1. RajSpin कथा: मुझे पता था वीडियो कहां काटना है
पहला वीडियो चौदह सेकंड का था। राकेश ने घोषणा की, अधिकारी को अवैध सेट मिला और मेरे पीछे किसी की हंसी आई। मैंने हंसी रखी।
वह हिस्सा काट दिया जिसमें राकेश ने बिना बहस दंड स्वीकार किया। बाद वाली बाजी भी काट दी जिसमें सही हाथ बनाकर जीता था। नीचे लिखा: हिम्मत के बिना कैलकुलेटर।
मैं विकास, चौंतीस साल का स्थानीय रमी खिलाड़ी था। कमरे का ध्यान खींचना आता था। राकेश तैंतीस का था और कभी मेरा सबसे करीबी अभ्यास साथी था। धीरे बोलता, सावधान नोट लिखता और मेरी आत्मविश्वास भरी व्याख्याओं में गलतियां खोज लेता। वीडियो ने बहस जीतने का आसान रास्ता दिया।
क्लब में उसके आते ही लोग वही वाक्य दोहराते। एक आदमी ने दोस्त की मदद से तेरह उंगलियां उठाकर पूछा कि गिनने में मदद चाहिए क्या। उसे घर ले जाने बाहर खड़े पिता ने मजाक समझने लायक सुन लिया।
राकेश चिल्लाया नहीं। उसने पूरा क्रम पोस्ट करने को कहा।
“सबने देखा क्या हुआ,” मैंने कहा।
उसने फोन देखा। “उन्होंने वही देखा जो तुमने रखा।”
वह वाक्य याद है, क्योंकि तीन महीने बाद मुझे दूसरे वीडियो में तय करना पड़ा कि क्या रखना है। वह अंतिम बाजी शुरू होने से पहले चलता था और हार वाले स्कोर पर मेरे हस्ताक्षर तक जाता था।
काटने की कोई सुविधाजनक जगह नहीं थी। इस बार स्क्रीन पर राकेश की गलती के बजाय मेरा फैसला दिखाई दे रहा था।
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2. वह उसी कमरे में लौटता है
मुझे उम्मीद थी राकेश आना छोड़ देगा। तब मजाक और चलता। लेकिन अगली अभ्यास शाम वह अवैध हाथ कॉपी में लिखकर आया। गलती असली थी। दो गड्डियों वाले खेल में उसने सेट गिनते समय सूट सावधानी से नहीं जांचे थे। न इनकार किया, न अधिकारी को दोष दिया।
समस्या वाले पत्ते मेज पर रखे और अनुभवी वयस्क खिलाड़ी से विकल्प जांचने को कहा। अगले घंटे ऐसे घोषणा हाथों का अभ्यास हुआ जो एक नजर में पूरे लगते, मगर ठीक जांचने पर टूट जाते। गलत व्यवस्था में समान रैंक। जहां शुद्ध क्रम चाहिए वहां जोकर पर निर्भरता। एक पत्ता मन में दो समूहों में इस्तेमाल होना।
मैं बगल की मेज से देख रहा था। गंभीर खिलाड़ी समझे जाने वाले आदमी के लिए अभ्यास बहुत शुरुआती लगा। फिर देखा कि शामिल होने वाले दूसरे लोग कितनी बार चूक रहे थे।
राकेश हर गलती लिखता, उसे खिलाड़ी के नाम से पाठ का शीर्षक नहीं बनाता। खराब फैसला और फैसला करने वाला आदमी अलग रखता था। मुझे चिढ़ होती थी, क्योंकि मजाक की सामग्री कम बचती थी।
अंत में किसी ने मेरा लिखा वाक्य दोहराया। राकेश ने पत्ते समेटे और कहा कि गुरुवार को इसी समय। उसने अपमान का जवाब नहीं दिया। उसके आगे की मुलाकात तय कर दी।
मैंने खुद से कहा कि वह पीछे हट रहा है। यह पूछने से आसान था कि मैं पूरा घंटा देखने क्यों रुका। वह चला गया तो खाली मेज पर लिखे गलत हाथ को मैं कुछ देर और देखता रहा।
3. बारह हफ्ते चौदह सेकंड में नहीं समाते
मैंने उसकी तैयारी इतनी देखी थी कि जानता था बदलाव अचानक नहीं हुआ। बारह हफ्ते मुख्य सत्र से पहले अभ्यास किया। कभी लगातार हारा। हाथ लिखता, संभावित ड्रॉ का क्रम बदलता और अगला पत्ता जाने बिना फैसला फिर खेलता।
उसने लचीले समूह पढ़े। लंबा प्राकृतिक क्रम कभी छोटा या लंबा करके दूसरी जगह उपयोगी पत्ता दे सकता था। जोकर सेट मजबूत करता, लेकिन जल्दी बांध देने से बेहतर व्यवस्था छिप भी सकती थी।
रुकने का अभ्यास भी किया। घोषणा से पहले फेंकने वाला अलग, तेरह की गिनती, शुद्ध क्रम की जांच, फिर हर बचा समूह। कुछ सेकंड लगते। वही गलती रुकती जिसे मैंने उसकी सार्वजनिक पहचान बना दिया था।
एक शाम उसने आकर्षक खुला पत्ता छोड़ा। मैं हंसा, क्योंकि उससे सेट पूरा लगता था। बाजी के बाद उसने दिखाया कि लेने से क्या टूटता। मैंने दूसरा समूह बनाया। उसमें एक पत्ता दो बार इस्तेमाल हुआ। वह तब तक रुका जब तक मैंने खुद देख लिया।
वह मेरा चेहरा रिकॉर्ड करने को किसी से कह सकता था। उसने नहीं कहा। पूछा कि अगली अभ्यास स्थिति में विरोधी की जगह खेलना चाहूंगा या नहीं। मना करना ज्यादा खराब दिखता, इसलिए बैठ गया।
दो बार मैं जीता, एक बार वह। उसने तीनों नतीजे एक ही आकार में लिखे। मुझे फिर भी लगा कि उसकी कमजोरी समझता हूं। कॉपी बंद होते समय मैंने केवल अपनी दो जीत देखीं। उसने जिन फैसलों पर निशान लगाए थे, उन पर नजर नहीं डाली।
4. आत्मविश्वास का मेरा रूप
मेरा खेल इतना मजबूत था कि सिर्फ मेरे व्यवहार को सुधार देने से प्रतिद्वंद्विता खत्म नहीं हो सकती थी। खुले पत्तों को पढ़ता, बड़े पत्तों का जोखिम संभालता और धीमे खिलाड़ियों की योजना तय होने से पहले कई हाथ पूरे कर लेता।
शहर की प्रतियोगिता में महत्वपूर्ण बाजियां इस पहचान से जीतीं कि लगभग तैयार सेट से प्राकृतिक क्रम ज्यादा उपयोगी था। राकेश उसी चार खिलाड़ियों वाले फाइनल में पहुंचा। आठ बाजियां थीं। सबसे कम कुल दंड अंक वाला विजेता बनता। पूजा और वरुण भी साथ थे। दोनों वयस्क पहले हमें हरा चुके थे।
फाइनल से पहले दर्शक ने पूछा नया वीडियो तैयार है या नहीं।
“देखते हैं कैलकुलेटर क्या करता है,” मैंने कहा।
राकेश ने सुना। वह अधिकारी से पंजीकरण संख्या मिला रहा था, मुड़ा नहीं। पूजा मुड़ी।
“पहले खेलो।”
मैं ऐसे मुसकराया जैसे मजाक हम दोनों का हो। वह दूसरी तरफ देख चुकी थी। पहली बाजी वरुण ने जीती। मेरा नुकसान छोटा रहा, राकेश को ज्यादा अंक लगे। दूसरी मैं अच्छे समूह परिवर्तन से जीता और आगे आ गया।
वह अनुभूति साफ याद है। कमरा, पत्ते और पुराना मजाक जैसे सहमत थे कि किसका महत्व होना चाहिए। राकेश अगला हाथ जमा रहा था। मैं दर्शक को पिछली जीत समझा रहा था, जबकि उसने पूछा भी नहीं था। अधिकारी ने अगली बाजी के लिए तैयार होने को कहा तो मैंने फोन किनारे रखा और पत्ते उठाए।
5. वह हिस्सा जो मुझे दिखा नहीं
चौथी बाजी तक मैं दो बार जीत चुका था। राकेश एक बार। पूजा की सावधानी ने कुल अंक इतने करीब रखे कि कोई ढीला नहीं पड़ सकता था। मैंने राकेश के धीमे पत्ते फेंकने को अपने डर का प्रमाण मानना शुरू कर दिया।
दूसरे कारण हो सकते थे। दो वैध रास्तों की तुलना कर रहा हो। खुला पत्ता अपनी संरचना में इतना सुधार करता है कि लिया जाए या नहीं, जांच रहा हो। उपलब्ध समय इस्तेमाल कर रहा हो। मुझे वही कारण पसंद आया जो मुझे बड़ा बनाता था।
पांचवीं बाजी में उसने वह पत्ता फेंका जिसे मैं रखने की उम्मीद कर रहा था। मैंने मान लिया उसका हाथ टूट गया। दो बारी बाद उसने ऐसी व्यवस्था में घोषणा की जो मेरी कल्पना से अलग थी। अधिकारी ने जांचा। वैध।
मेरे अंक जुड़ते समय उसने मेरी ओर नहीं देखा। मुसकराता तो उससे कम परेशान होता। मुसकराहट के लिए कई जवाब तैयार थे। उसकी चुप्पी के लिए नहीं।
विराम में उसने पूजा और अधिकारी के साथ स्कोर देखा। लिखे अंक पर एक तथ्यात्मक सवाल पूछा, जवाब लिया और बैठ गया। मैंने खुद से कहा कि वह जोड़ में जरूरत से ज्यादा लगा रहता है।
फिर मैंने तालिका दो बार मन में और एक बार कागज पर जोड़ी। आंकड़ों को मेरी टिप्पणी से ज्यादा ध्यान चाहिए होने लगा था। अगली बाजी से पहले मैंने राकेश की तरफ देखा। वह पानी पीकर अपने हाथ पोंछ रहा था। मेरी ओर देखने की उसे कोई जल्दी नहीं थी।
6. अंतिम बाजी से पहले तीन अंक
सात बाजियों के बाद मेरे छियासठ अंक थे। राकेश के उनहत्तर। वरुण के बानवे और पूजा के एक सौ दस। राकेश से तीन अंक का अंतर था। दूसरों की जीत से लगने वाले दंड भी नतीजा बदल सकते थे। आखिरी बाजी सबके लिए महत्वपूर्ण थी।
हाथ जल्दी देखा। अच्छा शुद्ध क्रम था। दूसरे रास्ते पर काम चाहिए था, लेकिन उपयोगी जोड़ थे। घबराने की जरूरत नहीं थी। राकेश ने पत्ते तीन समूहों में रखे, फिर एक बदला। चेहरे नहीं दिखे, सिर्फ हरकत दिखी। मैंने इसे अनिश्चय समझा।
यही गलती बाकी फैसलों पर छा गई। पत्ता चुनते समय थोड़ा यह सोचने लगा कि उससे राकेश असहज होगा या नहीं। अपनी वास्तविक योजना को कम नुकसान देने वाला पत्ता पूछने के बजाय निजी मुकाबला बना लिया। हर फेंक साबित करता कि मैं उसे पढ़ सकता हूं।
वरुण ने मेरा एक खुला पत्ता लिया। पूजा ने दूसरा छोड़ा। खेल मेरी व्याख्या से स्वतंत्र चलता रहा। अंत से कुछ बारी पहले राकेश ने चिड़ी का सात फेंका। तथ्य याद रखा और उससे बड़ा निष्कर्ष बनाया कि पास के चिड़ी शायद उसके लिए महत्वपूर्ण नहीं।
मुझे पूरा हाथ नहीं दिखा था। एक समय का एक फैसला देखा था। पुराने वीडियो ने टुकड़े से कहानी बनाना सिखाया था। मेज पर मैं फिर वही कर रहा था। राकेश अगले पत्ते को अपने हाथ में लगा रहा था और मैं पुरानी एक हरकत को उसके हर नए विकल्प पर थोप रहा था।
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7. आठ जिसे मैंने हानिरहित समझा
अगले उपयोगी ड्रॉ ने मेरे हाथ का दूसरा हिस्सा सुधारा। पत्ता फेंकना था। चिड़ी का आठ उपलब्ध था। एक छोटा पत्ता भी था जिसका अपने समूहों से ज्यादा संबंध नहीं था।
राकेश का पहले वाला चिड़ी का सात याद आया। मैंने आठ को पर्याप्त सुरक्षित मान लिया। दोनों पत्तों की सावधानी से तुलना करने के कारण थे। मैंने बराबर समय नहीं दिया। चाहता था कि जल्दी किया चुनाव सहज लगे।
आठ खुले ढेर पर गया। राकेश ने ले लिया। उसने न नाटकीय विराम दिया, न मेरे फोन की ओर देखा। पत्ता लगाया, दूसरा अलग किया और वही जांच शुरू की जो बारह हफ्ते देखी थी।
मुझे तुरंत कुछ बोलने की जरूरत लगी। मजाक चुप्पी को फिर ऐसी चीज बना सकता था जो मेरे नियंत्रण में हो। कुछ उपयोगी नहीं आया। राकेश ने ईंट का दो फेंका और घोषणा की।
तभी उसका हाथ दिखा। पहले फेंके सात ने चिड़ी खाली होने का संकेत नहीं दिया था। उस समय बचाए रास्ते में वह जरूरी नहीं था। उसने पूरा प्राकृतिक ढांचा, उपयोगी जोकर और छोटे क्रम को बढ़ाने के दो रास्ते रखे थे। मेरे आठ ने उनमें से एक दिया।
अधिकारी ने जांच तक पत्ते न छूने को कहा। मैंने अपने हाथ को देखा और बचने वाले अंक गिनने लगा। कई बारियों के बाद यह पहली सही कहानी थी जो मैंने खुद को बताई। सामने राकेश समूहों के बीच बराबर जगह छोड़ चुका था। अब कोई कैमरा कोण बदलने से उन पत्तों की संख्या नहीं बदलती।
8. पांच, चार और चार
राकेश ने दिल के पांच पत्ते लगाए। तीन, चार, पांच, छह, सात। शुद्ध क्रम। फिर चिड़ी के चार: आठ, नौ, दस, गुलाम। दूसरा शुद्ध क्रम, मेरे फेंके पत्ते से बढ़ा हुआ।
अंतिम समूह में अलग सूट के तीन प्राकृतिक बादशाह और सेट पूरा करता छपा जोकर था। चार पत्ते। पांच, चार और चार। फेंकने के बाद तेरह। हर पत्ता एक ही बार। अधिकारी ने स्वीकार किया।
पहले उसके पास पांच दिल और चार पत्तों के बादशाह सेट के साथ चिड़ी के नौ, दस, गुलाम थे। अलग ईंट का दो अंतिम व्यवस्था में नहीं आता था। चिड़ी का आठ या रानी क्रम बढ़ाकर दो को बाहर भेज सकती थी। उसने दोनों रास्ते बचाए थे।
मैंने कम उपयोगी पास वाला पत्ता फेंकने को उपयोगी क्रम न होने का संकेत मान लिया था। मेरे बचे दंड चौबीस थे। कुल छियासठ से नब्बे हुआ। राकेश उनहत्तर पर रहा। वरुण और पूजा पहले ही उससे ऊपर थे। इस हार से उनके अंक कम नहीं होने थे।
चैंपियनशिप का नतीजा साफ था। राकेश ने हस्ताक्षर से पहले लिखे अंक जांचे। पिता दर्शकों के पीछे वही हेलमेट पकड़े थे जो मजाक वाली शाम हाथ में था।
इस बार कमरा उसके नाम लिखने का इंतजार कर रहा था। किसी ने नहीं पूछा गिनने में मदद चाहिए या नहीं। मैंने अपनी पर्ची पर चौबीस देखे और कलम ली। जिस हाथ से आठ फेंका था, उसी से हार मान्य की।
9. कैमरा चलता रहता है
किसी ने अंतिम बाजी ऐसी जगह से रिकॉर्ड की थी जहां खुला ढेर, हमारे चेहरे और अधिकारी की जांच दिखती थी। बाद में उसने फाइल मुझे दी। लगा कि मुझे पता होगा इसका क्या करना है। पता था।
मैंने अपना आठ फेंकना देखा। दोष देने के लिए खराब कोण नहीं था। फिर राकेश का समूह जांचना और अधिकारी का मेरे चौबीस अंक लिखना देखा। वीडियो चल रहा था तभी राकेश पास आया।
“पूरा नतीजा पोस्ट करोगे?”
पहले वीडियो की तरह सीधा पूछा। मैं जोर से बधाई देकर सवाल टाल सकता था। पहले ऐसा करता आया था। इस बार संदेश खोला और पूरी क्लिप लगाई। नीचे अंतिम अंक और जीता हुआ समूह लिखा। साथ लिखा कि पुराने वीडियो में बाकी मैच और बाद का उसका सही खेल छोड़ दिया था।
उसी क्लब समूह में डालने से पहले उसे दिखाया।
“पहली घोषणा अवैध थी,” मैंने कहा।
“हां। मैंने अपनी गलती सुधारी। तुम अपनी सुधार सकते हो।”
मैंने पोस्ट कर दिया। परिचित हंसी वाले जवाब नहीं आए। पूजा ने आधिकारिक नतीजे की तस्वीर जोड़ी। वरुण ने राकेश को बधाई दी। उसके पिता ने किसी से पूरा वीडियो भेजने को कहा, परिवार को दिखाना था।
मैं अपलोड पूरा होते देखता रहा। संपादन का बटन नहीं छुआ। राकेश ने फोन अपनी जेब में रखा और पिता की ओर चला गया। पिता ने हेलमेट बाएं हाथ में किया ताकि दाएं से उसका कंधा पकड़ सके। मैं स्क्रीन बंद करके कुछ देर वहीं खड़ा रहा।
10. ज्यादा लंबा खेल
अगली अभ्यास शाम राकेश नई स्थिति लेकर आया। चैंपियनशिप कप साथ नहीं था, कॉपी थी। मैंने खिड़की के पास मेज लेकर दो कुर्सियां आमने सामने रखी थीं। उसके आते ही पूछा कि खेलने से पहले आखिरी बाजी देख सकते हैं क्या। वह बैठ गया।
मेरा पत्ता फेंकने का फैसला दोबारा बनाया। उसने ऐसा नहीं कहा कि दिखाई देने वाली जानकारी से आठ का घातक होना साफ था। अनिश्चितता दिखाई, दूसरा पत्ता दिखाया और बताया कि पहले सात से निकला निष्कर्ष सबूत से आगे कैसे बढ़ा।
फिर वही फैसला अलग छिपे हाथ के सामने खेलने को कहा। इस बार आठ हानिरहित था। दूसरा पत्ता ज्यादा खराब। मैंने सिर उठाया।
“यही बात है। सोचना फिर भी पड़ेगा।”
हमने कई रूप खेले। मैंने सार्वजनिक जानकारी और अपनी कल्पना अलग लिखी। कागज पर फर्क सरल दिखा। खाली जगह अभिमान भरने लगता तो उतना आरामदायक नहीं रहता।
शाम के अंत में नए खिलाड़ी ने पूछा शहर का खिताब हममें से कौन जीता था। मैंने राकेश की ओर इशारा किया।
“यह। उनहत्तर अंक। मेरे नब्बे रहे।”
राकेश ने अगली बाजी के लिए पत्ते फेंटे। मैंने फोन बैग में रखा और पत्तों के लिए हाथ बढ़ाया। इस बार तेरह आए तो अपने गिने।
फिर शुद्ध क्रम देखा, अधूरे समूह अलग किए और सामने वाले की पहली चाल का इंतजार किया। कोई वाक्य पहले से तैयार नहीं था जिसे बाद में वीडियो के नीचे लिखना हो। सामने पूरा खेल था।
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