नवीन ने कहा कि जीतने वाला उसकी बहन से शादी कर सकता है।
हर आदमी को तीन पत्ते बाँटते हुए ऐसे कहा, जैसे बता रहा हो कि नाश्ता आने वाला है।
तारा दरवाजे के पास खड़ी थी। हाथ में आयोजन का क्रम था, जिसे छापकर लाने को उसी ने कहा था।
दूसरा भाई आकाश हँसा।
“मजेदार करो। विजेता को परिवार का इंटरव्यू नहीं देना पड़ेगा।”
बाकी लोग भी हँसे।
फिर विवेक ने अपने पत्तों पर हाथ रखा।
“सँभलकर। सच मान सकता हूँ।”
तारा आठ महीने से उसके साथ रिश्ते में थी।
उसने इंतजार किया कि विवेक उसकी तरफ देखेगा।
वह नवीन को देख रहा था।
तारा ने कागज पास की मेज पर रख दिए।
“जा रही हूँ।”
नवीन मुड़ा।
“कहाँ?”
वह लगभग जवाब देने लगी।
मजाक से ज्यादा इस बात से डर लगा।
* * *
वयस्कों के तीन पत्ती प्रदर्शन कार्यक्रम से पहले निजी डिनर था।
तारा ने डिनर आयोजित किया था। अगले आयोजन का क्रम तैयार किया था। दोपहर खराब कुर्सियाँ बदलवाने के लिए सप्लायर को मनाने में गई थी।
अट्ठाईस साल की उम्र में वह यह सुनिश्चित करना जानती थी कि दर्शकों को पता न चले, आयोजन बिगड़ने के कितना करीब आया था।
भाई इसे हाथ बँटाना कहते थे।
परिवार की कंपनी कुछ काम का भुगतान करती। बाकी घर के लिए सहयोग माना जाता।
नवीन ग्राहक देखता था।
आकाश संबंध सँभालता था। अक्सर इसका मतलब तारा के मुश्किल बातचीत खत्म कर लेने के बाद पहुँचना होता।
पिता की मृत्यु चार साल पहले हुई थी। उसके बाद भाइयों ने करीब हर निर्देश को पिता की इच्छा बताना सीख लिया था।
तारा ने उस वाक्य का विरोध करना छोड़ दिया था।
पिता की याद इतनी आती थी कि उनके ऐसे रूप से बहस अच्छी नहीं लगती थी जिससे कोई सवाल नहीं कर सकता।
डिनर में विवेक गलियारे तक पीछे आया।
“मजाक था।”
“सुना।”
“सच में थोड़े समझ रही हो—”
“समझ रही हूँ कि तुम हँसे।”
उसने कमरे की तरफ देखा।
“बिना तमाशा किए बात कर सकते हैं?”
तारा ने आवाज ऊँची नहीं की थी।
* * *
बाहर टैक्सी देर कर रही थी।
विवेक प्रवेश की रोशनी के नीचे पास खड़ा था।
“भाइयों से अच्छे संबंध बनाने की कोशिश थी।”
“यह मानकर कि मुझे दे सकते हैं?”
“किसी का मतलब वह नहीं था।”
“तुम्हारा क्या था?”
उसने गर्दन के पीछे हाथ फेरा।
अंदर किसी ने अगला दौर खेलने को कहा।
विवेक ने दरवाजे की तरफ देखा।
तारा ने वह हरकत देखी और भीतर कुछ साफ हो गया।
वह बातचीत समय पर खत्म करके वापस अंदर जाना चाहता था।
“कैब आ गई,” उसने कहा।
तारा बैठ गई।
वह खुली खिड़की की तरफ झुका।
“रात को गुस्से वाले संदेश मत भेजना।”
तारा ने देखा।
“पूछ सकते थे कि ठीक हूँ या नहीं।”
जवाब मिलने से पहले गाड़ी चल पड़ी।
घर पर तारा ने बालियाँ उतारीं। मेज पर सप्लायर की रसीदों के पास रख दीं।
दिन भर पर्याप्त उपयोगी काम कर चुकी थी।
रोई। उस रोने से कोई काम निकालने की कोशिश नहीं की।
* * *
सुबह नवीन ने मेहमानों से माफी माँगने को कहा।
“किसलिए?”
“सबको शर्मिंदा किया।”
“चली गई।”
“वही।”
माँ नाश्ते की मेज पर बिना छुई चाय के सामने बैठी थीं।
तारा ने पूछा कि कही गई बात सुनी थी?
“सुनी। भाइयों को ऐसा मजाक नहीं करना चाहिए।”
नवीन ने हाथ फैला दिए।
“लो। खत्म।”
माँ आगे बोलीं।
“लेकिन जानती हो आदमी कैसे बात करते हैं।”
तारा इंतजार करती रही कि वाक्य का दूसरा हिस्सा कुछ और बन जाएगा।
नहीं बना।
आकाश ने कहा कि शायद शादी की चिंता है, इसलिए व्यक्तिगत तौर पर ले रही है।
बात इतनी अजीब थी कि तारा हँस दी।
नवीन ने हँसी को हार मानना समझ लिया।
“अच्छा। आयोजन पूरा करना है।”
तारा ने सामने रखी फाइल देखी।
“जिस काम का वादा किया है, सौंप दूँगी। फिर कंपनी छोड़ रही हूँ।”
इस बार किसी ने मजाक नहीं कहा।
* * *
वह ग्राहकों की सूची चुराकर नहीं निकली।
काम सौंपा। जिन नमूनों को रखने की अनुमति थी, अपने काम के वे नमूने रखे। जो भुगतान बाकी था, लिया।
रकम पर बहस हुई।
इस पर भी बहस हुई कि भुगतान करने के लिए भी उसे आभारी होना चाहिए या नहीं।
वह पुरानी सहपाठी लीना के साथ छोटे किराए के फ्लैट में रहने चली गई।
लीना सेट डिजाइन करती थी। किराया बाँटने के लिए साथी ढूँढ़ रही थी।
कमरे की खिड़की के सामने दीवार थी।
रसोई की शेल्फ टेढ़ी थी।
मुख्य दरवाजा भीतर से बंद होता था।
पहली शाम तारा ने दोनों के बीच फर्श पर कॉपी रखी।
“आयोजनों की फिल्में बनाना चाहती हूँ। इंटरव्यू। ठीक से कवरेज। छोटे काम, जिन्हें अच्छा पूरा कर सकें।”
लीना ने बजट देखा।
“दूसरी लाइट खरीदने के पैसे आने तक स्टूडियो मत कहना।”
दोनों ने नाम रखा, सेकंड लाइट।
आधे घंटे अपने मजाक पर हँसती रहीं।
उस सप्ताह पहली हँसी थी जिसमें तारा शामिल होना चाहती थी।
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* * *
तीन संभावित ग्राहक मिलने को तैयार हुए।
दो परिवार की कंपनी के जरिए उसे जानते थे।
तीसरे ने कॉलेज के कला कार्यक्रम की उसकी छोटी फिल्म देखी थी।
गुरुवार तक परिवार से जुड़े दोनों लोगों ने बैठक रद्द कर दी।
एक ने निजी तौर पर फोन किया।
“भाई कह रहे हैं अस्थायी बात है।”
“क्या?”
“तुम्हारी व्यवस्था। नहीं चाहते हम बीच में फँसें।”
“बीच नहीं है। सेवा दे रही हूँ।”
“समझता हूँ।”
फिर भी रद्द किया।
कुछ घंटे बाद आकाश का संदेश आया।
जो संबंध अकेले नहीं बनाए, उन्हें खराब मत करो।
तारा देखती रही।
उसे बारिश में नया तार उठाकर लाना याद था, जबकि आकाश छतरी के नीचे तस्वीरें खिंचवा रहा था।
उस वादे से हुई देर पर ग्राहक से माफी माँगना याद था जो आकाश ने बिना पूछे किया था।
लगता था संबंध की मरम्मत पूरी होते ही संबंध उसका हो जाता था।
तारा ने फोन रखा। तीसरे ग्राहक को फोन किया।
वह बैठक बनी रही।
काम छोटा था।
उन्होंने ले लिया।
* * *
पैसे साधारण रकमों में खत्म होते थे।
किराया। सफर। बदली गई बैटरी। छपाई। लंबे संपादन के बाद देर से मँगवाया खाना।
स्टूडियो जलाने की जरूरत नहीं थी।
तीन अटके भुगतान ज्यादा चुपचाप काम कर सकते थे।
तारा दूसरे निर्माताओं से छोटे संपादन कार्य लेने लगी।
लीना ने स्कूल के नाटक के लिए दृश्य रंगे।
किसने कितना दिया, दोनों लिखतीं। अविश्वास नहीं था। दोनों गलतफहमी का खर्च नहीं उठा सकती थीं।
विवेक एक बार आया।
फूल लाया था।
फूलदान नहीं था। तारा ने पानी के जग में रख दिए।
“नवीन से बात की,” उसने कहा।
तारा रुकी।
“मानता है बात साबित कर दी है। ठीक पद लेकर लौट सकती हो। हम भी आगे बढ़ सकते हैं।”
वह मुस्कराया।
उदार लगना चाहता था।
तारा को एहसास हुआ कि उसका भविष्य पहले से चर्चा करके लाया गया है।
“बताया कि मैं क्या चाहती हूँ?”
“सम्मान।”
“दोनों में से किसी ने मुझसे पूछा कि वह मेरे लिए कैसा होगा?”
विवेक ने फूल देखे।
इस बार उनसे मदद नहीं मिली।
* * *
मौका रद्द होती बुकिंग से आया।
स्वतंत्र आयोजक मिसेज फर्नांडिस ने वयस्कों के लिए खुला तीन पत्ती प्रदर्शन कार्यक्रम तय किया था। इंटरव्यू और छोटा दर्शक समूह होना था।
मूल पैकेज का खर्च देने वाला प्रायोजक पीछे हट गया तो प्रोडक्शन ठेकेदार ने काम छोड़ दिया।
हॉल अब भी बुक था।
खिलाड़ियों को बुलाया जा चुका था।
मिसेज फर्नांडिस को छोटा, संभव कार्यक्रम चाहिए था, या साफ तौर पर रद्द करना था।
उन्होंने तारा की कॉलेज वाली फिल्म देखी थी।
“बता सकती हो कि सच में क्या किया जा सकता है?”
तारा हॉल गई।
छत नीची थी। एसी शोर करता था। बचे बजट में बुलाए जा सकने वाले दर्शकों के हिसाब से मंच बड़ा था।
लीना ने इस्तेमाल की जगह नापी।
कम सीटें, साधारण सेट और महँगे ग्राफिक्स पर निर्भर न रहने वाले इंटरव्यू सुझाए।
आयोजन की व्यवस्था और प्रतिभागियों की शर्तें आयोजक देखतीं। सेकंड लाइट प्रोडक्शन सँभालता।
तारा ने लिख दिया कि क्या दे सकते हैं।
फिर लिखा कि क्या नहीं।
मिसेज फर्नांडिस ने दोनों सूचियाँ पढ़ीं।
“धन्यवाद। पिछले आदमी ने सिर्फ तारीफ वाले शब्द दिए थे।”
* * *
काम तुरंत नहीं मिला।
सवाल हुए। बदलाव हुए। अंतिम होने से पहले बजट और छोटा हुआ।
अग्रिम भुगतान और बाकी किस्तों पर सहमति बनी।
टीम को स्वीकार करने से पहले दरें बता दी गईं।
तारा बहुत बार दूसरों से धैर्य रखने को कह चुकी थी, उन पैसों के लिए जिनका वादा किसी और ने किया था।
ऐसी शुरुआत नहीं करेगी।
नवीन को बुकिंग पता चल गई।
लाइट जाँचते समय फोन किया।
“आयोजक हमारे परिवार को जानती है।”
“हमारी कंपनी को काम दिया है।”
“इस कारोबार से परिचय किसने करवाया?”
तारा ने फर्श पर टेप के निशान देखे।
“जाँच चल रही है।”
“यह दिखाकर कुछ नहीं बना सकती कि कहीं से नहीं आई।”
“ऐसा कहा नहीं।”
“तो अकेली होने का नाटक बंद करो।”
वह लगभग फिर हँसने लगी।
जब कथित तौर पर अकेली नहीं थी, तब ग्राहक गायब हुए थे।
अब एक बचा तो परिवार महत्वपूर्ण हो गया।
फोन रखकर लीना के साथ लाइट खिसकाई।
इलेक्ट्रीशियन के जाने से पहले एक घंटा था।
* * *
कार्यक्रम से दो दिन पहले एक कैमरा ऑपरेटर बीमार पड़ गया।
बैकअप की दूसरी बुकिंग थी।
तारा दोपहर भर फोन करती रही। लीना छोटी टीम के हिसाब से शॉट की योजना बदलती रही।
छह बजे फ्रीलांस ऑपरेटर संदीप तैयार हुआ।
घंटों, उपकरणों और भुगतान पर सीधे सवाल पूछे।
फिर बोला, “नवीन भाई है?”
तारा ने आँखें बंद कीं।
“हाँ।”
“फोन किया था उसने।”
“क्या कहा?”
“उस दिन रहेगा।”
“इस प्रोडक्शन का हिस्सा नहीं है।”
“ठीक। मेरी शीट कौन साइन करेगा?”
“मैं।”
“ठीक।”
बात की सरलता पर लगभग रोना आ गया।
सप्ताह भर उन लोगों को समझाया था जो पारिवारिक प्रभाव को मौसम की तरह मानते थे।
संदीप सिर्फ जानना चाहता था कि जिम्मेदार कौन है।
लिखित पुष्टि भेज दी।
फिर गाड़ियों की सूची जाँची।
आयोजन अभी भी होने वाला था।
* * *
उस सुबह अभ्यास के दौरान एक माइक खराब हो गया।
मेज का कपड़ा गलत आकार में आया।
एक खिलाड़ी को दूसरी कुर्सी चाहिए थी। पहली से पीठ दुख रही थी।
अलग-अलग कोई बड़ी आपदा नहीं थी।
साथ में इतना काफी था कि तारा के विचार हाथों से तेज चलने लगें।
गलियारे में जाकर पानी पिया।
लीना वहीं मिली।
“अगली चीज चुनो।”
“माइक।”
“अच्छा। मेज मैं देखती हूँ।”
आयोजक की व्यवस्था के तहत हॉल के तकनीशियन से दूसरा माइक लिया। दर्शकों के आने से पहले जाँच की।
कुर्सी बदली।
कपड़ा मोड़कर लगाया, ताकि गलत आकार दिखाई न दे।
दोपहर माँ आईं।
हाथ में स्टील का छोटा डिब्बा था।
“खाना लाई हूँ।”
तारा ने ले लिया।
माँ ने कमरा देखा। तार देखे। निर्देशों का इंतजार करती टीम देखी।
“सब तुमने किया?”
“हमने।”
मंच से लीना ने हाथ हिलाया।
माँ ने भी हिलाया। थोड़ी झिझक के साथ।
* * *
बीस मिनट बाद नवीन और आकाश आ गए।
तस्वीर खिंचवाने लायक जैकेटें पहनी थीं।
आकाश ने टीम के एक सदस्य से पूछा कि परिवार का बैनर कहाँ लगेगा?
उसने तारा की तरफ भेज दिया।
तारा ने बाँह में दबा लपेटा हुआ बैनर देखा।
“नहीं।”
नवीन की मुस्कान कस गई।
“यहाँ मत करो।”
“इस मंच पर क्या जाएगा, उसकी बात करने की यही जगह है।”
“साथ दे रहे हैं।”
“तो दर्शकों की दी हुई सीट पर बैठो।”
आकाश ने आवाज नीचे की।
“लोग सोचेंगे समस्या है।”
तारा ने घड़ी देखी।
“अभ्यास छूटा तो होगी।”
नवीन ने पूछा कि परिवार का नाम मिटाना चाहती है?
तारा ने उस सवाल का जवाब दिया जिसके लिए वह आया था।
“श्रेय में आयोजन पर काम करने वाले लोगों और कंपनियों के नाम होंगे।”
दोनों उसे देखते रहे।
पीछे संदीप ने अँगूठा उठाया। कैमरा तैयार था।
तारा काम पर लौट गई।
इस बार भाई इंतजार कर रहे थे कि कमरा उनके लिए जगह बनाए।
* * *
कार्यक्रम समय पर शुरू हुआ।
पहली जीत यह थी।
दूसरी छोटी थी।
एक उम्रदराज खिलाड़ी बताने लगा कि उसके घर का समूह अलग परंपरा क्यों इस्तेमाल करता है।
प्रस्तोता ने तारा की तरफ देखा। आँखों से पूछा कि जल्दी करवाए?
उसने इशारा किया कि समय है।
आदमी ने बात पूरी की।
उसके बाद की कहानी पर दर्शक हँसे।
गर्मजोशी की हँसी थी। कहानी कहने वाले की अपनी थी।
तारा को डिनर याद आया।
फिर हेडसेट में टीम का सवाल आया। याद को इंतजार करना पड़ा।
कार्यक्रम चलता रहा।
कुछ नजदीकी मुकाबले थे। कुछ साधारण।
एक अतिथि जवाब में अटका तो दोबारा शुरू करने दिया गया।
विजेता तय निशान पर खड़ा होना भूल गया। संदीप ने कैमरा बदला, आदमी को मूर्ख नहीं महसूस करवाया।
इनमें तारा का हर मिनट सामने दिखना जरूरी नहीं था।
उसके फैसले दूसरों के आराम से काम कर पाने में दिखाई दे रहे थे।
वह आखिरी पंक्ति के पीछे खड़ी होकर उस कमरे को सुनती रही जिसे बनाने में उसका हाथ था।
* * *
समापन से पहले विवेक कंट्रोल की मेज के पास आया।
भाइयों के साथ आया था।
“कुछ कहना चाहता हूँ।”
“चार मिनट में समापन है।”
“ज्यादा समय नहीं लगेगा।”
तारा ने हेडसेट का एक हिस्सा हटाया।
वह बोला कि खराब शाम पीछे छोड़नी चाहिए। परिवार एक ही चीज चाहते हैं। उसे बोलने दे तो लोग देखेंगे कि वह उसके साथ है।
तारा ने मंच देखा।
अगली घोषणा सेकंड लाइट और आयोजक की इवेंट कंपनी के आगे के काम की थी।
दायरा और शर्तें पहले तय थीं। घोषणा की अनुमति थी। मंच पर अचानक दिया जाने वाला वादा नहीं।
दो बार अभ्यास किया था।
विवेक उसकी जगह रिश्ते पर सार्वजनिक संकेत देना चाहता था।
“नहीं।”
“सुना भी नहीं क्या कहने वाला था।”
“किसी और दिन मुझसे कह सकते हो। उनकी तालियाँ नहीं चाहिए।”
उसने दर्शकों की तरफ देखा।
तारा ने हेडसेट वापस लगाया।
“समापन तैयार,” टीम से कहा।
* * *
मिसेज फर्नांडिस ने खिलाड़ियों, हॉल के कर्मचारियों और प्रोडक्शन टीम को धन्यवाद दिया।
फिर तारा और लीना को मंच पर बुलाया।
नवीन आधा खड़ा हो गया।
प्रस्तोता ने उन्हीं दोनों के नाम जारी रखे।
तारा ने भाई को वापस बैठते देखा।
मिसेज फर्नांडिस ने घोषणा की कि सेकंड लाइट तय कार्यक्रम और काम के दायरे के अनुसार अगले तीन सामुदायिक आयोजनों की कवरेज करेगा।
जीवन भर का अनुबंध नहीं था।
आगे योजना बनाने भर का काम था।
तारा ने टीम के नाम लेकर धन्यवाद दिया।
फिर कहा, “अगली जिम्मेदारी इन तीन आयोजनों की है। पहले कार्यक्रम की पूरी जानकारी तैयार होने पर बताएँगे।”
लीना पास खड़ी मुस्करा रही थी।
सगाई की घोषणा नहीं हुई।
परिवार के प्रतिनिधि ने माइक नहीं लिया।
तालियाँ उस काम की थीं जो सच में मौजूद था।
तारा ने माँ को देखा।
वह गोद में स्टील का डिब्बा रखे ताली बजा रही थीं।
* * *
उस शाम हर समस्या खत्म नहीं हुई।
दो पुराने संपर्क अब भी बचते थे।
एक भुगतान के लिए याद दिलाना पड़ा।
स्टूडियो की शेल्फ टेढ़ी थी। नए कार्यक्रम में व्यस्त सप्ताहों के लिए दूसरा संपादक चाहिए था।
लेकिन आयोजन पूरा हुआ। बाकी भुगतान आया। टीम को पैसे मिले।
नवीन का संदेश आया कि परिवार कैसा दिखा।
तारा ने कहा कि परिवार की बात निजी तौर पर करेगी।
विवेक ने मिलने को कहा।
कैफे में मिली। उसे दूसरा दर्शक समूह दिए बिना रिश्ता खत्म कर दिया।
अगले रविवार माँ फ्लैट आईं।
इस बार शादी की अगली बातचीत के बजाय अगले कार्यक्रम का पूछा।
तारा ने तैयार होती फिल्म दिखाई।
स्क्रीन पर उम्रदराज खिलाड़ी ने कहानी पूरी की। कमरा हँसा।
माँ आखिर तक देखती रहीं।
रात को लीना को कागजों के नीचे डिनर का पुराना छपा क्रम मिला।
“रखना है?”
तारा ने देखा।
फिर पलट दिया।
पीछे खाली था।
अगले प्रोडक्शन की तारीख लिखी। मेज के ऊपर लगा दिया।
उसे कोई जीतकर नहीं ले गया था।
सुबह काम पर जाना था।