P77: वह आधा अंक जिसने कप की उम्मीद बचाई
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P77: वह आधा अंक जिसने कप की उम्मीद बचाई

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

P77 की मौलिक टीम शतरंज कहानी: देविका अपनी जगह कमाती है, कठिन हाथी अंतखेल बचाती है और कप्तान को अपना अंतिम मुकाबला पूरा करना पड़ता है।

1. P77: कप्तान को अभी खेलना था

देविका की बाजी बराबर हुई तो मनोज ने उसे बधाई नहीं दी। उसकी अपनी बाजी चल रही थी और आर्बिटर मेजों के बीच बातचीत की अनुमति नहीं देता था। उसने एक बार देविका के बोर्ड के पास परिणाम देखा। दोनों को आधा अंक। फिर अपने घोड़े की तरफ लौट आया।

दूसरी दो बाजियों में एक-एक जीत दोनों टीमों को मिली थी। देविका की बराबरी के बाद फाइनल डेढ़-डेढ़ पर था। कप घर ले जाने के लिए मनोज को आखिरी बाजी जीतनी थी। उसकी बराबरी होने पर टीम मैच बराबर होता और प्रकाशित टाईब्रेक प्रक्रिया लागू होती।

सत्र की शुरुआत में उसने देविका से कहा था कि रिजर्व का मुख्य काम नियमित खिलाड़ियों के लिए समस्या न बनाना है। अब वह अपनी समस्या हल कर चुकी थी। बची समस्या उसकी थी।

कमरे के दूसरे सिरे पर विरोधी कप्तान विक्रांत बिना मुस्कराए देख रहा था। बयालीस साल का था। गर्म मौसम में भी क्लब ब्लेजर पहनता था। कभी देविका को टीम फोटो से इसलिए हटाया था क्योंकि वह केवल जगह भरने आई थी।

पैंतीस साल की देविका दर्शक सीमा के पीछे हाथ बाँधे खड़ी थी। लगभग एक घंटा कठिन हाथी अंतखेल बचाया था। सुबह पढ़ाई वयस्क शिक्षा कक्षा की चॉक एक कफ पर लगी थी।

मनोज उनतीस का था। किसी अलग अनुभव वाले की बात सुनना सीखने से पहले कप्तान बन गया था। उसने स्थिति फिर देखी। देविका की बराबरी उसकी गलती का बहाना नहीं थी। वह योगदान था, जिसके बाद अपना हिस्सा पूरा करना जरूरी था।

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2. वह तस्वीर जिसमें वह नहीं थी

दो साल पहले देविका ने विक्रांत की लीग के आखिरी दो राउंड खेले थे, क्योंकि नियमित सदस्य नहीं आ सकता था। एक जीती, एक बराबर की। उसके परिणाम से क्लब तीसरे स्थान पर आया।

पुरस्कार के समय विक्रांत ने आधिकारिक फोटो से हटने को कहा। बोला कि अतिथियों को नियमित दल दिखना चाहिए। एक अतिथि ने उसे सहायक कर्मचारी समझकर खाली कागजी कप थमा दिया। विक्रांत ने देखा और तस्वीर सजाता रहा।

देविका ने कप पास की ट्रे में रखा। न फेंका, न चिल्लाई। कमरे को यह बहाना नहीं दिया कि घटना के बजाय उसका गुस्सा याद रखे।

फोटोग्राफर जाने तक बाहर इंतजार किया। फिर वह छोटा टीम पदक माँगा जो हर खिलाड़ी को देने की बात हुई थी। विक्रांत ने कहा कि मुख्य चार के लिए ही मँगाए थे।

घर की बस में उसकी वयस्क भतीजी ने फोन करके तस्वीर माँगी। देविका ने कहा कि कैमरे के सामने भीड़ थी। उस शाम के बारे में वह उसका पहला झूठ था और सबसे ज्यादा वही चुभा।

अगले हफ्ते क्लब छोड़ दिया। कई महीने अध्यापन की पालियों के बीच कभी-कभार खेली। नियमित समूह के बिना गणना जल्दबाज और आत्मविश्वास कमजोर होता गया।

मनोज ने नई टीम में रिजर्व जगह दी तो उसने पूछा कि रिजर्व के लिए चयन की लिखित शर्तें और सम्मान नियमित खिलाड़ियों जैसे होंगे या नहीं।

उसने कहा कि टीम जीतना शुरू करे, फिर विस्तार से बात करेंगे। देविका ने उत्तर याद रखा। उसे यह भी याद था कि पिछली बार विस्तार से बात हमेशा बाद में ही होने वाली थी।

3. वह हार जिसे मनोज छिपाना चाहता था

मनोज की टीम में देविका की पहली बाजी हार में समाप्त हुई। ठीक उद्घाटन चुना। खेलने योग्य मध्यखेल मिला। फिर ऐसे सामरिक जीत वाले रास्ते में बहुत समय लगाया जो मौजूद नहीं था। समय के दबाव में विरोधी हाथी अंदर आने दिया और दो प्यादे खोए।

मनोज ने सुझाव दिया कि अगले राउंड में बैठे, जब तक कार्यक्रम कुछ आसान न हो।

उसने पूछा कि उस दिन हारे नियमित खिलाड़ी को भी यही सुझाव दिया है क्या। मनोज ने कहा कि स्थितियाँ अलग हैं। ऐसा अंतर समझा नहीं पाया जिसका संबंध वास्तविक बोर्ड से हो।

तीसरी साथी सहाना ने दोनों बाजियों की शीट सामने रखीं।

“दोनों की समीक्षा करो। फिर चुनो।”

उन्होंने की। देविका की मुख्य गलती आकर्षक हमले का विचार छोड़ने से इनकार थी। नियमित खिलाड़ी की गलती परिचित उद्घाटन को प्रतिद्वंद्वी का चाल क्रम जाँचे बिना खेलना था। दोनों को काम करना था।

देविका कई अभ्यास सत्रों में चयन परीक्षण के लिए तैयार हुई। स्थायी बीमा बनने को तैयार नहीं हुई जिसे तभी बुलाया जाए जब किसी अधिक महत्वपूर्ण व्यक्ति का दूसरा कार्यक्रम हो।

मनोज ने साधारण रोटेशन और चयन प्रक्रिया लिखी। उपलब्धता, हाल का खेल और फैसले का कारण सभी देख सकते थे। कोई महान घोषणा नहीं थी। वह पन्ना था जिसका पालन असुविधाजनक होने पर भी करना पड़ता।

अगले बाहर के मुकाबले से पहले ही असुविधाजनक फैसला आ गया। अब उसे तय करना था कि लिखा नियम केवल देविका को शांत करने के लिए था या टीम के व्यवहार को बदलने के लिए।

4. सुबह की ट्रेन में एक सीट

नियमित खिलाड़ी ने खेलने को कहा क्योंकि माता-पिता देखने आने वाले थे। देविका के हाल के अभ्यास परिणाम बेहतर थे। उसकी उपलब्धता भी पहले तय हुई थी।

मनोज लगभग माता-पिता की यात्रा को टीम बदलने का कारण मान बैठा। फिर याद आया कि देविका ने अपनी जगह शिक्षक की व्यवस्था की थी और सुबह की ऐसी ट्रेन का टिकट लिया था जिसे आसानी से बदल नहीं सकती थी।

वही खेली। काले मोहरों से कठिन बाजी बराबर की। विरोधी का खतरनाक ऊँट बदला और वह प्यादा नहीं लिया जिससे अपने राजा का रास्ता खुलता। बोर्ड पर साधारण दिखने वाला परिणाम टीम के लिए महत्वपूर्ण था।

लौटते समय उसने और सहाना ने पहले स्मृति से स्थिति देखी, फिर स्कोरशीट से मिलाई। मनोज सुन रहा था। उसने मजबूर करने वाला क्रम सुझाया तो देविका ने छूटा बचाव दिखाया।

उसने यह कहने के बजाय मोहरे फिर लगाए कि बाद में देखेंगे। क्रम काम नहीं करता था।

अगले हफ्तों में तैयारी का दिखावा कम हुआ। बढ़त का दावा करने से पहले हर खिलाड़ी को विरोधी का सर्वश्रेष्ठ उत्तर देना होता। हारे अंतखेल उस बिंदु से दोहराए जाते जहाँ बचाव संभव था। मनोज घोड़े के साथ अतिरिक्त प्यादा जीत में बदलने का अभ्यास करता। देविका सक्रिय हाथी बचाव और समय के इस्तेमाल पर काम करती।

एक सत्र के बाद उसने पदकों के बारे में पूछा। मनोज ने कहा कि अभियान में खेलने वाले हर पंजीकृत खिलाड़ी के लिए ऑर्डर होगा।

इस बार टीम कुछ जीतती, उससे पहले ऑर्डर दिया। वादा परिणाम के बाद दी जाने वाली मेहरबानी नहीं रहा।

5. वह जगह जो उधार नहीं थी

सेमीफाइनल तक देविका नियमित जगह कमा चुकी थी। साक्षात्कार में मनोज ने एक बार फिर उसे रिजर्व कहा। बाद में उसने निजी तौर पर, शब्द को नरम किए बिना सुधारा।

“पिछले तीन मैचों में शुरू से खेली हूँ।”

उसने पत्रकार से विवरण ठीक करने को कहा।

सेमीफाइनल करीबी था। सहाना जल्दी जीती। दूसरा साथी हारा। मनोज बराबर रहा। सीधे आगे जाएँगे या बराबरी की प्रक्रिया आएगी, यह देविका की बाजी पर था।

उसके पास छोटी स्थितिगत बढ़त थी, जबरन जीत नहीं। सबसे खराब मोहरे की जगह सुधारी। विरोधी हाथी को निष्क्रिय रखा। उस प्यादा अंतखेल में बदलने का लालच छोड़ा जिसे पूरी तरह नहीं गिना था।

विरोधी ने कई चाल अच्छा बचाव किया। आखिर राजा मुक्त करने के लिए प्यादा धकेला और ऐसा लक्ष्य बनाया जिस पर उसका हाथी पीछे से हमला कर सकता था। देविका ने प्यादा लिया, हाथी सक्रिय रखा और बिना जल्दबाजी जीत पूरी की।

टीम ढाई-डेढ़ से आगे गई।

दूसरा सेमीफाइनल विक्रांत का क्लब जीता। गलियारे में उसने मनोज से कहा कि सरल काम मिलने पर देविका हमेशा उपयोगी रही है।

मनोज ने अपनी अच्छी कप्तानी का भाषण नहीं दिया। पूछा कि उसके सेमीफाइनल अंतखेल का कौन-सा हिस्सा सरल लगा। विक्रांत ने कहा कि देखा नहीं।

“तो बताने से पहले देख लो,” मनोज ने कहा।

देविका विश्लेषण कमरे में विरोधी का बेहतर बचाव खोज रही थी। उसने बातचीत नहीं सुनी। बाद में सहाना ने बताई। उस रात वह अपनी जीत के साथ वह चाल भी लिखकर ले गई जिसे सामने वाला खेलता तो काम कठिन होता।

6. फाइनल उसकी सुविधा से नहीं बना था

दोनों टीमों ने एक-दूसरे की सूची देखने से पहले बोर्ड क्रम जमा किया। मनोज पहले बोर्ड पर था। देविका चौथे पर अनिल से खेली, जिसकी हाथी अंतखेल की समझ उसकी उद्घाटन प्रतिष्ठा से बेहतर थी।

वह सीधे विक्रांत के सामने नहीं बैठी। टीम प्रतियोगिता सुविधाजनक निजी बदले के लिए नहीं बनी थी।

अनिल ने सावधानी से विकास किया। संरचना सुधरती तभी बदला। देविका ने जल्दी बराबरी की पेशकश की तो उसने मना किया, क्योंकि दबाव बनाने का वास्तविक मौका था। उसने इनकार का सम्मान किया और खेलती रही।

प्यादा बचाने के लिए हाथी बहुत निष्क्रिय रखने से उसकी स्थिति बिगड़ी। अनिल को खुली लाइन मिली, कमजोरी बनवाई और प्यादा जीता।

अगली मेज पर सहाना का हमला सफल हुआ। दूसरे बोर्ड पर साथी हारा। एक-एक अंक।

मनोज घोड़े वाले अंतखेल में अतिरिक्त प्यादा लेकर पहुँचा था। विरोधी घोड़ा सक्रिय था। अपने राजा को आगे बढ़ते प्यादे की मदद के लिए सही जगह लाना बाकी था। बढ़त थी, परिणाम नहीं।

देविका इच्छा करके उसकी मदद नहीं कर सकती थी। वह हर चाल देखते हुए अपनी घड़ी भूलकर उसकी मदद नहीं कर सकता था।

उसने वह कमजोर प्यादा छोड़ने का फैसला किया जिसे बचाने में पूरी सक्रियता चली जाती। बदले में हाथी दुश्मन राजा के किनारे पहुँचा, जहाँ शहें राजा को आगे बढ़ते प्यादे से दूर कर सकती थीं। बचाव बेहतर होने से पहले सामग्री की कमी और बड़ी दिखाई दी।

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7. वह आधा अंक जिसे बचाना पड़ा

अनिल ने किनारे की शहों से राजा छिपाने की कोशिश की। देविका ने शह की दूरी बदली, हाथी सक्रिय रखा और महत्व खो चुके प्यादे के लिए उसे फिर निष्क्रिय नहीं किया।

कुछ क्षण ऐसे थे जब लापरवाह शह से राजा समय के साथ पास आ जाता। वह चलने से पहले राजा का अगला खाना जाँचती। अभ्यास में उसी तरह के हारे अंतखेल अब स्पष्ट चेतावनी बनकर लौटे।

शह इसलिए मत दो कि देना सुरक्षित महसूस होता है। इसलिए दो कि राजा की अगली चाल का उत्तर बचा है।

अनिल ने अलग रास्ता लिया। उसने हाथी बदला और फिर गणना कराई। अनिल ने प्यादों की एक जोड़ी बदली, उम्मीद थी कि सरल स्थिति में बचाव कम होंगे। देविका ने देखा कि उससे राजा का आश्रय भी कम हुआ है।

लगभग एक घंटे बाद ऐसी स्थिति आई जिसमें दोनों बोर्ड की अनुमति वाले परिणाम को छोड़े बिना आगे नहीं बढ़ सकते थे। अनिल ने बराबरी प्रस्तावित की। देविका ने फिर जाँचा और स्वीकार किया।

टीम मैच डेढ़-डेढ़।

विक्रांत ने परिणाम कार्ड देखा। देविका को फोटो और कागजी कप याद आए, लेकिन स्मृति अगला काम नहीं बताती थी। नियम बताते थे: हस्ताक्षर, खेल क्षेत्र से बाहर जाना और साथी की बाजी खत्म होने तक चुप रहना।

उसने वही किया।

मनोज ने आधा अंक देखा और अपने बोर्ड पर झुक गया। जिस कप्तान ने कभी उससे केवल समस्या न बनाने को कहा था, अब उसे वह काम पूरा करना था जिसे उसने जीवित रखा था। वह बोर्ड से हट गई, पर उसके आधे अंक का वजन कमरे में बना रहा।

8. मनोज का घोड़ा

मनोज का अतिरिक्त प्यादा दुश्मन राजा से दूसरी तरफ था। तुरंत आगे बढ़ाता तो विरोधी घोड़ा उसे रोकते हुए बाकी प्यादों पर हमला करता। अभ्यास में ऐसा अंतखेल हार चुका था क्योंकि समझा था कि दूर का पास्ड प्यादा अपने आप काम कर लेता है।

इस बार पहले राजा सुधारा।

राकेश ने सटीक शहें और प्यादों की जड़ पर खतरे दिए। मनोज को घोड़ा बचाव के लिए पास रखना था, साथ ही मजबूत केंद्रीय खाने तक पहुँचने का रास्ता खोजना था।

पीछे हटती दिखने वाली घोड़े की चाल पर छह मिनट लगाए। वह कमजोर प्यादा ढकती थी और आगे बढ़ने का दूसरा मार्ग तैयार करती थी। राकेश उसे बस दौड़ा नहीं सकता था, क्योंकि तब मनोज के राजा को केंद्र मिलता।

स्थिति धीरे बदली। मनोज का राजा सक्रिय हुआ। दूर का पास्ड प्यादा विरोधी घोड़े को काम में बाँधने लगा। तभी उसने दूसरे लक्ष्य पर दबाव बनाया।

राकेश ने घोड़े बदलने का प्रस्ताव दिया। मनोज ने प्यादा अंतखेल ध्यान से गिना। दुश्मन राजा समय पर जरूरी खाने तक पहुँचता। उस रूप में अतिरिक्त प्यादा पर्याप्त नहीं था। उसने मना कर दिया।

सीमा के पीछे देविका ने फैसला देखा और चेहरा स्थिर रखा। खेल के दौरान चाल की मंजूरी या दिशा देने का अधिकार नहीं था।

मनोज ने दूसरा घोड़ा मार्ग खोजा, जो रुकावट हटाए बिना प्यादे पर हमला करता था। पहली बार राकेश को स्थायी रियायत देनी पड़ी। यह तेज जीत का क्षण नहीं था। यह वह क्षण था जब सही तैयारी ने अगला सही सवाल पैदा किया।

9. ढाई अंक

राकेश ने राजा को निर्णायक प्रवेश देने के बजाय प्यादा छोड़ना चुना। उपलब्ध सबसे जिद्दी बचाव था। मनोज ने लिया और बढ़त बड़ी दिखते ही जल्दी खत्म करने की इच्छा रोकी।

दो अतिरिक्त प्यादे भी लापरवाह फोर्क या गलत अंतखेल की अदला-बदली से बर्बाद हो सकते थे।

उसने घोड़ा सुरक्षित रखा। राजा पास्ड प्यादे की मदद में लाया। दूसरे प्यादे से विरोधी राजा को दूर खींचा। राकेश का घोड़ा एक रास्ता रोक सकता था, दोनों को अनिश्चित समय तक नहीं।

आखिरी अदला-बदली मनोज की शर्त पर हुई। प्रस्ताव देने से पहले उसने परिणामी प्यादा अंतखेल गिन लिया था। राकेश मना करता तो एक और प्यादा गिरता। उसने अंतखेल चुना और नया मोहरा बनने का मार्ग साफ होने तक खेला। फिर हार मान ली।

मनोज ने घड़ी रोककर हस्ताक्षर किए। ढाई-डेढ़। टीम फाइनल जीती।

वह खड़ा होकर पहले देविका की तरफ देखने लगा। उसने अभी स्कोरशीट के साथ बैठे राकेश की तरफ इशारा किया। मनोज लौटकर सही तरह हाथ मिलाया, फिर मेज छोड़ी।

खेल क्षेत्र से बाहर ही टीम इकट्ठी हुई।

सहाना की जीत, देविका की बराबरी और मनोज की जीत परिणाम में साथ थीं। चौथे साथी की हार भी थी। किसी ने उसे विवरण से मिटाया नहीं। वे चार लोगों की टीम के रूप में जीते थे जिन्होंने बैठने का जोखिम लिया था। ऐसा नहीं था कि तीन विजेता सुविधाजनक तस्वीर के लिए किसी और का योगदान उधार ले रहे हों।

10. तस्वीर में जगह

पदक के डिब्बे में अभियान में खेलने वाले हर सदस्य के लिए पदक था। वह साथी भी शामिल था जिसने देविका की बेहतर फॉर्म के कारण अपनी शुरुआती जगह छोड़ी थी।

मनोज ने फोटो लगाने से पहले पदक बाँटे। देविका से वादा पूरा होने पर कृतज्ञता नहीं माँगी।

विक्रांत बधाई देकर बोला कि रिजर्व की गहराई ने सत्र तय किया।

“उसका नाम देविका है,” मनोज ने कहा। “पिछले पाँच में चार मैच शुरू किए।”

देविका ने सुधारा। “पिछले छह में पाँच।”

उसने सिर हिलाकर सही संख्या दोहराई। गलती सहज बनाने के लिए वह मुस्कराई नहीं।

फोटोग्राफर ने कप्तान बीच में माँगा तो मनोज अपने आप बढ़ा। फिर सहाना ने बोर्ड क्रम में खड़े होने और बाकी पंजीकृत खिलाड़ियों को पास रखने का सुझाव दिया। सभी आ गए। तस्वीर एक मिनट से कम में हो गई।

देविका ने भतीजी को भेजी। कैमरे की भीड़ का कोई बहाना नहीं था।

लौटते समय अगले सत्र की बात हुई। मनोज ने चयन समूह में निश्चित भूमिका और अभ्यास समय तय करने में बराबर राय दी। उसने जिम्मेदारी स्वीकार की, अपना बोर्ड कमाने से स्थायी छूट नहीं।

अगली टीम सूचना का मसौदा मनोज के फोन पर आया। देविका का नाम अतिरिक्त सहयोग के नीचे था। उसने देखा, फिर फोन उसे दिया।

उसने बाकी चयन समूह वाला खिलाड़ी शीर्षक चिन्हित किया। सामने ही मनोज ने संशोधन भेजा। स्टेशन पहुँचने से पहले पक्की सूचना आ गई।

देविका ने वही संस्करण भांजी को भेजा। पदक उसका हो चुका था। अब अगला लिखित निमंत्रण भी उसे खिलाड़ियों में रखता था। कोई इस बार गलती को भीड़ वाली तस्वीर या निर्दोष छोटा रास्ता नहीं कह सकता था।

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