नीली जैकेट वाले आदमी ने कहा, “इस पर चुटकुला क्यों बरबाद कर रहे हो? इसे सुनाई थोड़े देगा।”
ध्रुव को आखिरी हिस्सा समझ आया।
आदमी का चेहरा रोशनी की तरफ था। उससे पहले उसने सिर घुमाया था, इसलिए शुरुआती शब्द ध्रुव से छूट गए थे। ध्रुव ने उनका अंदाज़ा लगाकर कोई पूरी कहानी नहीं बनाई। जो दिखा था, उतना ही काफी था।
बगल वाला आदमी हँसा। प्रकाश भी हँसा।
फिर प्रकाश उसकी तरफ मुड़ा और परिचित संकेतों में बताया, “पूछ रहे हैं, खाना अच्छा लगा?”
ध्रुव ने प्लेट नीचे रख दी।
“उससे पहले क्या कहा था?”
प्रकाश ने हाथ हिलाया। “कुछ खास नहीं।”
ग्यारह साल से ध्रुव उसके हाथों को देखता आया था। उन्हीं हाथों ने पहली प्रतियोगिता में उसका परिचय कराया था, रेलवे स्टेशन पर बदला हुआ प्लेटफॉर्म बताया था, एक बार अस्पताल की खिड़की पर उसके लिए लंबी बहस की थी।
आज उन्हीं हाथों ने सामने कही गई बात उससे छिपा ली थी।
* * *
ध्रुव तैंतीस साल का था। फर्नीचर बनाने वाली कंपनी के गोदाम में काम करता था और छुट्टी के दिन तीन पत्ती की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता था।
उसे खेल के नियम समझाने के लिए किसी स्थायी साथी की जरूरत नहीं थी। जरूरत थी कि समय बदलने की सूचना लिखकर मिले, अधिकारी बात करते समय उसकी तरफ देखें और अगली बारी का संकेत उसे दिखाई दे।
इन सुविधाओं से उसके पत्ते बेहतर नहीं हो जाते थे। बस उसे वह जानकारी मिलती थी जो कमरे में बाकी लोगों को पहले ही मिल चुकी होती थी।
वह बधिर था और आम तौर पर सांकेतिक भाषा या लिखे हुए शब्दों से बातचीत करता था। कुछ लोगों के होंठ पढ़ लेता था, कुछ के नहीं। चेहरा दूसरी तरफ हो, रोशनी खराब हो या बोलने वाला जल्दी बोले, तो बात छूट जाती थी।
लगातार होंठ पढ़ने की कोशिश थकाती भी थी।
प्रकाश पहले दोस्त बनकर साथ जाता था। बाद में प्रतियोगिताओं का पंजीकरण, आयोजकों से संपर्क और कुछ प्रशासनिक काम सँभालने लगा। दोनों ने पुरस्कार में से दस प्रतिशत उसके काम के लिए तय किए थे।
ध्रुव प्रतिशत समझता था।
उसने सिर्फ उस रकम को जाँचना छोड़ दिया था, जिसका दस प्रतिशत काटा जाता था।
* * *
समारोह से लौटते समय प्रकाश ने फोन पर एक संदेश दिखाया।
“आगे प्रायोजक मिल सकता है। ऐसे लोगों के बीच थोड़ा ज्यादा मुस्कुराया करो।”
ध्रुव ने जवाब लिखा, “उस आदमी ने क्या कहा था?”
“बेकार का मजाक था। समझाने लायक नहीं।”
लाल बत्ती पर गाड़ी रुकी। बाहर दो दुकानदार शटर बंद कर रहे थे। एक ने उँगली से अटका हुआ कोना दिखाया। दूसरे ने नीचे झुककर उसे ठीक किया। दोनों ने बिना कोई मुश्किल पैदा किए एक-दूसरे की बात समझ ली।
ध्रुव उन्हें देखता रहा।
घर में उसने पुरस्कार समारोह वाली कमीज उतारकर कुर्सी पर रख दी। सुबह उसे बड़ी सावधानी से इस्तरी किया था। आस्तीन पर अब खाने का छोटा दाग था।
रात को प्रकाश का संदेश आया।
“तुम्हारा हिस्सा पैंतीस हजार बनेगा। बाकी कटौतियाँ मैंने देख ली हैं। कल भेज दूँगा।”
ध्रुव ने धन्यवाद नहीं लिखा।
उसने प्रतियोगिता की पुरस्कार सूची खोजी।
* * *
उसकी श्रेणी के सामने एक लाख रुपये लिखे थे।
नाम, तारीख और श्रेणी तीनों सही थे।
इस आयोजन में पंजीकृत समूह प्रतिनिधि को खिलाड़ियों की अनुमति से पुरस्कार भेजे गए थे। ध्रुव के लिए वह प्रतिनिधि प्रकाश था। उस व्यवस्था पर उसने पहले सवाल नहीं उठाया था।
अब उसने लिखा, “पूरा हिसाब भेजो।”
एक आवाज वाला संदेश आया।
“लिखकर भेजो, कृपया।”
दूसरा आवाज वाला संदेश आया। उसके नीचे प्रकाश ने लिखा, “बहुत लंबा है। मिलकर समझा दूँगा।”
दो दिन बाद दोनों एक कैफे में मिले। प्रकाश ने तेजी से संकेत किए—आना-जाना, प्रशासन, क्लब के खर्चे, साझा योगदान। ध्रुव ने उसे धीमा होने को कहा, फिर हर रकम लिखने को कहा।
प्रकाश की उँगलियाँ रुक गईं।
“इतना सब करने के बाद तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारे पैसे खा रहा हूँ?”
“मैंने हिसाब माँगा है।”
प्रकाश ने जवाब दिया, “अलग से कोई हिसाब नहीं है। खर्चे तो बता दिए।”
प्रकाश कुर्सी पर पीछे टिक गया। उसने पास से गुजरते कर्मचारी को रोका और कुछ पूछने लगा।
ध्रुव इंतजार करता रहा।
उसे लगा, उसकी बात से बचने के लिए प्रकाश ने किसी ऐसे आदमी को चुन लिया था जिससे बात करना उसके लिए आसान था। शायद प्रकाश ने खुद उस पल को इस तरह नहीं देखा होगा। मेज के इस तरफ से वही दिख रहा था।
* * *
छोटी बहन रूपा ने कागज देखे तो तुरंत प्रकाश को संदेश लिखने लगी।
ध्रुव ने उसका हाथ हल्के से छुआ।
“अभी मत भेजो।”
वह उसकी तरफ मुड़ी। ध्रुव जानता था, उसका गुस्सा उसके लिए था। फिर भी उसे एक और ऐसे व्यक्ति की जरूरत नहीं थी जो उसके बोलने से पहले उसकी जगह बोल दे।
दोनों रसोई के फर्श पर बैठ गए। रूपा ने पुराने कागज तारीख के हिसाब से लगाए। ध्रुव ने समझौता पढ़ा।
दस प्रतिशत का भुगतान साफ लिखा था। अतिरिक्त खर्च के लिए पहले सहमति और उसका रिकॉर्ड चाहिए था।
दो पुरानी यात्राओं के खर्च उसने मंजूर किए थे। उनके संदेश भी मिले। इस प्रतियोगिता के लिए ऐसी कोई मंजूरी नहीं थी।
एक लाख में से दस हजार घटते थे।
उसे नब्बे हजार मिलने चाहिए थे।
पैंतीस हजार मिले थे।
बीच के पचपन हजार का जवाब कागजों में नहीं था।
उसने नोटबुक में लिखा, “मुझे स्वतंत्र मदद चाहिए।”
रूपा ने फोन फिर उठाया, लेकिन इस बार रुकी।
“किस तरह की?”
ध्रुव ने पहली बार उस शाम बिना जल्दी किए जवाब दिया।
* * *
उसने एक दुभाषिया सेवा से संपर्क किया। सलोनी ने लिखकर उत्तर भेजा।
काम स्वीकार करने से पहले दोनों ने छोटी मुलाकात की, ताकि देख सकें कि उसकी सांकेतिक भाषा ध्रुव सहजता से समझ पाता है या नहीं। उन्होंने शुल्क, समय और काम की सीमा तय की।
सलोनी बातचीत का अनुवाद करेगी। पैसे का विवाद तय करना उसका काम नहीं था।
हिसाब समझने के लिए ध्रुव ने अलग से एक सलाहकार की मदद ली।
पहली बैठक धीमी चली।
किसी रकम पर सवाल होता तो बातचीत रुक जाती। ध्रुव कागज देखता, फिर पूछता। जरूरत पड़ती तो बात दोबारा समझाई जाती। किसी ने घड़ी देखकर लंबी साँस नहीं छोड़ी।
सलाहकार ने कहा कि कुछ दस्तावेज अभी गायब हैं। सलोनी ने पूरी बात पहुँचाई। ध्रुव ने पूछा, कौन से दस्तावेज, किससे माँगने हैं और मिलने तक क्या स्पष्ट नहीं कहा जा सकता।
उसे सारे जवाब एक साथ समझ नहीं आए।
उसने फिर पूछा।
घर लौटते समय थकान थी, मगर वह अलग तरह की थकान थी। आज उसने कुछ सीखा था। उसे जानने का हक माँगते रहने में पूरी ताकत नहीं लगानी पड़ी थी।
* * *
अगली बैठक में प्रकाश ऐसे आया जैसे किसी पुराने दोस्त की गलतफहमी सहने का बड़ा काम कर रहा हो।
Telegram · WhatsApp Channel · WhatsApp Group
उसने सलोनी से कहा, “इसे बताइए, मैं मदद करने आया हूँ।”
सलोनी ने वही बात ध्रुव तक पहुँचाई।
ध्रुव ने जवाब दिया। सलोनी ने उसकी ओर से कहा, “आप सीधे उनसे बात कर सकते हैं। मैं अनुवाद कर दूँगी।”
आयोजक से माँगी गई भुगतान पुष्टि सामने रखी थी।
एक लाख रुपये प्रकाश को भेजे गए थे।
प्रकाश ने रसीदें निकालीं। कुछ दूसरी प्रतियोगिता की थीं। एक यात्रा में ध्रुव गया ही नहीं था। समूह के कपड़ों का खर्च भी था, जिसे पुरस्कार से काटने की सहमति नहीं मिली थी।
“दोस्तों में हर चीज लिखी थोड़े जाती है,” प्रकाश ने कहा।
ध्रुव ने संकेत करना शुरू किया।
इस बार उसका जवाब छोटा नहीं था।
सलोनी ने बीच में उसकी बात समेटने की कोशिश नहीं की। उसने पूरा होने दिया, फिर उतने ही विस्तार से आवाज में कहा।
* * *
“तुम्हारा दस प्रतिशत मैं समझता हूँ। पहले जिन दो यात्राओं का खर्च मैंने मंजूर किया था, वह भी समझता हूँ। यह नहीं समझता कि तुमने क्यों कहा कि कोई हिसाब नहीं है, जबकि भुगतान का रिकॉर्ड मौजूद है।”
प्रकाश बोलने लगा। सलाहकार ने उसे थोड़ी देर रुकने को कहा।
ध्रुव ने आगे कहा।
“मैं रकम पूछता हूँ तो तुम कहते हो कि मैं तुम्हारी कद्र नहीं करता। मैं पूछता हूँ किसी ने क्या कहा, तो तुम तय करते हो कि वह बात मेरे लिए जरूरी है या नहीं।”
सलोनी के हाथ और आवाज दोनों अपना काम कर रहे थे।
“मैंने बातचीत में सहायता ली थी। मैंने तुम्हें यह अधिकार नहीं दिया था कि मुझे क्या जानना चाहिए, यह तुम चुनो।”
ध्रुव ने प्रकाश का चेहरा देखा।
पुराने समारोह याद आए। वह कई वाक्य संकेतों में कहता था, और प्रकाश माइक पर कुछ छोटा कहकर मुस्कुरा देता था। कभी “सबको धन्यवाद”, कभी “बहुत खुश है”, कभी “इसे खेल बहुत पसंद है।”
पहले उसने मान लिया था कि शायद वही जरूरी हिस्सा होगा।
प्रकाश ने कहा, “इतने साल मैंने तुम्हारे लिए चीजें आसान कीं।”
ध्रुव ने उत्तर दिया, “कुछ चीजें। यह नहीं।”
वह पुराने अच्छे काम मिटाना नहीं चाहता था। लेकिन उन्हें सामने रख देने से आज का गलत काम सही नहीं हो जाता था।
उसने अपनी माँग लिखकर दी।
अब उसे लिखित जवाब चाहिए था।
* * *
उसी शाम पैसे वापस नहीं आए।
कई दस्तावेज माँगने पड़े। संदेश भेजने पड़े। ध्रुव को काम की पाली देखकर बैठकों का समय रखना पड़ा। दुभाषिए का शुल्क भी देना पड़ा।
छह सप्ताह बाद लिखित समाधान के तहत पचपन हजार रुपये लौटे।
दूसरे पुराने खातों की जाँच अलग चलनी थी। ध्रुव ने प्रकाश का प्रतिनिधित्व समाप्त कर दिया।
प्रकाश का संदेश आया, “तो इतने सालों का कोई मतलब नहीं था?”
उस समय ध्रुव काम से लौटा था। उसके हाथ में चावल का पैकेट था। उसने पैकेट मेज पर रखा और संदेश फिर पढ़ा।
फिर लिखा, “इतना मतलब था कि मैंने तुम पर भरोसा किया। इसीलिए यह बात जरूरी है।”
उसने नीचे कोई सफाई नहीं जोड़ी।
अगले दिन उसने आयोजकों की सामान्य प्रक्रिया से अपने संपर्क का विवरण बदलवाया। आगे की सूचनाएँ सीधे उसके पास आनी थीं।
पंजीकरण में नाम वही रहा।
जानकारी पाने वाला व्यक्ति बदल गया।
ध्रुव ने पुष्टि वाला संदेश काफी देर तक खुला रखा।
* * *
अगली प्रतियोगिता में स्वतंत्र रूप से प्रवेश लेने के लिए बहुत से संदेश करने पड़े।
कुछ लोगों ने ठीक जवाब दिया। कुछ ने लिखित जानकारी माँगने के बाद भी आवाज वाले संदेश भेजे। एक सहायक ने पूछा कि क्या वह अपने साथ “किसी जिम्मेदार व्यक्ति” को ला सकता है।
ध्रुव ने लिखा, “अपने प्रवेश की जिम्मेदारी मेरी है। बातचीत में सहायता के लिए कोई आ सकता है।”
सहायक ने माफी माँगी।
लिखित घोषणाओं और दिखाई देने वाले संकेतों की व्यवस्था तय हुई। कोई उसे पत्तों का अर्थ या चाल का चुनाव समझाने नहीं आने वाला था।
अभ्यास में उसे एक पुरानी आदत छोड़नी पड़ी। सवाल होते ही उसकी नजर प्रकाश की कुर्सी खोजती थी।
अब वह अधिकारी का ध्यान खींचता।
शुरू में अटपटा लगा। कभी जवाब देर से मिला, कभी उसे फिर पूछना पड़ा। फिर भी उसे पता रहता था कि सवाल कहाँ गया और उत्तर किसने दिया।
एक शाम रूपा अभ्यास देखने आई। दर्ज किए गए कुल अंक पर मतभेद हुआ। ध्रुव ने जाँच कराई। अंक ठीक किए गए।
बाहर रूपा ने कहा, “तुम काफी चिढ़े हुए लग रहे थे।”
ध्रुव मुस्कुराया। “था।”
हर छोटी परेशानी को उसके साहस की कहानी बनाने की जरूरत नहीं थी।
गलत अंक देखकर उसे भी चिढ़ हो सकती थी।
* * *
प्रतियोगिता के दिन अधिकारी ने शुरुआत की जानकारी कमरे की दूर वाली दीवार की तरफ मुँह करके दी।
ध्रुव ने हाथ उठाया और पहले से तय लिखित सूचना माँगी।
थोड़ा समय लगा। फिर जानकारी बाँटी गई।
एक और खिलाड़ी ने कागज देखकर समय बदलने पर सवाल किया। वह भी घोषणा का वह हिस्सा नहीं समझ पाया था। उसने ध्रुव को धन्यवाद कहा।
ध्रुव का पहला सत्र मिला-जुला रहा। दो फैसले अच्छे थे, एक गलती साफ थी। वह अगले चरण में पहुँच गया।
जरूरत पड़ने पर किसी ने उसका ध्यान खींचा, फिर सामने देखकर बात की। सवाल अस्पष्ट होता तो उसने स्पष्ट कराया।
उसे दूसरों के चेहरे देखकर हर पत्ता पहचान लेने की कोई विशेष शक्ति नहीं मिली थी। वह भी मजबूत हाथ को गलत पढ़ सकता था। सामने वाला भी उसके अंदाज को गलत समझ सकता था।
उसे बस एक सामान्य खिलाड़ी की तरह निष्पक्ष मौका मिला था।
दूसरे दिन वह अंतिम मुकाबले में पहुँच गया।
* * *
दर्शकों में प्रकाश बैठा था।
उसके पास वही आदमी था जिसने उस रात नीली जैकेट पहनी थी। आज उसके कपड़े अलग थे। ध्रुव ने फिर भी पहचान लिया।
एक पल को उसका मन हुआ कि जाने, अभी दोनों क्या कह रहे हैं।
फिर उसने मेज की तरफ देखा।
आखिरी मुकाबला आसान नहीं था। वह पीछे हुआ, कुछ अंतर घटाया, फिर आखिरी मौके तक पहुँचा। अब तक पहुँचना भी परिणाम की गारंटी नहीं था।
अंतिम परिणाम घोषित होने पर आसपास के लोग पहले प्रतिक्रिया दे चुके थे।
अधिकारी ने उसकी तरफ देखा, बात समझी और परिणाम वाला बोर्ड घुमा दिया।
पहले स्थान पर उसका नाम था।
ध्रुव ने दो बार पढ़ा।
फिर हँस पड़ा।
सामने वाले खिलाड़ी ने हाथ बढ़ाया। ध्रुव ने हाथ मिलाया। रूपा इतनी तेजी से संकेत कर रही थी कि उसने उसे धीमा होने को कहा।
वह रुकी, फिर खुद भी हँसने लगी।
इस बार उसे किसी और की मुस्कुराहट से अनुमान नहीं लगाना था कि शाम उसके लिए कैसी रही।
* * *
पुरस्कार के बाद छोटे साक्षात्कार की पहले से व्यवस्था थी। सलोनी उसी हिस्से के लिए आई थी। वह खेलने के दौरान उसके साथ नहीं बैठी थी।
उसने ऐसी जगह ली जहाँ ध्रुव और दर्शक दोनों उसे देख सकें।
मेजबान ने पूछा कि यह जीत उसके लिए क्या मायने रखती है।
ध्रुव ने जवाब शुरू किया। कुछ वाक्य हो चुके थे कि मेजबान ने कार्यक्रम की सूची देखी।
“इसे छोटा सा धन्यवाद रख सकते हैं।”
सलोनी ने यह बात भी ध्रुव को बताई।
ध्रुव ने एक वाक्य कहा।
सलोनी की आवाज में वह कमरे तक पहुँचा।
“मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई है।”
मेजबान रुक गया।
फिर बोला, “ठीक है।”
ध्रुव ने आगे कहा। उसने उन लोगों को धन्यवाद दिया जिन्होंने जानकारी सीधे पहुँचाई थी, साथ खेले लोगों को और अपने परिवार को।
फिर उसने किसी की बात पहुँचाने और उसकी जगह सुविधाजनक बात चुन लेने का फर्क बताया।
उसने प्रकाश का नाम नहीं लिया। पुराने हिसाब की पूरी कहानी भी नहीं सुनाई। मंच पर उसका हर निजी मामला रखने की जरूरत नहीं थी।
लेकिन जो वाक्य वह खुद कहना चाहता था, वे जरूरी थे।
* * *
“मेरे सवाल का यह मतलब नहीं कि मैं समझ नहीं पाया। कभी इसका मतलब होता है कि आपने जवाब नहीं दिया।”
ध्रुव ने थोड़ा रुककर आगे कहा।
“मैं आभारी होकर भी असहमत हो सकता हूँ। मदद लेकर भी अपना फैसला खुद कर सकता हूँ। आज जीत सकता हूँ और अगली बार खराब खेल सकता हूँ। इनमें से किसी वजह से मेरे शब्द किसी और के नहीं हो जाते।”
सामने कई फोन नीचे हो गए थे।
चेहरे उसकी तरफ थे। मेजबान अब सूची नहीं देख रहा था।
ध्रुव ने सलोनी को उसकी पूरी बात पहुँचाने के लिए धन्यवाद दिया।
सलोनी ने वह वाक्य भी पूरा अनुवाद किया।
फिर ध्रुव के हाथ आराम से रुक गए।
मेजबान ने एक पल इंतजार किया, जैसे इस बार सचमुच देखना चाहता हो कि बात खत्म हुई है या नहीं।
“धन्यवाद, ध्रुव।”
ध्रुव ने सिर हिलाया।
यह बहुत साधारण शिष्टाचार था।
उसे इतना असाधारण नहीं लगना चाहिए था।
* * *
बाहर प्रकाश उसके पास आया। रूपा आगे बढ़ी, लेकिन ध्रुव ने उसकी बाँह छूकर रोक दिया।
“मुझे बात करने दो।”
प्रकाश ने संकेतों में कहा कि मंच पर इतना कहना जरूरी नहीं था।
ध्रुव ने पूछा, “कौन सा हिस्सा?”
प्रकाश ने आसपास खड़े लोगों की तरफ देखा। फिर कहा कि किसी दिन अकेले में बात कर लेंगे।
ध्रुव ने बताया कि बाकी आर्थिक सवाल लिखकर भेजे जा सकते हैं। आज शाम उसे कोई और मुलाकात तय नहीं करनी थी।
प्रकाश थोड़ी देर खड़ा रहा। शायद उसे पुराने जैसा आश्वासन चाहिए था, कोई वाक्य जिससे लगे कि सब फिर पहले जैसा हो जाएगा।
ध्रुव रूपा की तरफ मुड़ चुका था। दो दोस्तों के साथ खाने जाना था।
रेस्तराँ में कर्मचारी ने रूपा से पूछा कि उसके भाई को क्या चाहिए। उसने ध्रुव की तरफ इशारा किया।
ध्रुव ने खाने का नाम दिखाया, फिर एक सवाल फोन पर लिखा। कर्मचारी ने पढ़ा, जवाब दिया और उसके चुनाव का इंतजार किया।
खाना मँगाया गया।
किसी ने उस छोटी बातचीत पर भाषण नहीं दिया।
चार लोग अपनी शाम बिता रहे थे।
* * *
एक सप्ताह बाद आयोजकों ने साक्षात्कार का वीडियो भेजा।
ध्रुव ने लिखित कैप्शन चालू किए। शुरुआत से अंत तक देखा। उसका पूरा जवाब मौजूद था।
संकेत और अनुवाद के बीच थोड़ा अंतर था। उसे वह अंतर अच्छा लगा। इतने समय तक लोग उसकी बात आने का इंतजार कर रहे थे।
पुराने वीडियो में उसके हाथ देर तक चलते दिखते थे और नीचे बस लिखा रहता था कि वह बहुत खुश है।
इस वीडियो में शब्द उसके थे।
रूपा ने पूछा, साझा कर दूँ?
उसने हाँ कहा। फिर उसने उसके लिए पंक्ति लिख देने के बजाय इंतजार किया।
ध्रुव ने खुद लिखा।
“मैंने यही कहा था।”
फोन रखकर उसने अगले आयोजक का संदेश खोला।
एक समय की पुष्टि माँगी गई थी।
उसने अपनी काम की पाली देखी, दूसरा समय सुझाया और साफ जवाब पाया।
ध्रुव ने कैलेंडर पर मुलाकात लिख ली।
इस बार किसी ने उसके लिए तय नहीं किया था कि उसका सवाल जरूरी नहीं है।