कार्ड पर उसका नाम था।
नैना को अपनी शादी की तारीख इसी तरह पता चली।
वह समीर के साथ उसके माता-पिता के सोफे पर बैठी थी। उसकी माँ ने बीच की मेज पर नमूना कार्ड आगे किया। किनारों से पकड़ा था, ताकि सुनहरे अक्षरों पर निशान न पड़े।
सत्रह नवंबर।
नैना ने दो बार पढ़ा।
“हमारी तारीख आठ दिसंबर है।”
समीर ने उसे नहीं देखा।
उसकी माँ ने कहा कि नया इंतजाम सबके लिए ज्यादा सुविधाजनक है।
नैना उसकी तरफ मुड़ी।
“सत्रह को फाइनल है।”
“पता है,” उसने कहा।
उसे पता था।
कार्ड फिर भी छपा था।
* * *
नैना उनतीस साल की थी। इंदौर में इमारतों के नक्शे तैयार करने का काम करती थी।
दिन उन नापों को ठीक करते बीतता जिन्हें दूसरे लगभग सही कहते थे।
कुछ सेंटीमीटर से दरवाजा खुलना बंद हो सकता था।
वयस्कों की आयोजित भारतीय रमी प्रतियोगिताओं में भी लगभग पसंद नहीं था।
लगभग चुना जाना, चुना जाना नहीं था।
लगभग तैयारी, तैयारी नहीं थी।
महीनों के सप्ताहांत सफर और अभ्यास के बीच सामान्य नौकरी करते हुए क्षेत्रीय श्रृंखला के फाइनल तक पहुँची थी।
तारीख शादी की तैयारी शुरू होने से पहले घोषित हो चुकी थी।
समीर जानता था।
आठ दिसंबर तय हुआ तो उसने कहा था कि पहले प्रतियोगिता खत्म होना अच्छा रहेगा।
“दिमाग में एक चीज कम होगी।”
नैना ने इसे समर्थन समझा था।
अब सोच रही थी कि समर्थन उसके रुक जाने की संभावना से मिलने वाली राहत जैसा क्यों लगा था।
* * *
बदलाव के कारण थे।
समीर का बड़ा भाई नवंबर में विदेश से आ सकता था।
पसंद का हॉल खाली था।
एक रिश्तेदार ने किसी से बात की थी। कई लोग योजना बनाने लगे थे।
नैना ने सुना।
पिछला सप्ताहांत पूछा। अगला पूछा।
पुरानी तारीख रखने और भाई के आने पर अलग पारिवारिक कार्यक्रम करने का सुझाव दिया।
हर बात खारिज हुई।
हॉल महँगा होगा।
किसी का दूसरा कार्यक्रम है।
भाई जरूरी है।
आखिर समीर के पिता ने कहा कि विवाह में प्राथमिकताएँ तय करनी पड़ती हैं।
नैना ने फिर कार्ड देखा।
समीर के नीचे उसका नाम बहुत सुंदर ढंग से छपा था।
जिसका नाम था, उसे फोन करना किसी को जरूरी नहीं लगा था।
* * *
लौटते समय उसने गाड़ी किनारे लगाने को कहा।
समीर बंद दुकान के पास रुका।
“बताया क्यों नहीं?”
“पता था ऐसे ही प्रतिक्रिया दोगी।”
नैना ने इंतजार किया कि अपनी बात खुद सुनेगा।
उसके दोनों हाथ स्टीयरिंग पर रहे।
“एक प्रतियोगिता ही तो है।”
“फाइनल है।”
“और आएँगे।”
“और तारीखें भी आएँगी।”
उसने साँस छोड़ी।
यह साँस नैना पहले सुन चुकी थी। दफ्तर में जब कोई बड़े अधिकारी को असुविधा से बचाने के लिए गलती अनदेखी करने को कहता था।
समीर बोला, सबको खुश रखने की कोशिश कर रहा है।
उसने पूछा, सबमें वह कहाँ है?
उसने कहा, फिल्म का संवाद मत बनाओ।
दोनों खड़ी गाड़ी में बैठे रहे, जब तक चुप्पी भी जवाब नहीं लगने लगी।
* * *
घर में माँ कमला और छोटी बहन ईशा कपड़ों के नमूने छाँट रही थीं।
आधी खाने की मेज ढकी थी।
नैना ने कहा, तारीख बदल दी गई है।
माँ ने कारण पूछा।
उसने बताया।
फिर वही सवाल आया जिससे डर रही थी।
“प्रतियोगिता छोड़ नहीं सकती?”
कमला ने कठोर होकर नहीं कहा।
इससे ज्यादा मुश्किल हुआ।
अग्रिम भुगतान थे। निमंत्रण बनने थे। रिश्तेदारों को बताया जा चुका था।
पिता ने उस बचत से पैसा निकाला था जिसे सामान्यतः छूते भी नहीं थे।
नैना सब जानती थी।
उसने भी पैसे दिए थे।
ईशा ने कपड़ा नीचे रखा।
“तुमसे पूछा था?”
“नहीं।”
माँ थकी लग रही थीं।
“अब क्या हो सकता है, यह पूछ रही हूँ।”
नैना कमरे में चली गई। कुछ ऐसा कहने से पहले जिससे माँ का डर दुश्मन बन जाए।
* * *
दो दिन तक इसे समय-सारणी की समस्या की तरह हल करती रही।
रस्म देर से हो सकती है?
फाइनल में यात्रा और पूरे दिन के तय सत्र थे। मन से बनाया समय नहीं बता सकती थी कि तब तक खत्म हो जाएगा।
अगली सुबह शादी हो सकती है?
हॉल की बुकिंग वैसी नहीं थी।
समीर का भाई पहले आ सकता है?
उससे कोई नहीं पूछना चाहता था।
हर उपाय में किसी और को असुविधा थी।
वहीं वह उपाय रहना बंद हो जाता था।
समीर की माँ ने फोन किया।
“ऐसी बेटी चाहते हैं जिसे लगे यह उसका परिवार है।”
नैना दफ्तर के प्रिंटर के पास नक्शे का इंतजार कर रही थी।
“मैं भी परिवार चाहती हूँ।”
“तो समझती होगी।”
पन्ना बाहर आया।
किनारे का एक नाप कट गया था।
बात जारी रही। नैना उसी को देखती रही।
* * *
शाम को समीर मिलने आया।
पिता की पसंद की मिठाई लाया।
कुछ देर मिलनसार और व्यावहारिक रहा।
मेहमानों की गाड़ी की बात की। फोटोग्राफी में मदद करने वाले रिश्तेदार की बात की।
नैना ने बाहर बात करने को कहा।
बालकनी में बोली कि बिना पूछे चुनी नई तारीख स्वीकार नहीं कर सकती।
उसने आवाज धीमी की।
“इस बार समझौता कर लो। बाद में मैं सँभाल लूँगा।”
“कैसे?”
“खेल सको, यह देख लूँगा।”
नैना रुक गई।
वह देख लेगा कि वह खेल सके।
जैसे दरवाजा तब तक बंद रहेगा जब तक वह चाबी देने लायक मजबूत न हो जाए।
उसने पूछा, समीर खुद क्या मानता है? क्या उसे फाइनल छोड़ना चाहिए?
उसने बैठक की तरफ देखा।
“तुम्हारे और माता-पिता के बीच चुनने को मत कहो।”
“तुम क्या मानते हो, यह पूछा।”
वह चुप रहा।
* * *
फिर कहा।
“सच में शादी चाहतीं तो इतना समझाना नहीं पड़ता।”
नैना दो दिन से तारीख का बचाव कर रही थी।
उसने प्यार की परीक्षा बना दी थी।
नैना ने पूछा, उसका परिवार बिना बताए तारीख बदल दे तो क्या वह काम की जरूरी प्रस्तुति छोड़ देगा?
“वह मेरा करियर है।”
“मेरा समय फिर भी मेरा है।”
उसने कहा, बराबर चीजों की तुलना नहीं है।
बात सामने थी।
कैलेंडर की गलतफहमी नहीं थी।
जिद्दी माता-पिता के सामने थोड़ी कमजोरी नहीं थी।
वह भी वही प्रमाण चाहता था।
बस चाहता था कि नैना दे दे, उसे माँगने वाला न दिखना पड़े।
नैना बालकनी की रेलिंग से पीछे हुई।
“सत्रह को शादी नहीं करूँगी।”
उसका चेहरा कठोर हो गया।
“शायद शादी के लिए तैयार नहीं हो।”
नैना बोली, “शायद तुमसे करने के लिए नहीं।”
* * *
वह मिठाई छोड़ गया।
कई हफ्ते नैना को यही अजीब बात याद रही।
मेज पर मिठाई थी। माँ कमरे में रो रही थीं।
पिता अरविंद खिड़की के पास खड़े थे। पूछा, ठीक-ठीक क्या हुआ?
नैना ने बातचीत दोहराई।
अपनी पंक्तियाँ बेहतर नहीं कीं।
उन्होंने पूछा कि समीर के पिता से बात करें?
“नहीं। शादी की तैयारी रोकनी है।”
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वह बैठ गए।
कुर्सी फर्श पर आवाज करके खिसकी।
“आज?”
“और पैसा खर्च नहीं करना।”
माँ बाहर आईं।
“पता है लोग क्या कहेंगे?”
नैना ने सिर हिलाया।
पता होने से दर्द कम नहीं होता था।
ईशा ने मिठाई अलमारी में रख दी। और क्या किया जाए, किसी को नहीं सूझा।
* * *
इंतजाम रोकने में तारीख मना करने से ज्यादा समय लगा।
नैना और पिता ने अपनी की हुई बुकिंग देखीं।
हॉल और दूसरे सेवा देने वालों से बात की। हर आरक्षण की तय शर्तों के अनुसार मामला निपटाया।
कुछ पैसे वापस आ सकते थे।
कुछ किसी अगली बुकिंग में लग सकते थे।
कुछ डूब गए।
आखिरी वापस न मिलने वाली रकम अठारह हजार रुपये थी।
यह आजादी की कोई अमूर्त कीमत नहीं थी।
महीनों की सावधानी से बचाया पैसा था। खोने पर नैना को बहुत बुरा लगा।
पिता का दिया हिस्सा अपने लिए रखे खरीदारी के पैसों से उन्हें भेजा।
इससे परिवार की निराशा गायब नहीं हुई।
खाने पर माँ ने पूछा, अब संतोष है?
नैना ने चम्मच रखा।
“नहीं।”
कमला ने देखा।
“शादी करना चाहती थी,” नैना ने कहा। “चाहती थी वह जो बोल रहा है, उससे अलग इंसान निकले।”
* * *
फोन आने लगे।
एक बुआ ने कहा, घमंड जिंदगी खराब करे उससे पहले माफी माँग ले।
एक चचेरे भाई ने कहा, आजकल लड़कियाँ हर बात को लड़ाई बना देती हैं।
किसी ने पूछा, ताश के लिए रिश्ता तोड़ा?
पहले कुछ लोगों को विस्तार से बताया।
छठी बार तक अपनी आवाज में खुद को छोटा होता सुनने लगी।
ऐसा रूप ढूँढ़ रही थी जिसे सुनकर कोई कह दे कि ठीक है, अनुमति है।
बुआ का फिर फोन आया तो ईशा ने लिया।
“जो हुआ, बता चुकी है।”
बुआ ने विरोध किया।
ईशा ने कहा, खाना खा रहे हैं। फोन रख दिया।
फिर नैना को लौटा दिया।
नैना ने पूछा, बदतमीजी तो नहीं हुई?
“थोड़ी,” ईशा बोली। “खाने के बाद बुरा मान लेना।”
* * *
अभ्यास खराब हुआ।
एक बार रद्द बुकिंग वाले फोन में देर हुई तो देर से पहुँची।
दूसरी शाम जाना-पहचाना नोट देखती रही, शब्द समझ में नहीं आए।
अभ्यास साथी लीना ने पूछा, घर जाना है?
नैना बोली, अब रुकने के लिए बहुत कुछ खो चुकी है।
लीना ने अपनी कॉपी बंद की।
“आज खेलना है या शादी के लिए खुद को सजा देनी है?”
सवाल से नैना को गुस्सा आया।
रात को कारण समझा।
वह फाइनल को ऐसी सुनवाई बना रही थी जिसमें ट्रॉफी साबित करेगी कि मना करने का अधिकार था।
हार गई तो क्या समीर से माफी माँगनी होगी?
विचार बेतुका था।
डर फिर भी लग रहा था।
* * *
पिता रसोई की दराज का ढीला हैंडल ठीक कर रहे थे। नैना ने उन्हें बताया।
उन्होंने पेंच से नजर हटाए बिना सुना।
फिर पूछा, “खराब खिलाड़ी होतीं तो भी तारीख चुनने का हक होता?”
“हाँ।”
उन्होंने हैंडल परखा।
“तो नतीजे से वह फैसला मत करवाओ।”
नैना पास खड़ी रही।
उन्होंने पेचकस रखा।
“अब भी परेशान हूँ,” कहा।
उसने सिर हिलाया।
“मालूम है।”
“लेकिन इस बात से नहीं।”
पहली रात यही बात सुनना चाहती थी।
पहली रात अलग हुई थी, इसका दिखावा करने से यह बेहतर था।
दूसरा पेंच कसते समय उसने दराज स्थिर पकड़ ली।
* * *
फाइनल से एक हफ्ता पहले समीर का फोन आया।
उसने कहा, दोबारा विचार करे तो माता-पिता इस विषय को छोड़ने को तैयार हैं।
नैना ने पूछा, कौन-सी तारीख की बात है?
“सत्रह। कारण बता चुके हैं।”
वह पलंग के किनारे बैठ गई।
उनकी व्याख्या बची रही थी।
उसका जवाब नहीं।
उसने कहा, रिश्ते को एक और मौका मिलना चाहिए।
“यह साबित करने के लिए फाइनल छोड़ना पड़ेगा?”
“तुम बात ऐसे ही कहती हो।”
“और तरीका है?”
उसने कहा, परवाह करने वालों के बजाय प्रतियोगिता के अजनबियों को चुनने का पछतावा होगा।
नैना ने अलमारी के हैंडल पर टँगा बंद कपड़ों का बैग देखा।
“अफसोस है कि विकल्प बार-बार यही बनाते हो।”
फोन रख दिया।
बीस मिनट रोई।
फिर सूजी आँखों के साथ अभ्यास गई।
* * *
यात्रा की सुबह कमला ने ज्यादा खाना बाँधा।
जल्दी-जल्दी किया। नैना जिस लंबी बातचीत की उम्मीद कर रही थी, वह नहीं हुई।
दरवाजे पर छोटा डिब्बा दिया।
“चिंता में तुम्हारे पिता खाना भूल जाते हैं।”
अरविंद आखिरी दिन आने वाले थे। ईशा साथ आएगी।
नैना ने माँ को देखा।
“आप आ रही हैं?”
“घर में ताला भी तो लगाना है।”
फिर कमला ने पूछा कि वहाँ देखने वालों के लिए कुर्सियाँ हैं?
सुबह में पहली बार नैना मुस्कराई।
स्टेशन पर टिकट देखा।
तारीख अब भी दुख दे रही थी।
दे सकती थी।
वह फिर भी ट्रेन में चढ़ गई।
* * *
पहला दिन अस्थिर रहा।
पहला सत्र अच्छा। दूसरा इतना खराब कि कल्पना कर सकती थी, तीन रिश्तेदार गलत प्राथमिकताओं पर संदेश तैयार कर रहे हैं।
सत्रों के बीच फोन रख दिया।
आसपास दूसरे खिलाड़ी थे।
अपनी थकान। उम्मीदें। वहाँ होने के कारण।
सामने एक आदमी सूटकेस के टूटे पहिए की शिकायत कर रहा था।
पास की मेज पर महिला को देर से आते पार्सल के लिए फोन करना था।
यह साधारणपन मदद कर रहा था।
कमरे को नहीं पता था कि उसे नैना की सगाई का फैसला सुनाना है।
वह आयोजन में व्यस्त था।
नैना सामने के काम पर लौटी।
शाम तक संभावना में बनी हुई थी।
* * *
सत्रह की सुबह अलार्म से पहले आँख खुली।
कुछ क्षण लगा कि कोई इंतजाम भूल गई है।
फूल।
गाड़ी।
ब्लाउज की फिटिंग।
फिर याद आया कहाँ है।
होटल का पर्दा पूरा बंद नहीं होता था। कुर्सी पर रोशनी की पतली पट्टी थी।
नैना उठ बैठी।
सोचा था इस सुबह विजयी महसूस करेगी।
इसके बजाय उस चीज की अनुपस्थिति थी जिसे कभी चाहा था।
उसने महसूस होने दिया।
फिर मुँह धोया। तैयार हुई। माँ का बाँधा खाना खाया।
स्थल पर लीना का संदेश आया।
एक समय में एक सत्र।
नैना ने एक बार पढ़ा।
काफी था।
* * *
आखिरी दिन नाटक से ज्यादा धैर्य माँग रहा था।
पीछे हुई। कुछ सँभली। एक ऐसी गलती की जिसे वापस नहीं ले सकती थी।
विराम में परिवार दिखा।
पिता तीन कुर्सियाँ साथ खोज रहे थे।
ईशा समझा रही थी कि पूछें तो बैग हट सकते हैं।
कमला की नजर नैना से मिली। हाथ उठाया।
किसी के हाथ में यह संदेश नहीं था कि अब सबकी कीमत वसूल करके दिखाना।
नैना पास गई।
माँ ने खाना पूछा।
हाँ कहा।
अरविंद ने अगला सत्र पूछा।
समय बताया।
“तो जाओ।”
साधारण निर्देश जैसा था।
वह साथ ले गई।
* * *
आखिरी कुल अंकों में समय लगा।
नैना दूसरों के साथ इंतजार करती रही।
समझ नहीं आया बैठना है या नहीं।
खड़ी रही। बैठी। फिर खड़ी हुई।
नतीजे आए तो पहला स्थान था।
अपने नाम के बाद कुछ पल कुछ और सुनाई नहीं दिया।
फिर देखने वालों की तरफ से ईशा ने ऐसी आवाज निकाली कि कई सिर मुड़े।
नैना हँस पड़ी।
माँ के दोनों हाथ मुँह पर थे।
पिता पहले धीरे ताली बजा रहे थे। जैसे हाथों तक खबर पहुँचने में एक क्षण लगा।
नैना आगे गई।
पुरस्कार उम्मीद से भारी था।
दोनों हाथों से पकड़ा।
उसके वजन में निमंत्रण कार्ड जैसा कुछ नहीं था।
* * *
स्थानीय साक्षात्कार लेने वाले ने तारीख पूछी।
किसी ने रद्द शादी का जिक्र किया था।
नैना ने कहा, निजी फैसला था। प्रतियोगिता की बात करना चाहती है।
उसने मान लिया। कठिन दूसरे सत्र का सवाल किया।
नैना ने खुशी से जवाब दिया।
बाद में रिश्तेदार का संदेश आया कि सबको गलत साबित कर दिया।
ईशा खाने की जगह खोज रही थी। नैना ने संदेश पढ़ा।
जवाब नहीं दिया।
जीत बहुत अच्छी लग रही थी।
इससे अठारह हजार का खर्च काल्पनिक नहीं हो गया।
समीर के शब्द बेअसर नहीं हुए।
इस खुशी को महसूस करने के लिए हर नुकसान पहले ठीक होना भी जरूरी नहीं था।
ईशा को छोटा रेस्तराँ मिल गया। मेज खाली थी।
वे वहाँ गए।
* * *
सजा हुआ प्रवेश नहीं था।
मंच नहीं था।
फोटोग्राफर यह नहीं पूछ रहा था कि कौन-सा परिवार किस तरफ खड़ा हो।
एक पैर हिलता था, इसलिए वेटर ने दो मेजें जोड़ीं।
अरविंद ने परखा। मुड़ा हुआ गत्ता माँगा।
कमला ने कहा, रेस्तराँ की मरम्मत शुरू करने से पहले बैठ जाएँ।
नैना अचानक इतनी हँसी कि पानी गलत तरफ चला गया।
ईशा ने पीठ थपथपाई और प्लेट से रोटी का टुकड़ा चुरा लिया।
खाना जरूरत से ज्यादा मँगाया।
पिता ने नतीजे पर ईशा के चिल्लाने की कहानी सुनाई।
ईशा का कहना था कि घोषणा खत्म होने से पहले उन्होंने ताली शुरू कर दी थी।
दोनों बहस करने लगे।
नैना से किसी ने नहीं पूछा कि ज्यादा प्यार किससे है।
* * *
खाने के बीच फोन चमका।
समीर।
कॉल खत्म होने तक नैना नाम देखती रही।
फिर संदेश आया। बधाई। अब बात कर सकते हैं?
उसने फोन उलटा रख दिया।
कमला ने देखा।
किसका था, नहीं पूछा।
दाल का कटोरा आगे किया। बोलीं, बातें करते रहे तो ठंडी हो जाएगी।
नैना ने ली।
ट्रॉफी पास की खाली कुर्सी पर कपड़े में लिपटी थी। सफर में किनारा खुरचाना नहीं चाहती थी।
बाहर से बारात निकली।
कुछ देर संगीत कमरे में भर गया।
ईशा ने नैना को देखा।
नैना ने सुना।
फिर पिता से अचार आगे करने को कहा।