OKMM: वह चाबी जिसकी उसे जरूरत नहीं रही
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OKMM: वह चाबी जिसकी उसे जरूरत नहीं रही

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

OKMM की मौलिक रमी कहानी: अभ्यास से अंजलि को बाहर करने वाली प्रतिद्वंद्वी बताती है कि सात महीने की मेहनत और सही जोकर बदलाव से वह चार-दो कैसे जीती।

1. OKMM: चाबी मेरे पास रहती थी

मेरा नाम कविता है। गुरुवार को अभ्यास कमरे से सबसे आखिर में मैं निकलती थी। इससे छोटा अधिकार मिलता था जिसका आनंद स्वीकार करने से अधिक लेती थी। चाबी, बंद करने का समय और एक हाथ और खेलने के अनुरोध का जवाब मेरे पास था।

अंजलि पूछती तो जवाब आमतौर पर नहीं होता।

वह चवालीस साल की थी। क्लिनिक रिसेप्शन पर देर की पाली करती थी। मैं बयालीस की थी और पहले आ सकती थी। उस अंतर को मैं प्रतिबद्धता कहती थी। वह समय-सारिणी कहती थी।

एक शाम बहस इस तरह समाप्त हुई कि मैंने कमरा बंद कर दिया। वह बाहर समूह के लिए खरीदी गड्डी लेकर खड़ी थी। दो सदस्य मेरे साथ अंदर एक घंटा और रहे। काँच से रोशनी उसे दिखाई देती थी।

चैंपियनशिप मैच में मेरे सामने आने तक वह सात महीने दूसरी मेजें खोज चुकी थी।

मुकाबला पहले चार वैध घोषणाओं तक था। हर पुष्ट परिणाम के बाद नई डील। कोई जमा दंड कुल नहीं था। एक पूरा वैध हाथ, एक गेम। चार गेम पाने वाला आमने-सामने का फाइनल जीतता।

शुरुआती दोनों गेम मैं जीती।

दो-शून्य पर मेरी नजर गलियारे में बैग से लटकती चाबियों तक गई। अनुभव क्यों महत्वपूर्ण है, इसकी व्याख्या तैयार करने लगी।

अंजलि ने अंपायर से स्कोर की पुष्टि कराई। अगली डील के लिए पत्ते रखे और पानी का गिलास खेल क्षेत्र से थोड़ा दूर किया। छोटी, समझदार कार्रवाई थी। लगभग ध्यान नहीं दिया कि उसका कितना कम ध्यान अब मुझ पर बचा था। मैं उसके लिए फैसला करने वाली व्यक्ति नहीं, केवल सामने की खिलाड़ी रह गई थी।

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2. काँच के पीछे रोशनी

जिस गुरुवार बाहर रह गई, अंजलि सीधे काम से आई थी। बारिश में एक बाँह भीगी थी। उसने पूछा कि एक साप्ताहिक सत्र देर से हो सकता है क्या, ताकि शाम की पाली वाले भी आएँ।

मैंने कहा कि कमरा गंभीर खिलाड़ियों के लिए है। उसने पूछा कि एक घंटा पहले खेलने से गंभीरता कैसे बढ़ती है। मैंने कहा कि अभ्यास बाधित कर रही है। नई गड्डी उसके हाथ से ली, अगले सप्ताह इस्तेमाल करने को कहा और दरवाजा बंद कर दिया।

बाद में कहानी बताते समय वही हिस्सा छोड़ना चाहती थी। लाया सामान स्वीकार किया था, सीट नहीं दी थी।

वह इतनी देर बाहर रही कि अंदर रोशनी जारी रहने पर ध्यान जाए। किसी ने दरवाजा नहीं खोला। एक सदस्य ने काँच से नजर मिलाने से बचा लिया।

अगली सुबह उसने गड्डी वापस माँगी। बिना संदेश रिसेप्शन पर छोड़ दी। एक महीने बाद किसी खिलाड़ी ने बताया कि बस स्टॉप पर रोई थी। मैंने कहा कि हर सत्र एक व्यक्ति की भावनाओं के अनुसार नहीं चला सकते।

यह नहीं बताया कि उसी महीने अपनी पारिवारिक सुविधा के लिए दो सत्र बदले थे।

अंजलि ने पूछना बंद किया। बस डिपो के पास सुबह का समूह और रविवार को सामुदायिक हॉल की मेज खोजी। काम, घर और अभ्यास की यात्रा लंबी हुई। फिर भी गई।

सुना तो सोचा कि असुविधा उसे अधिक विनम्र होकर लौटना सिखा देगी। मैंने यह संभावना नहीं सोची कि दूसरे कमरे में वह केवल नई सीट नहीं, मेरे बिना अपना खेल विकसित करने का अवसर भी पाएगी।

3. सुबह साढ़े छह की मेज

अंजलि का अभ्यास बाद की समीक्षाओं से जाना, छिपकर देखकर नहीं। सुबह साढ़े छह के डिपो समूह में भाषणों का धैर्य कम था। कई लोग रात का काम समाप्त करके आते थे। पत्ते बाँटना और गलतियाँ समझाना चाहते थे।

पहली समस्या परिचित थी। दबाव में वह योजना बहुत जल्दी बदलती थी। विरोधी खुला पत्ता उठाता तो उसके पूरे छिपे हाथ की कल्पना कर लेती। फिर उस कल्पित खतरे से बचने के लिए अपने उपयोगी समूह तोड़ देती।

समूह ने ज्ञात और संभव अलग लिखवाया।

विरोधी ने क्लब का 7 लिया। ज्ञात। क्रम या सेट के लिए चाहिए हो सकता है। संभव। घोषणा से निश्चित एक पत्ता दूर है। स्थापित नहीं।

जोखिम पर विचार करना सीखा, हर संकेत को आदेश बनाना नहीं।

जोकर फिर व्यवस्थित करने का अभ्यास भी हुआ। शुरुआत में जहाँ लगा, वहीं सदा रहना जरूरी नहीं। प्राकृतिक पत्ता बाद में समूह पूरा करे तो जोकर दूसरी जगह उपयोगी हो सकता है, बशर्ते पूरे तेरह पत्ते वैध रहें और शुद्ध क्रम सुरक्षित हो।

नए ड्रॉ के बाद पूरा हाथ न देखने से कई अभ्यास फिनिश चूकी। साथियों ने संख्या गिनी। उसे गिनती नापसंद थी, फिर भी रखी।

घर में इस्तेमाल लिफाफों के पीछे छोटे समूह चित्र बनाती। सोने से पहले गड्डी से दूसरी व्यवस्थाएँ आजमाती और लिखती कि किस निर्णय ने हाथ बदला।

सुबह अलार्म बजता तो लिफाफे बिस्तर के पास रहते। उस काम का कोई दर्शक नहीं था। अगला अधूरा समूह था, जिसे अब वह पिछले दिन से थोड़ा अधिक साफ देख सकती थी।

4. पहले दो गेम

धीमे क्वार्टरफाइनल और तीखे सेमीफाइनल को जीतकर फाइनल आई थी। दोनों में उपयोगी समूह बनाए रखे, जबकि विरोधियों ने योजना जरूरत से ज्यादा बदली।

मेरी पहली घोषणा में क्रम जल्दी विकसित हुए। शुद्ध क्रम रखा। उसे बिगाड़े बिना जोकर इस्तेमाल किया। अंतिम गिनती जाँची। अंजलि की दूसरी योजना आशाजनक थी, तैयार नहीं। एक-शून्य।

दूसरे में मेरे खुले ढेर से पत्ता उठाने के बाद वह झिझकी। दो पत्ते अलग करके फिर जोड़े। बाद की समीक्षा में बताया कि उपयोगी समूह लगभग छोड़ दिया था क्योंकि मान लिया कि मैं तुरंत खत्म करने वाली हूँ।

मैं खत्म हुई, लेकिन इसलिए नहीं कि वह एक कार्रवाई से मेरे सही पत्ते जान सकती थी। उसका काम अपने हाथ का सबसे मजबूत रास्ता चुनना था।

दो-शून्य।

लगा पुराना संबंध लौट आया। मानक मैं तय करूँगी। वह पहुँचने के लिए संघर्ष करेगी।

फिर उसने असुविधाजनक काम किया। मेरी ओर उस व्यक्ति की तरह प्रतिक्रिया देना बंद किया जो तय करती है कि कमरे में रहने की अनुमति है या नहीं।

खुले पत्ते देखे। अपना हाथ लगाया। स्वीकार किया कि कुछ अनिश्चितता रहेगी। कठिन चुनाव आया तो आयोजन की प्रक्रिया में उपलब्ध समय लेकर फैसला किया।

तीसरा गेम चमत्कार से शुरू नहीं हुआ। मेरे हाथ में गतिविधि देखकर सही योजना तोड़ने से इनकार से हुआ। मैं उसकी सोच पढ़ नहीं सकती थी। केवल उसके खुले फैसले देख सकती थी। वे अब मेरे आत्मविश्वास के अनुसार नहीं बदल रहे थे।

5. उसने पहला अंक लिया

तीसरे गेम में अंजलि का हाथ धीरे सुधरा। प्राकृतिक क्रम पूरा किया। दो जुड़ी संभावनाएँ रखीं। जिस बड़े अकेले पत्ते के उपयोगी रास्ते कम हो गए, उसे छोड़ा।

मैंने खुला पत्ता लिया। उसने देखा, जानकारी पर विचार किया और अपना जुड़ा समूह बनाए रखा। कारण समझने से पहले मुझे चिढ़ हुई। उसकी आदत थी कि मेरे चुनाव को ऐसी चेतावनी माने जिसका तुरंत पालन जरूरी है।

बाद के ड्रॉ ने वैध दूसरा क्रम दिया। दूसरे पत्ते से सेट बना। तेरहों जाँचे, अतिरिक्त छोड़ा और घोषणा की। दो-एक।

मैंने व्यवस्था फिर देखने को कहा। अंपायर ने साफ दिखाई। संदेह नहीं था। अंजलि ने हाथ अपनी तरफ रखे और अगली डील की प्रतीक्षा की।

चौथा गेम अधिक करीबी था। मेरे कई पत्ते साथ काम कर रहे थे। लगा उसके खत्म होने से पहले एक बारी और मिलेगी। वह इच्छा थी, जानकारी नहीं।

दो कठिन चुनावों में रखे जुड़े पत्तों से उसका दूसरा प्राकृतिक क्रम बना। बाद के पत्ते से सेट पूरा हुआ। अब व्यवस्था में काम न आने वाली अकेली रानी छोड़ दी। मेरी अपेक्षित बारी से पहले घोषणा हो गई।

दो-दो।

पहली बार सीमा के पीछे उसके कॉपी वाले बैग को देखकर सोचा कि सात महीने किससे भरे थे। उत्तर मेज पर था। मैं ऐसी कहानी पसंद करती रही थी जिसमें वह मेरे दरवाजा खोलने का इंतजार कर रही हो। अब उसके पत्ते उस कहानी के अनुसार नहीं चल रहे थे।

6. वह विराम जिसमें मैं चुप रही

चौथे गेम के बाद निर्धारित विराम था। गलियारे में अनुमति वाली जगह से फोन लिया। संदेश थे कि कितनी आगे हूँ। “बराबर” लिखा और वहीं छोड़ दिया।

अंजलि खिड़की के पास आयोजक से अगले खेल का समय पूछ रही थी। तय बस पकड़ सकेगी या नहीं, जाँच रही थी। लगभग कह दिया कि गंभीर फाइनल उसके समय के अनुसार नहीं चल सकता।

बोलने से पहले ही वाक्य सुन लिया। विशेष शर्त नहीं माँग रही थी। आयोजन की तय जानकारी पूछ रही थी। फोन रख दिया।

लौटे तो पूछा कि तैयार हूँ क्या। मैंने हाँ कहा। विनम्रता अलग लगी क्योंकि उसमें मेरी मंजूरी की माँग नहीं थी।

पाँचवें गेम में अच्छा खेली। शुद्ध क्रम नहीं तोड़ा। अधूरी जोड़ी को सेट नहीं माना। निर्णायक दिखने के लिए उपयोगी पत्ता नहीं छोड़ा। मेरा हाथ अधूरा था जब अंजलि को अंतिम जरूरी पत्ता मिला।

उसने जाँचा, छोड़ा और घोषणा की। तीन-दो उसके पक्ष में।

अगले दो गेम जीतकर मैच अभी ले सकती थी। संभावना वास्तविक थी। उतना ही वास्तविक यह था कि उसे केवल एक चाहिए।

अंपायर ने स्कोर बताया। उसने पानी पिया। गिलास रखते हाथ हल्का काँपता दिखा। आखिर पहचाना कि खेल की स्थिरता वह पैदा कर रही थी। ऐसा नहीं था कि दबाव उसे छू ही नहीं रहा था।

मैंने अपनी कुर्सी ठीक की। पहली बार अगले हाथ की तैयारी में उसके लिए पुराना उपनाम खोजने का समय नहीं लगाया। मेरे सामने जीत के करीब पहुँची प्रतिद्वंद्वी बैठी थी।

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7. वह समूह जो पहले ही पूरा था

छठा गेम बाद में सबसे ज्यादा दोहराया।

अंजलि के पास हार्ट का शुद्ध क्रम 2, 3, 4 था। क्लब के 8 और 10 थे। हार्ट, डायमंड और स्पेड के जैक थे। एक छपा जोकर था। स्पेड के 5, 6, 7 थे। डायमंड का बादशाह था। तेरह पत्ते।

तीन जैक और जोकर चार पत्तों का सेट बन सकते थे। स्पेड दूसरा प्राकृतिक क्रम था। क्लब अधूरे थे। डायमंड का बादशाह अकेला था।

खेलते समय व्यवस्था नहीं जानती थी। हाथ खत्म होने के बाद समीक्षा में मिली। मेज पर केवल डिस्कार्ड और खुले ढेर से चुने पत्ते देख सकती थी।

मेरा हाथ इतना करीब था कि पूरा ध्यान माँग रहा था। एक डिस्कार्ड से लचीलापन घट सकता था। सोचा, मना किया और दूसरा चुना। मेरे पास भी खत्म करने का वास्तविक रास्ता था।

अंजलि ने बंद ढेर से क्लब का जैक लिया।

लापरवाह खिलाड़ी उसे अनावश्यक मान सकता था। जोकर के साथ जैक सेट पहले ही पूरा था। सात महीने पहले अंजलि इसी कारण अभ्यास में तैयार फिनिश चूकती थी।

उसने पूरा हाथ फिर देखा।

प्राकृतिक जैक ने केवल एक जैक और नहीं जोड़ा। उसने दूसरे पत्ते को ऐसे काम से मुक्त किया जहाँ अब उसकी जरूरत नहीं थी। सामने से मैंने उसे रुककर एक पत्ता समूहों के बीच ले जाते देखा।

उसी रुकावट में सुबह की मेजें, लिफाफों के चित्र और गिनी गई चूकें काम कर रही थीं। मैं उनका परिणाम देख रही थी, पीछे लगा समय पहली बार समझ रही थी।

8. जोकर कहाँ गया

छपा जोकर जैक सेट से क्लब में गया। 8 और 10 के बीच गायब 9 का काम किया। नया क्लब जैक चार अलग सूट के प्राकृतिक जैकों का सेट पूरा कर गया।

अंजलि ने अकेला डायमंड बादशाह छोड़ दिया।

अब तेरह पत्ते थे: हार्ट 2-3-4; क्लब 8, छपा जोकर, क्लब 10; चार प्राकृतिक जैक; स्पेड 5-6-7।

तीन, तीन, चार और तीन। हार्ट शुद्ध था। स्पेड भी शुद्ध था। क्लब क्रम में जोकर का वैध उपयोग था। सेट में चार अलग सूट थे।

उसने घोषणा की।

अंपायर की जाँच से पहले परिणाम समझ गई, लेकिन रुकी। मेरे मन का विश्वास आधिकारिक परिणाम नहीं था। पत्ते गिने गए, समूह सत्यापित हुए, घोषणा स्वीकार हुई।

चार-दो। शुरुआती दो गेम हारकर अंजलि मैच जीत गई थी।

कमरा तालियों से भर गया। डिपो समूह की महिला इतनी जोर से बजा रही थी कि सामान्य शोर के बीच अलग सुनाई दी। अंजलि ने उधर देखा, फिर स्कोरशीट पर लौटी।

मैंने हाथ दिया। उसने गिलास पकड़ते समय से अधिक मजबूत पकड़ से मिलाया।

“अच्छा पुनर्विन्यास,” मैंने कहा।

“हाँ। पहले चूक जाती थी।”

उत्तर में विजयी भाषण नहीं था। मेरे लिए अधिक कठिन बात थी: उन कमरों में किए काम का सटीक विवरण जिन्हें मैंने हमारे कमरे से नीचे माना था। अब सामने पूरा हाथ था। उसे मामूली कहने के लिए किसी तथ्य को नहीं, केवल अपने अहंकार को सहारा बना सकती थी।

9. रिसेप्शन पर गड्डी

पुरस्कार के बाद छठा गेम देखने को पूछा। अंजलि ने समय देखा और पंद्रह मिनट दिए।

मैं अंतिम ड्रॉ से शुरू करना चाहती थी। उसने पहले का फैसला चुना: हार्ट क्रम और जुड़े स्पेड बचाना। वे समूह न होते तो जोकर हटाना पूरा हाथ नहीं सुलझाता।

पत्ते फिर लगाए। मैंने दूसरा रास्ता सुझाया। उसने दिखाया कि उसी ड्रॉ के बाद उसमें एक अतिरिक्त ढीला पत्ता रह जाता। फिर गिना। समस्या समझ आई।

डिपो की खिलाड़ी पास बिना टोके सुन रही थी। पंद्रह मिनट पूरे होने लगे तो बस याद दिलाई।

मैंने पूछा कि गुरुवार का सत्र देर से करें तो अंजलि लौटेगी क्या। कुछ क्षण देखा।

“खिलाड़ियों के लिए उपयोगी हो तो समय बदलो। मेरे वापस आने की शर्त मत बनाओ।”

नई गड्डी याद आई जिसे उसके हाथ से लिया था। काँच के पीछे रोशनी और बिना संदेश लौटाई गड्डी वाला रिसेप्शन याद आया।

“उस रात दूसरों के लिए कमरा खुला रखा था,” मैंने कहा।

“पता है।”

“तुम अभ्यास बाधित नहीं कर रही थीं।”

“यह भी पता है।”

उसने केस बंद किया। मैं उन तथ्यों तक पहुँची थी जिनके साथ वह महीनों से रह रही थी। मेरी नई समझ को उदार दिखाने के लिए उसे देर तक रुकना जरूरी नहीं था।

वह साथी के साथ बाहर गई। मैंने मेज पर बचा स्कोर देखा। पहली दो प्रविष्टियाँ मेरे पक्ष में थीं। बाकी चार उसके। किसी पंक्ति में कमरे की चाबी का महत्व नहीं था।

10. गुरुवार रात नौ बजे

अगली समूह बैठक में चाबी मेज पर रखी। सदस्यों से ऐसा समय तय करने को कहा जिसे लोग इस्तेमाल कर सकें। अपने पहले किए दोनों बदलाव भी रिकॉर्ड में रखे। कोई पुराने समय को अटूट नहीं बता सकता था।

एक देर का साप्ताहिक सत्र जोड़ा। खोलने की जिम्मेदारी बाँटी। अंजलि को सूचना भेजी, उत्तर की माँग नहीं।

वह पहले सत्र में नहीं आई। कमरा फिर भी खुला।

क्लिनिक कर्मचारी आया, परिवहन लिपिक आया, कई महीने बाद लौटता खिलाड़ी आया। पत्ते बाँटे। अच्छे फैसले और महँगी गलतियाँ मिलीं। रोशनी इसलिए चालू रही कि तय सत्र समाप्त नहीं हुआ था, इसलिए नहीं कि मैंने एक और घंटे के योग्य लोग चुन लिए थे।

तीन सप्ताह बाद अंजलि घिसा कार्ड केस और समूह चित्रों वाले पुराने लिफाफे लेकर आई। दूसरी प्रतियोगिता से पहले अभ्यास मैच खेलने आई थी।

मैंने मेज के पास कुर्सी रखी। उसने सीट चुनी, केस खोला और प्रारूप पूछा।

“पहले चार?” मैंने सुझाव दिया।

अंदर आने के बाद पहली बार मुस्कराई। “ठीक है।”

स्कोरशीट बीच में रखकर दोनों नाम ऊपर लिखे। गड्डी काटने के लिए उसे दी। चाबी अलग मेज पर रही, जहाँ अगला जिम्मेदार सदस्य बंद करते समय पा सके।

उसने गड्डी काटी और वापस सरका दी। मैंने पत्ते बाँटने शुरू किए। इस बार उसके सामने की खाली जगह केवल एक नए हाथ की थी। उसमें बैठने का अधिकार किसी पुराने एहसान पर निर्भर नहीं था।

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