1. Spin 2x: वह कोना जिसे उसने नहीं छोड़ा
रघु के पास केवल राजा था। संदीप के पास राजा, ऊँट और प्यादा। कमरे ने तय कर लिया था कि इसका मतलब क्या है।
एक दर्शक पुरस्कार वाला बैनर मोड़ने लगा। दरवाजे के पास किसी ने कहा कि इस गेम के बाद टाइब्रेक चाहिए होगा। पंखों की हल्की आवाज के बीच रघु ने सुना। उसका हाथ घड़ी के पास रहा।
संदीप का राजा f3 पर था। काले खाने पर चलने वाला ऊँट d6 पर था। प्यादा h3 पर, पदोन्नति से दो कदम दूर। रघु का सफेद राजा h1 पर इंतजार कर रहा था। बोर्ड पर कोई दूसरा मोहरा या प्यादा नहीं था।
रघु की बारी थी।
“अब भी मुझसे पूरा काम कराओगे?” संदीप ने पूछा। आर्बिटर ने उसे चुप कराया।
लगातार तेरह मुकाबलों में रघु इसी सवाल के रूप सुन चुका था। आसान प्रतिद्वंद्वी, थका आदमी, पूर्व दुकानदार जो अब रात भर दूसरों के पहचान पत्र देखता था। संदीप के छात्र उसकी हारों से उदाहरण सीखते थे।
यह मैच अलग था। पहली बाजी रघु जीता था। यहाँ आधा अंक दो बाजियों का फाइनल जिता देता।
उसने राजा के नीचे h1 का हल्का खाना देखा। फिर वह ऊँट जो कभी इस रंग पर नहीं पहुँच सकता था।
घड़ी चलती रही। सात महीने पहले रघु वह बोर्ड लगभग बेच चुका था जिस पर उसने इस कोने का महत्व सीखा था।
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2. फाटक के पीछे का कमरा
फरवरी में प्रिंटिंग कारोबार डूबा। अप्रैल तक परिवार किराए का घर छोड़ चुका था। रघु गोदाम के फाटक के पीछे तंग कमरे में सोता था, जहाँ रात की ड्यूटी करता था।
पत्नी मीना बाईस वर्षीय बेटी को लेकर अपनी माँ के घर गई। आखिरी झगड़ा किराए के टेम्पो के पास हुआ। रघु ने शतरंज का बॉक्स उसमें रखना चाहा। मीना ने ढक्कन पर हाथ रख दिया।
“जब मैं किराया देने के लिए लोगों से एक और सप्ताह माँग रही थी, तुम इसके लिए समय निकाल रहे थे।”
उसके पास उपयोगी जवाब नहीं था। कुछ शामें वह सचमुच डराने वाले हिसाब से बचकर खेल में छिपा था। पत्नी का गुस्सा कोई ऐसा भ्रम नहीं था जिसे चतुर वाक्य से दूर कर दे।
गोदाम में एक ही स्टील डिब्बे से तीन वक्त खाता। बाल्टी में वर्दी धोता और मेज के पंखे के नीचे सोता। एक सुबह सुपरवाइजर ने उसका बॉक्स फेंकने वाले पैकिंग सामान में रख दिया।
उसी समय संदीप डिलीवरी लेने आया। रघु से पहले बॉक्स पहचान गया।
“आखिर कीमत के हिसाब से सामान रख रहे हो?”
रघु चुपचाप बॉक्स उठा लाया। सुपरवाइजर देखता रहा। जीने भर का पैसा कमाना और उससे आगे कुछ चाहने पर शर्म न करना, दोनों का भार था।
शाम को बेटी ने फोन किया। आवाज पर भरोसा आने से पहले उसने दो बार बजने दिया।
3. फोल्डर में तेरह हार
अगली बार संदीप से खेला तो रघु ने तीस चाल बाद हाथी खोया। संदीप ने अगले सप्ताह सार्वजनिक पाठ में वही स्थिति दिखाई। चित्र के ऊपर रघु का नाम था। उसने कहा कि अपनी सीमा न समझने वाले खिलाड़ी ऐसी गलती करते हैं।
यह उसके पक्ष में लगातार तेरहवाँ परिणाम था।
रघु ने पूरी स्कोर शीट लेकर फोल्डर बनाई। बारह बाजियों में निर्णायक गलती से पहले दूसरी गलतियाँ थीं। तेरहवीं में बच सकने वाला एंडगेम था। बोर्ड के कहने से पहले वह मन से हार गया था।
वह स्थिति नगरपालिका के शतरंज कमरे में ले गया। बंद होने के बाद लाइब्रेरियन ईशान ने उसे याद से दोनों ओर की चालें चलाते पाया।
“स्कोर जेब में है। उसे इस्तेमाल करो।”
उन्होंने सही स्थिति लगाई। रघु को अपमान बिल्कुल याद था, तीन मोहरे गलत याद थे।
उसके बाद हर समीक्षा असली चालों से शुरू हुई।
ईशान कोई छिपा उस्ताद नहीं था। लगभग समान स्तर पर खेलता था। ऐसे प्रश्न पूछता जिन्हें रघु बड़े आदमी का आदेश कहकर खारिज नहीं कर सकता था। दोनों स्थिति देखते, फिर बोर्ड पर आजमाते।
रविवार की सुबह सामान्यतः दरवाजे पर पहरा देने वाला आदमी अब कठिन एंडगेम समझे बिना उठने को तैयार नहीं होता था।
हारें जारी रहीं। लेकिन फोल्डर में नतीजों के साथ उत्तर भी जमा होने लगे। हर नए उत्तर से अगली समीक्षा थोड़ी अधिक सटीक होती गई।
4. गलत रंग का ऊँट
एक अभ्यास रघु को सबसे ज्यादा चिढ़ाता। उसके पास ऊँट और किनारे का प्यादा होता, फिर भी ईशान अकेले राजा से ड्रॉ कर लेता।
बचाव वाला राजा पहले ही प्यादे के पदोन्नति कोने में था। ऊँट विपरीत रंग पर चलता था। दूसरी समस्या बनाने के लिए कोई और प्यादा नहीं था।
रघु ने राजा की चाल, शह, प्रतीक्षा और गुस्से में प्यादा आगे बढ़ाना सब किया। कोना शरण बना रहा। कभी उसने स्टेलमेट कर दिया। कभी राजा से प्यादा खाने दिया। कभी वही मोहरे घुमाता रहा और ईशान इंतजार करता रहा।
उन्होंने रंग और सीट बदलीं, जब तक रघु जरूरी खाने समझाने लगा। फिर राजा को कोने के बाहर रखा। उस स्थिति में नई गणना चाहिए थी। मिलती-जुलती हर स्थिति पर ड्रॉ का विचार चिपकाया नहीं जा सकता था।
रघु ने दोनों चित्र एक पन्ने पर बनाए।
वे सामान्य बढ़त को जीत में बदलना भी सीखते: हाथी सक्रिय रखना, राजा आगे लाना और ऐसी जल्द अदला-बदली रोकना जो जीत का एकमात्र मौका मिटा दे। आकर्षक चाल चल जाने के बाद भी ईशान उससे पूरा एंडगेम खत्म कराता।
रघु ने सप्ताह में चार तय अभ्यास समय रखे। ड्यूटी के आरंभ में देरी होने वाली हो तो अतिरिक्त गेम नहीं लेता।
बॉक्स बिस्तर के नीचे रहा। कॉपी मेज पर खुली रही। अब दोनों को एक दूसरे के पीछे छिपने की जरूरत नहीं थी।
5. वह मुलाकात जो छूट गई
घर छोड़ने के बाद पहली प्रतियोगिता खराब समाप्त हुई। दो बाजियों में रघु ने मजबूत बचाव किया। फिर बराबर स्थिति में जरूरत से ज्यादा कोशिश की, क्योंकि बेटी को बताने लायक परिणाम चाहिए था।
अंतिम स्कोर पर मन ही मन बहस करते रविवार का तय भोजन चूक गया। बेटी बस स्टैंड पर चालीस मिनट इंतजार करके लौट गई।
रात के फोन में उसने यह नहीं पूछा कि जीत हुई या नहीं।
“अब भी मेरी मुलाकात बोर्ड पर हुए नतीजे से तय होगी?”
रघु गोदाम की सीढ़ी पर बैठा रहा, जब तक सुरक्षा की बत्ती अपने आप बंद नहीं हुई। उसने टाइमर दबाया और वापस फोन किया।
नई तारीख तय की। उसने उसी कैलेंडर में लिखी जिसमें अगली प्रतियोगिता और ड्यूटी थीं। समय टकराएगा तो वादा करने से पहले चुनेगा।
अभ्यास में उसने जबरन जीतने की कोशिश वाली बाजी देखी। ठीक रानियों की अदला-बदली इसलिए ठुकराई थी कि बाद की स्थिति कुछ साबित करने के लिए बहुत शांत लगती थी। हमले में मोहरा गया।
ईशान ने बचाए बिना उसे दोबारा बनाने दिया।
तीन सप्ताह बाद रघु आयोजन पूरा करके बस पकड़ गया। बेटी से पहले खाने पहुँचा। नतीजा सामान्य था। उसने एक स्थिति बताई जिसे पहले से बेहतर समझा था।
बेटी ने सुना, फिर अपना कठिन सप्ताह बताया। महीनों बाद बातचीत में दोनों की कहानी के लिए जगह थी।
6. जागे हुए दिमाग से पहुँचा फाइनल
अगले सीजन में रघु नगर की छोटी नॉकआउट चैम्पियनशिप के लिए चुना गया। कठिन क्वार्टर फाइनल बचाया। सेमीफाइनल में खराब स्थिति इतनी देर सँभाली कि विरोधी ज्यादा आगे बढ़ गया, फिर जीता।
ड्रॉ की दूसरी ओर से संदीप आया।
फाइनल दो बाजियों का था। कुल बराबर हो तभी घोषित टाइब्रेक। दोनों को एक-एक रंग मिलता। रघु ने समय नियंत्रण और कार्यक्रम पढ़ा। बहुत पहले ड्यूटी बदलने का इंतजाम कर लिया।
ईशान के घर उधार मिले कमरे में ठीक से सोकर पहुँचा। साफ कमीज बॉक्स में रखी थी। मीना ने बेटी के हाथ भेजी थी, बिना संदेश के।
संदीप ने कुर्सी के पास बॉक्स देखा।
“अब भी वही पुराना?”
रघु ने पेन निकाला। “बंद हो जाता है।”
आर्बिटर ने बोर्ड पर बुलाया।
पहली बाजी में रघु काले मोहरों से खेल रहा था। महीनों पढ़ा ढाँचा चुना। बिना जल्दी विकास किया। प्यादे तय करने से पहले केंद्र के खुलने की जाँच की। संदीप ने जटिलता रखी, परिचित अधीरता की उम्मीद में।
वह नहीं आई।
गणना किए क्रम के बाद रानियाँ हटीं। एंडगेम में रघु का राजा सक्रिय हो सकता था। दूर का प्यादा ध्यान माँगता था और दूसरी तरफ दूसरा लक्ष्य था।
इस बार संदीप को तय करना था कि पहले किस समस्या का जवाब दे। रघु अपनी बारी पर बोर्ड ही देख रहा था।
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7. दूसरे कॉलम का पहला निशान
रघु ने दूर का प्यादा तुरंत नहीं धकेला। राजा सुधारा, जब तक आगे बढ़ने की धमकी उपयोगी नहीं हो गई।
संदीप ने राजा उस तरफ किया। मिले समय में रघु ने दूसरी कमजोरी पर हमला किया। रक्षक वापस आया तो दूर का प्यादा बढ़ा। हर दिशा बदलने में ऐसी चाल लगी जो स्थिति अब खर्च नहीं कर सकती थी।
गणना अभी जरूरी थी। आकर्षक कैप्चर से पहले रघु रुका। विरोधी प्यादे का रास्ता गिना और सुरक्षित क्रम चुना। दर्शकों को धीमा एंडगेम दिख रहा था। उसे वे छोटे अंतर दिख रहे थे जो अब भी ड्रॉ करा सकते थे।
अंत में संदीप ने हार मान ली।
कुछ सेकंड रघु का हाथ स्कोर शीट की ओर नहीं गया। तेरह हारों ने शरीर को दूसरे नतीजे की उम्मीद सिखाई थी। आर्बिटर ने हस्ताक्षर की जगह बताई।
रघु ने हस्ताक्षर किए।
विराम में संदीप कसा जबड़ा लेकर तैयारी देख रहा था। उसे जीत चाहिए थी। रघु को ड्रॉ, लेकिन ईशान ने शुरू से गतिविधि छोड़कर जबरन ड्रॉ बनाने से सावधान किया था।
दूसरी बाजी सामान्य शुरू की। संदीप ने अधिक जोखिम लेकर फायदा उठाया। जटिल मध्य खेल में रघु एक सामरिक जवाब चूक गया और ऊँट कम रह गया।
पुरानी आवाजें तुरंत लौटीं। कमरे में मीना ने नजर झुका ली। रघु ने देखा, फिर वापस बोर्ड पर आया, इससे पहले कि वह दृश्य भी उसकी सोच में कोई मोहरा बन जाए।
8. h1 तक का रास्ता
संदीप की बढ़त वास्तविक थी। रघु को बच सकने वाली अंतिम स्थिति खोजनी थी। आत्मविश्वास गायब ऊँट की जगह नहीं ले सकता था।
प्यादे हटे तो एक संभावना दिखी। बचा काला ऊँट काले खानों पर चलता था। यदि केवल h-प्यादा बचे, उसका पदोन्नति खाना हल्का होगा। काला राजा रोक सके, उससे पहले रघु h1 पहुँच सकता था।
यह चालों के क्रम पर निर्भर था।
उसने दूसरे प्यादे को हटाने वाली अदला-बदली गिनी। राजा का रास्ता दोबारा देखा। संदीप ने स्वीकार किया, शायद अतिरिक्त ऊँट और प्यादा बचने से संतुष्ट था। रघु कोने की ओर गया।
किसी दर्शक ने फुसफुसाया कि भाग रहा है।
राजा h1 पहुँचा।
संदीप ने अपना राजा सुधारा और h-प्यादा आगे लाया। रघु छोटी शरण के भीतर रहा जिसे पाने के लिए इतनी मेहनत की थी। ऊँट जहाँ संभव था शह देता। h1 पर कभी हमला नहीं कर सकता था।
अब शुरुआती क्षण वाली स्थिति बोर्ड पर थी: सफेद राजा h1; काला राजा f3, काले खाने का ऊँट d6, प्यादा h3। सफेद की बारी। और कुछ नहीं बचा था।
रघु ने शर्तें एक-एक देखीं। बचाव का राजा सही कोने में था। ऊँट उस कोने से निकालने के लिए गलत रंग का था। ध्यान बाँटने को दूसरी तरफ कोई प्यादा नहीं था।
उसने राजा की ओर हाथ बढ़ाया।
9. वह आधा अंक जिसे संदीप नहीं ले सका
रघु ने Kg1 चला। शरण के पास यही उपलब्ध खाना था।
संदीप ने h2 बढ़ाकर शह दी।
रघु h1 लौट गया।
काला प्यादा उसके राजा के सामने था। संदीप देर तक देखता रहा। ऊँट प्यादा बचा सकता था, राजा बाकी निकलने की जगह रोक सकता था। लेकिन बिना शह हर रास्ता बंद करना स्टेलमेट बनाता। पदोन्नति का खाना सफेद राजा के नियंत्रण में था।
वह दूसरी व्यवस्था खोजता रहा। रघु ने इंतजार किया।
टूर्नामेंट की घड़ी चलने से ऊँट का रंग नहीं बदलता। काला राजा सीधे सफेद राजा के पास जाकर उसे हटने का आदेश भी नहीं दे सकता था।
आखिर संदीप ने ऊपर देखा।
“ड्रॉ।”
रघु ने स्वीकार किया। आर्बिटर ने आधा अंक लिखा और मैच का परिणाम दिया: डेढ़ बनाम आधा।
टाइब्रेक की जरूरत नहीं थी।
तालियों से पहले संदीप ने शीट पर हस्ताक्षर किए। पहली बाजी की हार और दूसरी का ड्रॉ नामों के नीचे दो पंक्तियों में थे। पास बोर्ड की स्थिति हिसाब को स्पष्ट बना रही थी।
उसके एक छात्र ने पूछा कि ऊँट जीत क्यों नहीं सकता।
क्षण भर लगा संदीप उसे इंतजार करने को कहेगा। फिर उसने प्रदर्शन बोर्ड कमरे की ओर किया और मोहरे लगाने लगा।
रघु ने उसे सफेद राजा h1 पर रखते देखा।
इस बार पढ़ाया जाने वाला उदाहरण उसकी हारी हुई स्थिति नहीं था। कोने में टिके राजा ने पूरा मुकाबला जिता दिया था।
10. कैलेंडर की तीन तारीखें
रघु पेन रख रहा था, तब मीना आई। उसने पुराने बॉक्स का लकड़ी वाला ढक्कन छुआ।
“उसने ऊँट जीता तो लगा तुम खत्म हो गए।”
“कुछ चाल मुझे भी लगा।”
“फिर क्या बदला?”
उसने कॉपी का छोटा चित्र दिखाया। दोनों तरफ से उसकी असफल कोशिशें, काटे हुए तीर और बार-बार मिटाने से पतला पड़ा कोना था।
मीना उसकी उम्मीद से अधिक देर देखती रही।
बेटी तीन कागज के कप में चाय लाई। पुरस्कार के बाद वे हॉल के बाहर बैठे। बेंच संकरी थी, इसलिए कप जूतों के बीच जमीन पर रखा।
रघु ने ऐसे घर में लौटने को नहीं कहा जो अभी दे नहीं सकता था। फोन का कैलेंडर दिखाया: पक्की ड्यूटी, अगले अभ्यास और पहले से खाली रखा रविवार।
मीना ने अपनी तारीख जोड़ी। माँ के मोहल्ले के पास छोटा कमरा उपलब्ध था। लेने का वादा किए बिना साथ देख सकते थे।
रघु ने समय लिखा।
रात को गोदाम लौटकर अंतिम स्कोर शीट बॉक्स में रखी। सुपरवाइजर ने झाँककर पूछा कि जीते या नहीं।
“हाँ,” रघु ने कहा।
ढक्कन बंद किया, फाटक जाँचा और ड्यूटी शुरू की। सुबह छह बजे बेटी फोन करेगी। इस बार दूसरी घंटी से पहले उठाएगा। बॉक्स के भीतर एक नई पर्ची थी। कैलेंडर में एक मुलाकात। दोनों को निभाने का काम अब उसके सामने था।
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