1. Saga Slots: जिसने घोषणा नहीं की, वही विजेता निकला
तुषार के हाथ की घोषणा सही होने के बाद प्रणव ने अपने तेरह पत्ते मेज पर रखे। हॉल के पीछे किसी ने गलत आदमी के लिए तालियाँ बजानी शुरू कर दीं।
तुषार दोनों मुट्ठियाँ उठाकर खड़ा हो गया था। सात हाथों के मुकाबले का आखिरी हाथ उसने जीता था। निर्णायक ने अभी दोनों हाथों की जाँच भी पूरी नहीं की थी, लेकिन उसकी पुरानी अकड़ लौट चुकी थी। उसने प्रणव के बचे पत्तों की तरफ उँगली उठाई।
“इस बार धीरे गिनना। जल्दी करते हो तो क्या होता है, सबको याद है।”
प्रणव ने सचमुच धीरे गिना। पहली सीक्वेंस में तीन पत्ते। दूसरी में चार। अलग अलग सूट की तीन बेगमों का सेट। फिर अलग बचे तीन छोटे पत्ते। हर पत्ते को उसकी अपनी जगह देने के बाद उसकी उँगलियाँ रुक गईं।
निर्णायक ने कुल अंकों के नीचे रेखा खींची। तुषार अभी खड़ा ही था, जब उन्होंने उसे बैठने के लिए कहा। सात महीने पहले ऐसी खामोशी प्रणव को एक और तबाही का संकेत लगती। वह उस सन्नाटे को पहचानता था जिसमें लोग तय कर रहे होते हैं कि सामने वाले को कितना अपमानित किया जा सकता है।
अब उसने हाथ जोड़कर अंतिम जोड़ का इंतजार किया। बगल की मेज पर कप्तान का रजिस्टर पेपरवेट के नीचे बंद पड़ा था। तुषार उसके ऊपर लगाने के लिए अपने नाम की पर्ची पहले ही लिख चुका था। निर्णायक ने वह पर्ची उठा ली।
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2. Saga Slots कथा: चौदह
तीस साल का प्रणव जिला अभ्यास समूह का सबसे तेज खिलाड़ी माना जाता था। तेज हाथ, तेज मजाक और तेज घोषणा। पुराने प्रशिक्षक कहते थे कि दूसरों को सूट दिखने से पहले उसे बनते समूह दिख जाते हैं। धीरे धीरे उसने तारीफ को खेलने का पूरा तरीका बना लिया।
फिर एक महत्वपूर्ण टीम क्वालिफायर के आखिरी हाथ में उसने जरूरी पत्ता छोड़ने से पहले ही घोषणा कर दी। सामने चौदह पत्ते थे। निर्णायक ने गलत घोषणा पर पहले से प्रकाशित दंड लगाया। उसकी टीम मुकाबला हार गई।
फैसले पर कोई विवाद नहीं था। प्रणव ने नतीजे पर हस्ताक्षर किए, साथियों का सामना किया और माफी माँगी। विरोधी कप्तान तुषार अधिकारियों के जाने तक चुप रहा। फिर उसने दोनों हाथ उठाए और कमरे से चार उँगलियाँ उधार माँग लीं।
मजाक प्रतियोगिता के बाद भी चलता रहा। क्लब के भोजन में किसी ने प्रणव की थाली के पास चौदह चम्मच रख दिए। उस घटना की रिकॉर्डिंग मोबाइल पर चलती रही, जबकि वह वहीं खड़ा था। अगले अभ्यास कार्यक्रम में उसके नाम की जगह खाली पंक्ति थी।
छोटे भाई ने पूछा कि वह टीम की जर्सी क्यों नहीं पहनता। प्रणव ने कहा, धुलने गई है। तीन सप्ताह तक बैग में एक साधारण कमीज तह रखी रही। असली जर्सी वह लौटा चुका था। बची केवल वह कमीज थी जिसे जर्सी के नीचे पहनता था। भाई को यह अंतर समझाने की हिम्मत उसमें नहीं थी।
3. बिना दर्शकों की मेज
उसने पहले सोचा कि और तेज होकर अपमान मिटा देगा। किराए के कमरे में मोबाइल का टाइमर लगाकर हाथ बाँटता और कोई बनावट पूरी दिखते ही पत्ते पटक देता। एक शाम चार नई गलतियाँ हुईं। गुस्से में टाइमर हटाया तो उसका छोटा स्टैंड टूट गया।
अगली सुबह उसने पड़ोस की मालती से लकड़ी की साधारण ट्रे माँगी। अट्ठावन वर्ष की मालती स्कूल प्रशासन में काम करती थीं और सप्ताहांत में गंभीर रमी खेलती थीं। उन्होंने प्रणव को एक हाथ सजाते देखा। फिर पूछा कि कौन से समूह सचमुच पूरे हैं और कौन अभी केवल संभावना हैं।
प्रणव ने एक बेगम दूसरी जगह सरकाई। थोड़ी देर बाद उसी को तीसरी जगह रखने लगा। मालती ने पत्ता वापस किया। “एक पत्ता दो संभावित भविष्य में इस्तेमाल कर रहे हो। पहले तय करो कि अभी वह कहाँ है।”
अभ्यास इतना धीमा हो गया कि उसे शर्म आती। पूरे समूह अलग पंक्तियों में रहते। अधूरे विकल्प खुले रहते। पत्ता उठाने के बाद वह मन में छोड़ने वाला पत्ता तय करता, बचे तेरह गिनता, जरूरी सीक्वेंस जाँचता और तभी घोषणा का अभ्यास करता।
मालती कभी ऐसा हाथ देतीं जो अगला पत्ता मिलने पर भी पूरा नहीं हो सकता था। प्रणव को ये अभ्यास सबसे खराब लगते। उसे कोई सुंदर जवाब चाहिए था जो पुरानी रिकॉर्डिंग मिटा दे। उन्हें उपलब्ध स्थिति में अच्छा फैसला चाहिए था। एक रविवार उसने बीस अभ्यास किए और एक बार भी घोषणा नहीं की। शाम को लिखे परिणाम देखे तो अठारह बार सही पत्ता छोड़ा था।
4. सुंदर हाथ की कीमत
पाँचवें सप्ताह तक प्रणव घड़ी के भीतर रहकर पूरे हाथ की जाँच करने लगा। अगली कमजोरी छोड़ना अधिक कठिन था। वह बड़े पत्ते इसलिए बचाए रखता क्योंकि वे किसी शानदार समूह के करीब दिखाई देते थे।
मालती ने दो सही सीक्वेंस और कुछ बिखरे पत्तों वाला हाथ दिया। फिर बदलते खुले पत्तों के सामने उससे निर्णय करवाए। दो बादशाह उसे इंतजार के लिए उकसा रहे थे। बंद गड्डी से आया छोटा पत्ता कम चमकदार रास्ता दे रहा था: सामने वाला पहले पूरा कर दे तो नुकसान घटाया जा सकता था।
उसने बादशाह बचाए और अभ्यास में भारी अंक खाए। अगले सत्र में एक उपयोगी बड़ा पत्ता जरूरत से पहले छोड़ दिया और अच्छा रास्ता खराब कर बैठा। किसी भी परिणाम ने उसे यह आसान नियम नहीं दिया कि हर बड़ा पत्ता तुरंत छोड़ दो।
वे बनावट, संभावित रास्ते और बिना समूह के पत्तों की कीमत अलग लिखते। अभ्यास के विरोधी अपनी गति बदलते। कुछ मजबूत हाथ होने पर जल्दी छोड़ते, कुछ इसलिए कि उनका निर्णय आसान था। प्रणव अपने अनुमानों के पास “अनिश्चित” लिखने लगा।
एक शुरुआती प्रतियोगिता में तुषार ने पूछा कि गिनने के लिए सहायक चाहिए क्या। उसी दिन प्रणव चौथा हाथ हार गया। उसने अंक जाँचे और पाँचवें के लिए वापस बैठा। कुल परिणाम में तीसरा आया। गलत घोषणा के बाद पहली बार हार उसकी कॉपी की एक पंक्ति में समाई थी। उसने पूरा पन्ना नहीं निगला।
5. वापस कमाई हुई कुर्सी
कप्तानी की इस काल्पनिक प्रतियोगिता में खुले क्वालिफायर के बाद दो खिलाड़ियों का सात हाथों वाला फाइनल था। कम कुल दंड अंक वाला खिलाड़ी जीतता। ड्रॉप और गलत घोषणा के नियम पहले ही छपे थे। हर फाइनलिस्ट ने उन्हीं शर्तों पर हस्ताक्षर किए थे।
प्रणव दूसरे स्थान पर क्वालिफाई हुआ। तुषार पहले स्थान पर था। उसके साथ प्रणव के दो पुराने साथी आए, जो चम्मच वाले मजाक पर हँसे थे। उन्होंने देखा कि प्रणव कुर्सी के पास पेंसिल, पानी और तह किया अभ्यास पत्र रख रहा है।
“होमवर्क भी लाए हो?” तुषार ने पूछा।
खेल शुरू होने से पहले प्रणव ने अभ्यास पत्र मालती को दे दिया। मुकाबले के दौरान निजी नोट्स की अनुमति नहीं थी। पेंसिल आधिकारिक अंक लिखने के लिए बची रही।
पहला हाथ तुषार ने जीता। प्रणव की जरूरी सीक्वेंस बन चुकी थीं, लेकिन घोषणा आने तक कई पत्ते बिना समूह के थे। उसने दंड की गणना देखी, स्वीकार की और अगली शफल के दौरान चुप बैठा रहा। दर्शकों के लिए चेहरा सँभालने की कोशिश नहीं की।
दूसरे हाथ में खराब शुरुआती बनावट देखकर उसने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ड्रॉप किया। तुषार उसकी सावधानी पर हँसा। दंड चुभा, पर हाथ में इतनी संभावना नहीं थी कि वह खुद से झूठ बोलता। दो हाथों के बाद बोर्ड पुरानी कहानी जैसा लग रहा था। तुषार ने अपनी बढ़त पर पेंसिल ठकठकाई। प्रणव निर्णायक के हाथों से आते नए पत्ते देखता रहा।
6. तीसरे हाथ ने आवाज बदल दी
तीसरे हाथ में प्रणव की शुद्ध सीक्वेंस जल्दी बन गई। प्रिंटेड जोकर को उसने दूसरी सीक्वेंस के लिए बचाया। बराबर रैंक के दो पत्तों से सेट बन सकता था, लेकिन उनमें से एक दूसरी उपयोगी सीक्वेंस में भी लग सकता था। उसने पत्ते को बार बार खिसकाकर दोनों रास्ते एक साथ पूरे मानने की पुरानी आदत रोकी।
बंद गड्डी से बीच का जरूरी पत्ता मिला तो उसने फैसला कर लिया। जोकर दूसरी अधूरी सीक्वेंस में गया। अगला छोड़ा गया पत्ता उस सेट की योजना से आया जिसे वह छोड़ चुका था। किसी पूरे समूह को अनजाने में नहीं तोड़ा।
तुषार ने वही पत्ता उठा लिया। कई दर्शक आगे झुक गए। प्रणव इतना जानता था कि वह पत्ता विरोधी की किसी योजना में उपयोगी था। पूरा हाथ उसे नहीं दिख सकता था। उसने अपना बचा रास्ता जाँचा। अगली बारी बंद गड्डी से उसका आखिरी जोड़ने वाला पत्ता मिला।
इस बार घोषणा से पहले पत्ता छोड़ा गया। मेज पर तेरह रहे। निर्णायक ने जरूरी सीक्वेंस और बाकी समूह जाँचकर घोषणा सही बताई। तुषार के दंड ने उसकी अधिकांश बढ़त मिटा दी। पीछे खड़े लोग हर पत्ते पर टिप्पणी करना बंद कर चुके थे।
चौथा हाथ अधिक कड़ा था। प्रणव दो उचित विकल्पों में एक चुनने के बाद हार गया। लेकिन तुषार के पूरा करने से पहले उसने बचे पत्तों की कीमत घटा ली थी। उसने नया कुल साफ लिखकर अंक बोर्ड पलटने को कहा।
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7. इतनी छोटी बढ़त कि दर्द हो
पाँचवाँ हाथ बीच की टूटी सीक्वेंस से लंबी लड़ाई के बाद प्रणव ने जीता। नई बनती राह मजबूत हुई तो उसने आशाजनक बड़े जोड़े को छोड़ दिया। तुषार खुली गड्डी पर अधिक आक्रामक हुआ, लेकिन प्रणव पहले सही हाथ तक पहुँचा।
छठे हाथ में दोनों कई बार ऐसे निर्णय लेते रहे जिन्हें बाहर बैठा व्यक्ति पूरी तरह नहीं समझ सकता था। प्रणव ने आकर्षक खुला पत्ता नहीं उठाया क्योंकि उसके पीछे बहुत से असंबद्ध पत्ते बच जाते। बाद में छोटा उपयोगी पत्ता मिला तो उसने शुद्ध सीक्वेंस तोड़े बिना बनावट बदली।
वह हाथ तुषार ने जीता। प्रणव का दंड इतना कम था कि पिछले हाथ में बनी बढ़त बच गई। आखिरी हाथ से पहले प्रणव के तिरसठ और तुषार के सतहत्तर अंक थे। अंतर चौदह का था। पीछे से एक छोटी हँसी निकली। फिर हँसने वाले ने देखा कि कोई साथ नहीं दे रहा।
इस प्रतियोगिता में शुरुआती ड्रॉप के बीस अंक थे। प्रणव आखिरी हाथ से बाहर होकर अपनी बढ़त सुरक्षित नहीं कर सकता था। तुषार को शून्य दंड मिलता तो प्रणव के तिरासी अंक हो जाते और वह पीछे चला जाता। खेलते रहने में भी खतरा था। एक खराब सँभाला हाथ पूरा मुकाबला पलट सकता था।
पत्ते बाँटे गए तो तुषार आगे झुका। “फिर चौदह,” उसने कहा। प्रणव ने अपना हाथ उठाया। सूट अलग किए और जो वास्तव में मौजूद था, उसकी गिनती शुरू की।
8. जिस पत्ते को उसने देवता नहीं बनाया
आखिरी हाथ में जल्दी घोषणा का रास्ता नहीं था। प्रणव ने दिल की शुद्ध सीक्वेंस बनाई और चिड़ी की लंबी सीक्वेंस पर काम किया। तीन बेगमों का सही सेट भी बन गया। खुले बचे पत्तों की कीमत अभी अधिक थी।
तुषार ने अपनी लगातार दो बारियों में खुले पत्ते उठाए। हर चुनाव कुछ संभावनाएँ घटाता था, लेकिन बाकी रास्ते खुले रहते। प्रणव सार्वजनिक जानकारी देखता रहा। उसने उसे विरोधी के छिपे पत्तों के भीतर देखने की शक्ति नहीं मान लिया।
बंद गड्डी का एक बड़ा पत्ता उसे अतिरिक्त महत्वाकांक्षी रास्ता बचाने के लिए उकसा रहा था। मन में पुराना प्रणव लगभग बोल उठा कि बस अगली बार शानदार घोषणा होगी। उसने पूरे हाथ की तुलना की। अतिरिक्त योजना में अधिक कीमत के बिखरे पत्ते बचे रहते, जबकि बनी हुई संरचना को बहुत कम लाभ मिलता।
उसने बड़ा पत्ता छोड़ दिया। दो बारियों बाद चिड़ी की चार पत्तों वाली सीक्वेंस पूरी हो गई। अब दस पत्ते सही समूहों में थे और तीन बाहर। घोषणा अब भी संभव नहीं थी।
अगली बारी हुकुम का चौका आया। उससे बचे पत्तों की कोई सीक्वेंस या सेट नहीं बनता था। लेकिन वह बिना समूह के बादशाह की जगह ले सकता था। प्रणव ने बादशाह छोड़कर चौका रखा। तुषार उस बड़े खुले पत्ते को देखकर मुस्कराया। प्रणव ने अपने तीन बचे पत्तों के बीच थोड़ा फासला कर लिया, ताकि आँख ऐसी बनावट न पढ़ ले जो वहाँ थी ही नहीं।
9. नौ
तुषार ने पत्ता उठाया, एक छोड़ा और घोषणा कर दी। निर्णायक की जाँच में उसका हाथ सही निकला। वह तुरंत उठ खड़ा हुआ। उसे विश्वास था कि आखिरी हाथ जीतकर उसने पूरा मुकाबला बचा लिया है।
प्रणव ने अपने पत्ते खोले। दिल का पाँच, छह और सात शुद्ध सीक्वेंस थे। चिड़ी का आठ, नौ, दस और गुलाम दूसरी सीक्वेंस थे। ईंट, दिल और हुकुम की बेगमों का सही सेट था। बिना समूह के पत्ते थे ईंट का दो, हुकुम का तीन और हुकुम का चार।
तीन, चार, तीन और तीन मिलाकर तेरह पत्ते। जरूरी सीक्वेंस मौजूद थीं और बाकी सेट भी साफ था। दंड में केवल तीन बचे पत्ते गिने गए। दो, तीन और चार का जोड़ नौ था।
निर्णायक ने तिरसठ में नौ जोड़े। प्रणव के अंतिम अंक बहत्तर हुए। तुषार सतहत्तर पर रहा। आखिरी हाथ तुषार का था। सात हाथों का मुकाबला प्रणव ने पाँच अंकों से जीता था।
तुषार ने दोबारा जोड़ने को कहा। स्कोरर ने पिछले कागज उसकी तरफ कर दिए। हर पुराने परिणाम के पास उसी के हस्ताक्षर थे। वह पंक्ति दर पंक्ति नीचे आया। उसकी गति अब प्रणव की सबसे धीमी गिनती से भी कम थी।
पीछे मालती ने वह अभ्यास पत्र नीचे कर लिया जिसे उन्होंने कसकर पकड़ रखा था। प्रणव तीन छोटे पत्ते देखता रहा। सात महीने की मेहनत उसी शांत फैसले में उतर आई थी। पहली तालियाँ रुक चुकी थीं। अब हॉल सही नाम सुनने का इंतजार कर रहा था।
10. रजिस्टर पर लिखा नाम
कप्तान का रजिस्टर दोनों के सामने खुला। तुषार की हटाई गई पर्ची पेपरवेट के पास मुड़ी पड़ी थी। अधिकारी ने स्याही से प्रणव का नाम लिखा और माइक्रोफोन पर दोनों कुल अंक पढ़े।
निवर्तमान कप्तान के रूप में तुषार को हस्ताक्षरित परिणाम स्वीकार करना था। बहत्तर बोलते समय उसकी आवाज अटकी। सतहत्तर तक पहुँचते ही हॉल ने प्रणव के लिए वह ताली बजाई जो पहले गलत आदमी के लिए शुरू हुई थी।
प्रणव ने तुरंत माइक्रोफोन नहीं लिया। वह दर्शक पंक्ति में अपने दो पुराने साथियों के पास गया। एक ने धीमे कहा कि चम्मच वाला मजाक बहुत आगे चला गया था। प्रणव ने अगले महीने के खुले टीम ट्रायल की सूचना उनके सामने रख दी।
“आकर खेलना,” उसने कहा। “जगह वहीं तय होगी।”
कप्तानी का पहला काम साफ और ठोस था। अभ्यास की तारीखें तय करना, चयन के मानदंड छापना और सभी आवेदकों तक एक जैसी जानकारी पहुँचाना। हॉल से निकलने से पहले उसने वह काम पूरा किया। अगली सुबह आवेदन सूची में तुषार का नाम भी था। उसके ऊपर कई ऐसे खिलाड़ी थे जिन्हें वह पहले महत्व नहीं देता था।
घर पर छोटा भाई साधारण पुरानी कमीज लिए इंतजार कर रहा था। इस बार प्रणव ने लौटाई हुई जर्सी, अपनी गलती और सात हाथों की कहानी पूरी सुनाई। शर्म वाले हिस्से छोड़े नहीं। भाई ने ट्रॉफी देखी, फिर अंक पत्र।
“आखिरी हाथ तुम हारे थे?”
प्रणव ने अंक पत्र कप्तान के रजिस्टर के पास रखा। “उसके नीचे वाली पंक्ति पढ़ो।”
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