Rummy Ludo — गुरु और शिष्य का आखिरी हाथ मिलाना
Rummy Ludo

Rummy Ludo — गुरु और शिष्य का आखिरी हाथ मिलाना

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

अधिकारी की बात पूरी होने से पहले महेश ने अपनी कमीज से आगंतुक का बैज उतार लिया। “लड़के को इसमें मत घसीटिए,” उसने कहा। “मैं जहाँ खड़ा था, उसकी जिम्मेदारी मेरी…

अधिकारी की बात पूरी होने से पहले महेश ने अपनी कमीज से आगंतुक का बैज उतार लिया।

“लड़के को इसमें मत घसीटिए,” उसने कहा। “मैं जहाँ खड़ा था, उसकी जिम्मेदारी मेरी है।”

अर्जुन को लड़का कहलाने से नफरत थी।

वह उनतीस साल का था। किराया देता था, सप्ताह में छह दिन काम करता था और वयस्क तीन पत्ती प्रतियोगिता में अपने नाम से आया था।

लेकिन उस समय कमरे में उसके लिए इस्तेमाल हुए शब्दों में लड़का सबसे दयालु शब्द था।

एक दर्शक ने महेश पर खेल के दौरान संकेत देने का आरोप लगाया था। दूसरे ने बात दोहरा दी। अब दो खिलाड़ी अपनी कुर्सियाँ अर्जुन से थोड़ा दूर कर रहे थे, जैसे बेईमानी आस्तीन छू लेने से चिपक सकती हो।

महेश ने बैज मेज पर रखा।

अर्जुन उठ खड़ा हुआ।

उसके गुरु ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

“बैठो।”

अर्जुन बैठ गया।

बाद में उसे सबसे साफ यही याद रहा। आरोप नहीं, बैज नहीं। यह कि उसके घुटनों ने कितनी जल्दी आदेश मान लिया था।

* * *

सात साल पहले महेश ने उसे छपाई की दुकान के काउंटर के नीचे अभ्यास की कॉपी छिपाते देखा था।

अर्जुन तब वहीं काम करता था। क्लब के अभ्यास में खेले हाथ लिखता और हर हार के नीचे गुस्से से भरी लंबी सफाई देता।

महेश ने विजिटिंग कार्ड बनवाए और कॉपी देखने को माँगी।

अर्जुन ने मना कर दिया।

अगले दिन महेश चाय लेकर लौटा।

इस बार अर्जुन ने पढ़ने दी।

“तुमने लिखा है कि क्या होना चाहिए था,” महेश ने कहा। “जो हुआ, वह कहाँ है?”

किसी ने पहली बार ऐसी आलोचना की थी जिसका वह उपयोग कर सकता था।

रविवार की सुबह दोनों मिलने लगे। महेश वर्षों से खेलता था। वह धीरज से अर्जुन को किसी फैसले का कारण बताने देता, केवल परिणाम के पीछे छिपने नहीं देता था।

उसने अपनी दो पुरानी कॉपियाँ उधार दीं।

छपाई की दुकान अचानक बंद हुई तो एक बार पैसे भी दिए।

अर्जुन ने पैसे लौटा दिए।

कॉपियाँ उसके पास रहीं।

और यह एहसास भी रहा कि वह जो कुछ अच्छा सीखता है, वह पहले से महेश का है।

* * *

विवाद वाले आयोजन में अधिकारियों ने जानकारी जुटाने तक अर्जुन की मेज का खेल रोक दिया।

उस समय किसी को दोषी नहीं पाया गया था।

हॉल के बाहर यह फर्क तुरंत गायब हो गया।

फोन का एक छोटा वीडियो फैलने लगा। उसके साथ लिखा था कि अर्जुन बाहर से मदद लेकर बेईमानी करता है। वीडियो में महेश दर्शकों की सीमा के अंदर खड़ा कॉलर के पास हाथ ले जाता दिखता था।

उसमें अर्जुन का चेहरा नहीं था। पूरी मेज भी नहीं थी।

जिन्हें जवाब पहले से मालूम मानना था, उनके लिए इतना काफी था।

अब अर्जुन पैकेजिंग की कार्यशाला में काम करता था। वहाँ एक सहकर्मी ने पूछे बिना वीडियो उसके सामने चला दिया।

“तुम्हारे गुरु तुम्हारे लिए सोचते भी हैं क्या?”

अर्जुन लेबल काटता रहा।

ब्लेड की लकीर टेढ़ी चली गई।

पर्यवेक्षक ने कहा कि पूरी शीट खराब करने से पहले एक मिनट रुक जाए।

उस मामूली दयालुता ने उसे लगभग तोड़ दिया।

वह एक और ताने के लिए तैयार था। साधारण ढंग से साँस लेने का मौका मिलेगा, इसके लिए तैयार नहीं था।

* * *

महेश ने कहा कि संदेशों का उत्तर न दे।

“आयोजक देख लेंगे।”

“तो उन्हें सब देने में मदद कीजिए।”

“मैंने कह दिया कि वहाँ खड़ा होना मेरी जिम्मेदारी थी।”

“वे मुझ पर सिर्फ यही आरोप नहीं लगा रहे।”

महेश ने नाक के ऊपर उँगलियाँ रखीं।

“लोग बोलते हैं। हर शब्द के पीछे भागना जरूरी नहीं।”

अर्जुन उस पर भरोसा करना चाहता था।

सात साल से भरोसा करने पर समय बचता आया था। कौन सा फॉर्म जरूरी है, कौन आयोजक ठीक है, कौन निमंत्रण स्वीकार करना चाहिए, महेश जानता था। वह इंतजार कहता तो अर्जुन इंतजार करता।

अब इंतजार करना फिर उसी कुर्सी पर बैठ जाना लग रहा था।

अर्जुन ने पूरी रिकॉर्डिंग माँगने की बात कही।

महेश का चेहरा कस गया।

“तुम क्या देख लोगे जो वे नहीं देखेंगे?”

“अभी नहीं जानता।”

“इसीलिए कह रहा हूँ, छोड़ दो।”

अर्जुन घर लौटा तो दोनों पुरानी कॉपियाँ बैग में थीं। कागज से जितनी भारी होनी चाहिए थीं, उससे ज्यादा भारी लग रही थीं।

उस रात उसने उन्हें नहीं खोला।

आयोजकों को खुद लिखा।

* * *

आयोजन में समीक्षा की प्रक्रिया थी। अर्जुन ने उसी का उपयोग किया।

उसने पूछा कि ठीक आरोप क्या है, दर्शकों के किस नियम का सवाल है और उस समय की कौन सी रिकॉर्डिंग उपलब्ध है।

कार्यालय ने निगरानी में वीडियो देखने का समय दिया और उसका लिखित विवरण स्वीकार किया।

उसकी दोस्त लीला साथ गई, ताकि नोट ले सके।

वह लेखाकार थी, खिलाड़ी नहीं। यह अच्छा था। महेश की प्रतिष्ठा को लेकर उसकी कोई राय नहीं थी। किसी पसंदीदा कहानी को सही साबित करने का दबाव भी नहीं था।

लंबे वीडियो में सेवा की ट्रॉली सामान्य रास्ता रोके थी। महेश उसके पास से घूमकर गया और अधिकारियों के लिए चिह्नित हिस्से में खड़ा रह गया।

दर्शक सीमा का नियम उसने तोड़ा था।

लेकिन दिशा महत्वपूर्ण थी।

जिस समय संकेत देने का आरोप था, अर्जुन मेज की दूसरी तरफ देख रहा था। महेश उसके दाएँ कंधे के पीछे था। अर्जुन उसकी तरफ नहीं मुड़ा।

जिस हरकत को संकेत कहा गया, उसमें हाथ बैज की मुड़ी डोरी तक गया था।

दोनों के बीच कोई दिखाई देने वाला आदान-प्रदान नहीं था।

लीला ने समय लिखे।

फिर पूछा कि छोटे वीडियो ने क्या छोड़ दिया था।

“लगभग सब,” अर्जुन ने कहा।

* * *

समीक्षा में यह नहीं कहा गया कि दर्शक सीमा पार करना ठीक था।

महेश को उस आयोजन के नियमों के अनुसार चेतावनी मिली। समिति के लिखित निर्णय में यह भी था कि उपलब्ध प्रमाण अर्जुन के साथ खेल संबंधी सलाह या मिलीभगत के आरोप का समर्थन नहीं करते।

पूरा हो चुके चरण का उसका परिणाम कायम रहा।

बाकी कार्यक्रम आगे बढ़ चुका था। नाम साफ होने से खराब हुआ सप्ताहांत वापस नहीं आ गया।

अर्जुन ने आयोजक से कहा कि जहाँ आरोप फैला था, वहाँ सुधार भी बताया जाए।

उन्होंने तथ्य वाला वक्तव्य जारी किया।

कुछ लोगों ने अपनी पोस्ट हटा दी। एक व्यक्ति ने पुराने अपमान के नीचे छोटा सुधार जोड़ दिया। बाकी चुप रहे।

कार्यशाला वाला सहकर्मी कंधे उचकाकर बोला, “अच्छा है। निपट गया।”

अर्जुन पूछना चाहता था कि निपट जाने का मतलब क्या वह टेढ़े लेबल काटने वाली दोपहर वापस पा सकता है?

उसने निर्णय महेश को भेज दिया।

जवाब आया, मैंने कहा था न कि देख लिया जाएगा।

अर्जुन देर तक उस वाक्य को देखता रहा।

फिर बिना उत्तर दिए फोन रख दिया।

* * *

दूसरा रहस्य एक भेजे गए ईमेल में मिला।

अपनी सीधी संपर्क जानकारी बदलवाते समय अर्जुन ने पूछा कि क्या पहले भी कोई निमंत्रण महेश के पास गया था।

कर्मचारी को पिछले सत्र का एक संदेश मिला।

क्षेत्रीय प्रशिक्षण सप्ताहांत। उसके बाद चयन के खेल। यात्रा में सहायता उपलब्ध। हाल के परिणामों के आधार पर वयस्क खिलाड़ियों को बुलाया गया था।

अर्जुन को याद था कि उसने उस सप्ताहांत के बारे में महेश से पूछा था।

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महेश ने कहा था कि सारी जगहें भर गई हैं।

ईमेल कुछ और दिखा रहा था।

महेश को अर्जुन के नाम का निमंत्रण मिला था। तीन दिन बाद उसने उत्तर दिया था कि अर्जुन नहीं आएगा। विचार करने के लिए धन्यवाद भी लिखा था।

अर्जुन ने संलग्न पत्र खोला।

उसके अपने नाम के आसपास ऐसा फैसला लिखा था जो उसने कभी किया ही नहीं था।

उसने तारीख देखी।

उस रविवार अभ्यास से पहले उसने महेश के घर अलमारी का दरवाजा ठीक करने में चार घंटे लगाए थे।

महेश ने चाय बनाई थी।

दोनों ने बात की थी कि अवसर पाने के लिए धैर्य रखना पड़ता है।

* * *

इस बार अर्जुन कॉपियाँ लिए बिना घर गया।

महेश फीकी चप्पलें पहने दरवाजे पर आया।

एक पल को अर्जुन पूछने वाला था कि अलमारी का कब्जा ठीक चल रहा है या नहीं।

फिर उसने ईमेल दिखाया।

महेश ने भेजने से इनकार नहीं किया।

“तुम तैयार नहीं थे।”

“तो यह क्यों कहा कि जगह भर गई?”

“क्योंकि तुम बहस करते।”

अर्जुन ने फोन नीचे किया।

बाहर सब्जी वाला गली में आवाज दे रहा था। पड़ोसी ने बालकनी में कुर्सी खिसकाई। कमरे के आसपास सब सामान्य चलता रहा।

अंदर सात साल का आकार बदल रहा था।

“आप कह सकते थे कि आपके हिसाब से मैं तैयार नहीं हूँ।”

“फिर भी जाते।”

“हाँ।”

महेश ने ऐसे देखा जैसे वही शब्द बेवफाई का सबूत हो।

अब अर्जुन के हाथ काँप रहे थे। उसने फोन मेज पर रख दिया। दोनों में से कोई यह न मान सके कि बात का उस पर असर नहीं हो रहा।

“आपने मुझे हारने से नहीं बचाया,” उसने कहा। “आपने मुझे पता करने से रोक दिया।”

* * *

महेश ने उसके लिए किए काम गिनाने शुरू किए।

पहली कॉपी।

पैसों की मदद।

वे रविवार, जब कोई और उसकी परवाह नहीं करता।

अर्जुन को सब याद था।

“उधार लौटाया था मैंने।”

“मैं पैसों की बात नहीं कर रहा।”

“जानता हूँ।”

यही ज्यादा बुरा था।

कोई अंतिम रकम नहीं थी। कोई रसीद नहीं जो इस खाते को बंद कर सके। अर्जुन जब भी महेश की चुनी हुई राह से अलग कुछ चाहता, हर पुरानी भलाई फिर सामने रखी जा सकती थी।

फिर महेश ने धीमे स्वर में कुछ और कहा।

पत्नी के जाने के बाद रविवार का अभ्यास ही सप्ताह का वह हिस्सा था जिसका इंतजार रहता था। क्षेत्रीय सप्ताहांत में अर्जुन दूसरे प्रशिक्षकों से मिलता। दूसरी दिनचर्या सीखता।

ऐसे लोगों से मिलता जो हर रविवार उसके घर लौटने को जरूरी न बताते।

अर्जुन ने खिड़की के पास खाली कुर्सी देखी।

उसे महेश की पत्नी अच्छी लगती थी। अंतिम संस्कार के बाद वह आया था। खराब खाना बनाया था, कप धोए थे और ऐसी शामों में बैठा था जब दोनों कुछ नहीं कहते थे।

उसे लगता था कि किसी को उसकी जरूरत होना प्रेम होना है।

कभी वह प्रेम था भी।

लेकिन उससे ईमेल कम जानबूझकर नहीं भेजा गया था।

* * *

अर्जुन निकल आया। वह नहीं चाहता था कि दोनों इस बातचीत का कोई आसान अंत खोज लें।

सीढ़ियों पर महेश ने पीछे से कहा, “तुम्हारे लिए आरोप अपने ऊपर लेने के बाद भी?”

अर्जुन रुक गया।

“आपने वहाँ खड़े होने की जिम्मेदारी ली जहाँ खड़े होने की अनुमति नहीं थी। मैंने यह साफ करने में मदद की कि जो आरोप लगा, वह हम दोनों ने नहीं किया।”

महेश चुप रहा।

“आपसे नाराज हूँ तो वह बात नहीं बदल दूँगा। उस हाथ में आपने मुझे सलाह नहीं दी थी। प्रमाण वही रहेगा।”

अर्जुन ने रेलिंग पकड़ी।

“लेकिन निमंत्रण भी सच है।”

उसने फाटक नहीं पटका। तीन सेकंड अच्छा लगता। फिर याद आता कि ढीली कुंडी किसने ठीक की थी।

उसने ध्यान से बंद किया।

घर में उधार की कॉपियाँ शेल्फ पर रखीं और स्टेशनरी की दुकान से नई कॉपी खरीदी।

भूरा सादा कवर था।

पहले पन्ने पर अपना नाम लिखा।

फिर बीस मिनट बैठा रहा। समझ नहीं आया कि अगला वाक्य क्या लिखे।

* * *

महेश के बिना सीखना छोटी-छोटी तरह से अपमानजनक था।

अर्जुन को पता चला कि कितनी बार वजह की जगह कह देता है कि सर ऐसे करते हैं।

अभ्यास समूह में लीला के भाई ने एक फैसले का कारण पूछा।

अर्जुन ने वही जाना-पहचाना जवाब दिया।

उस आदमी ने कहा, “तुम्हारे सर से मैं नहीं मिला हूँ।”

कोई हँसा नहीं।

इसलिए बात से निकल भागना और मुश्किल हो गया।

अर्जुन ने लिखना शुरू किया कि वास्तव में क्या देखा था, क्या मान लिया था और क्या अभी समझा नहीं सकता।

कुछ पन्नों में निष्कर्ष से ज्यादा सवाल थे।

अपने खेल की रिकॉर्डिंग देखकर ऐसी गलतियाँ मिलीं जिन्हें महेश इतनी जल्दी सुधार देता था कि वह खुद पहचानना सीख ही नहीं पाया था।

कई सप्ताह परिणाम और खराब हुए।

मन करता कि भूरी कॉपी लेकर पुराने घर जाए और कोई बता दे कि कौन सा वाक्य महत्वपूर्ण है।

इसके बजाय अगली अभ्यास बैठक में ले गया।

तीन अलग लोगों से पूछा।

तीनों की राय अलग थी।

अब उसे चुनना था कि किस बात पर विश्वास करता है और क्यों।

* * *

कई महीने बीते।

अर्जुन ने एक नई खुली प्रतियोगिता में प्रवेश लिया। महेश भी खिलाड़ी के रूप में आया।

किसी को दूसरे की अनुमति नहीं चाहिए थी।

समूह सूची आई तो दोनों अलग थे।

अर्जुन फिर भी देर तक सूची देखता रहा।

लीला ने पूछा कि नाम देखने से उसकी योजना बदली क्या।

“नहीं।”

थोड़ी देर बाद बोला, “जीतने की इच्छा ज्यादा हो गई।”

लीला ने सिर हिलाया।

“बस ध्यान रखना कि वह इच्छा कब खेलने का तरीका बदलने लगे।”

अर्जुन यह बात हॉल में लेकर गया।

पहले सत्र में गुस्से ने अधीर किया। उसने जल्दी परिणाम निकालने की कोशिश की और नुकसान हुआ।

विराम में भूरी कॉपी में एक पंक्ति लिखी।

वह इस मेज पर नहीं है।

अगला सत्र बेहतर गया।

महेश भी अपने समूह से आगे आया।

अंतिम चरण तक पहुँचते-पहुँचते प्रतियोगिता ने वह कर दिया था जिसे दोनों खुद तय नहीं करते।

अब एक ही मेज पर खेलना था।

* * *

हॉल की तेज रोशनी में महेश बूढ़ा लग रहा था।

आस्तीन पर सिलाई की मरम्मत दिखी। अर्जुन को वह दोपहर याद आई जब एक प्रतियोगिता के बाद कमीज खरीदी थी और महेश छोटी छूट के लिए दुकानदार से बहस करता रहा था।

यादें आने से पहले अनुमति नहीं माँगतीं।

महेश ने उसे नाम से बुलाया।

लड़का नहीं कहा।

अर्जुन ने भी अभिवादन किया।

खेल शुरू होने से पहले भूरी कॉपी बाकी निजी सामान के साथ रखते देखकर महेश ने पूछा, “नई किताब?”

“हाँ।”

“काम आती है?”

“कभी-कभी।”

महेश के होंठ का कोना हिला। लगभग मुस्कान थी।

फिर अधिकारी ने ध्यान देने को कहा।

खेल ने दोनों के सामने ऐसा काम रख दिया जिस पर पहले से बहस नहीं की जा सकती थी। अपने फैसले लेने थे, उपलब्ध जानकारी का इंतजार करना था और परिणाम स्वीकार करना था।

महेश अर्जुन की पुरानी आदतें जानता था।

अर्जुन जानता था कि कोई उन्हीं आदतों को देखने बैठा है।

शुरुआत में इस जानकारी ने दोनों का नुकसान किया।

* * *

एक समय महेश ने ऐसा फैसला लिया जिसे अर्जुन पहले निर्देश की तरह लेता।

एक पल पुराना भरोसा लौटा।

सर ऐसा कर रहे हैं तो इसका मतलब—

वह रुक गया।

सामने दूसरा खिलाड़ी बैठा था। अनुभवी खिलाड़ी। ऐसा व्यक्ति जिसकी उसे परवाह थी। ऐसा व्यक्ति जो गलती भी कर सकता था।

हर जवाब खोलने वाली चाबी नहीं।

अर्जुन फिर उस जानकारी पर लौटा जो सचमुच उसके सामने थी।

बाद में एक हाथ हारा जिसे उसने अपने हिसाब से ठीक खेला था। उसने फैसले को उस समय उपलब्ध जानकारी से जाँचा। सिर्फ बुरा परिणाम मिलने पर फैसला बदलकर लिखने से खुद को रोका।

यह महेश ने सिखाया था।

गुरु से अलग होने का सबूत देने के लिए उपयोगी सीख फेंक देना जरूरी नहीं था।

उससे एक गलती भी हुई जो पूरी तरह उसकी अपनी थी।

दोष देने को कोई और नहीं था। छिपने के लिए उधार का अधिकार भी नहीं।

आखिरी हिस्सा इतना करीब रहा कि कोई निश्चिंत नहीं बैठ सका।

अंतिम परिणाम जाँचे गए तो अर्जुन महेश और बाकी अंतिम समूह से आगे था।

वह जीत गया था।

* * *

तालियों से निमंत्रण वाला मामला नहीं सुलझा।

अर्जुन इसके लिए आभारी था। वह नहीं चाहता था कि एक परिणाम तय करे कि उससे चुनाव छीनना गलत था या नहीं।

महेश पहले उठा और हाथ बढ़ाया।

अर्जुन ने थाम लिया।

पकड़ मजबूत और परिचित थी।

वर्षों तक उसी हाथ ने उसकी कोहनी ठीक दिशा में की थी, पन्ने पर उँगली रखी थी, कुर्सी सही मेज की ओर घुमाई थी।

अब हाथ मिलाते समय वह हाथ अपनी जगह रहा।

“अच्छा खेले,” महेश ने कहा।

“धन्यवाद।”

उसके बाद भाषण नहीं हुआ।

पुरस्कार लेते समय अर्जुन ने सिखाने वाले लोगों और उसके सवाल सहने वाले अभ्यास समूह का धन्यवाद किया। माइक को हथियार नहीं बनाया।

बाद में महेश को कोट रखने की जगह के पास पाया।

बैग से दोनों पुरानी कॉपियाँ निकालीं। साफ कपड़े में लिपटी थीं।

उनमें स्थायी निशान नहीं बनाए थे। अलग चिपकाई गई छोटी पर्चियाँ निकाल दी थीं।

महेश ने दोनों हाथों से कॉपियाँ लीं।

एक पल तक किसी ने छोड़ा नहीं।

फिर अर्जुन ने छोड़ दिया।

* * *

“मुझे निमंत्रण तुम्हें दिखाना चाहिए था,” महेश ने कहा।

अर्जुन ने उसे देखा।

ईमेल के बारे में यह पहला वाक्य था जिसमें यह वजह नहीं छिपी थी कि उसे आभारी क्यों होना चाहिए।

“हाँ।”

महेश ने गला साफ किया।

“रविवार को आओगे?”

सवाल इसलिए दुखा क्योंकि वह सामान्य था। चाय, ठीक की हुई अलमारी, खिड़की की कुर्सी। पूरी दोपहर आँखों के सामने इंतजार करती दिख रही थी।

“सीखने के लिए नहीं।”

महेश ने धीरे सिर हिलाया।

अर्जुन ने खामोशी आसान बनाने के लिए आने का वादा नहीं किया।

उसने अपना बैग उठाया।

बाहर लीला टैक्सी चालक को समझा रही थी कि वे किस प्रवेश द्वार पर खड़े हैं। उसने हाथ हिलाकर अर्जुन को बुलाया।

घर लौटते समय उसने भूरी कॉपी खोली।

अंतिम मुकाबले की अपनी गलती लिखी। नीचे वह फैसला दर्ज किया जिसे हारने के बावजूद अब भी ठीक मानता था।

पन्ने महेश की कॉपियों जैसे नहीं थे।

काटे हुए वाक्य थे। अटपटे सवाल थे। एक पंक्ति थी जिसे शायद कल बदल देता।

अर्जुन ने एक बार फिर पढ़ा।

फिर किताब बंद की और अपने पास रख ली।

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