रेखा पत्ते रखने लगी थी कि पति ने मेज के नीचे उसके घुटने को छुआ।
जोर से नहीं।
बस इतना कि समझ जाए।
सामने उसके पिता अपने उस हाथ पर मुस्कुरा रहे थे जिससे जीतने की उम्मीद थी।
रेखा रुक गई।
बेटी ने हरकत देखी। ईशा की नजर माँ के पत्तों से पिता के हाथ पर गई, फिर वापस आई।
“इतना समय क्यों?” बुजुर्ग ने पूछा।
“कुछ नहीं।”
रेखा ने फैसला बदल दिया।
कुछ देर बाद चंद्रकांत जीत गए। मनोज ने कंधा थपथपाकर घोषणा की कि अनुभव हमेशा चालाकी से बड़ा होता है।
रेखा ने खाली कप उठाए।
तेईस साल की ईशा इतनी बड़ी थी कि झूठ पहचान सके, भले सब उसे तहजीब कहें।
इतनी बड़ी भी थी कि जान चुकी हो, कौन से झूठ शाम आसान बनाते हैं।
अगला खेल शुरू हुआ तो उसने भी एक वैसा झूठ बोला।
* * *
परिवार की शामों के कुछ नियम लिखे नहीं जाते थे।
इंडियन रमी के लिखित नियमों पर जोर से चर्चा होती थी जब कोई मेहमान कुछ गलत समझे। बाकी नियम नजर से बताए जाते। मेज के नीचे हाथ से। या इस मजाक से कि महिलाएँ मनोरंजन को जरूरत से ज्यादा गंभीर बना देती हैं।
चंद्रकांत हार की शिकायत कर सकते थे।
मनोज दोबारा खेलने की माँग कर सकता था।
रेखा को याद रखना था कि ससुर इकहत्तर साल के हैं। पत्तों के लिए परेशान नहीं होना चाहिए।
पूछती कि इस चिंता के कारण कोई उसकी बेइज्जती क्यों नहीं बचाता, तो मनोज कहता कि अलग चीजों की तुलना है।
“बड़े हैं।”
“उम्र जानती हूँ।”
“तो उसके हिसाब से रहो।”
पैसों के लिए नहीं खेलते थे। बातचीत और घर के छोटे अंक खाते के लिए। इसलिए नुकसान नहीं होना चाहिए था।
फिर भी चंद्रकांत जीतते तो हिसाब ध्यान से लिखा जाता। रेखा आगे होती तो गिनना छोड़ दिया जाता।
वह कॉलेज से खेलती थी। ध्यान लगाने में आनंद आता था। हर शाम बहस बनाने का इरादा नहीं था।
वर्षों से उसकी इसी इच्छा को अनुमति माना गया था।
* * *
जिस शाम सोच बदली, वह सबसे बुरी नहीं थी।
ज्यादा बुरे मजाक हुए थे। तीखी सुधार वाली बातें हुई थीं। लंबी नाराजगी हुई थी।
इस बार ईशा को जानबूझकर हारते देखा।
पहली पूर्णकालिक नौकरी से लौटकर बेटी ने पुरानी टीशर्ट पहनी और खाने से पहले मेज पर बैठी। थकी थी, दिलचस्पी भी थी।
तभी चंद्रकांत ने शिकायत की कि नई पीढ़ी को बड़ों को नीचा दिखाने में खुशी मिलती है।
ईशा ने माँ को देखा।
अपना खेल बदल दिया।
बुजुर्ग सहज हो गए।
बाद में रसोई में रेखा ने पूछा कि ऐसा क्यों किया।
ईशा प्लेट धो रही थी।
“आप करती हो।”
दो शब्द। आरोप नहीं था।
रेखा ने चाहा कि आरोप होता। गुस्से के सामने बचाव कर सकती थी। यहाँ सीखी बात सही-सही लौटाई जा रही थी।
“नहीं चाहती कि तुम्हें लगे, ऐसा करना पड़ता है।”
“तो आप क्यों करती हो?”
प्लेट पर पानी बहता रहा, जब तक ईशा ने नल बंद नहीं किया।
रेखा के पास कई स्पष्टीकरण थे।
कोई ऐसा जवाब नहीं जिसे बेटी को विरासत में देना चाहती।
* * *
पुरानी कॉलेज मित्र के मनोरंजन समूह से वयस्क खुली प्रतियोगिता का पता चला।
प्रवेश की शर्तें स्पष्ट थीं। खुद पढ़ीं। समय पूछा। तय करने से पहले अभ्यास पर गई।
दोस्त नीलम ने यह नहीं कहा कि वह छिपी हुई असाधारण खिलाड़ी है।
पहले सत्र में दो बार हारी।
नीलम ने पूछा कि फैसले देखना चाहेगी?
रेखा ने हाँ कहा।
किस उम्र के व्यक्ति को हराया या उससे हारी, इसका निरीक्षण नहीं हुआ। किसी ने नहीं कहा कि इतना ध्यान देना महिला को शोभा नहीं देता।
घर लौटकर फिर जाना चाहती थी।
मनोज को प्रतियोगिता बताई तो हँसा।
“अब घर की बहस निपटाने के लिए टूर्नामेंट चाहिए?”
“घर के अंकों की बात नहीं है।”
“तो अभी क्यों?”
रेखा को ईशा की गीली प्लेट याद आई।
“क्योंकि ठीक से खेलना चाहती हूँ।”
मनोज ने कहा कि घर में खेलती तो है।
समझ नहीं आया कि कैसे बताए, वर्षों से मेज पर खेलने के पास की कोई और चीज करनी पड़ रही थी।
* * *
खाने पर चंद्रकांत को प्रवेश का पता चला।
पूछा कि रविवार हॉल में बिताएगी तो दोपहर का खाना कौन बनाएगा?
“फ्रीजर में खाना है। गरम कर सकते हैं।”
मनोज ने देखा।
रेखा ने कहा कि आम तौर पर अपने किए काम तय कर लिए हैं। बाकी दो वयस्क लोग सँभाल सकते हैं।
वयस्क शब्द बुरा लगा।
चंद्रकांत ने प्लेट दूर की।
“अब बोझ हो गए।”
रेखा को पुरानी इच्छा हुई कि वाक्य गायब कर दे। दूसरा खाना दे। मजाक करे। कहे कि ऐसा मतलब नहीं था।
ईशा स्थिर बैठी थी।
रेखा ने प्लेट वहीं रहने दी।
“मैंने कहा कि खाना गरम कर सकते हैं।”
बहस इतनी देर चली कि बोलने पर पछतावा होने लगा। उसे संदेह था कि यही उद्देश्य भी था।
प्रवेश रद्द नहीं किया।
अगले सप्ताह किसी ने नहीं पूछा कि अभ्यास कैसा चल रहा है।
मनोज प्रतियोगिता को सिर्फ उसका कार्यक्रम कहता। उसी स्वर में जिसमें किसी और की खराब तय कराई मरम्मत को कहता था।
* * *
कागजों का फोल्डर शनिवार को गायब हुआ।
शुक्रवार शाम रेखा ने जाँचा था। दिखाने वाला मूल पहचान दस्तावेज, प्रवेश पुष्टि और घर के कुछ अन्य कागज थे।
अब दराज खाली थी।
अलमारी, मेज और कागज जमा होने वाली शेल्फ देखीं।
मनोज ने कहा कि सफाई में खुद कहीं रख दिया होगा।
“कल देखा था।”
“तो मिल जाएगा।”
दोपहर तक पलंग के नीचे से बैग निकाल रही थी।
ईशा मदद कर रही थी।
चंद्रकांत बैठक में टेलीविजन देखते हुए पूछ रहे थे कि शयनकक्ष के तमाशे के कारण खाना देर से होगा क्या।
रेखा ने आयोजन कार्यालय में फोन किया। जो पास था, बताया। पूछा कि क्या स्वीकार होगा।
उस आयोजन की पहचान जाँच में उसके पास की प्रतियाँ पर्याप्त नहीं थीं। कार्यालय ने विकल्प बताए। जाँच अवधि के बाद जगह रोक नहीं सकते थे।
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उसने धन्यवाद कहा और फोन रखा।
फिर खुले बैगों के बीच फर्श पर बैठ गई।
ईशा पास बैठी।
किसी ने नहीं कहा कि मिल जाएगा।
* * *
सोमवार को मिल गया।
दादा ने ईशा को पुरानी पारिवारिक तस्वीर के लिए अलमारी खोलने को कहा था। सर्दी के कंबलों के पीछे कपड़े के बैग में फोल्डर मिला।
वह माँ के पास लाई।
सभी कागज थे।
मनोज ने कहा कि खुश होना चाहिए।
ईशा ने पूछा कि वहाँ पहुँचा कैसे?
चंद्रकांत बोले कि लोग चीजें अजीब जगह रख देते हैं।
फिर खामोशी से चिढ़कर जोड़ा कि कम से कम रविवार घर में शांति रही।
मनोज ने उन्हें छोड़ने को कहा।
रेखा ने पति देखा।
“तुम्हें पता था?”
उसने माथा मला।
“पता था कि वह चाहते हैं तुम शांत हो जाओ।”
“कागज कहाँ हैं, पता था?”
रुककर हाँ कहा।
ईशा ने फोल्डर इतनी सावधानी से रखा कि छोटी, सपाट आवाज हुई।
रेखा ने शनिवार सोचते बिताया था कि भूलने लगी है क्या।
पति उसे यह सोचते देख रहा था।
कागज लौट आने भर से वह हिस्सा माफ नहीं कर सकती थी।
* * *
हर दस्तावेज जाँचा। निजी रिकॉर्ड अपने नियंत्रण की जगह रखे।
जिस पहचान पत्र के जरूरत पर मिलने का भरोसा नहीं था, उसके स्थान पर वैध प्रतिस्थापन पाने की सामान्य प्रक्रिया शुरू की। संबंधित रसीदें रखीं। यह नहीं माना कि आवेदन की रसीद ही किसी आयोजन में पर्याप्त होगी।
वैध दस्तावेज आने पर बाद की प्रतियोगिता की शर्तें पढ़ीं। क्या लाना है, उसकी पुष्टि की।
व्यावहारिक काम धीमा था।
मदद करता था।
फोन करने थे। तारीखें लिखनी थीं। कागज अब वहीं रहते जहाँ रखे।
कुछ समय अभ्यास वाले सप्ताहांत नीलम के पास रही। मनोज को बताया कहाँ होगी। व्यवस्था को अनुमति की माँग नहीं बनाया।
उसने जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया कहा।
रेखा ने पूछा कि पहचान छिपाना संतुलित प्रतिक्रिया था क्या?
जवाब नहीं मिला।
वह अचानक निर्भय नहीं हुई। पहली रात फोन तब तक देखती रही जब तक बैटरी की चेतावनी नहीं आई।
नीलम ने चाय पूछी।
रेखा ने हाँ कहा और फोन दूसरे कमरे में रखा।
* * *
सप्ताहांत के राशन का हिस्सा अपनी कमाई से दिया। पास के स्टेशनरी थोक व्यापारी के बिल सँभालती थी।
काम हमेशा घर के आसपास फिट होता आया था। दो सुबह दुकान पर। कुछ जाँच घर में। महीने के अंत में भुगतान।
मनोज उसे छोटा काम कहता था।
उसी से अगला प्रवेश भरा।
सोमवार लौटकर व्यापारी से व्यवस्था बदली। जाँच वाले घंटे भी दुकान पर होंगे।
उसे काम पूरा चाहिए था। कहाँ करती है, इसकी कहानी नहीं।
समय तय हो गया।
कई वर्षों में पहली बार सप्ताह के नियमित हिस्से ऐसे थे जब घर में रहना मूल स्थिति नहीं था। हर दूसरी बात का बचाव उसके सामने नहीं करना था।
शुरू में जाते समय पीछे की हर चीज जाँचती। गैस। खिड़की। खाना। फिर याद करती कि घर में और लोग भी हैं।
बैग उठाकर निकलती।
दुकान की मेज पर बिल होते। उन पर ध्यान देना होता।
उसका समय सिर्फ अनुपस्थित होने का अपराध नहीं रह गया था।
* * *
अभ्यास में सबसे कठिन आदत का नाम जानबूझकर हारना नहीं था।
दूसरा जीते तो राहत होती थी।
निराशा से पहले राहत। मुस्कुराती, अच्छे हाथ की तारीफ करती और बिना कहे कप समेटने लगती।
एक दोपहर नीलम ने रोका।
“कप रुक सकते हैं। आखिरी दौर में क्या हुआ?”
रेखा ने परिणाम बताया।
“यह नहीं पूछा।”
फिर शुरू किया। इस बार अपने फैसलों से।
कुछ उचित थे। एक लापरवाह था। किसी में जरूरी नहीं था कि जीतने वाले को सुरक्षित महसूस कराने के लिए उपयोगी काम में गायब हो जाए।
कुर्सी पर रही।
दूसरे सत्र में जीती और खाली पल किस्मत के स्पष्टीकरण से भरने लगी। सामने वाला बोला कि बस स्वीकार कर सकती है। उसने कोई आरोप नहीं लगाया।
रेखा हँसी। फिर एहसास हुआ कि ऐसी शिकायत का बचाव कर रही थी जो आई ही नहीं।
बदलाव छोटे और अक्सर शर्मिंदा करने वाले थे। सब ईशा को नहीं बताए। बेटी को माँ की हर प्रगति की निगरानी नहीं करनी थी।
अपने लिए नोट लिखे। जाती रही।
धीरे खेल खत्म होना सिर्फ खेल खत्म होना हुआ। सीखने को बात थी, अगला सत्र था।
यह तय करने का क्षण नहीं था कि कितनी छोटी होकर बैठना चाहिए।
* * *
ईशा एक अभ्यास देखने आई।
पहले पीछे खड़ी रही। जैसे उम्मीद हो कि माँ जीतेगी तो बहस शुरू होगी।
इसके बजाय सामने वाला बोला कि कुछ छूटा। दोबारा देखना चाहता है।
दोनों ने देखा।
बाद में ईशा खुद वयस्क अभ्यास मेज पर बैठी।
निष्पक्ष हारी।
फिर निष्पक्ष जीती।
बस में पूछा कि माँ को हमेशा ऐसे कमरों का पता था क्या?
“ऐसे कमरे का नहीं।”
“होता तो पहले जातीं?”
रेखा खिड़की से दुकानें देखती रही।
“नहीं जानती। बहुत समय इंतजार किया कि चाहना अपने आप पर्याप्त वजह बन जाए।”
ईशा ने सिर हिलाया।
कुछ देर बाद बताया कि अगले शनिवार सहकर्मी ने फिल्म के लिए बुलाया है। उसी समय माँ का अभ्यास होगा। चाहे तो अपना कार्यक्रम रद्द कर सकती है।
“क्यों?”
“ताकि अकेले न जाना पड़े।”
रेखा प्रस्ताव समझती थी। साथ ही कुछ ऐसा शुरू होता दिखा जो नहीं चाहती थी। बेटी अपना जीवन दूसरे वयस्क को सहज रखने के हिसाब से तय करने लगी थी।
“फिल्म देखने जाओ। मैं सफर कर सकती हूँ।”
“घर में कुछ हुआ तो?”
“तब मैं तय करूँगी कि क्या करना है।”
ईशा पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखी। रेखा ने तुरंत आश्वस्त दिखने की माँग नहीं की। वह जानती थी कि घर की चिंता एक वाक्य सुनकर गायब नहीं होती।
उन्होंने फिल्म की बात की। बेटी ट्रेलर ठीक से बता नहीं पा रही थी। दो अभिनेताओं के नाम मिला दिए, फिर अपनी गलती पर हँस पड़ी। रेखा उसे सुनती रही। अच्छा लगा कि ईशा के पास ऐसी बात है जो न घर की बहस है, न माँ को ठीक करने की योजना।
ईशा ने यह नहीं कहा कि अब सब बदल जाएगा।
घर पहुँचे तो चंद्रकांत ने पूछा कि दोनों चैंपियन याद रखती हैं कि लोगों को खाना चाहिए?
ईशा ने फ्रिज का डिब्बा निकाला। गरम किया।
दोपहर के लिए माफी नहीं माँगी।
रेखा ने हाथ धोए और प्लेटें रखीं।
काम था। उसके लिए किसी को घर से निकलने का पछतावा नहीं चाहिए था।
* * *
बाद की प्रतियोगिता पहली से छह सप्ताह बाद थी।
रेखा जरूरी दस्तावेज, पुष्टि और खाने का बैग लेकर जल्दी पहुँची।
जाँच मेज पर अधिकारी ने जानकारी देखी और पहचान लौटाई।
उसने आगे बढ़ने से पहले रख ली।
इस साधारण लेन-देन से लगभग रो पड़ी।
बाहर बैठकर आधा केला खाया। साँस सामान्य होने का इंतजार किया।
नीलम ने साथ पूछी।
“एक मिनट में।”
रेखा सीख रही थी कि थोड़ी जगह माँग सकती है, बिना दूसरे को अनुमान लगाने दिए कि उसने कुछ गलत किया है।
शुरुआत साधारण थी। दो फैसले फिर देखने थे। उनसे यह नहीं तय होने दिया कि घर रहना चाहिए था।
मुश्किल से आगे पहुँची।
रात मनोज ने पूछा कि अगले दिन खाने तक आ जाएगी क्या?
प्रकाशित कार्यक्रम भेज दिया।
उत्तर आया, ठीक है।
उस एक शब्द को माफी नहीं समझा।
फिर भी छिपे फोल्डर से बेहतर था।
* * *
अंतिम चरण में सबसे उम्रदराज खिलाड़ी चाँदी जैसे बालों वाली महिला थी। अंक का कागज अधीरता से सीधा करती थी।
नाम उषा बताया।
विराम में रेखा ने फैसले पर ज्यादा सोचने की माफी माँगी।
उषा हैरान हुई।
“अनुमत समय से बाहर थीं?”
“नहीं।”
“तो माफी किसकी?”
रेखा असहज हँसी।
बाद में उषा से आगे हुई तो परिचित झिझक आई।
महिला ने ठहराव देखा।
“अब दया मत शुरू करना। मैंने नहीं की।”
हल्के से कहा था। रेखा समझ गई।
खेली।
उषा ने अंतर घटाया। दूसरा खिलाड़ी आगे आया। रेखा से गलती हुई। जो बचा, उससे काम करना था। अपने अभिमान के अनुसार शाम बदलने की माँग नहीं कर सकती थी।
अंत में अंक करीब थे।
अधिकारी जाँचते रहे। खिलाड़ी रुके।
रेखा का पहला स्थान पक्का हुआ तो उषा ने हाथ मिलाया।
किसी ने बड़ी महिला के परिणाम की माफी माँगने को नहीं कहा।
उषा अपनी गलती पर बात कर रही थी।
* * *
ईशा प्रस्तुति तक पहुँच गई।
साँस चढ़ी थी। दफ्तर का बैग था। दरवाजे पर दिखी तो रेखा व्यवस्थित होने से पहले मुस्कुरा पड़ी।
तस्वीर के बाद ईशा ने कहा, “उन्हें जाने नहीं दिया।”
“नहीं।”
“अच्छा।”
गले मिलीं।
पुरस्कार और प्रमाणपत्र ने घर की बात नहीं सुलझाई। स्टेशन आने से पहले रेखा जानती थी।
मनोज ने खाना बनाया था।
चंद्रकांत सामान्य कुर्सी पर थे। बोले कि आयोजन छोटा होगा।
रेखा ने बैग रखा।
“जानना है तो पूछ सकते हैं।”
नहीं पूछा।
उसने खाया। मनोज को बनाने का धन्यवाद दिया। प्रमाणपत्र अपने फोल्डर में रखा।
बाद में मनोज ने माना कि कागज छिपाने में साथ देना गलत था।
रेखा ने सुना।
फिर कहा कि माफी के बाद दस्तावेज, योजनाएँ और फैसले अकेले छोड़ने होंगे।
उसने समझने को कहा।
बातचीत से ज्यादा अगली घटनाएँ बताएँगी।
* * *
दो रविवार बाद ईशा ने बैठक की मेज पर पत्ते रखे।
“खेलें?”
चंद्रकांत ने अखबार से देखा।
रेखा रुकी।
ईशा ने दो कुर्सियाँ निकालीं। एक अपनी, एक माँ की।
“हम शुरू कर सकते हैं।”
मेज के नीचे छिपा निर्देश नहीं था।
रेखा बैठी।
पहले दोनों जरूरत से ज्यादा सावधान थीं। छोटे नियम पर दो बार बात हुई। ईशा का मजाक ठीक से नहीं हँसाया।
कमरे में वे सारी शामें थीं जब किसी दूसरे का चेहरा सँभालना पड़ता था।
फिर खेल दिलचस्प हुआ।
ईशा आगे झुकी। रेखा ने अखबार की सरसराहट सुनना छोड़ा।
लिखे कुल पर असहमति हुई। जाँचा। सुधारा।
ईशा जीती तो हाथ पत्तों की तरफ गया। जैसे किसी के देखने से पहले परिणाम वापस ले सकती हो।
रेखा ने पेंसिल रखी।
“अच्छा खेलीं।”
बेटी देर तक देखती रही।
फिर मुस्कुराई।
माफी में नहीं।
कमरा सहज करने के लिए नहीं।
सिर्फ इसलिए कि जीत गई थी।