Rummy 91 — छह कुर्सियाँ, कोई एप्रन नहीं
Rummy 91

Rummy 91 — छह कुर्सियाँ, कोई एप्रन नहीं

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

एप्रन आकर रूपा के अंकपत्र पर गिरा। नॉर्थगेट के शोरूम मैनेजर की बाँह पर पाँच और थे। एक लता को थमाया। जावेद से कहा कि मेहमान आने से पहले डिब्बे दूसरी तरफ रखने…

एप्रन आकर रूपा के अंकपत्र पर गिरा।

नॉर्थगेट के शोरूम मैनेजर की बाँह पर पाँच और थे। एक लता को थमाया। जावेद से कहा कि मेहमान आने से पहले डिब्बे दूसरी तरफ रखने हैं।

“आठ बजे तक हमारा अभ्यास है,” रूपा ने कहा।

“लॉन्च सात बजे शुरू होगा। बाद में खेल लेना।”

समीर की बस की पाली सुबह छह बजे शुरू हुई थी। उसने घड़ी देखी, फिर दरवाजे के बाहर रखी साफ गिलासों की ट्रे।

“हमने कार्यक्रम में आने की बात मानी थी।”

“तो यही कार्यक्रम है।”

मैनेजर सबसे छोटे खिलाड़ी नीलेश की तरफ मुसकराया। “चलो, कुछ काम आओ।”

पच्चीस साल के नीलेश ने एप्रन ले लिया। टीम की कमीज उसने पिछली रात हाथ से धोई थी। उसी के ऊपर गाँठ बाँधने लगा।

मैनेजर ने पंखे का प्लग निकाला। उसे पेय के काउंटर के पीछे चाहिए था। जाते हुए कहा कि बैग ऐसे रखो जहाँ ग्राहकों को न दिखें।

रूपा ने अंकपत्र खींच लिया। उसके ऊपर अब गिलास रखने की तैयारी थी।

* * *

इस टीम को कंपनी ने बनाया नहीं था। छह लोग डेढ़ साल से साथ अभ्यास कर रहे थे। रूपा एक दुकान का हिसाब रखती थी। समीर बस कंडक्टर था। लता कपड़ों की सिलाई-सुधार करती थी, जावेद मोटरसाइकिलें ठीक करता था, नीलेश पार्सल पहुँचाता था और अरुणा नगरपालिका के दफ्तर में काम करती थी।

छह अलग नौकरियों के बीच अभ्यास का समय निकालते थे। उनकी इंडियन रमी प्रतियोगिता में हर दौर में चार खिलाड़ी खेलते और दो रिजर्व रहते थे। तय चरणों पर सूची बदली जा सकती थी, इसलिए तैयारी सभी की होती थी।

मुश्किल कमरे की थी। पुराना मनोरंजन केंद्र मरम्मत के लिए बंद हो गया था। शाम को उपलब्ध दूसरी जगहें महँगी थीं।

नॉर्थगेट होमवेयर ने प्रायोजन के बदले कमरा और शुरुआती पाँच हजार रुपये दिए। समझौते में अभ्यास की जगह लिखी थी। मैनेजर उसे प्रशिक्षण केंद्र कहता था। मिला शोरूम के पीछे सामान रखने वाला कमरा।

शुरू में सबने कहा, चल जाएगा। मेज लग जाती थी। ताला था। दरवाजा खुला रहे तो हवा भी आ जाती थी।

* * *

तीन हफ्ते रूपा किसी तरह व्यवस्था चलाती रही। ग्राहक आते तो दरवाजा बंद रखने को कहा जाता। उधार की मेज दो बार बिक्री कार्यक्रम में चली गई। कुर्सियाँ सजावटी खोल पहनकर लौटीं, जिन्हें गंदा नहीं करना था।

एक मंगलवार लता पहुँची तो मेज पर मग के डिब्बे थे। उसने नीचे साफ जगह पर रख दिए। मैनेजर बोला कि सामान सोच-समझकर सजाया था।

“हम भी सोच-समझकर आए हैं,” लता ने कहा।

रूपा ने अभ्यास के निश्चित घंटे माँगे। बदले में लॉन्च की तारीख मिली। उस शाम उपस्थित रहना उनके समझौते में था। ग्राहकों से मिलना था, कंपनी की समर्थित टीम के रूप में परिचय होना था।

समीर ने पाली बदली। लता ने ग्राहक से कहा कि तैयार ब्लाउज अगले दिन ले जाए। फिर एप्रन मिले।

पहले घंटे वे गिलास उठाते और सामान रखते रहे। मेहमान आने लगे थे। रूपा परिचय की प्रतीक्षा करती रही। आठ बजे मैनेजर ने काउंटर के पास गिरे पेय की तरफ इशारा किया।

रूपा ने ट्रे रख दी। “सफाई वाले कहाँ हैं?”

“व्यस्त हैं।”

“हम भी हैं।”

एक ग्राहक मुड़ा तो मैनेजर पास आकर धीमे बोला, “पाँच हजार दिए। कमरा दिया। इतना छोटा काम नहीं कर सकते?”

* * *

परिचय साढ़े आठ बजे हुआ। मैनेजर ने कंपनी के सामुदायिक सहयोगियों का धन्यवाद किया। छहों की तरफ हाथ करके कहा कि ये लोग मेहनत की कीमत सीख रहे हैं।

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समीर अब भी ट्रे पकड़े था। नौ घंटे बस में काम करके आया था। लता की बाँह पर डिब्बे से चोट लग गई थी। अरुणा समय से पहुँचने के लिए छुट्टी लेकर आई थी।

भाषण खत्म हुआ तो रूपा ने एप्रन काउंटर पर रखे और साथियों से बैग लेने को कहा। नीलेश नहीं हिला।

“जाकर अभ्यास कहाँ करेंगे?”

रूपा के पास जवाब नहीं था। तेज आवाज में बोलने से नया कमरा सस्ता नहीं हो जाता।

मैनेजर ने कहा कि फिर खेलने से पहले सामान वाला कमरा साफ करना होगा। कार्यक्रम दस बजे तक चलेगा। समीर की सीधी बस सवा नौ पर आखिरी थी।

उसने नीलेश को देखा। “हर रात कल की नींद उधार नहीं ले सकता।”

नीलेश ने गाँठ खोली। कमीज आगे से गीली थी। एप्रन सावधानी से तह किया, जैसे उसे अस्त-व्यस्त छोड़ने से मैनेजर की बात सही हो जाएगी।

उस रात अभ्यास नहीं हुआ।

* * *

अगली सुबह रूपा समझौता लेकर पहुँची। उसमें लॉन्च पर उपस्थित रहने की बात थी। गिलास उठाने, स्टॉक खिसकाने या सफाई करने की नहीं।

मैनेजर बोला कि प्रायोजन में सहयोग चाहिए, हर मिनट का हिसाब नहीं। अरुणा ने अतिरिक्त काम और घंटे लिखकर देने को कहा। उसने मना कर दिया। फिर कहा कि पैसे वापस करके जाना चाहें तो जा सकते हैं।

पाँच हजार अभी टीम के खाते में बिना खर्च हुए रखे थे। रूपा ने तय तरीके से लौटाए। कंपनी ने समझौता समाप्त होने की पुष्टि की। सामान जाँचकर कमरे के हस्तांतरण पर हस्ताक्षर हुए।

समीर अपने भाई से माँगी मेज उठा रहा था। अरुणा अंक वाले फोल्डर लाई। नीलेश काउंटर के पीछे से अपना पंखा निकाल लाया।

बाहर मैनेजर बोला कि पंजीकरण खत्म होने से पहले लौट आएँगे।

रूपा ने ऑटो का दरवाजा पकड़ा। “पहले पंखा रखो। बैग से पंखुड़ियाँ न टकराएँ।”

अभी उसे ऐसा कोई काम करना था जिसे करना आता हो।

* * *

अगली शाम लता की छत पर मिले। धूप उतर चुकी थी। बारिश आ जाती तो बचने की जगह नहीं थी। रूपा खर्च लिखकर लाई थी।

बाकी प्रतियोगिताओं की प्रवेश फीस आठ हजार चार सौ। तय यात्रा खर्च छह हजार छह सौ। अभ्यास के कमरे का किराया दो हजार चार सौ। सामग्री और साझा छपाई बारह सौ। कुल अठारह हजार छह सौ रुपये। घर का खर्च और रोज का खाना अलग था।

हर खिलाड़ी दो हजार देता तो भी छह हजार छह सौ कम पड़ते। अरुणा तुरंत दे सकती थी। समीर को एक सप्ताह चाहिए था। नीलेश चुप रहा।

रूपा ने पूछा, “रकम मुश्किल है या तारीख?”

“तारीख।”

सबके भुगतान की तारीख कमाई आने के हिसाब से रखी गई। दो शाम बाद नीलेश देर से पहुँचा और बार-बार फोन देखने लगा। रूपा ने रखने को कहा। उसने बताया कि काम का संदेश आएगा।

“काम हम सब करते हैं।”

वाक्य निकल गया तो रूपा को अपनी आवाज सुनाई दी। नीलेश उठकर सीढ़ियों पर चला गया। वह पीछे गई।

एक ग्राहक ने पार्सल मिलने से इनकार किया था। भुगतान अटका था। सुपरवाइजर उसी शाम जानकारी माँग रहा था। कॉल छूटती तो अगले भुगतान से पहले जाँच नहीं हो पाती। रूपा को लापरवाह साथी दिखा था। वह उसी कमाई को बचाने में लगा था जिससे टीम को पैसे देने थे।

“जाना है?” उसने पूछा।

“नहीं। एक फोन उठाना है।”

रूपा ने माफी माँगी। अभ्यास की समीक्षा का क्रम बदला। कॉल आया तो नीलेश नीचे गया। बारह मिनट बाद लौटकर पूछा कि कहाँ तक पहुँचे। किसी ने ताना नहीं दिया।

अगली शाम बारिश आ गई। छहों ने पत्ते, बैग और कुर्सियाँ समेटीं। जावेद ने लता का कपड़ों वाला बंडल पानी पहुँचने से पहले उठा लिया। वह अभ्यास के बाद ग्राहक का काम पूरा करने लाई थी।

सीढ़ियों की छत के नीचे सब भीगे बैग लिए खड़े थे। मैनेजर ने कहा था कि कंपनी उन्हें मेहनत सिखा रही है। असल में उनकी जिंदगी पहले से भरी हुई थी। उसी में खेल की जगह बनानी थी।

जावेद ने दो कारोबारियों से मदद की बात की। नाम से धन्यवाद देने का प्रस्ताव था। कोई अलग कार्यक्रम चाहिए तो पहले बात करनी होगी। सहायता के बदले छह लोगों को जब चाहे नहीं बुलाया जा सकता था।

एक ने मना किया। दूसरे ने खर्च माँगा।

* * *

मोहल्ले की छपाई सहकारी संस्था ने चार हजार दिए। जावेद के गैराज मालिक ने दो हजार। दोनों ने समर्थक के रूप में नाम लिखने को कहा।

छह सौ बाकी थे। रूपा सोच रही थी कि आपस में बाँट लें। तभी सुंदर पानी की बोतलों का क्रेट लेकर आया। लता की इमारत के नीचे उसकी छोटी किराने की दुकान थी। छत पर अभ्यास के लिए पानी देता था। बोतलें वापस आतीं तो दुकान के पीने वाले पानी से भर देता।

उसने कमी पूछी। रकम सुनकर थैली से छह सौ निकाले।

“पक्का?” लता ने पूछा।

“कल थोड़ा कम माल खरीदूँगा। दुकान बंद नहीं कर रहा।”

रूपा ने साफ कहा कि सहायता है, पैसा लगाकर मुनाफा लेने वाली बात नहीं। जीत की गारंटी भी नहीं है।

“एक हफ्ते से तुम्हारी बहस सुन रहा हूँ। पता है।”

उसे रसीद चाहिए थी। रूपा ने लिखी। उसने नाम जाँचा, तह की और थैली में रख ली। सबसे छोटी रकम से हिसाब पूरा हो गया।

* * *

परिवहन कार्यालय के ऊपर कमरा किराए पर लिया। सीढ़ियों में डीजल की गंध रहती थी। ट्रक का हॉर्न बजता तो बात बीच में रोकनी पड़ती। फिर भी बुक किए घंटों में कमरा उनका था। मेज पर सामान नहीं आता था। पंखा चल सकता था।

पहला अभ्यास खराब गया। जगह और पैसे की बात में खेल की तैयारी पीछे रह गई थी। समीर नीलेश पर झल्लाया। नीलेश बैग बाँधने लगा। रूपा बीच में आई तो किसी ने कहा कि मैनेजर की तरह बोल रही है।

रूपा चुप हो गई। दस मिनट रुके। फिर लता ने सबसे पूछा कि तैयारी में क्या काम नहीं कर रहा। जवाब सुनने में अच्छे नहीं लगे, पर काम आए। समीक्षा का क्रम बदला। रिजर्व खिलाड़ियों को पूरे सत्र दिए गए। जो पहले पहुँचे, उसी पर सारी व्यवस्था डालना बंद किया।

सुंदर कभी सहायक से पानी भेज देता, कभी वे लेने जाते। पानी लेते समय साथ में दुकान का कोई काम नहीं थमाया जाता था।

अगली बहस जावेद ने की। गैराज से पैसे वही लाया था। उसे पहले आयोजन की मुख्य सूची में होने की उम्मीद थी। अभ्यास के नतीजे दूसरी सूची के पक्ष में थे।

“मालिक से पैसे इसलिए नहीं माँगे थे कि बाहर बैठूँ।”

अरुणा ने पूछा, “दो हजार में जगह खरीदी थी?”

जावेद का चेहरा लाल हो गया। रूपा उसका बचाव करना चाहती थी। मदद माँगना आसान नहीं था। लेकिन उसे मैनेजर के पाँच हजार वाले शब्द भी याद थे।

जावेद के सामने चयन दोबारा देखा गया। उसकी एक आपत्ति सही थी। कुछ आकलन सुधरा। फिर भी पहले आयोजन में उसे रिजर्व रखा गया।

यात्रा भर नाराज रहा। वहाँ पहुँचकर नीलेश को सही डेस्क ढूँढ़ने में मदद की, लता को समय बताया। अपने गुस्से की सजा खिलाड़ियों को नहीं दी।

बाद में रूपा से कहा कि पैसे माँगने के बाद लगता था, मालिक को ऐसी तस्वीर देनी चाहिए जिसमें वह जरूरी दिखे।

“तस्वीर के पहले भी जरूरी हो।”

“यह भाषण में मत बोलना।”

“नहीं बोलूँगी।”

अगले चरण में उसी चयन प्रक्रिया से उसे खेलने की जगह मिली। उसने समय देखा, यात्रा पूछी और सूची लता को दे दी। हर मदद का कर्ज वसूले बिना भी असहमति हो सकती थी।

* * *

पहली प्रतियोगिता मुश्किल रही। कुल अंक आगे बने रहने के लिए काफी थे, किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं। एक सत्र में रूपा ने बड़ी गलती की। वापसी में खिड़की देखती रही।

अरुणा ने पूछा कि उस पर बात करनी है क्या।

“कल।”

“ठीक है।”

अगले अभ्यास में गलती देखी गई। जो सुधार सकते थे, सुधारा। बाकी चयन दौरों में छहों ने अलग-अलग अनुमत चरणों पर खेला। सूची की प्रतियाँ रखीं। कमजोर सत्रों पर उतनी ही गंभीर बात हुई जितनी अच्छे नतीजों पर।

नीलेश शुरुआत की घबराहट से उबरा। समीर ने खराब दौर के बाद संभाला। लता सबसे स्थिर रही। रूपा के अंक गिरे तो जावेद और अरुणा ने कुल सँभाला। फाइनल तक पहुँचने में हर खिलाड़ी लगा था।

रूपा ने समर्थकों को सूचना दी। अगले नतीजे का वादा नहीं किया। बस जो हासिल हुआ था, वही बताया।

* * *

फाइनल की मुख्य सूची में रूपा का नाम नहीं था।

हाल के अभ्यास के आधार पर चयन करने का नियम सबने मिलकर बनाया था। लता, नीलेश, जावेद और अरुणा का प्रदर्शन बेहतर था। समीर ने रिजर्व की जगह बिना बहस मान ली। रूपा बार-बार पन्ने देखती रही कि कहीं कोई गलती हो।

गलती नहीं थी। एक करीबी तुलना पर उसने सवाल किया। उसे फिर देखा गया, जैसे जावेद के मामले में देखा था। फैसला नहीं बदला।

घर लौटते समय उसे लगा जैसे अपनी ही बनाई जगह से हट गई हो। कमरा ढूँढ़ा, हिसाब रखा, फोन किए। फाइनल में फिर बैग उठाएगी। इस विचार पर शर्म भी आई, मगर वह गया नहीं।

शाम को अरुणा को फोन करके बता दिया। अरुणा ने बीच में नहीं रोका।

“समीर को टीम से बाहर मानती हो?”

“नहीं।”

“तो खुद को क्यों?”

जावेद को रूपा ने भी ऐसी ही बात कही थी। जब विश्वास किसी और को करना हो, तब कहना कितना आसान था।

अगले अभ्यास में उसने पक्की सूची लता को दी। पूछा कि खेलने की जगह के बाहर रहकर किस तरह मदद चाहिए। इस बार जवाब पूरा सुना।

* * *

फाइनल में रूपा समीर के पास बैठी थी। सफर के कागजों वाला बैग पैरों के नीचे था। खेलने वाले साथी घेरे के दूसरी तरफ थे। पहले आधे घंटे वह मन में बार-बार सलाह बनाती रही जिसे वहाँ से देना मना था।

समीर ने पानी दिया। रूपा लगभग कहने वाली थी कि ठीक है, जरूरत नहीं। फिर बोतल ले ली।

आखिरी दौर में जावेद के एक फैसले पर वह चौंकी। मन हुआ खुद मेज पर होती तो अपना फैसला ले पाती। फिर उसे खेल पूरा करते देखा। उसी प्रक्रिया से उसे जगह मिली थी जिसका रूपा ने पहले बचाव किया था।

नतीजे अलग-अलग आए। एक खराब था। दो अच्छे थे। आखिरी के बाद कुल की जाँच का इंतजार हुआ। समीर ने सूची पढ़ी, पीछे हटा और रूपा से देखने को कहा।

उसने दो बार देखा। वे पहले स्थान पर थे।

लता घेरा पार करके आई और उसके दोनों कंधे पकड़ लिए। नीलेश तीन लोगों को एक साथ गले लगाने की कोशिश कर रहा था। जावेद सिर पर हाथ रखे हँस रहा था, जैसे अभी भरोसा नहीं हुआ हो।

रूपा ने उस दिन एक भी दौर नहीं खेला था। लता उसे बीच में खींचकर लाई तो वह साथ चली गई।

* * *

पुरस्कार की ट्रे पर चार पदक थे।

आयोजक ने फाइनल में खेलने वाले चार नाम बुलाए। समीर कुर्सियों के पास रह गया। रूपा बैग मोड़ने लगी। हाथ किसी काम में लगे रहने चाहिए थे।

लता ने मंच पर चढ़ने से पहले पीछे देखा। “हम छह हैं।”

“आज चार खेले हैं,” सहायक ने कहा।

“पंजीकरण में छह हैं। चयन दौरों में सब खेले थे।”

उसने कैमरे की तरफ इशारा किया। बाद में देख लेंगे। कार्यक्रम आगे बढ़ाना था। अगला समूह इंतजार कर रहा था।

नीलेश पहली सीढ़ी से उतर आया। अरुणा ने आयोजक से कहा कि आखिरी दौर की सूची के बजाय टीम का पंजीकरण देखें।

रूपा फोल्डर लेकर पहुँची। एक पल फिर वही महसूस हुआ—हाथ में कागज है और सामने वाला समझा रहा है कि उसके लिए समय नहीं है। सामान वाले कमरे में भी ऐसा ही था।

लेकिन आज लता उसके पास थी। जावेद भी खड़ा था। उसकी कमीज की कफ अब भी नम थी, जिसे उसने लॉज के छोटे बेसिन में धोया था।

आयोजक ने कागज देखा। छह नाम थे। सहायक ने गलत सूची से पुरस्कार का इंतजाम किया था। माफी माँगकर बाकी दो पदक डाक से भेजने को कहा।

लता ने कहा कि पदकों का इंतजार कर लेंगे। पुरस्कार वाली तस्वीर में दो लोग बाहर नहीं रहेंगे।

आयोजक ने माइक का स्टैंड खिसकाया। छहों मंच पर गए।

* * *

रूपा को लगा लता छोटा-सा धन्यवाद कहेगी। उसने माइक लेकर समीर से शुरुआत की।

चयन दौर में उसका नतीजा बताया। फिर अरुणा का, जावेद का। वह दौर याद किया जिसमें रूपा ने जरूरी अंक लेकर टीम को आगे बनाए रखा था। अलग हफ्ते थे। अलग मुख्य सूचियाँ थीं। आखिरी दिन चार लोगों के खेलने से बाकी योगदान मिट नहीं गया था।

ट्रॉफी मिली तो जावेद ने रूपा को पकड़ा दी।

“यह पकड़ो।”

यह बात उसने ट्रे, डिब्बों और बैग के सामने सुनी थी। आज बाकी पाँचों इतने पास आए कि कंधे उसके कंधों से लगे। कैमरा चमका।

बाद में आयोजक ने दो बाकी पदक भेजने की लिखित पुष्टि दी। समीर ने अपने नाम की वर्तनी जाँची। दोनों पदक किराए के अभ्यास कमरे पर भेजने को कहा, पुराने शोरूम पर नहीं।

रूपा ने मदद करने वालों का नाम लेकर धन्यवाद दिया। खर्च का सार उन्हें पहले ही भेजा जा चुका था। माइक पर पूरे हिसाब की बैठक करने की जरूरत नहीं थी।

उसने सुंदर को फोन किया। दो बार नहीं उठा। तीसरी बार बोला कि दुकान पर लाइन है।

“हम जीत गए।”

“तो फोन करना बंद करो। आराम से वापस आओ।”

* * *

सुंदर ने पूरी बात अगली शाम सुनी। पहले छहों को दरवाजा खाली करने को कहा ताकि एक महिला तेल खरीद सके। फिर हाथ पोंछकर ट्रॉफी माँगी। वजन से चौंक गया।

“गिराना मत,” नीलेश बोला।

“तो सिर पर मत खड़े रहो।”

तस्वीर के बाद उसने ट्रॉफी लौटा दी। उसके छह सौ रुपयों से टीम सीजन पूरा कर पाई थी। उसने यह नहीं पूछा कि इतने में कितने दिन ट्रॉफी उसकी दुकान में रहेगी।

बाकी पदक अगले हफ्ते आए। साथ में सुधरी हुई पुरस्कार सूची थी। छहों नाम थे। समीर की पाली खत्म होने से पहले रूपा ने दोनों पदक जाँच लिए।

कई दिन से मन में था कि काश फाइनल खेली होती। साथियों के प्यार से वह इच्छा गायब नहीं हुई थी। मगर पदक के पीछे अपना नाम पढ़कर उसने सीजन को अपने और पराए हिस्सों में बाँटना बंद कर दिया।

ट्रॉफी किराए के कमरे की अलमारी पर रखी गई। पास में ताश के कवर का पैकेट और टेप का रोल था। वहाँ जँच नहीं रही थी। अरुणा ने टेप हटाया। फिर भी जगह कम थी।

नीलेश ने पंखा लगाया। अगली मुख्य सूची अगले अभ्यासों से तय होनी थी। रूपा सबके साथ बैठी और अपने नोट खोले।

दीवार पर छहों नाम थे। किसी के नीचे ‘सहायक कर्मचारी’ नहीं लिखा था।

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