कक्षा कहाँ जाएगी, इस पर बात करने से पहले वसंत से चाबी माँग ली गई।
वह हाजिरी की कॉपी बैठक में लाए थे।
सामुदायिक भवन के सचिव चावला ने खोली नहीं।
“स्तर ऊपर करना है।”
वसंत ने काँच के पार उस कमरे को देखा जहाँ तीन साल पढ़ाया था।
एक मेज पर अब भी टेप लगी थी। टूटा किनारा आस्तीन में फँस सकता था।
“पढ़ाने में क्या कमी है?”
चावला ने चमकीली पुस्तिका आगे कर दी।
“प्रस्तुति।”
तस्वीर में चमकदार नामपट्ट के नीचे प्रशिक्षक था।
एक जैसे कपड़े। नई कुर्सियाँ। पीछे से दिखने लायक बड़ी स्क्रीन।
वसंत की मासिक फीस तीन सौ रुपये थी।
नई अकादमी आठ गुना लेती थी।
कई माता-पिता पहले ही मान चुके थे कि बेहतर होगी।
* * *
सीखने वाले वयस्क थे।
अनु तेईस साल की थी। चश्मे की दुकान में काम करती थी।
निखिल चौबीस का था। नौकरी की परीक्षाओं की तैयारी और पिता की बिजली के सामान की दुकान में मदद करता था।
छब्बीस साल का तेजस किराने के व्यापार में स्टॉक देखता था।
पच्चीस साल की फराह शाम को रिसेप्शन पर काम करती थी।
भारतीय रमी की कक्षा में इसलिए आते थे क्योंकि खेल पसंद था। व्यवस्थित अभ्यास चाहिए था। पूरे शहर को पार किए बिना भवन पहुँच सकते थे।
कुछ अपनी फीस देते थे।
कुछ को परिवार से मदद मिलती थी।
जब परिवार चर्चा करता कि कौन-सी कक्षा सम्मानजनक दिखती है, यह फर्क जरूरी हो जाता था।
परिचय देने में वसंत प्रभावशाली नहीं थे।
अट्ठावन साल के सेवानिवृत्त बिजली मिस्त्री थे।
अपनी एक्सटेंशन तार ठीक करते। पुराने बिस्कुट के डिब्बे में अतिरिक्त पेंसिल लाते।
क्या देते हैं पूछने पर कहते, “जहाँ समझ नहीं आता, उस पर काम करने की जगह।”
चमकीले बैनर पर डालने के लिए कठिन वाक्य था।
* * *
परिवारों की बैठक रविवार को हुई।
अनु माँ हेमा के साथ आई।
निखिल पिता के साथ।
वसंत सोच रहे थे अगले सत्र की समय-सारणी पर बात होगी।
बात उन पर हुई।
कमरा पुराना लगता है।
कुर्सियाँ मेल नहीं खातीं।
दूसरी जगह छोटे कोर्स के बाद प्रमाणपत्र मिलते हैं।
किसी ने पूछा, जानते इतना हैं तो फीस इतनी कम क्यों है?
अनु कहने लगी कि उन्हें समझाने का तरीका पसंद है।
माँ ने बाँह छुई।
“बड़ों को बात करने दो।”
अनु ने हाथ देखा।
वह तेईस साल की थी।
अकेली आई फराह ने पूछा कि मौजूदा सीखने वालों की कोई राय होगी?
चावला ने कहा, सबके हित देखे जा रहे हैं।
उसे फिर नहीं पूछा गया।
* * *
वसंत ने कुर्सियों पर बहस नहीं की।
पुरानी थीं।
कमरे को रंग चाहिए था।
कहा कि जगह बेहतर हो तो स्वागत करेंगे।
प्रस्ताव वह नहीं था।
ऑर्बिट स्किल्स अपने नए कार्यक्रम के लिए कमरा चाहती थी।
समिति को अधिक किराया और इमारत में औपचारिक अकादमी का रूप पसंद आया।
पुराने विद्यार्थी जगह के लिए आवेदन कर सकते थे।
आवेदन शब्द इतने धीरे आया कि कई लोगों ने ध्यान नहीं दिया।
वसंत ने दिया।
“जिनका नहीं होगा?”
प्रतिनिधि ने कहा, उपयुक्त विकल्प के लिए आकलन करेंगे।
निखिल के पिता ने ऐसे सिर हिलाया जैसे जवाब मिल गया।
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वसंत ने हाजिरी की कॉपी बैग में रख दी।
* * *
जिन सत्रों की फीस ली थी, पूरे किए।
आखिरी शाम अनु ने उन्हें टूटी मेज से टेप निकालते देखा।
“रहने दीजिए। उन्हें जरूरत होगी।”
“बदल रहा हूँ। यह निकल रही है।”
वह साथ खड़ी रही। उन्होंने नई पट्टी दबाई।
अनु गुस्से की उम्मीद कर रही थी।
इस देखभाल से उनकी तरफ से और गुस्सा आया।
निखिल ने पूछा, कहीं और पढ़ाएँगे?
वसंत ने कहा, इंतजाम नहीं किया।
“हमारे साथ अकादमी आ सकते हैं,” निखिल बोला।
फिर समझा कैसा सुनाई दिया।
वसंत हल्का मुस्कराए।
“उन्होंने पूछा नहीं।”
अंत में अपनी कक्षा और भवन की सामग्री अलग गिनी।
चाबी लौटाई।
चावला फोन पर थे। बिना उठे ले ली।
* * *
नया कमरा बहुत अच्छा था।
ताजा रंग। तेज रोशनी। एक जैसी कुर्सियाँ।
अनु को अच्छा लगा, भले पहले से नाराज थी।
स्वागत की तस्वीरें थीं। छपा कार्यक्रम था।
हेमा ने रिश्तेदारों को फोटो भेजीं।
पहले सत्र उत्साहपूर्ण थे।
फिर समूह बदले गए।
ऑर्बिट स्किल्स शुरुआती सीजन में प्रतियोगी दल बनाना चाहती थी।
उन्नत अभ्यास में उन्हीं को जगह मिली जो पहले से सबसे मजबूत खेलते थे।
बाकी बड़ी सामान्य बैठकों में जा सकते थे। या प्रवेश की लिखी शर्तों वाले विकल्प चुन सकते थे।
घोषणा हुई तो छिपी बात नहीं थी।
मगर परिवारों को जो लगा था कि खरीदा है, वैसा भी नहीं था।
अनु नहीं चुनी गई।
निखिल भी नहीं।
तेजस और फराह को सामान्य समूह मिला जिसका समय अक्सर उनके काम से टकराता था।
* * *
हेमा ने पूछा, ज्यादा कोशिश क्यों नहीं की?
अनु ने की थी।
बताया भी था कि नया समय नौकरी से टकराता है।
अकादमी में पूछा कि जिन्हें ज्यादा वक्त चाहिए, उनके लिए छोटी समीक्षा बैठक होगी क्या?
संयोजक ने कहा, प्रतियोगी प्रशिक्षक चुने दल पर ध्यान दे रहे हैं।
अतिरिक्त भुगतान वाली बैठक ले सकती है।
अनु ने हिसाब लगाया।
फिर पर्चा मोड़कर रख लिया।
घर में हेमा ने कहा कि सबको सिफारिश करने के बाद इतनी जल्दी छोड़ना शर्म की बात होगी।
अनु ने पूछा, अपने अभ्यास के लिए जा रही है या तस्वीर बचाने के लिए?
बात खराब खत्म हुई।
अगली सुबह काम पर गई तो पर्चा अब भी बैग में था।
* * *
निखिल का भी अच्छा नहीं हुआ।
पिता ने कहा, गंभीर न होने वाले पर महँगी पढ़ाई बेकार है।
निखिल ने पूछा कि गंभीर होने का मतलब पहले से इतना अच्छा होना है कि पढ़ाने की जरूरत ही न हो?
पिता ने चालाक जवाब कहा।
तारीफ नहीं थी।
दो हफ्ते किसी कक्षा में नहीं गया।
तेजस दुकान पर मिला तो पूछा, कहाँ है?
निखिल ने कंधे उचका दिए।
फराह ने चारों का संदेश समूह बनाया।
पहला संदेश काम का था।
किसी के पास वसंत सर का नंबर है?
सबके पास था।
किसी ने फोन नहीं किया था। हर कोई समझता था बाकी आगे बढ़ गए।
* * *
वह घर के सामने वाले कमरे में लैंप ठीक कर रहे थे।
चारों को देखकर चकित हुए।
तेजस नाश्ता लाया था। खाली हाथ आना अजीब लग रहा था।
वसंत ने अकादमी पूछी।
जवाब टुकड़ों में दिए।
अनु ने चयन बताया।
फराह ने समय।
निखिल बोला, पिता के पैसे बर्बाद किए।
वसंत ने लैंप रखा।
“वह फीस तुम्हारे लिए चुनने को तुमने कहा था?”
निखिल ने मना किया।
“तो सीखने की बात वहाँ से शुरू किए बिना कर सकते हैं।”
चुप रहे।
अनु ने पूछा, फिर पढ़ाएँगे?
वसंत ने तुरंत हाँ नहीं कहा।
पूछा, वास्तव में कब आ सकते हैं?
क्या सीखना है?
समझते हैं कि उनके पास कमरा नहीं है?
इस बार जवाब उन्होंने अपने लिए दिए।
* * *
पुस्तकालय समिति ने दूसरे काम खत्म होने के बाद पिछला कमरा हफ्ते में दो शाम दिया।
व्यवस्था छोटी और स्पष्ट थी।
मेजें लगाएँगे।
कमरा साफ छोड़ेंगे।
तय समय निभाएँगे।
वसंत ने पुष्टि से पहले सब देखा।
बाहर नामपट्ट नहीं था।
एक मेज हिलती थी। तेजस को पैर के नीचे रखने के लिए सपाट लकड़ी मिली।
फराह ने साझा समय-सारणी बनाई।
अनु कागज लाई।
निखिल पहली बैठक भूल गया। समय गलत लिखा था।
वसंत ने फोन किया।
शर्मिंदा होकर आया।
कोच ने बैठने से पहले कैलेंडर ठीक करने को कहा।
फिर शुरू किया।
किसी ने नहीं कहा कि एक गलती से साबित होता है उस पर कक्षा बेकार है।
* * *
फीस कम रही।
कमरे की व्यवस्था सस्ती थी और लगाने-सँभालने का काम समूह करता था।
वसंत ने बताया कि किस खर्च के लिए है।
यह वादा नहीं किया कि कम कीमत से हर अकादमी से बेहतर हो जाते हैं।
चारों को वह दावा नहीं चाहिए था।
कोई उस बिंदु को देखे जहाँ समझना बंद होता है, यह चाहिए था।
कभी दस मिनट लगते।
कभी वसंत को दूसरी तरह समझाना पड़ता।
एक बार फराह ने कहा कि पहली व्याख्या उलझा रही है।
उन्होंने पन्ना देखा।
“हाँ। अब सुन पा रहा हूँ।”
फिर शुरू किया।
अनु ने उस शाम के नोट अकादमी के पर्चे के पीछे लिखे।
ध्यान आया तब तक दोनों तरफ भर चुकी थी।
* * *
परिवार तुरंत नहीं बदले।
हेमा ने कहा, पुस्तकालय का कमरा अस्थायी लगता है।
निखिल के पिता ने पीछे जाना कहा।
अपना खर्च देने वाले तेजस ने कहा कि पाली बदले तो बस दुकान के मालिक को मनाना पड़ता है।
फराह बोली, कमरे की तस्वीरें भेजना बंद कर दिया।
वे हँसे।
मगर माँ अकादमी के चुने दल का पूछती तो अनु को शर्म अब भी आती।
वे खिलाड़ी भी आगे बढ़ रहे थे।
कुछ को वही पढ़ाई मिली थी जो चाहिए थी।
अनु को उनकी सफलता को अपने फैसले के खिलाफ प्रमाण बनाना छोड़ना था।
वसंत ने पूछा, इस हफ्ते क्या सीखा?
उसने कॉपी खोली।
काफी कुछ था।
* * *
समूह ने अपने अनुभव के अनुकूल श्रेणी वाली क्षेत्रीय टीम प्रतियोगिता चुनी।
प्रवेश की शर्तें ध्यान से पढ़ीं।
चारों योगदान देंगे।
किसी को सिर्फ नाम बनाकर नहीं रखा जाएगा जबकि बाहर का मजबूत खिलाड़ी टीम उठाए।
बारह हफ्ते थे।
वसंत ने हर व्यक्ति से बिना अपना अपमान किए कमजोरी बताने को कहा।
निखिल बोला, दबाव में बेकार है।
“यह अपमान है। फिर कोशिश करो।”
निखिल ने बताया कि जल्दी में वास्तव में क्या करता है।
अब काम करने की बात मिली।
अनु को समझने का दिखावा करने से पहले पूछना था।
तेजस समीक्षा में जल्दी करता था क्योंकि गलती मिलना पसंद नहीं था।
फराह कभी अपने से ज्यादा दूसरों के निर्णय देखती रहती थी।
सूची लिखी गई।
प्रचार के लिए तस्वीर नहीं खींची गई।
* * *
अगले हफ्ते मनमोहक नहीं थे।
काम बदला। बैठकें हिलानी पड़ीं।
अनु निखिल पर चिढ़ी।
निखिल ने पलटकर बोला।
फराह ने कहा, कमरे का समय बर्बाद कर रहे हैं।
वसंत ने चुप्पी रहने दी।
फिर पूछा, समीक्षा पूरी करनी है?
करनी थी।
बाद में अनु ने ऐसे बोलने के लिए माफी माँगी जैसे खुद कभी जूझी नहीं।
निखिल ने घर का झगड़ा उस पर निकालने की माफी माँगी।
अगले हफ्ते पहले आया। मेज लगाई।
तेजस डिलीवरी रुकने से देर हुआ।
फराह ने समीक्षा दस मिनट आगे की।
सहयोग अब सिर्फ एक ही कोच को पसंद करने से ज्यादा ठोस बन रहा था।
* * *
एक शाम हेमा अनु को लेने आईं।
खुले दरवाजे पर खड़ी रहीं।
वसंत ने निखिल से व्याख्या दोहराने को कहा।
उसने गलत की।
पूछा, कहाँ संदेह हुआ?
निखिल ने दिखाया।
वहीं से शुरू किया।
हेमा तेज आवाज का इंतजार करती रहीं। उसी को गंभीरता से जोड़ती थीं।
आई नहीं।
बाद में अनु से पूछा, कक्षा हमेशा इतनी धीमी होती है?
अनु ने कॉपी बैग में रखी।
“जब जरूरत हो।”
हेमा ने कमरे में देखा।
तेजस कुर्सियाँ रख रहा था।
उस रात माफी नहीं माँगी।
मगर अनु के कागज ऑटो तक उठाए।
बेकार नहीं कहा।
* * *
आयोजन में चारों आसपास की कुछ टीमों से कम चमकदार दिखे।
साधारण कमीजें थीं। बैग अलग थे।
अनु के दिमाग में माँ की पुरानी बातें आईं।
तभी फराह ने पंजीकरण के कागज पूछे।
अनु के पास थे।
काम के सवाल ने पुराना सवाल हटाया।
वसंत पीछे खड़े हर हरकत पर निर्देश नहीं दे रहे थे।
समय-सारणी और विराम में मिलने की जगह स्पष्ट की।
फिर चारों खेले।
पहला दौर मुश्किल था।
आगे जाने जितना अच्छा हुआ।
आराम महसूस करने जितना नहीं।
निखिल बोला, सबको निराश किया।
फराह ने जानकारी देने को कहा।
वाक्य पहचान गया। फिर कोशिश की।
* * *
आखिरी चरण देखने हेमा और निखिल के पिता आए।
जान-पहचान थी, इसलिए साथ बैठे।
यह मानने को कोई तैयार नहीं था कि क्यों आए हैं।
अकादमी की एक टीम आयोजन में दूसरी जगह थी।
खिलाड़ी अपनी प्रतियोगिता में व्यस्त थे।
अनु ने देखकर शुभकामना दी।
शब्द आसानी से निकले तो आश्चर्य हुआ।
अपने समूह में लौटी।
वसंत ने पूछा, अगले सत्र के लिए तैयार है?
हाँ कहा।
इस बार मतलब था कि काम समझती है।
यह नहीं कि अब गलती न करने वाला इंसान बन गई है।
* * *
गलतियाँ बहुत हुईं।
तेजस का एक सत्र खराब गया।
फराह ने बाद में संभाला।
दर्ज विवरण का स्पष्टीकरण माँगने के बाद अनु वापस आई।
महीनों खुद को दबाव में बेकार कहने वाला निखिल आखिरी करीबी हिस्से में ध्यान से रहा।
अंत में संयुक्त प्रदर्शन अपनी श्रेणी में पहले स्थान पर था।
कुछ सेकंड कोई नहीं हिला।
फिर तेजस ने हँसते हुए कुछ कहा जो किसी को समझ नहीं आया।
फराह ने अनु का हाथ पकड़ा।
निखिल ने दर्शकों की तरफ देखा।
पिता खड़े थे।
वसंत इतने समय बैठे रहे कि कुल अंकों की पुष्टि हो जाए।
फिर वह भी उठे।
* * *
पुरस्कार में चावला आए।
समुदाय के प्रतिभागियों के लिए आए थे। नतीजे का पता चला था।
वसंत को गर्मजोशी से बधाई दी।
जैसे चाबी कभी लौटी ही नहीं थी।
“हमें पता था प्रतिभा है।”
वसंत ने आने का धन्यवाद किया।
चावला ने अगले हफ्ते नए भवन में फोटो की बात की।
समिति वसंत को विशेष कार्यक्रम के लिए वापस लाने पर विचार कर सकती थी।
उनके जवाब से पहले परिवार वाले बोलने लगे।
पुरानी फीस बढ़ सकती है।
अकादमी सहयोग कर सकती है।
ध्यान मिला है तो जल्दी फैसला होना चाहिए।
अनु फराह के साथ पुरस्कार पकड़े थी।
लोग फिर उनके आसपास कक्षा तय कर रहे थे।
* * *
वसंत ने हाथ उठाया।
“अगले सत्र से पहले इन्हें बताने दीजिए कि इस बार क्या हुआ।”
चावला मुस्कराए। जैसे औपचारिक अनुरोध हो।
वसंत अनु की तरफ मुड़े।
उसने माँ को देखा।
“अकादमी में सवाल करना छोड़ दिया था। लगता था मदद चाहिए तो वहाँ की नहीं हूँ।”
मुस्कान चली गई।
निखिल ने कहा, लगभग पूरा छोड़ दिया था।
तेजस ने कहा, पुस्तकालय का समय इसलिए काम करता था क्योंकि तय करने में शामिल थे।
फराह ने कहा कि जरूरी फर्क कुर्सियों की कीमत नहीं थी।
किसी ने रोका नहीं।
वसंत ने खत्म होने दिया।
फिर पूछा, नया कार्यक्रम सुझाने से पहले असली समय-सारणी सुनना चाहता है कोई?
* * *
बात असुविधाजनक थी।
इसीलिए काम की थी।
निखिल के पिता ने माना कि ज्यादा फीस को बेटे के लिए सही कक्षा की गारंटी समझ लिया था।
हेमा ने कहा कि रिश्तेदारों को अनु कहाँ पढ़ती है बताना अच्छा लगता था।
अनु ने पुरस्कार देखा।
जानती थी।
साफ सुनना फिर भी दुख देता था।
माँ ने उसकी साधारण आस्तीन का किनारा छुआ।
“अगली बार जरूरत बताना।”
अनु ने ऊपर देखा।
“बताई थी।”
हेमा का हाथ हट गया।
फिर सिर हिलाया।
“हाँ। बताई थी।”
इसके बाद कोई जल्दी वाला वाक्य नहीं आया जिससे सब आसान हो जाता।
दोनों फिर भी साथ खड़ी रहीं।
* * *
चारों ने अगले सत्र में वसंत के साथ रहने का फैसला किया।
उपलब्ध रहे तो पुस्तकालय का कमरा चाहिए था।
दूसरी जगह चाहिए तो कोई उनकी तरफ से हस्ताक्षर करने से पहले उनसे बात करे।
वसंत ने साथ व्यवस्था देखने को माना।
चावला की प्रचार फोटो को उस बातचीत का विकल्प नहीं बनाया।
भवन के प्रस्ताव की वास्तविक शर्तें बाद में देख सकते थे।
अगले हफ्ते पुस्तकालय में मेज लगाते समय पुरस्कार शेल्फ पर रखा।
अनु नया कागज लाई।
फराह ने समय-सारणी बदली।
निखिल ने तारीख दो बार देखी।
तेजस ने लकड़ी का टुकड़ा ढूँढ़कर मेज स्थिर की।
वसंत ने पुराना बिस्कुट का डिब्बा खोला।
चार पेंसिल बची थीं।
बीच में रखीं।
पूछा, कहाँ से शुरू करना चाहते हैं?