीन सत्र पहले इंडियन रमी की टीम प्रतियोगिता के अंतिम दौर में उससे महँगी गलती हुई थी। मामूली अंतर से हारे थे। उसने हर साथी से माफी माँगी, यात्रा का अपना खर्च दिया और अभ्यास पर लौटा।
उसके बाद दो बार टीम को अगले चरण तक पहुँचाया। खराब स्थिति से अंक लौटाए। नए खिलाड़ी को सिखाने के लिए देर तक रुका।
उन बातों में से कोई केक पर नहीं आई थी।
उसने बराबर आकार के चार टुकड़े काटे।
अरविंद फिर हँसा।
“देखो, सीख गया।”
इमरान ने चाकू रख दिया।
काम से सीधे आया था। दोपहर के बाद कुछ नहीं खाया था।
अचानक भूख नहीं रही।
* * *
पुरानी गलती वास्तविक थी।
यह जरूरी था।
तब छब्बीस साल का था। थका था और जल्दी समाप्त करना चाहता था। ऐसी घोषणा की जिसे अधिकारी ने आयोजन के नियमों के अनुसार अस्वीकार किया। जुर्माने ने टीम की मामूली अंतर वाली हार में सीधे योगदान दिया।
उसे नहीं लगता था कि चिंतित बचपन, कठिन नौकरी या खराब नींद उस गलती को मिटा देनी चाहिए।
उम्मीद नहीं थी कि गलती उसका नाम बन जाएगी।
अरविंद ने छोटा वीडियो रख लिया।
टीम के सामने करीबी परिणाम होता तो कोई भेज देता।
अभ्यास में राय देता तो कप्तान पूछता कि इसके साथ भी चौंकाने वाला अंत मिलेगा क्या?
जीतते तो कप्तान टीम की वापसी की क्षमता की तारीफ करता।
हारते तो पुराना वीडियो लौटता।
इमरान सूरत में गाड़ियों के पुर्जे बेचने वाले कार्यालय में बिल जाँचता था। इतनी सावधानी थी कि पर्यवेक्षक ने कहा था, गायब अंक की आवाज सुन लेता होगा।
अभ्यास में जाँची संख्या पर भी संदेह होने लगा।
गिनता, फिर गिनता, फिर अरविंद को देखता।
कप्तान इसे आत्मविश्वास की कमी का प्रमाण कहता।
काम पर एक बार नए कर्मचारी हरि ने एक ही डिलीवरी दो बार दर्ज कर दी। इमरान ने दोहराव पकड़ा, ठीक करने में मदद की और बताया कि अगली बार कैसे ध्यान रखे।
कई दिनों तक हरि उस ग्राहक की फाइल उठाता तो इमरान के मन में मजाक बनता। दोहरी डिलीवरी। किसी और की गलती का छोटा, निर्दोष दिखने वाला नाम।
लगभग कह दिया।
फिर वाक्य में कप्तान की आवाज सुनाई दी।
हरि तेईस साल का था। ऐसी नौकरी सीख रहा था जिसमें अपरिचित बातें पहले से बहुत थीं। सुधार पूरा हो गया था। फाइल से डरना सिखाने से काम अच्छा नहीं होगा।
इमरान ने पूछा कि अगली प्रविष्टि साथ जाँचना चाहता है क्या?
हरि ने हाँ कहा।
इतना छोटा चुनाव कठिन नहीं लगना चाहिए था।
बाद में इस घटना को सोचकर इमरान खुद को साथियों से स्वाभाविक रूप से अधिक दयालु नहीं बता सका। मजाक आसानी से आया था। बस दर्शक मिलने से पहले रोक लिया था।
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सोचा कि बाकी लोग कितनी बार इसी छोटे पल तक पहुँचे होंगे और हँसी चुनी होगी।
पहली बार उनका व्यवहार टीम के अपरिवर्तनीय स्वभाव के बजाय कई अलग फैसलों जैसा लगा। उन फैसलों में अगली बार दूसरी राह चुनी जा सकती थी।
हरि ने अगले सप्ताह वही फाइल अकेले सँभाली। सही काम हुआ। किसी ने समारोह नहीं किया। इमरान ने रजिस्टर में पुष्टि की और अगली फाइल बढ़ा दी। आदमी को उसकी सुधरी गलती के आगे भी काम मिल सकता था।
* * *
केक के बाद लीना कैफे के बाहर मिली।
“रुकना जरूरी नहीं था।”
“लगा कि जाना भी दूसरा मजाक बन जाएगा।”
उसने यह नहीं कहा कि गलत समझ रहा है।
इमरान ने पूछा कि पिछली सर्दी का जिला चयन बाकी लोगों को याद है क्या?
“उसका क्या?”
“आखिरी दो दौर।”
“अच्छे अंक लाए थे।”
“उनसे आगे गए थे।”
लीना ने देखा।
“हाँ।”
जवाब इतना सरल था कि लगभग गुस्सा आ गया।
“तो कभी बात क्यों नहीं करते?”
वह रेलिंग से टिक गई।
“क्योंकि तुम माँगते नहीं। दूसरी कहानी आसान है।”
वह पूछ सकता था कि उसने चलने क्यों दिया।
इसके बजाय कहा, थक गया हूँ।
लीना ने केक के लिए माफी माँगी। मेज पर आने से पहले रोकना चाहिए था।
उस खास बात की माफी उसने स्वीकार की।
तीन सत्र नहीं निपटे।
बस में आधिकारिक परिणाम वाला फोल्डर खोला।
याद से ज्यादा जीत थीं।
* * *
सबसे पुराने आयोजन से शुरू किया।
हर दौर का प्रकाशित टीम योगदान लिखा। जुर्माना भी। फिर बाद के आयोजनों का लिखा।
रिकॉर्ड ने यह नहीं दिखाया कि वह छिपकर हमेशा सही था।
एक प्रतियोगिता शुरू से अंत तक खराब थी। दूसरी में कमजोर सत्र से लीना निकाल लाई थी। प्रणव का एक अच्छा परिणाम था जिसका धन्यवाद इमरान खुद भूल गया था।
पुरानी हार रही।
बाद के चयन भी रहे।
उसे एहसास हुआ कि टीम की अधूरी याद के सामने अपनी उतनी ही अधूरी याद रखकर बहस कर रहा था।
बाकी लोगों से अंक जाँचने को कहा।
अरविंद ने परिचित वीडियो भेजा।
बहुत गृहकार्य। बस यह दोबारा मत करना।
इमरान ने वीडियो का जवाब नहीं दिया।
फिर पूछा कि रिकॉर्ड सही है क्या?
लीना ने अपने की पुष्टि की। धुँधले स्कैन से टाइप की एक प्रविष्टि प्रणव ने सुधारी। इमरान ने धन्यवाद कहकर ठीक की।
आखिर अरविंद ने लिखा, सही लगता है।
इमरान ने जवाब रखा।
यह सिद्ध नहीं कर रहा था कि उसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए।
चाहता था कि आलोचना उस खिलाड़ी की हो जो अब भी मौजूद है।
* * *
अगले अभ्यास में खेल से पहले दस मिनट माँगे।
अरविंद ने कहा कि सालाना लेखा जाँच नहीं कर रहे।
इमरान ने जाँचा रिकॉर्ड रखा।
“अगली टीम चुन रहे हैं तो यह भी इस्तेमाल करो।”
कप्तान ने देखा।
“अंक नहीं बताते कि दबाव में कौन टूटता है।”
“तो क्या बताता है?”
अरविंद ने पुराना अंतिम दौर कहा।
इमरान ने बाद के दो अंतिम दौर दिखाए।
“इनमें भी दबाव था।”
प्रणव आगे झुका।
“सही है।”
वाक्य से सब हैरान हुए। प्रणव भी।
लीना ने कहा कि अगले आयोजन से पहले चयन और बदलाव पर बात हो। बदलाव का स्पष्ट कारण हो।
कप्तान को औपचारिकता पसंद नहीं थी। मजबूत उपलब्ध टीम भी चाहिए थी।
दो सत्र और एक बहस बाद तय हुआ कि टीम पहुँची तो अंतिम चरण में इमरान खेलेगा। पंजीकृत अतिरिक्त खिलाड़ी विवेक सिर्फ आयोजन की तय बदलाव व्यवस्था में आएगा।
सूची जमा करने का अंतिम समय देखा।
सबने पुष्टि की।
इमरान सुरक्षित नहीं लगा।
थोड़ा कम आसानी से मिटाया जा सकने वाला लगा।
* * *
नए आयोजन का प्रकाशित टीम प्रारूप था। अलग मेजों पर लगातार दौरों से मिलने वाले अंक जुड़ते थे।
चार सक्रिय खिलाड़ियों के साथ प्रवेश लिया।
इमरान ने नियम पढ़े। यात्रा जाँची। कार्यालय से एक दिन की छुट्टी ली।
चयन में शुरुआत स्थिर रही।
अरविंद उससे बेहतर अंक लाया।
लीना का दूसरा दौर कठिन था।
प्रणव ने बाद में अंतर घटाया।
कुल पर्याप्त था, इसलिए आगे गए।
इमरान ने साझा रिकॉर्ड में चारों का योगदान लिखा।
अरविंद ने सांख्यिकी वाला कहा।
इस बार उत्तर दिया।
“हाँ। किसी को रखना चाहिए।”
कप्तान चिढ़ा, फिर ट्रेन टिकट की पुष्टि पूछी।
हो चुकी थी।
अगले चरण की यात्रा लगभग सामान्य लगी। खाना बाँटा। फिल्म पर बहस की। इमरान यह जाँचे बिना हँसा कि अगला वाक्य उसी पर होगा क्या।
उम्मीद हुई।
बाद में लगा कि एक आरामदायक शाम को ऐसा समझौता नहीं मानना चाहिए था जिसकी रक्षा अब जरूरी नहीं।
* * *
अंतिम स्थान पर पुराना दबाव लौटा।
सूची पिछली शाम पक्की हो गई थी। खेल शुरू होने वाला था कि अरविंद ने तीन सत्र पहले वाली हार का अधिकारी पहचाना।
प्रणव को कोहनी से इशारा किया।
“याद है?”
इमरान ने सुना।
अधिकारी कई खिलाड़ियों को नमस्कार करके कमरा जाँचता रहा। किसी की शर्म दोहराने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।
अरविंद ने दिखाई।
पहले विराम में कुल कमजोर था। उसने इमरान को गलियारे में बुलाया।
“विवेक को लेना चाहिए।”
“सूची पक्की है।”
“पूछ सकते हैं।”
“किस आधार पर?”
कप्तान ने आवाज धीमी की।
“फिर वैसा लग रहा है।”
दरवाजे के पार लीना नोट देख रही थी। प्रणव केला खा रहा था। विवेक पास खड़ा था। नहीं जानता था कि बिना पूछे किसी सवाल का जवाब बन गया है।
इमरान ने वह गलती नहीं की थी जिससे कप्तान डर रहा था।
सिर्फ ऐसे कमरे में आया था जहाँ गलती संभव है।
* * *
अरविंद आयोजन मेज पर गया।
इमरान साथ गया।
कप्तान ने बदलाव की मंजूरी पूछी। अधिकारी ने प्रकाशित शर्तें देखकर पुष्टि की कि उस चरण में माँगा गया रणनीतिक बदलाव उपलब्ध नहीं है।
अरविंद ने कहा कि शायद इमरान हटना चाहता हो।
अधिकारी इमरान की तरफ मुड़ा।
“हटना चाहते हैं?”
“नहीं।”
शब्द उम्मीद से तेज निकला।
फिर शांत कहा।
“खेलने को तैयार हूँ।”
अनुरोध खत्म हुआ।
बाहर अरविंद ने टीम से ऊपर अभिमान रखने को कहा।
इमरान बोला कि तय सूची और पढ़े नियम मान रहा है।
“पक्का होना चाहिए।”
“इतना पक्का है कि खेलना चाहता हूँ। परिणाम का वादा नहीं कर सकता।”
कप्तान ने सिर हिलाया।
इमरान का जी मिचला रहा था।
चाहता था कि दृढ़ जवाब आत्मविश्वास लगे। मुँह सूखा था। हाथ कुछ पकड़ना चाहते थे।
लीना पानी लेकर आई।
“कुछ देर बैठो।”
वह बैठा।
उसने वीरता भरी दोपहर का वादा नहीं किया।
* * *
अगला दौर कठिन था।
फैसले ध्यान से जाँचे, लेकिन पुरानी आदत लौटती महसूस हुई। इतनी जाँच कि ध्यान डर बन जाए।
दर्शकों की तरफ देखना बंद किया।
वहाँ उपयोगी जानकारी नहीं थी।
एक मेज पर निराशाजनक परिणाम स्वीकार किया, अगले फैसले से तुरंत ठीक करने की कोशिश नहीं की।
दूसरी पर सोच की गलती पकड़ी, दोहराने से पहले।
दोनों पल लोकप्रिय वीडियो नहीं बनते।
पूरे दौर में इतना योगदान आया कि टीम की जगह सुधरी।
लीना और बेहतर रही।
विराम में इमरान ने पहले बधाई दी।
वह मुस्कुराई।
“अपनी किताब में लिखना।”
“लिख लिया।”
विवेक ने कप्तान से पूछा कि अब भी तैयार रहना है क्या?
अरविंद बोला कि पक्की टीम खत्म करेगी।
इमरान ने देखा कि फिर जाने को नहीं कहा गया।
अगला दौर कप्तान को पछताने पर मजबूर करने में नहीं लगाया।
उसके लिए पत्तों से ज्यादा कप्तान पर ध्यान देना पड़ता।
अभ्यास का बहुत समय पहले ही वैसे खोया था।
* * *
आखिरी दौर से पहले अंक करीब हुए।
पुराने आयोजन का आकार पहचान लिया। छोटा अंतर। अंतिम परिणाम। लोग तय करने को तैयार कि अभी न हुई बात का जिम्मेदार कौन होगा।
अरविंद बोलने लगा।
प्रणव ने टोका।
“दौर पर बात करें। वीडियो पर नहीं।”
कप्तान ने उसे देखा, फिर अंक पत्र।
इस बार वही किया।
हर खिलाड़ी अपनी मेज पर गया। कोई एक हाथ पूरे दल की नियति नहीं था।
लीना ने स्थिति रखी।
प्रणव ने सुधारी।
अरविंद का परिणाम मिला-जुला था।
इमरान ने मापकर अंतिम सत्र खेला। हर बार नहीं जीता। इतना मजबूत योगदान दिया कि दूसरों के साथ कुल जोड़ने पर टीम पहले स्थान पर थी।
अंतर बहुत बड़ा नहीं था।
परिणाम स्पष्ट था।
इमरान ने अपने नाम वाली पंक्ति देखने से पहले पूरा पत्र पढ़ा।
फिर ऊपर देखा।
प्रणव हँस रहा था। लीना ने दोनों हाथ चेहरे पर रखे थे।
अरविंद किसी से कह रहा था कि सूची पर हमेशा भरोसा था।
* * *
तब इमरान सच में नाराज हुआ।
बदलाव माँगते समय नहीं।
पुराना वीडियो आते समय नहीं।
उस वाक्य पर जिसने दोपहर इतनी चिकनी बना दी कि सब भूल सकें।
आधिकारिक तस्वीर तक रुका।
फिर कप्तान को अलग बुलाया।
“मुझे बदलना चाहा था।”
“विकल्प देख रहा था।”
“कहा था शायद हटना चाहता हूँ।”
“जीत गए। लड़ाई क्यों खोज रहे हो?”
इमरान ने फोल्डर बगल में पकड़ा।
“जिस फैसले को पलटना चाहा, उस पर भरोसा था कहना बंद करो।”
लीना और प्रणव सुनने लायक पास थे।
कप्तान ने दोनों को देखा।
प्रणव बोला, गलत नहीं है।
एक पल कप्तान गुस्से से ज्यादा हैरान लगा। पुराना मजाक इसलिए चला था क्योंकि सब हँसते या चुप रहते।
दोनों विकल्प अब कम भरोसेमंद थे।
इमरान ने सार्वजनिक बेइज्जती नहीं माँगी।
सही विवरण माँगा।
अरविंद ने छोटी माफी दी। सहज नहीं थी।
इमरान ने इतना स्वीकार किया कि कही गई है।
* * *
अगले सप्ताह टीम का आयोजन विवरण जाना था।
आम तौर पर कप्तान लिखता था। इमरान ने आधिकारिक परिणाम से हर दौर का विवरण सुझाया। चारों अपना योगदान जाँचें।
लीना और प्रणव माने।
आखिर अरविंद भी।
रिपोर्ट में कप्तान का मजबूत चयन सत्र, लीना की वापसी, प्रणव का सुधार और इमरान का स्थिर अंतिम योगदान था।
अकेला उद्धारक नहीं बनाया।
पुराने सार्वजनिक परिणामों का संग्रह भी जोड़ा।
पुरानी हार थी। सही विवरण के साथ।
बाद के चयन और जीत भी थे, जो बातचीत से गायब थे।
प्रकाशित करने से पहले विवेक ने पूछा कि अतिरिक्त खिलाड़ी की तैयारी लिख सकते हैं क्या, बिना ऐसा लगे कि खेला था?
वह भी जोड़ा।
पहली बार इतिहास में सबसे जोर से बोलने वालों से ज्यादा लोग थे।
इमरान ने धीरे पढ़ा।
हर पंक्ति प्रशंसा नहीं थी।
इसीलिए भरोसा हुआ।
* * *
जवाब कल्पना से छोटे रहे।
माफी माँगने वाली बड़ी भीड़ नहीं आई।
पूर्व साथी ने लिखा कि सर्दी वाला चयन भूल गया था। दूसरे ने कहा कि पूरे परिणाम कभी देखे नहीं।
पुराना वीडियो कुछ फोन पर रहा।
हर प्रति इकट्ठी नहीं कर सकता था।
अभ्यास समूह में क्या हो, तय कर सकता था।
अगले सत्र में नए व्यक्ति ने वीडियो पूछा। किसी और से मजाक सुना था।
अरविंद बोलने लगा।
फिर कहा, पुराने आयोजन की गलती थी। पूरे परिणाम संग्रह में हैं।
शाम की व्यवस्था पर आगे बढ़ गया।
सादा उत्तर था।
इमरान ने वफादारी के भाषण से ज्यादा पसंद किया।
प्रणव ने खाने पर चलने को पूछा।
“लिखावट वाला केक नहीं।”
उसने सिर हिलाया।
खाना साझा मँगाया। अगला अभ्यास सच में किसका चाहिए, उस पर बात हुई।
* * *
बदलाव की परीक्षा इमरान की पसंद से जल्दी हुई।
दो सप्ताह बाद छोटे अभ्यास आयोजन में खराब सत्र रहा। बचाई जा सकने वाली गलती हुई। मेज से लौटा तो समूह में रहने का अपना अधिकार समझाने को तैयार था।
अरविंद ने पूछा, क्या हुआ?
इमरान ने फैसला बताया।
कप्तान विवरण के एक हिस्से से असहमत हुआ। नोट देखे। इमरान ने बात मान ली।
बस इतना।
किसी ने फोन नहीं उठाया। किसी ने नहीं कहा कि किस्मत वाले सप्ताहांत के बाद असली इमरान लौट आया।
आलोचना फिर भी लगी। अच्छा खेलना चाहता था।
लेकिन वह जाँची और सुधारी जा सकने वाली चीज से जुड़ी रही। हर कमरे में ले जाने वाला फैसला नहीं बनी।
वापसी में लीना से कहा कि शायद यह परीक्षा चैंपियनशिप से ज्यादा अच्छी लगी।
वह हँसी।
“भावुक मत हो। सत्र बहुत खराब था।”
“जानता हूँ।”
इतनी आसानी से कहना उसे हैरान कर गया।
* * *
अगले सोमवार बिल वाले कार्यालय लौटा।
पखवाड़े बाद आए पर्यवेक्षक ने चैंपियनशिप पूछी।
“जीत गए।”
“अच्छा। तीन डिलीवरी नोट रखे हैं।”
इमरान हँसा और बैग रखा।
खाने पर टीम की रिपोर्ट खोली। अपना नाम अच्छे और खराब परिणामों के बीच था। दूसरे नाम भी थे।
तीन सत्र पहले हॉल के बाहर खड़ा युवा याद आया। उसे लगा था कि एक गलती से असली पहचान खुल गई।
चाहा कि उसे उपयोगी बात बता सके।
यह नहीं कि फिर गलती नहीं होगी।
यह नहीं कि अगला पुरस्कार पुरानी गलती मिटा देगा।
सिर्फ यह कि रिकॉर्ड उस पल से लंबा है जिसे सब दोहरा रहे हैं।
शाम नया अंक पत्र पुराने के पीछे फोल्डर में रखा।
पुरानी हार के ऊपर नहीं लगाया।
दोनों की जगह थी।
अभ्यास का संदेश आया तो आने की पुष्टि की।
फिर खाना बनाया और जरूरत तक फोल्डर बंद रहने दिया।