1. Rummy 888: तस्वीर के बाहर की जगह
फ़ोटोग्राफ़र ने सभी को पास आने को कहा। प्रकाश उस चाँदी के कप की ओर बढ़ा जिसे जिताने में उसका बड़ा हाथ था। कप्तान दिनेश ने हथेली उसके सीने पर रख दी।
“तुम नहीं। ये बैग नीचे पहुँचा दो।”
छह घंटे पहले दिनेश ने उसी अड़तीस वर्षीय मंडी मजदूर से अनुपस्थित खिलाड़ी की जगह बैठने की विनती की थी। बुखार के बावजूद प्रकाश ने छह डील वाला आखिरी रम्मी मुकाबला खेला और अपनी मेज पर सबसे कम पेनल्टी अंक बनाए। अब मंडी संघ विजेताओं की तस्वीर चाहता था। उसका फीका कुरता तस्वीर बिगाड़ रहा था।
किसी ने हँसकर प्याज की धूल का जिक्र किया। दरवाजे के पास उसकी बीस साल की बेटी रितु खड़ी थी। वह पिता के बाल सँवारने के लिए कंघी लाई थी। प्रकाश ने देखा, उसने कंघी मुट्ठी में बंद कर ली।
वह बैग नीचे ले गया। दिनेश के बैग में कप जूतों से टकराता रहा।
सुबह तस्वीर मंडी कार्यालय में लगी। नीचे पाँच नाम थे। प्रकाश का नाम गायब था, जबकि स्कोर शीट पर उसके बचाए हुए अंक मौजूद थे।
दिनेश ने सफाई देने के बजाय एक अतिरिक्त डिलीवरी की पेशकश की। किराया देना था, इसलिए प्रकाश ने काम लिया। नौ दिन तक वह तस्वीर के नीचे से बोरियाँ ढोता रहा। ऊपर देखते ही उसके गले में कुछ अटक जाता था।
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2. खराब पत्तों से भी खराब फैसला
दसवीं शाम प्रकाश नागपुर के एक मोहल्ले में रम्मी खेलने पहुँचा। वह तुरंत किसी को हराना चाहता था, मानो एक जीत उसका नाम वापस तस्वीर में लगा देगी।
आधी डील तक उसने तीन बड़े पत्ते पकड़े रखे। मन में ऐसी शानदार बनावट थी जो असल में बनी ही नहीं थी। पास बैठे खिलाड़ी ने पहले घोषणा कर दी। प्रकाश की पेनल्टी ने पिछली दो डील में मिली छोटी बढ़त मिटा दी।
उसने पत्तों को कोसा। स्कोर लिखने वाली साठ वर्षीय रेलवे कर्मचारी लता ने शीट उसकी ओर घुमा दी।
“पत्ते खराब थे। तुम्हारे फैसले ने उन्हें महँगा बना दिया।”
प्रकाश उठने लगा, फिर रुक गया। उसने पूछा कि गलती कहाँ हुई।
दोनों ने उसके लिखे नोट से हाथ दोबारा बनाया। उसने एक राजा इसलिए रखा था कि दूसरा राजा मिल सकता था। रानी भी उसी उम्मीद में रखी। इसी बीच काम का छोटा पत्ता छोड़ दिया। वह संभावनाओं को अपनी संपत्ति मान रहा था।
अगले सप्ताह लता ने उसके दुखते पैरों के नीचे खाली पेटी रख दी। सांत्वना देने के बजाय उसने तीन मुश्किल शुरुआती हाथ दिए। पूछा, पहले कौन से पत्ते छोड़ोगे और क्यों।
तस्वीर वाले दिन के बाद पहली बार प्रकाश के सामने ऐसा प्रश्न था जिसका उत्तर वह वास्तव में तलाश सकता था।
3. तराजू के नीचे रखी कॉपी
प्रकाश की अभ्यास कॉपी सब्जी के तराजू के नीचे रहती थी। काम के बीच वह तेरह खाने बनाकर उनमें पत्ते लिखता। एक ग्राहक ने उन्हें उधारी का हिसाब समझ लिया।
कुछ मायनों में वह हिसाब ही था।
उसे खुद से यह अंतर वसूलना था कि खेल आना और एक ही गलती दोहराना बंद करना अलग बातें हैं। जिस हाथ में अहंकार के कारण उसने खतरनाक पत्ता बचाया, उस पर निशान लगाया। पास लिखा कि उस समय सचमुच कौन सी जानकारी मौजूद थी।
लता अगला पत्ता दिखाने से पहले उससे डिस्कार्ड का कारण पूछती। बाद में कोई दुर्लभ पत्ता निकल आए तो पहले का समझदार फैसला मूर्खता नहीं बन जाता। खराब फैसला संयोग से सफल हो जाए तो अच्छा भी नहीं बनता।
वे छह डील वाले मुकाबले खेलते। आने वाली मार्केट सर्कल चैम्पियनशिप का यही प्रारूप था। कुल पेनल्टी कम रखने वाला आगे रहता; बराबरी होने पर पहले से लिखे नियम लागू होते। एक बढ़िया डील मदद करती, लेकिन एक लापरवाह डील कई समझदार डीलों का फायदा मिटा देती।
प्रकाश ने एक ही चमत्कार का इंतजार छोड़ना सीखा।
अपनी अकाउंटिंग परीक्षा की तैयारी करती रितु उसके अभ्यास का समय देखती। जब वह तर्क के बजाय अनुमान लगाता, वह कंघी से कॉपी थपथपाती।
“फिर से, बाबा।”
उसे पता चला कि ईमानदार अभ्यास कभी बोरी उठाने से अधिक थका देता है।
4. शर्त वाला निमंत्रण
चैम्पियनशिप की अंतिम तारीख पास आई तो दिनेश का फोन आया। उसका सामान्य अतिरिक्त खिलाड़ी हट गया था।
“हमारे लिए फिर खेल सकते हो,” उसने कहा। “लेकिन टीम का डिनर सदस्यों के लिए है।”
प्रकाश ट्रक के पास खड़ा था। दूसरे मजदूर उसे बुला रहे थे। एक पल पुराना रास्ता आसान लगा: अपमान सहो, अच्छा खेलो, उम्मीद रखो कि अगली तस्वीर अलग होगी।
“एंट्री पर मेरा नाम रहेगा?” उसने पूछा।
“बात इतनी मुश्किल क्यों बना रहे हो?”
प्रकाश ने फोन काट दिया।
उसने खुले पंजीकरण से व्यक्तिगत प्रतियोगिता में नाम दिया। रसीद में वे पैसे चले गए जो नए काम वाले जूतों के लिए रखे थे। रितु ने पुराने जूतों में चमड़े की अतिरिक्त पट्टी लगाई। उसने यह दिखावा नहीं किया कि फैसले की कीमत नहीं थी।
पहले क्वालिफायर में प्रकाश जरूरत से ज्यादा साबित करना चाहता था। वह आगे जाने वालों से एक स्थान पीछे रहा। सीढ़ियों पर बैठा उसने रसीद इतनी मोड़ी कि पसीने से गीली हो गई।
तीन सप्ताह बाद दूसरा क्वालिफायर था। लता ने कहा कि पहले मुकाबले की समीक्षा करनी होगी, और उसमें दिनेश का नाम नहीं लेना होगा।
असल गलती सामने आई। शुरुआती झटका लगते ही उसने धैर्य वाले फैसले छोड़ दिए थे। प्रतिद्वंद्वी मेज पर था भी नहीं। प्रकाश खुद उसे अपने मन में वहाँ बिठाकर लाया था।
5. बिना दर्शकों के तीन सप्ताह
अभ्यास करते समय प्रकाश ने फाइनल की कल्पना बंद की। पहले उसे प्रवेश का रास्ता पार करना था।
उसने ऐसे हाथ बनाए जिनमें अधूरी सीक्वेंस और आकर्षक सेट एक ही पत्ते के लिए खींचतान करते थे। उसने वास्तविक सुधार और सिर्फ सुंदर दिखने वाले फेरबदल का अंतर समझा। प्योर सीक्वेंस न हो तो जोकर को हर समस्या का हल मानना बंद किया।
लता अभ्यास बदलती रहती। कभी अच्छी शुरुआत देकर पूछती कि उसे बिगाड़े बिना कैसे आगे बढ़ोगे। कभी पत्ते लगातार उलझे रहते और काम था निराशा के बाद भी साफ सोचते रहना।
मंडी में दिनेश ने मजदूरों के सामने उसे “हमारा भावी सुपरस्टार” कहा। प्रकाश चुप रहा। उसी शाम उसने बुरा खेला। इस बार वजह कॉपी में लिखी, किस्मत को दोष नहीं दिया।
रितु ने पूछा कि इतनी मेहनत का फायदा होगा भी या नहीं।
“अभी नहीं जानता,” उसने कहा।
यह पहला जवाब था जिस पर बेटी को पूरा भरोसा हुआ।
दूसरे क्वालिफायर में वह छह में सिर्फ एक डील जीता। फिर भी आगे निकला, क्योंकि बाकी पाँच में उसका स्कोर बुरी तरह नहीं टूटा। कुल अंकों में वह मेज पर दूसरे स्थान पर रहा, जो तय क्वालिफाइंग स्थानों में था।
उसने जोड़ दो बार देखा। फिर दो चाय खरीदीं और बेटी को फोन किया। रितु परिणाम पहले ही ऑनलाइन देख चुकी थी।
6. छह कुर्सियाँ और पुरानी आवाज
फाइनल एक विवाह भवन की ऊपरी मंजिल पर था। छह नंबर वाली कुर्सियों के ऊपर पंखे खड़खड़ा रहे थे। प्रकाश के सामने छपा नाम था, उसकी वर्तनी भी सही थी।
दो कुर्सियाँ छोड़कर दिनेश बैठा था।
“मंडी ने अपना सामान ढोने वाला विभाग भेजा है,” उसने कहा।
प्रतियोगिता पर्यवेक्षक ने ऊपर देखा। “इस मेज पर खिलाड़ियों को उनके नाम से बुलाइए।”
बस इतना। कोई लंबा भाषण नहीं। प्रकाश को यह छोटा स्पष्ट नियम तालियों से अधिक उपयोगी लगा।
पहली शफल से पहले खिलाड़ियों ने छह डील का स्कोर प्रारूप और बराबरी के नियम पढ़े। प्रकाश शीट देखता रहा। बाहर रितु अपने चचेरे भाई को समझा रही थी कि आखिरी डील जीतने वाला जरूरी नहीं पूरी प्रतियोगिता भी जीते।
पहली डील दिनेश ने पूरी की। प्रकाश का हाथ तब तक अधूरा था। पेनल्टी तकलीफ देने वाली थी, पर मुकाबले से बाहर नहीं करती थी। दूसरे खिलाड़ी के पास उससे बहुत भारी बचे पत्ते थे।
दिनेश ने देखा, जैसे पुराने अतिरिक्त खिलाड़ी के घबराने का इंतजार हो।
प्रकाश ने अंक लिख लिए।
दूसरी डील में उसे जल्दी प्योर सीक्वेंस मिली। उसने उसके आसपास हाथ बनाया, मगर अच्छी शुरुआत को जीत का वादा नहीं माना। डील खत्म हुई तो उसकी पेनल्टी छोटी थी।
दो डील बीतीं, चार बाकी थीं। इस बार दिनेश के चेहरे से अधिक महत्व पूरे मुकाबले के ढाँचे का था।
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7. वह पत्ता जिसे छोड़ना था
तीसरी डील में प्रकाश के पास दो राजा थे। तीसरा मिलने की संभावना आकर्षित कर रही थी। साथ ही छोटे पत्तों की सीक्वेंस में एक जगह खाली थी। कुछ महीने पहले वह राजाओं से सिर्फ इसलिए प्रेम करता कि वे ताकतवर दिखते थे।
उसने खुले पत्ते और अपना बदलता हाथ देखा। एक राजा अब सबसे उपयोगी रास्ते में मदद नहीं करता था। उसे बचाने के लिए ऐसा पत्ता छोड़ना पड़ता जो एक से अधिक बनावटों में काम आ सकता था।
उसने राजा छोड़ दिया।
दिनेश मुस्कराया। शायद उसे फैसला गलत लगा, शायद वह प्रकाश को यही सोचने पर मजबूर करना चाहता था। एक मुस्कान से पूरा हाथ पढ़ना संभव नहीं था। प्रकाश ने कोशिश नहीं की।
दो चाल बाद एक और राजा ऐसी जगह आया जहाँ से वह उसे नहीं ले सकता था। पछतावा उठा। फिर लता का अभ्यास याद आया: फैसला उस समय की जानकारी से परखो, बाद में आए पत्ते से नहीं।
वह खेलता रहा। किसी और ने घोषणा की। प्रकाश की पेनल्टी सीमित रही और कुल अंक उसे दिनेश के करीब ले आए।
चौथी डील खराब गई। उपयोगी बनावट जल्दी नहीं बनी और प्रतिद्वंद्वी पहले पूरा कर गया। उसका कुल स्कोर उछल गया।
बाहर रितु की मुस्कान गायब हुई। दिनेश कुर्सी पर पीछे झुक गया।
प्रकाश ने पानी माँगा। कप पकड़ते हाथ काँपे, पर उसने स्कोर लिखने वाले से वह अंक छिपाने को नहीं कहा।
8. पाँचवीं डील
डीलों के बीच किसी को खिलाड़ियों को सलाह देने की अनुमति नहीं थी। चौथी डील का जवाब प्रकाश को अकेले खोजना था।
पहला विचार था कि कोई जबरदस्त फिनिश करके सब वापस खींच ले। वह इसे पहचान गया। कॉपी में कई बार लिख चुका था: चोट कभी महत्वाकांक्षा का रूप पहन लेती है।
पाँचवें शुरुआती हाथ में एक काम की सीक्वेंस और कुछ अलग संभावनाएँ थीं। उसने सुरक्षित बनावट को अधूरे हिस्सों से अलग किया। जोकर ने एक समूह सुधारा, लेकिन वहाँ इस्तेमाल करने से पहले उसने देखा कि कहीं दूसरी जरूरी बनावट तो नहीं टूट रही।
मेज शांत होती गई। दिनेश भी अब फैसलों में अधिक समय ले रहा था।
प्रकाश को ऐसा पत्ता मिला जिसने अंतिम समूह पूरा कर दिया। उसने तुरंत घोषणा नहीं की। तेरह पत्ते गिने, जरूरी सीक्वेंस जाँचीं और हर सेट देखा। फिर नजर पूरे हाथ पर दोबारा दौड़ाई।
उसके बाद घोषणा की।
पर्यवेक्षक ने हाथ सही माना। उस डील में प्रकाश के शून्य अंक जुड़े। दूसरों की पेनल्टी से कुल स्थिति बदली। अब वह दिनेश से तीन अंक पीछे था। तीसरा खिलाड़ी भी इतना करीब था कि दोनों को हरा सकता था।
बाहर रितु ने कंघी हथेली में कस ली।
पहले की गलतियाँ चमत्कार से मिटने वाली नहीं थीं। अंतिम डील उन्हीं पाँच के ऊपर जुड़ती। प्रकाश ने एक अवसर कमाया था, उससे अधिक कुछ नहीं।
9. आखिरी डील की माँग
छठा हाथ सुंदर नहीं था। निराशा चुभी, फिर प्रकाश ने काम शुरू किया।
दो रास्ते दिखे। एक में महँगी जोड़ी बचाकर बहुत सीमित सुधार का इंतजार करना था। दूसरे में देखने लायक कम था, मगर बदलने की जगह अधिक थी। उसने दूसरा रास्ता चुना।
दिनेश ने खुले ढेर से पत्ता उठाया। प्रकाश ने ध्यान दिया, यह दावा नहीं किया कि उससे पूरा हाथ समझ आ गया। वह दिखाई देने वाली जरूरत में लापरवाही से पत्ता नहीं देगा, लेकिन काल्पनिक खतरे से बचते हुए अपना हाथ भी नहीं बिगाड़ेगा।
कई चालें बीतीं। तीसरे स्थान वाला तेजी से आगे बढ़ रहा था। उसकी घोषणा दोनों प्रतिद्वंद्वियों के पूरा करने से पहले चैम्पियन तय कर सकती थी।
प्रकाश ने एक और बड़ा पत्ता छोड़ दिया जो अब अपनी जगह का औचित्य खो चुका था। दिनेश ने उसे गिरते देखा। इस बार मुस्कराया नहीं।
अगली चाल में तीसरे खिलाड़ी ने घोषणा कर दी।
प्रकाश को पहले लगा कि वह हार गया। फिर हाथ जाँचे गए और अंक दर्ज हुए। जोखिम घटाने से उसकी पेनल्टी दिनेश से कम थी। अंतर कुल स्थिति उलटने के लिए पर्याप्त था, लेकिन इतना छोटा कि किसी ने मन के जोड़ पर भरोसा नहीं किया।
स्कोरकीपर ने कॉलम जोड़े। पर्यवेक्षक ने जाँचा। अंतिम बोर्ड पर प्रकाश दो अंक से प्रथम था।
उसने सिर्फ आखिरी डील का तमाशा नहीं जीता था। उसने पूरा मुकाबला जीता था। दिनेश छह अलग पंक्तियों को देखता रहा, जिनसे कोई सुविधाजनक बहाना नहीं निकल रहा था।
10. ऊपर पहुँची तस्वीर
पुरस्कार के समय मंडी अध्यक्ष ने प्रकाश के कंधे पर हाथ रखा।
“हमारी मंडी का चैंपियन।”
प्रकाश उस बाँह से निकलकर खड़ा हुआ। “प्रकाश साहू।”
अध्यक्ष ने माइक्रोफोन में पूरा नाम दोहराया। और कुछ जोड़ने से पहले ऋतु ने ताली शुरू कर दी।
दिनेश ने टीम की तस्वीर सुझाई। प्रकाश ने छहों फाइनलिस्ट को बुलाया, अंतिम स्थान वाला भी जो बैरियर के पास था। सबको लेने के लिए कैमरा पीछे करना पड़ा। दिनेश ऐसे फ्रेम के किनारे आया जिसे सबके सामने काट नहीं सकता था।
दो दिन बाद मंडी कार्यालय में तस्वीर और पूरे परिणाम पहुँचे। क्लर्क ने ऊपर लाने के लिए आवाज़ दी। दिनेश ने भरी ट्रॉली लेकर जाते प्रकाश को देखा और सीढ़ी से उँगलियाँ बजाईं।
प्रकाश ने ट्रॉली रोकी। “पहले ये डिलीवरी हैं।”
क्लर्क खुद नीचे आया, पार्सल उठाया और दिनेश के पास से ऊपर चला गया।
दोपहर तक तस्वीर दीवार पर थी। ऋतु प्रकाश को दिखाने लाई। नीचे चैंपियन, बाकी फाइनलिस्ट और कुल अंक लिखे थे। तस्वीर में पैरों के पास उसका काम का बैग भी था।
एक व्यापारी ने विजेता पूछा। दिनेश पास खड़ा था। क्लर्क ने प्रकाश की ओर इशारा किया।
“ये रहे। यहीं हैं।”
व्यापारी तस्वीर से मुड़कर उसका हाथ मिलाने आया। प्रकाश ने डिलीवरी की रसीद दिनेश की मेज़ पर रखी और इंतज़ार कर रही बातचीत शुरू होने दी।
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