Rumble Rummy — बारिश उसका नाम नहीं मिटा सकी
Rumble Rummy

Rumble Rummy — बारिश उसका नाम नहीं मिटा सकी

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

लाल फोल्डर अलमारी से दो टुकड़ों में निकला। किरण ने दोनों अँगूठों से उसे जोड़े रखने की कोशिश की। प्लास्टिक के कवर से पानी टपक रहा था। अंदर प्रमाणपत्र आपस में…

लाल फोल्डर अलमारी से दो टुकड़ों में निकला।

किरण ने दोनों अँगूठों से उसे जोड़े रखने की कोशिश की।

प्लास्टिक के कवर से पानी टपक रहा था। अंदर प्रमाणपत्र आपस में चिपक गए थे। ऊपर का पन्ना उठाया तो किसी के दस्तखत की पट्टी नीचे वाले पर रह गई।

विकास दरवाजे से देख रहा था।

“चलो,” उसने कहा, “अब घर में शांति तो रहेगी।”

किरण ने ऊपर नहीं देखा।

बाहर पड़ोसी पानी से फूला फर्नीचर गली में खींच रहे थे। फाटक के पास प्रेशर कुकर एक तरफ गिरा था।

हर चीज में कीचड़ की गंध थी। उन चीजों में भी जिन्हें पानी ने छुआ नहीं था।

किरण ने फोल्डर रसोई के काउंटर पर रख दिया।

पति ने कहा कि बचाने को इससे जरूरी चीजें हैं।

उसने माना।

फिर जब वह खराब स्टूल बाहर ले गया, उसने एक और पन्ना अलग करने की कोशिश की।

* * *

बाढ़ से पहले फोल्डर अलमारी की सबसे नीचे वाली शेल्फ पर रहता था।

अब किरण जानती थी कि वह गलत जगह थी।

कई लोग यह बात बताने वाले थे। जैसे अतीत में जाकर दूसरी शेल्फ चुनना अभी बाकी काम हो।

वह चौंतीस साल की थी। सांगली की एक छोटी सिलाई सहकारी संस्था का हिसाब रखती थी।

जिन सप्ताहांतों में समय मिलता, वयस्कों की भारतीय रमी प्रतियोगिताओं में खेलती थी।

नौ प्रमाणपत्र थे। सालों के हाथ से लिखे नोट थे। कुछ तस्वीरें थीं।

कुछ प्रमाणपत्र स्थान पाने के थे। कुछ उन आयोजनों में भाग लेने के, जिन्हें वह दूसरे कारणों से याद रखती थी।

एक पर चाय का दाग था। उस यात्रा की सहेली अब दूसरे शहर में थी।

एक पर उपनाम गलत था। सुधार माँगने का सोचा था, कभी किया नहीं।

विकास फोल्डर को उसका संग्रहालय कहता था।

वह हँस देती थी। रखना क्यों चाहती है, यह समझाने से हँसना आसान था।

* * *

तेज बारिश वाली रात पानी बढ़ा।

जरूरी बैग लेकर रिश्तेदारों के यहाँ ऊँची जगह पहुँचे, तब तक किरण प्रमाणपत्रों के बारे में सोचना छोड़ चुकी थी।

लोगों की मदद करनी थी। फोन उठाने थे। एक पड़ोसी का बैग उठाना था।

वापसी स्थानीय व्यवस्था के अनुसार संभव हुई तो घर आए।

अगले दिन जरूरी और अप्रिय कामों से भरे थे।

फर्श। बिस्तर। खराब हो चुका खाना। सीली दीवारें। खर्चों की सूचियाँ।

किरण विकास के साथ काम कर रही थी।

यह नहीं कहा था कि घर की सफाई रोक दे, वह अंकपत्र का शोक मनाएगी।

फिर भी खराब फोल्डर के पास रुकती तो उसके पास कुछ कहने को होता।

“अब उन छुट्टियों के पीछे भागना तो बंद होगा।”

जैसे बारिश कोई उचित फैसला सुना गई हो।

* * *

उसके औजार ऊँचे रखे थे।

ज्यादातर इस्तेमाल लायक थे।

विकास घरों में छोटी फिटिंग की मरम्मत करता था। एक दोपहर जरूरत वाले औजार सुखाने में लगी।

किरण ने फैलाने में मदद की।

वह हर चीज ध्यान से देखता रहा।

किरण समझती थी। उसके लिए मायने थे। कुछ से कमाई होती थी। कुछ पिता के थे।

जब उसने खराब कागज पुराने तौलियों पर फैलाए, तो विकास ने पूछा कि और गंदगी क्यों कर रही है।

“देख रही हूँ क्या पढ़ा जा सकता है।”

“मेज चाहिए।”

उसने जगह बदल दी।

बाद में विकास ने तौलिए पर बाल्टी रख दी। नीचे तस्वीर थी।

शायद देखी नहीं।

या देखी और जरूरी नहीं लगी।

किरण तय नहीं कर पा रही थी कि कौन-सी बात ज्यादा दुख देती है।

* * *

एक हफ्ते बाद मौसी खाना लेकर आईं।

विकास ने कहा कि किरण का ताश वाला जुनून आखिर ठीक हो गया।

कहते समय हँसा।

किरण कप धो रही थी।

मौसी ने सिंक की तरफ देखा। समझ नहीं आया कि उन्हें भी हँसना है क्या।

किरण ने नल बंद किया।

“खेलना छोड़ा नहीं है।”

विकास ने हाथ हिलाया।

“मतलब अब दूसरी प्राथमिकताएँ होंगी।”

सुबह उसने तीन घरों के लिए सफाई का सामान जुटाया था। दोपहर संस्था का रुका हिसाब किया था।

धोने से खुरदरे हुए हाथ देखे।

ऐसा क्या दिखा सकती थी जिससे वह एक शौक को बाकी सबकी उपेक्षा का प्रमाण बनाना छोड़ दे?

उसने कप पोंछे।

रात को खराब पन्नों की तस्वीरें लीं, इससे पहले कि और टूट जाएँ।

* * *

पहले सब अकेले जुटाने की कोशिश की।

आयोजनों के नाम याद थे। दो तारीखें गड़बड़ा गईं।

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फोन बदला था। पुराने संदेशों में से कई नहीं थे।

जिस पहले आयोजक को संपर्क किया, वह अब आयोजन नहीं करता था।

दूसरे के पास प्रतिभागियों की सूची थी, परिणाम नहीं।

तीसरे ने मूल प्रमाणपत्र भेजने को कहा।

किरण ने फिर समझाया।

वह माँग वापस ली गई। मगर उस हफ्ते नया प्रमाणपत्र नहीं आया।

एक शाम पुराने प्रतिद्वंद्वियों की सूची खोली।

रश्मि का नाम था।

कई साल से सहज बातचीत नहीं हुई थी।

एक आयोजन में किरण ने दर्ज नतीजे पर आपत्ति की थी। रश्मि को लगा, उसे शर्मिंदा करना चाहती है।

किरण को लगा, आपत्ति खारिज होने पर रश्मि खुश हुई थी।

दोनों के पास उस दोपहर की अपनी कहानी थी।

किरण ने संपर्क सूची बंद की।

फिर खोल ली।

* * *

संदेश छोटा था।

बाढ़ में रिकॉर्ड खराब हो गए हैं। दोनों जिन आयोजनों में खेली थीं, उनकी तस्वीर, कार्यक्रम या परिणाम हो तो भेज सकती है क्या?

पुराने झगड़े का जिक्र नहीं किया।

संदेश को इतना सुधार दे कि समझ ही न आए, उससे पहले भेज दिया।

रश्मि ने शाम को पढ़ा।

जवाब नहीं आया।

किरण स्क्रीन देखती रही। फिर खुद पर गुस्सा होने लगा।

फोन शेल्फ पर रख दिया। हिसाब करने बैठ गई।

अगली सुबह तीन तस्वीरें आईं।

समूह की फोटो।

कार्यक्रम का पन्ना।

फीकी परिणाम सूची।

नीचे लिखा था, माँ के यहाँ एक और डिब्बा है। रविवार को देखूँगी।

किरण कुर्सी के किनारे बैठ गई।

एक पल धन्यवाद भी ठीक से टाइप नहीं हुआ।

* * *

पहली मिली तस्वीर खराब थी।

आधे लोग दूसरी तरफ देख रहे थे। किसी की कोहनी बैनर पर थी।

किरण की आँखें बंद थीं।

उसने फिर भी बड़ी करके देखी।

वह वहाँ थी।

ऐसी कहानी नहीं थी जिसे उसने जरूरत से ज्यादा बड़ा कर लिया था।

ऐसा शौक नहीं था जिसके सालों का निशान सिर्फ उसके अपने कहने में बचा हो।

वह वहाँ गई थी।

विकास पीछे से गुजरा।

“अब भी यही देख रही हो?”

उसने फोन बंद कर दिया।

फिर उसके जाने पर खोल लिया।

रविवार को रश्मि का फोन आया।

पहले तस्वीरों पर अटपटी बातचीत हुई। फिर पुराने विवाद वाले आयोजन पर।

किरण ने कहा, चौथे स्थान पर रही थी।

रश्मि ने सामने का पन्ना देखा।

“पाँचवाँ लिखा है।”

किरण बहस करना चाहती थी।

इसके बजाय साफ तस्वीर माँगी।

पाँचवाँ था।

उसने सुरक्षित रख ली।

* * *

दूसरे लोग भी चीजें भेजने लगे।

एक पुराने आयोजक को स्कैन किया रजिस्टर मिला।

जिस खिलाड़ी को किरण मुश्किल से याद करती थी, उसके पास ऐसी तस्वीर थी जिसमें प्रमाणपत्र का निचला कोना दिख रहा था।

एक पुराने प्रतिद्वंद्वी ने कार्यक्रम भेजा। माफी माँगी कि परिणाम नहीं है।

उससे भी तारीख पहचानने में मदद मिली।

किरण ने सूची बनाई।

पुष्ट परिणाम।

भाग लेना पुष्ट।

अब भी गायब।

खाली जगहों से थक गई थी, मगर तीसरी सूची को पहली में नहीं बदला।

नया जुटा रिकॉर्ड कहीं यादों से कम चमकीला था। कहीं ज्यादा ठोस।

एक आयोजन भूल गई थी जहाँ दो पालियाँ काम करने के बाद पहुँची थी।

तारीख देखकर ट्रेन की यात्रा याद आई। रात के खाने में खाया बिस्कुट का पैकेट याद आया।

बंद आँखों वाली फोटो छपवाई।

नए ढेर के सबसे ऊपर रखी।

* * *

नौ में से छह पुराने प्रमाणपत्रों की पुष्टि इतनी हो गई कि संबंधित आयोजक दूसरी प्रतियाँ देने का इंतजाम कर सके।

तीन की नहीं हुई।

किरण ने उन तीन पर बहुत समय लगाया।

एक नंबर पर संपर्क करती रही, फिर साफ हुआ कि वह अब किसी ऐसे व्यक्ति का है जिसका आयोजन से संबंध नहीं।

मौसी के घर पुराने बैग में देखा।

टूटा पेन, दो रसीदें और दुपट्टा मिला।

रिकॉर्ड नहीं।

रश्मि ने कहा, समय मिलने पर और देखेगी।

किरण लगभग लिखने वाली थी कि ढूँढ़ना जरूरी है।

फिर रश्मि के पहले से भेजे संदेश पढ़े।

सत्रह थे।

उसने लिखा, जो मिला उसके लिए धन्यवाद।

फिर दुपट्टे की बात हुई।

रश्मि को याद था। बोली, कमरे के दूसरे कोने से भी दिख जाता था।

पहली बार किरण उसके साथ हँसी।

* * *

अभ्यास के नोट ज्यादा मुश्किल थे।

प्रमाणपत्र की प्रतियाँ बन सकती थीं। अपने संकेतों में लिखे सालों के सुधार दूसरों की तस्वीरों से नहीं बन सकते थे।

बाढ़ के बाद पहले अभ्यास में किरण धीमी लगी।

बार-बार मन उस याद वाले पन्ने की तरफ जाता जो अब था ही नहीं।

एक दूसरे वयस्क खिलाड़ी ने किसी निर्णय का कारण पूछा।

किरण ने कहा, कभी समझाकर लिखा था।

वह इंतजार करता रहा।

उतना याद नहीं आया।

लौटते समय बस में चुपचाप रोई। गुस्सा था कि किसी के सामान्य सवाल ने नुकसान फिर खोल दिया।

बाद में रश्मि का फोन आया।

किरण ने कहा, शायद कुछ दिन छोड़ दे।

“छोड़ना चाहती हो,” रश्मि ने पूछा, “या पुरानी कॉपी चाहिए?”

किरण ने जवाब नहीं दिया।

पुरानी कॉपी चाहिए थी।

* * *

अगली बैठक में रश्मि साधारण कॉपी लाई।

साथ कोई भाषण नहीं था।

“बहुत पन्ने हैं,” किरण बोली।

“जल्दी दूसरी नहीं चाहिए होगी।”

उसी शाम जो हुआ था, उससे शुरू किया।

किरण ने बहुत लिखा। पुराने नोटों की आवाज लौटाना चाहती थी। जैसे सही शब्द मिल जाएँ तो उन्हें लिखने वाली भी लौट आएगी।

रश्मि ने पूछा, पढ़कर सुना सकती है?

आधे में किरण रुक गई।

काम का नहीं था।

कई पंक्तियाँ काटीं। छोटी व्याख्या लिखी।

अगले हफ्ते बदली।

नई कॉपी में सुधार आए। कोना मुड़ा। खाने के डिब्बे से दाग लगा।

पुरानी जैसी हुए बिना अपनी बन गई।

* * *

लौटती दिनचर्या विकास को पसंद नहीं थी।

पहले कहा कि घर में अब भी काम है।

किरण ने माना। बचे काम लिखे। नौकरी और अभ्यास के आसपास अपना हिस्सा तय किया।

घर की समस्या से समय बदला तो अपना समय भी बदला।

फिर उसने कहा कि पड़ोसी सोचेंगे, बाकी लोग मुश्किल में हैं और वह आनंद ले रही है।

किरण ने पूछा, कौन-से पड़ोसी?

उसने कहा, बात वह नहीं है।

एक रात खराब फोल्डर पूरा फेंकने को कहा।

किरण ने बताया, कवर रखेगी।

“किसलिए?”

ऐसा जवाब नहीं था जिससे वह संतुष्ट होता।

इसलिए दिया नहीं।

कवर अलमारी में रखा।

इस बार ऊपर की शेल्फ पर।

* * *

मतभेद अब सिर्फ खेल के नहीं थे।

खेल से विवाह का एक हिस्सा साफ दिखने लगा था।

उसके लिए कुछ जरूरी हो तो महत्व अपने आप मान लिया जाता था।

किरण के लिए हो तो उसमें लगने वाले समय का बचाव करना पड़ता था।

उसने संस्था के पास कमरा देखना शुरू किया।

फैसले में हफ्ते लगे।

किराया, यात्रा और जमा रकम का हिसाब किया।

मौसी से बात की।

देखा कि सामान्य कमाई से खर्च चल पाएगा या नहीं।

किसी प्रतियोगिता का पुरस्कार आकर हिसाब ठीक करे, इसका इंतजार नहीं किया।

विकास ने कहा, बाढ़ के बाद छोड़कर जाएगी तो वह क्रूर दिखेगा।

किरण साफ कपड़े तह कर रही थी।

“पानी की वजह से नहीं जा रही।”

उसने नाटक कहा।

वह तह करती रही।

* * *

कमरा पुराने बेडरूम से छोटा था।

दीवार पर हटाई गई शेल्फ का निशान था। खिड़की सामने की इमारत की तरफ खुलती थी।

गद्दा, केतली, काम के कपड़े और नई कॉपी लाई।

खराब फोल्डर अलग बैग में था।

मौसी ने केतली उठाई। फिर कहा कि बस में भीड़ होने से पहले निकलना है।

किरण ने धन्यवाद दिया।

दरवाजा बंद हुआ तो गद्दे पर बैठ गई।

जीत जैसा नहीं लगा।

अपरिचित मात्रा में शांति थी।

अगले कमरे में सब्जी कटने की आवाज आती थी।

कुछ देर बाद चाय के लिए पानी रखा।

आने वाले आयोजनों की सूची खोली।

* * *

वापसी वाले आयोजन की सामान्य प्रवेश प्रक्रिया थी।

किरण ने आवेदन किया। तय पात्रता पूरी की। प्रतियोगिता के लिए छुट्टी ली।

आयोजक ने यह भी बताया कि दो पुराने प्रमाणपत्रों की प्रतियाँ वहाँ मिल सकती हैं।

बाकी अलग पहुँचेंगी।

दो काम एक यात्रा में होना उपयोगी था।

रश्मि ने भी नाम दिया।

यात्रा की सुबह फोन करके बोली, किरण देर कर रही है।

किरण ने समय देखा।

जल्दी थी।

रश्मि हँस पड़ी।

“एक बार कहना था।”

दोनों अपने-अपने बैग लेकर स्टेशन पर मिलीं। नाश्ता साझा किया।

सालों तक किरण समझती रही थी कि रश्मि का तीखापन हमेशा उसके लिए है।

अब पता चला कि फीकी चाय, देर करती बस और चम्मच भूलने की अपनी आदत से भी वैसी ही बात करती है।

* * *

स्थल पर किरण ने खेलने से पहले प्रतियाँ लीं।

अपना नाम जाँचा।

जिस पुराने प्रमाणपत्र पर उपनाम गलत था, उसमें अब सही था।

कर्मचारी ने पहले की गलती के लिए खेद जताया।

किरण ने धन्यवाद दिया। कागज रख दिए।

फिर शुरुआती सत्र कठिन रहा।

घर से निकलते समय सोचा था कि प्रतियाँ मिलेंगी तो भीतर कुछ स्थिर हो जाएगा।

वे बैग में सुरक्षित थीं। ध्यान फिर भी खिसक रहा था।

एक खराब निर्णय किया। दर्ज विवरण गलत समझा। विराम खुद पर झुँझलाते बीता।

रश्मि ने यह कहकर आराम नहीं दिया कि किसी बात का महत्व नहीं है।

“जो हुआ, देखो,” उसने कहा। “फिर खाना खाओ।”

किरण ने दोनों किए।

* * *

धीरे-धीरे सँभली।

नई कॉपी ने हर पुरानी याद वापस नहीं दी थी।

वर्तमान काम करने की जगह दी थी।

जो जानती थी, इस्तेमाल किया। जहाँ स्पष्टीकरण चाहिए था, पूछा।

हर गलती को यह प्रमाण मानना छोड़ा कि बाढ़ उसका सबसे अच्छा हिस्सा ले गई है।

कुछ समय तक रश्मि आगे थी।

किरण उसे हराना चाहती थी।

यह साफ भावना थी।

इससे सत्रह संदेश या दी हुई कॉपी रद्द नहीं हो जाते थे।

आखिरी हिस्से में इतना अच्छा खेली कि आगे निकल गई।

नतीजे जाँचे गए। अंतिम सुधार से दूसरा स्थान बदला, उसका नहीं।

वह जीत गई थी।

रश्मि ने लगी हुई सूची देखी।

फिर बोली, “अब तुम्हें झेलना मुश्किल होगा।”

किरण इतनी हँसी कि मेज पर हाथ रखना पड़ा।

* * *

पुरस्कार में आयोजक ने नया सम्मान दिया।

किसी ने बाढ़ में पुराने रिकॉर्ड खोने का जिक्र किया।

किरण भीतर से तैयार हो गई कि दुख पर भाषण आएगा।

इसके बजाय आयोजक ने पूछा कि प्रतियाँ ठीक से मिल गईं?

“हाँ।”

“अच्छा।”

अगला नाम बुला लिया गया।

किरण उस छोटी बातचीत के लिए आभारी थी।

बाहर रश्मि ने पुरस्कार पकड़े उसकी तस्वीर ली।

किरण ने देखने को कहा।

आँखें खुली थीं।

“दूसरी वाली भी रखना,” रश्मि बोली।

“रख रही हूँ।”

वापसी से पहले चाय खरीदी।

फीकी थी।

रश्मि ने शिकायत की। इस बार किरण भी शामिल हुई।

* * *

विकास को किसी परिचित से नतीजा पता चला।

संदेश आया। अपनी बात साबित कर दी। अब घर आ सकती हो।

किरण ने ट्रैफिक सिग्नल पर रुके ऑटो में पढ़ा।

नया प्रमाणपत्र बैग में सीधा रखा था।

तस्वीर पर रखी बाल्टी याद आई। मौसी के सामने हँसना याद आया।

उसका घर छोड़ना कितनी जल्दी एक अस्थायी प्रदर्शन बना दिया गया था, जिसे वह समाप्त घोषित कर सकता था।

किरण ने लिखा कि घर पर बचा सामान लेने का समय तय कर सकते हैं।

फिर फोन रख दिया।

इमारत पर उतरकर किराया दिया।

अपने बैग खुद ऊपर ले गई।

* * *

उपलब्ध प्रतियाँ एक साथ आने में एक और महीना लगा।

किरण ने एक-एक करके साधारण फ्रेम खरीदे।

छह पुराने प्रमाणपत्र।

एक नया।

बंद आँखों वाली तस्वीर छोटे फ्रेम में गई।

तीन रिकॉर्ड अब भी नहीं मिले थे।

जिनकी पुष्टि नहीं हुई थी, उन्हें गढ़ने के बजाय सूची में नाम रहने दिए।

रविवार को रश्मि ने फ्रेम सीधे पकड़ने में मदद की।

पहली बार टेढ़े लगे। दो उतारे। फिर कोशिश की।

खराब लाल कवर नीचे की शेल्फ पर रखा गया।

रश्मि ने पूछा, किताबों के पीछे छिपाना है?

किरण ने सिर हिला दिया।

नहीं।

काम पूरा हुआ तो चाय बनाई।

पतली खिड़की से आती धूप दीवार के नीचे के किनारे पर पहुँची।

किरण ऐसी जगह बैठी जहाँ काँच पर उसकी चाल दिख रही थी।

उस दीवार पर कुछ भी बने रहने के लिए अगले महीने जीतना जरूरी नहीं था।

जाने से पहले रश्मि ने पूछा, गुरुवार अभ्यास में आएगी?

किरण ने काम का कैलेंडर देखा।

“हाँ।”

कैलेंडर बंद किया।

फ्रेम अपनी जगह रहे।

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