1. Rummy Ludo: गलियारे में पड़ा गद्दा
प्रिंटिंग दुकान से लौटकर कबीर ने सीढ़ियों के पास अपना लपेटा हुआ गद्दा देखा। खुली खिड़की से बारिश का पानी अंदर आ रहा था। प्रतियोगिता में पहनने वाली नीली कमीज जूतों के साथ बाल्टी में थी।
दस्तक देने से पहले विजय ने दरवाजा खोल दिया।
“अरमान रहने आ रहा है। उसकी टीम में अच्छे खिलाड़ी हैं।”
दोनों चार साल से कोच्चि का वह फ्लैट साझा करते थे। बीमारी के समय कबीर ने विजय का किराया दिया था। छोटे रम्मी आयोजनों के लिए रात भर साथ यात्रा की थी। वे एक दूसरे को भाई कहते, क्योंकि दोस्त शब्द अस्थायी लगता था।
अब विजय ने पत्तों की प्लास्टिक थैली आगे कर दी।
“तुम सबको धीमा करते हो। जीतते भी हैं तो तुम्हें ढोना पड़ता है।”
अंदर दो लोग हँसे। उनमें एक ने पिछली टीम प्रतियोगिता में कबीर को कम पेनल्टी से मैच बचाते देखा था। किसी ने उस मुकाबले का जिक्र नहीं किया।
पंजीकरण पेज से उसका नाम पहले ही हट चुका था। विजय ने बताने से पहले निकाल दिया था।
उनतीस वर्ष का कबीर थका हुआ था और अचानक उसके पास बिस्तर नहीं था। वह प्रिंटिंग दुकान में कागज के पैकेट पर सिर रखकर सोया। सुबह मालिक ने वजह पूछी।
उसने कहा, बारिश में फँस गया था।
यह सच्चाई का सबसे छोटा हिस्सा था। बाकी कहता तो शायद आवाज टूट जाती।
ऐप लिंक और मौजूदा ऑफ़र की जानकारी चाहिए? नीचे अपनी पसंद की कम्युनिटी चुनें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
2. खाली कुर्सी टीम नहीं होती
कबीर को मरम्मत की दुकान के ऊपर सस्ता कमरा मिला। उसने तय किया कि अगला हार्बर टीम रम्मी कप विजय को हराकर जीतेगा।
समस्या सीधी थी: प्रतियोगिता में तीन खिलाड़ी चाहिए थे।
उसने अपने परिचित दो सबसे मजबूत खिलाड़ियों को बुलाया। दोनों ने मना किया। एक पहले से दूसरी टीम में था। दूसरे ने सावधानी से कहा कि किसी और के बदले का हिस्सा बनना सुखद नहीं लगेगा।
साप्ताहिक लाइब्रेरी सत्र में आशा ने फटा कार्ड बॉक्स चिपकाते हुए बात सुनी। इकतालीस वर्ष की आशा शांत लेकिन मजबूत खिलाड़ी थी। उसका छियालीस वर्षीय चचेरा भाई सलीम सामने बैठा था। वह फेरी के इंजन ठीक करता था।
“अभ्यास करके देखेंगे,” आशा ने कहा। “पूरे सीजन का वादा नहीं।”
पहले सत्र में कबीर टीम का नाम, लोगो और कप वाली तस्वीर की योजना लेकर आया। सलीम ने अभ्यास शीट पूछी।
कबीर भूल गया था।
वे अलग मेजों पर घूमते प्रतिद्वंद्वियों के साथ खेले। समीक्षा में कबीर ने विजय की आदतों पर पंद्रह मिनट लगाए, आशा की कठिन दूसरी डील पर लगभग कुछ नहीं।
आशा ने पत्ते समेटे।
“अगर हम केवल तुम्हारी कहानी बड़ी करने आए हैं, दो और कुर्सियाँ खोजो।”
उन्हें जाते देख कमरा पुराने फ्लैट जैसा लगा। फर्क यह था कि इस बार दूसरे लोगों को सामान की तरह उसने माना था।
3. साथ रहने की शर्तें
अगली सुबह कबीर ने आशा को फोन किया। माफी में “लेकिन” नहीं जोड़ा।
उसने पूछा कि साथ अभ्यास करने की शर्तें वे खुद लिखें। तीन बातें तय हुईं: हर खिलाड़ी की तैयारी बराबर महत्व रखेगी; आलोचना फैसले की होगी, व्यक्ति की नहीं; किसी को बदला जाएगा तो उससे सीधे बात होगी।
अगले सत्र में सलीम लाइन वाली कॉपी लाया। उसने तीन बराबर कॉलम बनाए।
खेलों के बीच वे हाथ जाँचते। आशा धैर्यवान थी, लेकिन कभी छोटे पत्ते उनकी उपयोगिता खत्म होने के बाद भी बचाती। सलीम तेजी से बनावट बना लेता, मगर अंतिम जाँच जल्द करता। कबीर अच्छी गणना करता, जब तक कोई चिढ़ाता नहीं। फिर वह अपना हाथ सुधारने के बजाय विरोधी को सजा देना चाहता।
किसी की कमजोरी उसका मजाक वाला नाम नहीं बनी।
वे तैयार प्योर सीक्वेंस और ऐसी उम्मीद का फर्क देखते जो अभी खास पत्ते पर निर्भर थी। जाँचते कि जोकर ने वास्तव में पत्ता मुक्त किया या समस्या सिर्फ दूसरी जगह पहुँची।
कबीर भाषण के बजाय खाली समीक्षा शीट लाने लगा।
कप में अलग मेजों पर तीन खिलाड़ियों के पेनल्टी अंक जुड़ते थे। खेल के दौरान इशारे, साझा हाथ या सलाह नहीं मिल सकती थी। साथी निर्णय की तैयारी में मदद कर सकता था। मेज पर फैसला अकेले लेना था।
इसी सीमा से धीरे-धीरे टीम असली लगने लगी।
4. वह हार जिसे छिपाया नहीं जा सकता
पहला दोस्ताना टीम मुकाबला बुरी तरह गया।
सलीम ने गलत घोषणा की। जिस दूसरी बनावट को सीक्वेंस समझा था, उसमें पत्ते क्रम में नहीं थे। आयोजन के लिखे नियम के अनुसार पेनल्टी लगी। वह पत्तों को ऐसे देख रहा था जैसे वे किसी और के हों।
कबीर के मुँह तक आया, “ऐसा कैसे कर दिया?”
गलियारा याद आया तो रुक गया।
सत्र के बाद पूछा, “दिखाओ, तुम्हारी जाँच कहाँ रुक गई।”
सलीम ने बताया कि पत्ते गिने, परिचित आकार देखा और रैंक जाँचना बंद कर दिया। उत्तर इतना स्पष्ट था कि उसका अभ्यास बन सकता था।
आशा का स्कोर भी खराब था। तीनों में कबीर सबसे अच्छा रहा। कुछ खतरनाक मिनट वह चाहता था कि उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि टीम की हार से अधिक दिखाई दे।
फिर उन्होंने तीनों कॉलम देखे।
उसके अच्छे कुल में एक जोखिम वाला फैसला था जो संयोग से सफल हो गया। आशा ने बताया। उसने बहस की, विकल्प दोबारा बनाए, फिर माना कि वह सही है।
पहली जीत से पहले दो और दोस्ताना मुकाबले हारे। सलीम ने हाथ की अंतिम जाँच हर बार एक ही तरह करना शुरू किया। आशा ने बेकार हो चुकी संभावनाएँ छोड़ना सीखा। कबीर ने उकसावे के बाद तुरंत पत्ता फेंककर जवाब देने के बजाय रुकना सीखा।
सुधार असमान था, लेकिन अब तीनों का था।
5. विजय को दर्शक मिलते हैं
क्वालिफाइंग ड्रॉ में दोनों टीमें एक ही सत्र में आईं। प्रतिद्वंद्वी अलग थे, मगर पंजीकरण डेस्क विजय के लिए मंच बन गई।
उसने आशा और सलीम को देखा, फिर कबीर को।
“एक आंटी और एक मैकेनिक मिल गए। बहुत भावुक टीम है।”
सलीम ने पहचान पत्र डेस्क पर रखा। “यह कमेंट्री से पहले जाँचा जाएगा या बाद में?”
स्वयंसेवक एक बार हँसा और फॉर्म देखने लगा। विजय के दर्शक बिखर गए।
कबीर जवाब का आनंद लेना चाहता था, लेकिन आशा ने उसके हाथ का फोल्डर छुआ।
“कार्यक्रम देखो।”
उनकी टीम चौथे स्थान से क्वालिफाई हुई। विजय की दूसरी रही।
यह परिणाम डेस्क वाले जवाब से अधिक जरूरी था। इससे पता चला कि बिना किसी एक शानदार व्यक्तिगत स्कोर के भी टीम सत्र पार कर सकती है। अंक इतने करीब थे कि एक बड़ा पतन उन्हें बाहर कर देता।
शाम को छोटे रेस्तराँ में अप्पम खाते हुए उन्होंने तालिका देखी। कबीर ने कहा कि फाइनल में मौका मिले तो वह विजय के सामने बैठे।
आशा ने वजह पूछी।
उसने रणनीति से शुरू किया और अंत में अनिच्छा से गुस्सा स्वीकारा।
आशा ने याद दिलाया कि मेजें प्रकाशित ड्रॉ से तय होंगी। तैयारी सबसे संतोषजनक दृश्य मिल जाने पर निर्भर नहीं हो सकती।
कबीर ने काल्पनिक सामना छोड़कर सलीम के नोट खोले।
6. तीन खिलाड़ी अलग बैठते हैं
फाइनल तक चार महीने का अभ्यास हो चुका था। कबीर अब भी मरम्मत की दुकान के ऊपर रहता था। उसने लोगों से उसे अस्थायी व्यवस्था कहना बंद कर दिया था।
फाइनल में तीन स्वतंत्र मेजें थीं। हर खिलाड़ी निर्धारित डील पूरी करता और अंत में टीम का कुल जुड़ता। कबीर का ड्रॉ विजय की मेज पर आया। आशा और सलीम हॉल की दूसरी ओर उसके साथियों से खेले।
बैठने की जगह देखकर विजय मुस्कराया।
“कोशिश करना कि उन्हें तुम्हें ढोना न पड़े।”
पुराना वाक्य पुरानी जगह पर चोट कर गया। कबीर ने पानी की बोतल रखी, मेज का नंबर देखा और शफल का इंतजार किया।
पहली डील खराब गई। उसने अच्छी दिखती बनावट बनाई, फिर बाकी हाथ साथ न देने पर उसे तोड़ना पड़ा। विजय पहले पूरा हुआ। कबीर की पेनल्टी उम्मीद से भारी रही।
वह मदद के लिए कमरे की दूसरी ओर नहीं देख सकता था। खेल की शर्तें साथियों के बीच संपर्क रोकती थीं।
दूसरी डील में उसने जोखिम जल्दी घटाया। दूसरे खिलाड़ी की घोषणा के समय उसका स्कोर सीमित रहा। शानदार वापसी नहीं थी। वही छोटी सुधार वाली डील थी जिसे महत्व देना उन्होंने महीनों सीखा था।
हॉल के दूसरे छोर पर आशा अपने पत्तों के सामने स्थिर बैठी थी। सलीम होंठ बिना आवाज हिलाकर अंतिम जाँच कर रहा था। हर खिलाड़ी अपना हिस्सा अकेले निभा रहा था।
नई गतिविधियों और ऐप अपडेट के लिए अपना पसंदीदा चैनल देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप
7. मुकाबले का एक ही केंद्र नहीं होता
विजय ने एक और डील जीती और तेज खेलने लगा। उसने आत्मविश्वास कमाया था। कबीर यह मान सकता था, बिना पूरा दिन उसके हवाले किए।
कठिन हाथ में उसके पास बड़ी जोड़ी बचाने और अधिक लचीली सीक्वेंस बनावट मजबूत करने का चुनाव था। उसने वास्तव में दिखाई दे रहे पत्तों के आधार पर दोनों रास्ते देखे। जोड़ी आकर्षक थी, लेकिन उसे रखने के लिए बाकी हाथ में बहुत नुकसान करना पड़ता।
उसने जोड़ी तोड़ी।
विजय ने सिर हिलाया। कबीर ने फिर ऊपर नहीं देखा।
घोषणा से पहले डील समाप्त हुई, लेकिन कबीर की पेनल्टी नियंत्रित रही। व्यक्तिगत कुल में वह अब भी विजय से पीछे था। पुराना कबीर सीधी बड़ी जीत से कम हर नतीजे को असफलता मानता।
दूसरी मेज पर आशा ने सही हाथ पूरा किया। उसका विरोधी कई चालों से बहुत संकरे रास्ते का इंतजार कर रहा था। सलीम ने खराब शुरुआत झेली, मगर पहली दोस्ताना प्रतियोगिता जैसी जल्दबाजी की घोषणा नहीं की।
कबीर को अभी इसका पता नहीं था।
उसे अपने पत्ते, अपनी मेज की सार्वजनिक स्कोर शीट और उन तथ्यों की सीमा पता थी। टीम उसकी नजर से बाहर भी मौजूद थी।
पहली बार उस पर भरोसा करने का अर्थ यह छोड़ना था कि हर जरूरी चीज उसी के नियंत्रण में होनी चाहिए। वह अपने फैसले कर सकता था। दूसरों को उनके फैसले करने देने थे।
8. अकेला नायक बनने का प्रलोभन
दो डील बाकी थीं। कबीर की मेज पर विजय अच्छी बढ़त में था। कबीर अपना परिणाम सुधार सकता था, मगर लापरवाह पीछा टीम पर ऐसी पेनल्टी डाल देता जिसे वह संभाल न पाए।
अगले हाथ में आकर्षक रास्ता था जिसे एक खास पत्ता चाहिए था। दूसरी बनावट कम सुंदर थी, लेकिन अधिक संभावनाएँ खुली रखती थी।
उसे तीन बराबर कॉलम याद आए।
उसने लचीला रास्ता चुना और नई जानकारी के साथ जाँचता रहा। एक पत्ते ने सही सीक्वेंस पूरी की तो राहत में घोषणा करने के बजाय बाकी समूह देखे। एक सेट अभी ठीक करना था।
विजय उससे पहले पूरा हो गया।
स्कोर लिखते समय उसने पूछा, “अब भी इंतजार कर रहे हो?”
गुस्सा उठा, गर्म और उपयोगी दिखता हुआ। कबीर ने उसे पत्ता पकड़ाने के बजाय गुजरने दिया।
आखिरी डील में जल्दी प्योर सीक्वेंस मिली। उसके आसपास सही हाथ बनाया। घोषणा से पहले गिना और हर समूह जाँचा। जीत से कुल सुधरा, लेकिन विजय की व्यक्तिगत बढ़त पूरी नहीं मिटी।
मेज का खेल समाप्त हुआ।
विजय पहले उठा। “कुछ चीजें नहीं बदलतीं।”
कबीर ने स्थिर हाथ से स्कोर शीट पर हस्ताक्षर किए। वह सामने की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं जीता था। लेकिन निजी जीत की जरूरत में साथियों की मेहनत भी दाँव पर नहीं लगाई थी।
9. बाकी दो कॉलम
स्कोर डेस्क पर अंतिम टीम कुल बनाए गए। विजय ऐसे सहज आया जैसे तय कर चुका हो कि शाम किस तरह याद रखी जाएगी।
कबीर आशा और सलीम के पास खड़ा था। किसी ने नहीं पूछा कि पुराने दोस्त को क्यों नहीं हरा सका।
आशा अपनी मेज पर जीती थी। सलीम का कुल लगातार कम रहा था। दोनों का संयुक्त लाभ कबीर की मेज के अंतर से बड़ा था।
स्कोरकीपर ने जोड़ जाँचा और परिणाम लगाया।
कबीर की टीम कप जीत चुकी थी।
विजय शीट देखता रहा, फिर अपने अंक की ओर उँगली रखी। “मैंने इसे हराया है।”
“हाँ,” आशा ने कहा। “यह टीम प्रतियोगिता थी।”
उसने आवाज नहीं उठाई। इसलिए बात और दूर तक गई।
कबीर को भीगा गद्दा, पत्तों की थैली और हमेशा ढोए जाने का आरोप याद आया। अब दिख रहा था कि टीम को लेकर विजय की समझ कितनी छोटी थी। तीनों को एक दूसरे की जरूरत पड़ी थी। उन्होंने इसी स्थिति के लिए तैयारी की थी।
कप मिला तो कबीर अपने आप बीच में नहीं खड़ा हुआ। एक हैंडल सलीम ने पकड़ा, दूसरा आशा ने। कबीर ने नीचे से सहारा दिया।
कमरा विजेताओं की ओर बढ़ा। विजय स्कोर शीट के पास खड़ा रहा। इस बार उसका उत्कृष्ट व्यक्तिगत परिणाम आसपास के बाकी लोगों को गायब नहीं कर सकता था।
10. लौटाई हुई चाबी
एक सप्ताह बाद विजय ने पुराने कमरे के बारे में संदेश भेजा। अरमान जा रहा था। वे फिर साथ रह सकते थे और “गलतफहमी पीछे छोड़ सकते थे।”
कबीर इमारत के बाहर उससे मिला। वह अतिरिक्त चाबी लाया था जिसे लौटाना भूल गया था।
“कोई गलतफहमी नहीं थी,” उसने कहा।
वफादारी पर भाषण नहीं दिया। चाबी उसकी हथेली में रखी और चला गया। अंदर से कुछ लेना बाकी नहीं था। सामान ऐसे कमरे में था जहाँ किसी दूसरे के आदेश पर उसे गलियारे में नहीं रखा जा सकता था।
रविवार के अभ्यास में सलीम फेरी की मरम्मत के कारण देर से आया। आशा ने उसकी कुर्सी रखी थी और छूटे अभ्यास पर निशान लगा दिए थे।
कप बगल की मेज पर रखा था। पास ऐसी केतली थी जिसे नया ढक्कन चाहिए था। तय हुआ था कि कप एक-एक सप्ताह हर घर जाएगा, फिर तीनों नामों के साथ लाइब्रेरी में रहेगा।
पहली अभ्यास बाजी कबीर आशा से हारा। उसने बताया कि कहाँ अधीर हुआ था। कबीर ने लिख लिया।
सलीम ने अगला हाथ बाँटा। बाहर बारिश खिड़की पर पड़ रही थी। कबीर ने एक पल आवाज की ओर देखा और फिर मेज पर लौटा।
“तैयार?” सलीम ने पूछा।
“हाँ।”
इस बार शामिल होना किसी का एहसान नहीं था जिसे बेहतर खिलाड़ी मिलने पर वापस लिया जाए। यह तीन लोगों का निभाया हुआ समझौता था।
आगे जानना चाहते हैं? ऐप की जानकारी और साझा ऑफ़र की शर्तें चैनल पर देखें।
टीजी चैनलWhatsApp चैनलWhatsApp ग्रुप