Rokda7: तीन उधार की मेजें और आखिरी बाजी
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Rokda7: तीन उधार की मेजें और आखिरी बाजी

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

Rokda7 की मौलिक रमी कथा: सगाई टूटने पर घर से निकला निखिल तीन जगह अभ्यास करके उसी आदमी से निर्णायक मुकाबला करता है जिसने उसे अपमानित किया।

1. Rokda7 कथा: आखिरी बाजी के तीन दरवाजे

करण की नजर निखिल के बैग से लटकती छोटी चाबी पर गई। वह मुसकराया।

“कोई ऐसी जगह मिल गई जो तुम्हें रख ले?”

शहर की रमी प्रतियोगिता का फाइनल आखिरी बाजी तक पहुंच चुका था। दोनों दो दो बाजियां जीत चुके थे। आयोजन के घोषित प्रारूप में अगली वैध जीत मैच का फैसला करती।

निखिल उनतीस साल का था। तीन महीने पहले उसकी सगाई करण की बहन से टूटी थी। उसी शाम करण उसे घर की सीढ़ियों से कपड़े बटोरते देखता रहा था। नीचे गिरते ही सूटकेस खुल गया था। दो कमीजें और अभ्यास के कागज माली के छोड़े पानी में फिसल गए थे।

करण के पिता ऊपर खड़े थे।

“छत दे दी तो तुमने भविष्य के सपने देखने शुरू कर दिए।”

अनिका अंदर रही थी। निखिल उसके बाहर आने का इंतजार करता रहा, जब तक चौकीदार ने उसे फाटक से हटने को नहीं कहा।

आज उसी लड़की का भाई ताश की गड्डी के उस पार बैठा था। निखिल ने बैग को बस पैरों से दूर किया। चाबी वाले सवाल का जवाब नहीं दिया। अधिकारी ने तेरह पत्ते बांटे।

उन्हें जमाने से पहले निखिल को तीन और दरवाजे याद आए। एक भीड़ भरे साझा कमरे का, दूसरा रात के चौकीदार की कोठरी का, तीसरा उधार मिले सामुदायिक भवन का।

हर दरवाजे ने उसे अलग तरह से सिखाया था कि सामने बैठा आदमी उसके हाथ के भीतर होने वाले फैसले क्यों नहीं करेगा। उसने पहला पत्ता उठाकर देखा और करण की मुसकराहट से आंखें हटा लीं।

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2. पहला दरवाजा: पेटी पर बची जगह

साझा कमरे का किराया हर हफ्ते देना पड़ता था। निखिल ने बिजली के छोटे उपकरण ठीक करके कमाए पैसे में से किराया चुकाया। फिर खाने और काम पर आने जाने के लिए बची रकम गिनी।

सगाई के दौरान वह अनिका के परिवार की संपत्ति पर बने कमरे में रहता था। उनके क्लब में मदद करता और शादी की तैयारी करता था। जिस शाम उसके होने वाले ससुर को रिश्ता बोझ लगा, उसी शाम रिश्ता और कमरा दोनों छिन गए।

पहली रात सामान सुरक्षित रखने की दूसरी जगह नहीं मिली। बैग बिस्तर पर रखा रहा और निखिल उसके सख्त कोनों से बचकर सोया। दो दिन बाद उसने भीगे अभ्यास पत्र एक लकड़ी की पेटी के नीचे दबाकर सीधे किए। उसी पेटी को मेज बना लिया।

सबसे पहले उसने अपनी एक पुरानी हारी बाजी दोबारा लगाई। लगभग तैयार दिख रहे सेट से मोह के कारण उसने बेहतर क्रम बनाने वाला पत्ता फेंक दिया था। कागजों में गलती साफ थी।

पहले सारे पत्ते खुले रखकर बाजी देखी। फिर उन्हें फेंटकर बिना अगला पत्ता जाने अभ्यास किया। दोनों अनुभवों का अंतर जरूरी था। भविष्य देखकर सफल होने वाली योजना प्रतियोगिता में इस्तेमाल नहीं हो सकती थी।

कमरे में रात को काफी शोर होता। बातचीत के बीच भी पत्ते जांचना सीखा, लेकिन थकान में लगातार वही गलती होने लगती तो अभ्यास बंद कर देता। वह अगली सुबह गलत फैसला फिर लिखकर उसका विकल्प खोजता। सिर्फ लंबी रात जागने से उसके खेल का कोई कमजोर हिस्सा अपने आप ठीक नहीं होने वाला था।

3. दूसरा दरवाजा: उधार मिला एक घंटा

कमरे के मालिक को लंबी अवधि की बुकिंग मिली तो निखिल को वहां से भी निकलना पड़ा। इस बार एक कार्यशाला के पीछे छोटी जगह मिली। रात का चौकीदार रफीक देर वाली मालगाड़ी आने से पहले उसे अपनी मेज एक घंटा इस्तेमाल करने देता था।

रफीक इतनी अच्छी रमी खेलता था कि लापरवाही की सजा दे सके। जहां कोई फैसला समझ न आता, पूछने में उसे संकोच भी नहीं होता था।

उन्होंने अभ्यास की शुरुआत खुले तौर पर उपलब्ध जानकारी से की। हर बाजी के बाद निखिल को बताना पड़ता कि रफीक ने खुले ढेर से कौन से पत्ते उठाए थे और उनके बारे में कौन सी बात अभी केवल अनुमान थी।

निखिल ने पाया कि अपमान के बाद उसे खुद को बहुत चतुर महसूस करने की जल्दी रहती थी। एक उठे पत्ते से वह सामने वाले का पूरा हाथ बना लेता। रफीक की घोषणा में अलग व्यवस्था निकलती तो अपनी गढ़ी हुई कहानी देखनी पड़ती।

दोनों ने समीक्षा में तथ्य और अनुमान अलग लिखने शुरू किए। खुले ढेर से लिया पत्ता तथ्य था। उसे लेने का कारण फिर भी अनुमान हो सकता था। एक ही दिखाई देने वाले कदम के पीछे दो अलग छिपी व्यवस्थाएं संभव थीं।

निखिल ने अपने हाथ को नुकसान न पहुंचने पर अपेक्षाकृत सुरक्षित पत्ता फेंकना सीखा। केवल एक संभावित खतरे के डर से अच्छी संरचना तोड़ना भी छोड़ा।

एक शाम रफीक ने सगाई के बारे में पूछा। निखिल ने इतना बताया कि उसके हमेशा बंधे बैग का कारण समझ आ जाए। रफीक ने सुना, फिर पत्ते बांट दिए।

“यहां फिर भी तेरह पूरे गिनने पड़ेंगे।”

निखिल बहुत दिनों बाद बिना दया महसूस किए किसी के सामने बैठा रह सका।

4. तीसरा दरवाजा: बुलावे की जरूरत नहीं

सामुदायिक भवन में पंजीकृत वयस्कों को हफ्ते में दो शाम अभ्यास की जगह मिलती थी। निखिल उन लोगों के बीच शामिल हुआ जिनका अनिका के परिवार से कोई संबंध नहीं था।

वह कई मैच हारा। कुछ जीता भी। किसी ने नतीजे को इस सवाल से नहीं जोड़ा कि उसे रहने की जगह मिलनी चाहिए या नहीं। वहां बैठकर वह अपना काम कर सका।

भावना नाम की खिलाड़ी ने दिखाया कि वह अक्सर आकर्षक सेट बचाने में जरूरी दूसरा क्रम अधूरा छोड़ देता था। निखिल ने बात तुरंत स्वीकार नहीं की। दोनों ने कई अलग संभावित पत्ते लगाकर हाथ परखा, तब अंतर उसकी आंखों के सामने खुला।

कुछ स्थितियों में सेट बचाना सही था। कुछ में वह बस पुरानी परिचित व्यवस्था थी।

इसके बाद निखिल हर घोषणा में प्रत्येक वास्तविक पत्ते को एक ही वैध समूह में गिनने लगा। पहले शुद्ध क्रम, फिर दूसरा क्रम, फिर शेष समूह। किसी पत्ते को एक जगह से हटाने के बाद दिमाग में उसे पुरानी जगह गिनते रहने की आदत पर विशेष काम किया।

इसी मेहनत ने उसे शुरुआती मुकाबले पार कराए। तब तक मजदूरी से कुछ पैसे जोड़कर उसने महीने के किराये पर छोटा कमरा ले लिया था। सादी पीतल की चाबी बैग से बांध दी। जेब में बार बार टटोलने की जरूरत कम हो गई।

पहली शाम वह अभ्यास का हाथ मेज पर खुला छोड़कर खाना खाने गया। लौटकर देखा तो हर पत्ता उसी जगह था जहां उसने रखा था। उसने कुर्सी खींची और अधूरी समीक्षा पूरी की।

5. अनिका भवन में आती है

एक अभ्यास शाम के बाद अनिका वहां पहुंची। बाकी खिलाड़ी पत्ते समेट रहे थे। वह दरवाजे के पास खड़ी रही।

“मुझे नहीं पता था कि वे तुम्हारा सामान बाहर डाल देंगे।”

“तुम्हें पता था कि मैं बाहर हूं?”

उसने नजर झुका ली।

“हां।”

इस छोटे जवाब ने किसी लंबी सफाई से कम चोट पहुंचाई। उस शाम की असली तस्वीर कम से कम बनी रही। अनिका ने कहा कि पिता बहुत गुस्से में थे, करण ने बात और बिगाड़ी और उसे समझ नहीं आया कि परिवार में अपनी जगह खोए बिना उनका विरोध कैसे करे।

निखिल ने सुना। उसके डर को झूठा बताना जरूरी नहीं था। उस डर की कीमत उसने किस तरह चुकाई, यह भी उसे याद था।

“आज क्यों आई हो?”

“देखना चाहती थी कि ठीक हो या नहीं।”

“कोशिश कर रहा हूं।”

उसने यह नहीं पूछा कि शहर का खिताब जीत लेने पर क्या वह लौट आएगी। कुछ देर दोनों चुप रहे। अनिका ने मेज पर खुले पत्तों को देखा, फिर कहा कि करण भी मुख्य प्रतियोगिता में पहुंच गया है।

“मुझे मालूम है। सूची में उसका नाम है।”

अगली शाम निखिल वही अभ्यास पत्र लेकर भवन आया। एक मुश्किल हाथ का हल निकालना बाकी था। पिछली बातचीत ने उसके पत्तों की समस्या नहीं सुलझाई थी।

सगाई टूटने के बाद पहली बार वह दुखी होते हुए भी शाम के लिए तय किया काम पूरा कर पाया। भावना ने अंतिम व्यवस्था जांची। निखिल ने गलत विकल्प पर निशान लगाया और अगली बाजी के लिए पत्ते फेंट दिए।

6. करण भी जीतकर फाइनल पहुंचता है

प्रतियोगिता ने तुरंत दोनों को आमने सामने नहीं बैठाया। पहले दोनों को दो दो मैच जीतने पड़े। करण का खेल निखिल की याद से बेहतर निकला। वह क्रम बनाने में अनुशासित था और नया प्राकृतिक पत्ता बेहतर रास्ता खोलता तो पुरानी व्यवस्था जल्दी बदल देता था।

निखिल का सेमीफाइनल बहुत करीबी रहा। निर्णायक बाजी में उसने ऐसा खुला पत्ता लेने से इनकार किया जो हाथ को देखने में साफ बनाता, लेकिन उसके संभावित सुधारों को सीमित कर देता। बाद में आए पत्ते ने लचीली व्यवस्था को लाभ दिया।

उसने समीक्षा में यह भी लिखा कि बाद वाला पत्ता मिलने की गारंटी नहीं थी। फैसले के पीछे की सोच अलग जांचनी थी। करण अंतिम घोषणा देख रहा था। अधिकारी की जांच पूरी होने से पहले ही वह मुड़ गया।

फाइनल की मेज पर पहला पत्ता बंटने से पहले उसने पुराना घरेलू रिश्ता वापस थोपने की कोशिश की।

“देखते हैं, उधार की मेजों ने क्या सिखाया।”

निखिल ने कुर्सी ठीक की। पहली बाजी करण की हुई। दूसरी निखिल ने सावधानी से समूह बदलकर जीती। तीसरी में उसने शुद्ध क्रम बचाते हुए दूसरा प्राकृतिक क्रम पूरा किया और बढ़त ले ली।

चौथी में करण ने जोरदार वापसी की। उसने खुले पत्तों की जानकारी सही इस्तेमाल की, सोचकर पत्ते फेंके और निखिल की अंतिम कमी पूरी होने से पहले घोषणा कर दी।

अब दो दो बाजियां थीं। तभी चाबी वाला सवाल आया और आखिरी तेरह पत्ते बांटे गए। निखिल ने उन्हें उठाया। करण की आवाज सुनाई दे रही थी, लेकिन पहली जांच उसके अपने क्रम की हुई।

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7. हाथ का मालिक खिलाड़ी है

अंतिम बाजी में निखिल के पास एक शुद्ध क्रम और कुछ अच्छे लेकिन अधूरे समूह थे। उसने पत्ते जमाए, फिर जानबूझकर व्यवस्था बिगाड़कर देखा कि दूसरी संरचना ज्यादा उपयोगी जोड़ देती है या नहीं।

करण ने जल्दी पत्ता उठाया। खुले ढेर से उसकी पहली पसंद किसी संभावित क्रम की ओर इशारा करती थी, पूरे हाथ का खुलासा नहीं। निखिल के पास उसके पास की रैंक वाला पत्ता था। उसने दूसरे संभावित फेंकने वाले पत्ते से तुलना की।

दोनों उसके वर्तमान हाथ में बेकार थे। उसने वह चुना जो सामने दिखाई दिए संभावित रास्ते में कम मदद करता। अपना फैसला लिखने को कहा जाता तो वह यही कारण देता, सामने वाले का पूरा हाथ पढ़ लेने का दावा नहीं करता।

अगले पत्ते ने उसके दूसरे हिस्से को मजबूत किया। संभावित सेट में रखा पत्ता अब एक क्रम बढ़ा सकता था। उसे सेट में रखने से हाथ आगे बढ़ता हुआ दिखता, लेकिन ज्यादा जरूरी जरूरत अधूरी रहती।

निखिल ने उसे दूसरी जगह रख दिया।

करण देख रहा था। “अभी तक नहीं समझे कि चीजें कहां रखनी हैं?”

उस वाक्य में निखिल को घर की सीढ़ियां सुनाई दीं। फिर रफीक की आवाज याद आई, जो तथ्य और अनुमान अलग करने को कहता था।

तथ्य यह था कि नए पत्ते ने बेहतर व्यवस्था बदल दी थी। बाकी सामने वाले की कोशिश थी कि बदलाव करने में उसे शर्म महसूस हो। उसने सही पत्ता फेंका और अगली बारी का इंतजार किया। आसपास दर्शकों की भीड़ थी। अपने हाथ की व्यवस्था पर उसका अधिकार साफ था।

8. पत्तों में खुला छोड़ा रास्ता

करण ने एक और खुला पत्ता लिया और जल्दी अपनी जगह रख दिया। वह घोषणा के काफी करीब था। निखिल खतरा महसूस कर सकता था, उसका ठीक आकार नहीं जानता था।

पहले वह हर ऐसा पत्ता रोक लेता जो शायद करण के काम आता। उससे अपना हाथ विरोधी की कल्पित जरूरतों से भर जाता। इस बार उसने अपने समूह फिर जांचे।

शुद्ध क्रम सुरक्षित था। दूसरा क्रम आगे बढ़ चुका था। एक सेट पूरा था और बाकी पत्तों में सुधार के कई रास्ते बचे थे। उसने उसी लचीलेपन को बचाया।

नए पत्ते से एक प्राकृतिक क्रम लंबा हुआ। पुरानी व्यवस्था का एक पत्ता अब अंतिम सेट में जा सकता था। निखिल ने विकल्प ध्यान से गिने। पहली आकर्षक बनावट में अभी एक पत्ता किसी वैध समूह का हिस्सा नहीं बन रहा था।

करण की अगली बारी पर घोषणा नहीं हुई। उसने रुककर एक पत्ते की जगह बदली और दूसरा फेंक दिया। निखिल ने देखा कि सामने वाला भी अंतिम सही जोड़ खोज रहा है। फिर उसका ध्यान अपने हाथ की बची कमी पर लौट आया।

उसने अगला पत्ता उठाया। दोनों बचे विकल्पों में बेहतर संरचना पूरी हो रही थी। पत्ता सही जगह रखा, फेंकने वाला अलग किया।

एक क्षण के लिए पूरा हाथ उतना साफ दिखा जितना पेटी पर खुले पत्ते रखकर किए अभ्यास में दिखता था। यहां हर अगला पत्ता अज्ञात रहा था। उसने एक बार फिर शुद्ध क्रम को देखा और उंगलियों से बाकी समूहों के बीच थोड़ी जगह बनाई।

9. आखिरी जांच

निखिल ने तुरंत घोषणा नहीं की। अंतिम समूहों में पत्ते गिने। शुद्ध क्रम में चार। दूसरे क्रम में तीन। बाकी दोनों सेटों में तीन तीन, आवश्यक रूप से अलग अलग सूट के पत्ते। फेंकने वाला पत्ता अलग करने के बाद कुल तेरह। प्रत्येक पत्ता एक ही जगह।

उसने घोषणा की।

अधिकारी की पहली जांच खत्म होने से पहले करण आगे झुक गया। पहले लंबा क्रम देखा, फिर बदला हुआ सेट। एक पत्ते के ऊपर उसकी उंगली ठहरी और वापस हट गई।

कोई गलती नहीं मिली। अधिकारी ने हाथ और मैच का नतीजा मान्य किया। तीन बाजियां निखिल की, दो करण की।

तालियां सुनाई दीं। निखिल परिणाम दर्ज होने तक बैठा रहा। उसने करण से हाथ मिलाया। सामने वाले की पकड़ सख्त थी। उसकी नजर निखिल के चेहरे से नीचे कहीं अटकी रही।

दर्शकों के पीछे अनिका अपने पिता के पास खड़ी थी। निखिल को उनके आने का पता नहीं था। उसके पिता ने कुछ देर बाद तालियां शुरू कीं। यही आदमी सीढ़ियों के ऊपर खड़ा होकर बोला था, जब निखिल के पैरों के आसपास भीगी कमीजें पड़ी थीं।

इस बार निखिल को जमीन से कुछ उठाने के लिए झुकना नहीं पड़ा। अधिकारी ने विजेता की पर्ची दी। वह खड़ा हुआ, बैग लिया और प्रस्तुति वाली जगह की ओर चल पड़ा।

चाबी जिप से हल्के से टकराई। साधारण सी आवाज थी। निखिल ने उसे सुना और चलते हुए बैग की पट्टी कंधे पर ठीक कर ली। पीछे अधिकारी अगले हस्ताक्षर के लिए करण को बुला रहा था।

10. चौथा दरवाजा

तस्वीरें होने के बाद अनिका के पिता पास आए।

“हमें ठीक से बात करनी चाहिए। भावनाओं में लोग कुछ भी कह देते हैं।”

निखिल ने कुछ पल उन्हें देखा।

“मेरे कपड़े सीढ़ियों पर थे। वह केवल कही गई बात नहीं थी।”

उन्होंने आसपास नजर घुमाई। पास खड़े लोग इतना चुप हो गए थे कि जवाब सुन सकें। करण पीछे उपविजेता का प्रमाणपत्र पकड़े था। उधार की मेजों पर अब कोई मजाक नहीं आया।

अनिका ने आगे बढ़कर बधाई दी। निखिल ने धन्यवाद कहा। उसने उस बैग को देखा जिसे वह उनके घर से उठाकर ले गया था। फिर उसे निकलने की जगह देने के लिए किनारे हो गई।

उसके पिता ने सबको घर चलने का सुझाव दिया। निखिल ने सिर हिलाया।

“मेरे पास जाने की जगह है।”

वह पहले सामुदायिक भवन गया। भावना अंतिम हाथ देखना चाहती थी। कार्यशाला में रफीक ने पूछा कि तेरह ठीक से गिने थे या नहीं। निखिल हंसा। याद से पत्ते लगाए, फिर लिखे विवरण से मिलाकर जांचा।

देर में अपने कमरे पहुंचा। पीतल की चाबी ताले में घूमी। उसने कप मेज पर रखा और बचाए हुए अभ्यास पत्र बैग से निकालकर पास फैला दिए। पानी के निशान अभी थे। अब उन्हें हटाकर साफ प्रतियां रखने का मन नहीं हुआ।

फाइनल तक पहुंचने में तीन उधार के दरवाजे आए थे। चौथा उसकी अपनी चाबी से खुला।

वह अंदर गया और दरवाजा धीरे से बंद कर दिया। मेज पर आखिरी बाजी की जगह बनाने के लिए उसने कप थोड़ा पीछे सरकाया।

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