आनंद ने फोन शादी के मंच के पास रखे स्पीकर से जोड़ दिया।
पहले तीन सेकंड रवि समझ ही नहीं पाया कि वह क्या सुन रहा है। फिर पूरे आँगन में उसकी माँ की आवाज गूँजी।
“बेटा, आज पैसे आ जाएँ तो बता देना। और बिना खाए मत घूमना।”
दूसरी बात पर कोई हँसा। किसी ने कहा, माँ लोगों को खाने के अलावा कुछ सूझता ही नहीं। आनंद मुस्कराया और फोन रवि के बढ़े हुए हाथ से दूर कर लिया।
“देख रहे हो? अब पूरा परिवार लगा दिया है।”
रवि ने गेंदे के फूलों की छत देखी, किराए की रोशनियाँ देखीं। दोनों फोटोग्राफर अपना काम रोककर उनकी तरफ देख रहे थे। वह अड़तालीस हजार रुपये लेने आया था। अपनी माँ के अड़तालीस हजार।
उधार लेते समय आनंद ने कहा था, भाइयों के बीच दो दिन की बात है। अब अपनी शादी के संगीत में, उन्हीं पैसों को माँगने का नाम उसने भीख रख दिया था।
* * *
स्कूल के दिनों से एक-दूसरे को जानते थे। आनंद आम चुराने में बुरा था, झूठ बोलने में उससे भी बुरा। अपने ही झूठ पर इतनी जोर से हँस पड़ता कि बड़े लोग बात पूरी होने से पहले उसे माफ कर देते थे।
रवि को लगा था कि इतना पुराना साथ किसी आदमी को पहचानने के लिए काफी होता है।
उनतीस साल का रवि लखनऊ के बाहर मशीनों के पुर्जे बनाने वाली कार्यशाला में काम करता था। समय से पहुँचना, नाप ठीक रखना, छोटी गलती को अगले काम तक न जाने देना—उसे इन्हीं बातों के पैसे मिलते थे।
आनंद अपने परिवार के बिजली के सामान के कारोबार में था। सड़क से देखने पर दुकान जितनी चलती हुई लगती, हिसाब में उतनी नहीं थी। उसकी कमीजें अब महँगी हो गई थीं। जरूरत पड़ती तो रवि को अब भी भाई कहता था।
तीन हफ्ते पहले उसे किसी रुके हुए भुगतान के बदले दो दिन के लिए अड़तालीस हजार चाहिए थे। रवि ने उसी वक्त साफ बताया था कि रकम किसलिए रखी है।
* * *
शांति का ऑपरेशन होना था। घर वाले बचत जोड़ रहे थे, जरूरत पड़ने पर कहाँ से मदद मिलेगी, यह भी देख रहे थे। रवि ने पैसा अलग रखा हुआ था। खाते में कितनी रकम है, वह दिन में इतनी बार देखता कि किसी को बताने में संकोच होता।
आनंद यह सब जानता था। उसने आने वाले भुगतान का एक संदेश दिखाया। पैसा पक्का है, बस पहुँचने में देर है। अस्पताल की तारीख से बहुत पहले लौटा देगा।
रवि को भरोसा नहीं करना चाहिए था। बाद में यह बात इतनी साफ लगी कि समझना मुश्किल हो गया कि उस दिन भरोसा कैसे कर लिया था। लेकिन उस समय सामने वही लड़का था जो पिता की बीमारी के दिनों में परीक्षा कक्ष के बाहर उसका इंतजार करता रहा था।
रवि ने रकम भेज दी।
दो दिन चार हुए। फिर आनंद ने सीधे जवाब देने बंद कर दिए। कभी दुकान पर था, कभी ग्राहक के पास। पैसे का सवाल आते ही बातचीत किसी और तरफ मुड़ जाती।
* * *
शांति के इलाज की तारीख पहले हो गई। अस्पताल ने बताए गए खर्च में से बहत्तर हजार रुपये अग्रिम जमा करने को कहा। रवि के पास छब्बीस हजार थे।
बाकी रकम अब ऐसी बचत नहीं थी जिसे किसी दिन वापस आ जाना था। उसके सामने जमा करने की तारीख थी।
उसने आनंद को छह बार फोन किया। पहले जवाब मिला कि कारोबार का भुगतान अटका है। फिर कहा गया कि शादी के खर्चों ने हिसाब बिगाड़ दिया है।
“तुम्हारी शादी का मेरे पैसे से क्या संबंध है?”
आनंद ने कहा, इतना घबरा क्यों रहा है।
तभी रवि उस आँगन तक पहुँचा था। वह चिल्लाता हुआ भीतर नहीं गया। दरवाजे पर खड़ा रहा। एक रिश्तेदार ने पूछा, किसके मेहमान हो?
“आनंद के।”
रिश्तेदार ने उसकी काम वाली कमीज देखी।
“कुछ सामान देने आए हो?”
* * *
आनंद उसे कुर्सियों की एक कतार के पीछे ले गया। रवि ने अस्पताल का खर्च वाला कागज खोलकर सामने किया।
“आज रात तक वापस चाहिए।”
आनंद ने कागज हाथ में नहीं लिया।
“मौका बड़ा अच्छा चुना है।”
“दो दिन तुमने कहे थे।”
“यहाँ लोग हैं।”
“दिख रहे हैं।”
मंच पर संगीत वाले माइक के तार के ठीक होने का इंतजार कर रहे थे। आनंद ने उधर देखा, फिर रवि से जाने को कहा।
रवि ने कहा, वह किसी किनारे बैठ जाएगा। आनंद पैसे भेजने का इंतजाम कर ले, तब चला जाएगा।
आनंद के चेहरे से मुस्कान उतर गई।
“यहाँ खड़े रहने से पैसे निकल आएँगे?”
“नहीं। मुझे लगता है मेरे पैसे तुम्हारे पास पहले से हैं।”
एक चचेरे भाई ने सुन लिया। वह पास आया। एक मिनट के भीतर दो लोगों की बात मेहमानों के देखने का तमाशा बन गई।
* * *
आवाज पहले आनंद ने ऊँची की। बोला, गरीब रिश्तेदारों को बीमारी भी तभी याद आती है जब किसी के घर खुशी हो।
रवि उसका रिश्तेदार नहीं था। उसने यह कहा भी, लेकिन इतनी धीमी आवाज में कि बाहर खड़े लोग नहीं सुन पाए। चचेरे भाई ने शाम खराब न करने की सलाह दी।
रवि ने फोन निकाला। बिना जवाब की कॉल और रकम लौटाने वाले संदेश दिखाए। आनंद ने अपना फोन निकाला।
माँ का संदेश रवि ने पहले उसे इसलिए भेजा था कि शायद उनकी आवाज सुनकर जरूरत समझ आए। जो बात वह बार-बार कह चुका था, माँ के कहने से शायद असर करे।
आनंद ने वही संदेश स्पीकर से जोड़ दिया।
“सुनें इनका कार्यक्रम?”
शांति की आवाज चली। रवि आगे बढ़ा तो चचेरे भाई ने उसकी छाती पर हाथ रखकर रोक लिया।
* * *
कुछ लोगों ने नजर फेर ली। हँसने वालों जितने साफ वे लोग भी रवि को बाद में याद रहे। एक फोटोग्राफर ने कैमरा नीचे कर लिया। खाने के काउंटर के पास खड़ी महिला कुछ कहने लगी, लेकिन पति ने कोहनी छुई तो चुप हो गई।
आनंद ने पूरा संदेश बजने दिया। फिर कहा, अस्पताल के सहायता काउंटर पर जाए। सफल लोगों को शर्मिंदा करने से क्या मिलेगा?
पूरा आँगन एक साथ नहीं हँसा। ऐसा होता तो पता रहता कि कौन साथ दे रहा है। कुछ लोग मुस्कराए। कुछ अपनी बातों में लौट गए। संगीत वालों ने फिर एक सुर जाँचा।
अस्पताल वाला कागज अब भी रवि के हाथ में था। उसने पुरानी तह पर ही उसे मोड़ा। उँगलियों को कोई काम चाहिए था।
फिर वह बाहर निकल आया। पीछे किसी ने संगीत की आवाज बढ़ा दी।
* * *
अस्पताल में मौसी ने पूछा, पैसे आए?
रवि ने कहा, अभी नहीं।
बिस्तर से शांति उसे देख रही थीं।
“खाना खाया?”
उसे लगभग हँसी आ गई। एक घंटे से भी कम समय पहले यही बात अनजान लोगों के मनोरंजन का सामान बनी थी। उसने कहा, नीचे जाकर खा लेगा।
माँ ने आनंद का हाल पूछा। याद था कि उसके घर शादी है। रवि ने कहा, बाद में बात करेंगे।
वह सीढ़ियों तक गया। एक पायदान पर बैठा और खर्च का कागज बगल में रख दिया। अभी उसे बदला नहीं चाहिए था। वह बस चाहता था कि पन्ने पर लिखी रकम उसके खाते में जमा करने लायक रकम बन जाए।
* * *
उस रात पैसा ऐसी जगह से आया जिसका खयाल ही छूट गया था। अस्पताल की तारीख बदलने से पहले रवि ने क्रिकेट पर छोटी रकम लगाई थी। उससे कोई मदद मिल जाएगी, ऐसा भरोसा उसने नहीं किया था। माँ की परेशानी बढ़ी तो उस बात को भूल ही गया।
एक नतीजे का हिसाब बाकी था। उसकी पुष्टि हुई। खाते का निपटारा होने के बाद छियालीस हजार रुपये मिले।
रवि ने सूचना पढ़ी, फिर अलग से देखा कि रकम सच में उपलब्ध है या सिर्फ संदेश में लिखी है। उस रात किस्मत ने असाधारण साथ दिया था। उसके हाथ कोई ऐसी तरकीब नहीं लगी थी जिसे दोहराकर अगला बिल भर सके।
फिलहाल छियालीस हजार और पहले से मौजूद छब्बीस हजार मिलकर बहत्तर हजार हो रहे थे।
बाकी कुछ करने से पहले उसने मौसी को फोन किया।
“अग्रिम जमा कर सकता हूँ।”
* * *
अस्पताल की रसीद प्रिंटर से निकली तो गर्म थी। मौसी ने रकम दो बार देखी और बाकी कागजों के साथ फाइल में रख दी। रवि ने बताया कि अचानक मिले पैसे कहाँ से आए हैं।
उन्होंने सुना, रसीद देखी, फिर कहा कि आगे अस्पताल ने जैसा समय बताया है, उसी हिसाब से चलना होगा।
इलाज कर रही टीम की योजना के अनुसार ऑपरेशन हुआ। बीच का समय इंतजार में बीता। कई बातें हुईं जो बाद में रवि को पूरी नहीं, टुकड़ों में याद आने वाली थीं।
टीम के एक सदस्य ने बताया कि ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा हो गया है और आगे क्या होगा। रवि ने पास की कुर्सी की पीठ पकड़ ली। घुटनों पर भरोसा नहीं रहा था।
उसने खबर का इंतजार कर रहे रिश्तेदारों को फोन किया। आनंद को नहीं किया।
* * *
अगली सुबह आनंद का संदेश आया।
उम्मीद है नाटक खत्म हो गया होगा। शादी में दोबारा मत आना।
रवि ने उसे मशीन से चाय लेने वाली जगह के पास पढ़ा। माँ आराम कर रही थीं। मौसी फोन करने बाहर गई थीं।
उसने पैसे भेजने का रिकॉर्ड खोला। अड़तालीस हजार। फिर दो दिन में लौटाने का वादा खोला। उसके बाद शादी के खर्चों वाला संदेश।
किस्मत से मिली रकम ने अस्पताल का अग्रिम भर दिया था। आनंद के पास रखा पैसा किसका था, यह उससे नहीं बदला।
रवि ने सारे रिकॉर्ड एक जगह सुरक्षित किए। रकम और लौटाने की तय तारीख लिखकर छोटा-सा संदेश भेजा। अब और स्पष्टीकरण नहीं माँगा। अपना पैसा वापस माँगा।
आनंद ने हँसने वाला निशान भेजा। रवि ने उसका जवाब नहीं दिया।
* * *
काम आने वाला पहला गवाह कोई प्रभावशाली रिश्तेदार नहीं था। वही फोटोग्राफर था जिसने कैमरा नीचे कर लिया था। नाम इमरान था। झगड़ा देख चुके एक मेहमान की मदद से रवि उससे संपर्क कर सका।
परिवार के लिए शाम की रिकॉर्डिंग करते समय घटना का कुछ हिस्सा कैमरे में आ गया था। इमरान समझ पाता कि आनंद क्या बजा रहा है, उससे पहले रिकॉर्ड हो चुका था।
उसने वीडियो फैलाने की पेशकश नहीं की। पूछा, रवि को चाहिए क्या?
रवि उस हिस्से की बिना काटी रिकॉर्डिंग चाहता था जिसमें माँ का संदेश चलाया गया और आनंद ने अपनी बातें कहीं। आगे कोई घटना का दूसरा रूप बताए तो असली क्रम उसके पास रहे।
इमरान ने आसपास की बातचीत समेत संबंधित हिस्सा दे दिया। रवि ने एक बार देखा। फोन पर माँ की आवाज आँगन के मुकाबले छोटी लग रही थी। फिर भी उसे सुनकर उसके हाथ काँपने लगे।
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दुल्हन का नाम नेहा था। वह यात्रा संबंधी काम करने वाले एक दफ्तर में नौकरी करती थी। उसे बताया गया था कि आनंद के कारोबार से शादी का खर्च आराम से चल रहा है।
संगीत के समय वह दादी के साथ दूसरे कमरे में थी। बाद में सुना कि किसी दूर के परिचित ने आकर पैसे माँगे थे। आनंद ने उसे ब्लैकमेल कहा।
नेहा ने पूछा, वह उनके कार्यक्रम में ही क्यों आएगा?
“ऐसे लोग जानते हैं कि हम तमाशा नहीं करेंगे।”
उसने जवाब मान लिया, लेकिन बेचैनी बनी रही। अगले दिन पिता के साथ आयोजन स्थल का बिल देखते हुए उसे एक जमा रकम दिखी। तारीख रवि के पैसे माँगने वाले बताए गए प्रसंग से कुछ बाद की थी। रकम अड़तालीस हजार थी।
सिर्फ इतना देखकर रवि की बात साबित नहीं होती थी। लेकिन बाद में जो जानकारी आई, उसे अनदेखा करना कठिन हो गया।
* * *
नेहा के पिता को संपर्क करते समय रवि को उस रसीद का पता नहीं था। नंबर उसी मेहमान से मिला था जिसने इमरान तक पहुँचाया था।
रवि ने लिखा कि आनंद से रकम लौटाने का विवाद है, उसके पास रिकॉर्ड हैं और पैसा माँ के इलाज के लिए चाहिए था। उसके बारे में और आरोप लगाए जाएँ, उससे पहले वह कागज दिखाना चाहता है।
नेहा के पिता लगभग मना कर चुके थे। फिर उन्होंने रिकॉर्डिंग देखी। शांति की आवाज सुनी, जो बेटे को खाना खाने के लिए कह रही थीं। फोन स्पीकर की तरफ बढ़ाते आनंद को देखा।
उन्होंने रवि को वापस फोन किया।
“पैसे भेजने का रिकॉर्ड और संदेश लेकर आओ। भीड़ मत लाना।”
रवि ने कहा, मौसी अस्पताल लौट आएँ तो आ जाएगा। उसे कहीं जाने से पहले माँ के पास किसी को छोड़ना था।
* * *
बाकी विवाह समारोहों से पहले वाली दोपहर आयोजन स्थल के दफ्तर में बैठक हुई। मेज पर पाँच लोग थे—रवि, आनंद, नेहा, उसके पिता और स्थल के प्रबंधक। प्रबंधक बाकी भुगतान का हिसाब करने के लिए पहले से मौजूद थे।
किसी के गले में माला नहीं थी।
रवि ने पैसे भेजने की पुष्टि और लौटाने वाले संदेश रखे। आनंद ने कहा, कारोबार में योगदान था। रवि ने उस संदेश पर उँगली रखी जिसमें साफ दो दिन का उधार लिखा था।
आनंद बोला, दोस्तों में ऐसे ही लिख देते हैं।
नेहा ने पूछा, रवि किस कारोबार में पैसा लगा रहा था?
सीधा जवाब नहीं मिला।
प्रबंधक ने जमा रकम की रसीद सामने रखी। रकम मेल खाती थी। समय भी। नेहा ने आनंद से पूछा कि पैसा किस रास्ते आया था।
* * *
आनंद ने कहा, खातों में पैसा आता-जाता रहता है। सब लोग सीधी बात को बदसूरत बना रहे हैं। वह बाद में लौटा देगा।
उस आखिरी वाक्य से कमरे की हवा बदल गई। अभी तक वह मान ही नहीं रहा था कि लौटाना कुछ है।
नेहा के पिता ने पूछा, लौटाने के पैसे कहाँ से आएँगे?
आनंद ने कहा, पहले शादी के बाकी खर्च निपटा लें। उसके बाद देख लेंगे।
दफ्तर की खिड़की से सजावट दिख रही थी। रवि ने फूल देखे। उसकी माँ का पैसा फूलों का भुगतान होने तक इंतजार करने वाली चीज बना दिया गया था।
“नहीं,” उसने कहा। “मुझे पैसा वापस चाहिए। उसके बदले एक और वादा नहीं।”
प्रबंधक ने बिल की फाइल बंद कर दी। निजी विवाद का फैसला वह नहीं करने वाले थे। स्थल को कौन-से भुगतान मिले थे, इसकी पुष्टि कर सकते थे। उन्होंने वही किया।
* * *
नेहा ने माँ का पूरा संदेश सुनना चाहा। रवि झिझक गया। फिर एक कमरे में बैठे लोगों के सामने वही आवाज बजाने का विचार उसे अच्छा नहीं लगा।
नेहा ने देख लिया।
“जरूरी नहीं है।”
रवि ने उसके बजाय पहले की लिखित बातचीत दिखाई। अस्पताल की तारीख और जरूरत का जिक्र उसमें था। नेहा ने फिर पिता के फोन पर इमरान की रिकॉर्डिंग का संबंधित हिस्सा देखा।
आनंद बताने लगा कि शोर बहुत था। लोगों ने मजाक गलत समझ लिया।
नेहा ने वीडियो रोक दिया।
“मजाक क्या था?”
उसने नेहा के पिता को देखा। नेहा ने सवाल दोहराया।
रवि देखता रहा। आनंद ऐसा जवाब खोज रहा था जिसके बाद वह फिर सबको प्यारा लग सके। इस बार कोई जवाब नहीं मिला।
* * *
नेहा खड़ी हो गई। उसने कहा कि बाकी विवाह समारोह नहीं होंगे।
आनंद ने गुस्से में फैसला न करने को कहा। नेहा ने उसके सामने घटनाएँ दोहरा दीं। दोस्त से इलाज के लिए बचाए पैसे लिए। आयोजन में खर्च किए। लौटाने की बात आई तो उसकी माँ की आवाज से मेहमानों का मनोरंजन किया।
उसने सफाई सुनी थी। उससे इनमें से कोई बात नहीं बदली थी।
पिता ने पूछा, कुछ मिनट चाहिए?
नेहा ने कहा, जो तैयारियाँ अभी चल रही हैं, उन्हें रुकवाना है। उन्होंने फोन कर दिया।
बाहर फूल वैसे ही लगे रहे। आँगन का रूप बदलने से पहले भी शादी रुक सकती थी।
* * *
रवि के पैसे लौटाने के लिए आनंद को अपने परिवार को फोन करना पड़ा। अचानक आने वाला कोई कारोबारी भुगतान उसे बचाने के लिए तैयार नहीं था।
रकम बतानी पड़ी। उधार बताना पड़ा। आयोजन स्थल में जमा किए पैसे बताने पड़े। फोन पर सुनने वालों को यह भी सुनना पड़ा कि नेहा आगे शादी करने से मना कर चुकी है।
रवि उसके ऊपर खड़े होकर भाषण नहीं दे रहा था। रकम आने का इंतजार कर रहा था। पूरे अड़तालीस हजार खाते में पहुँचे तो उसने जाँचा और लिखकर प्राप्ति की पुष्टि कर दी।
उधार चुका दिया गया था। शादी के बाकी सवाल उन लोगों के थे जिन्होंने उसके लिए वादे और भुगतान किए थे। आनंद को इस स्थिति से सम्मान के साथ निकालने का इंतजाम रवि ने अपने जिम्मे नहीं लिया। उसकी सफाइयों के लिए वह पहले ही बहुत जगह बना चुका था।
* * *
दरवाजे पर आनंद ने बाँह पकड़ ली।
“सब बर्बाद कर दिया।”
रवि ने उसके हाथ को देखा। हाथ हट गया। एक पल आम चुराने वाला लड़का फिर दिखाई दिया, जो हँसकर परिणाम टालने की उम्मीद करता था।
“अपने पैसे लेने आया था।”
“रुक सकता था।”
“मेरी माँ नहीं रुक सकती थीं।”
इसके बाद रवि निकल गया। बात फिर ऐसा तमाशा बन सकती थी जिसका कोई शुरू का हिस्सा रिकॉर्ड न करे। बाहर इमरान सामान समेट रहा था। उसने पूछा, जो चाहिए था मिल गया?
रवि ने कहा, पैसे वापस आ गए। इमरान ने सिर हिलाया और तार लपेटने लगा। किसी ने ताली नहीं बजाई। रवि को यही अच्छा लगा।
* * *
अस्पताल के रास्ते में मौसी का फोन आया। शांति जाग रही थीं। उसे पूछ रही थीं। रवि फल की दुकान पर रुका, फिर अस्पताल में दी गई देखभाल की हिदायतें याद कीं। साथ इंतजार कर रहे घरवालों के लिए जो लाना उचित था, उतना ही लिया।
वह शादी की रिकॉर्डिंग लेकर वार्ड में नहीं गया। माँ तकियों के बीच पिछले हफ्ते की याद से भी छोटी लग रही थीं। लेकिन उन्होंने उसे देखा। वह दरवाजे पर ठिठक गया।
“इधर आ।”
वह पास बैठा। माँ ने पूछा, डॉक्टर ने उन लोगों से बात की है?
उसने सबसे पहले बताया कि ऑपरेशन अच्छी तरह पूरा हुआ है। आगे की देखभाल के बारे में टीम ने जो समझाया था, वही दोहराया। उसकी उँगलियों पर माँ की पकड़ ढीली पड़ी।
* * *
बाद में उन्होंने आनंद का पूछा तो रवि ने कहा, पैसा लौटा दिया है। बाकी बात कहने का समय होगा, जब माँ सुनना चाहेंगी और सुन सकेंगी।
उसने खुशहाल शादी की कोई झूठी खबर नहीं बनाई। बस उनकी पहली शांत दोपहर को ऐसा दूसरा कमरा नहीं बनाया जहाँ उन्हीं की आवाज सबूत की तरह बजाई जाए।
मौसी चाय ले आईं। रवि ने बचाकर रखा खाना खाया। माँ उसे देखती रहीं। उसने दूसरा कौर लिया, उसके बाद ही उन्होंने आँखें बंद कीं।
रकम वापस आने की पुष्टि फोन में थी। अस्पताल के कागज फाइल में थे। कई दिनों बाद पहली बार दोनों में से किसी को हाथ में पकड़े रहना जरूरी नहीं था।
उसने माँ का हाथ पकड़ लिया।