सोनल के इंटरव्यू वाले कपड़े दरवाजे के पीछे थे जब रजत ने सौदा बताया।
“वह प्रतियोगिता जीत लो। नौकरी पर आपत्ति बंद कर दूँगा।”
वह हल्के हरे कुर्ते की बाँह इस्तरी कर रही थी।
“दोनों का क्या संबंध?”
“कहती हो दबाव सँभाल सकती हो। दिखाओ।”
वह बिस्तर पर संदेश देखता रहा। सोनल सोचती रही कि बहस करे या नहीं।
इंटरव्यू माल का हिसाब सँभालने वाले पद का था। शहर बदलने से पहले वैसा काम करती थी। खेप मिलाना, गायब सामान का पता लगाना और उत्तर गढ़े बिना अंतर समझाना जानती थी।
प्रतियोगिता वयस्क इंडियन रमी की थी। खेलना पसंद था, इसलिए जाना चाहती थी।
किसी में पति का मूल्यांकन जरूरी नहीं था।
फिर भी खुद को पूछते सुना, “सच कह रहे हो?”
रजत बिना ऊपर देखे मुस्कुराया।
“बिल्कुल। महत्वाकांक्षा का साथ दे रहा हूँ।”
सोनल ने इस्तरी बंद की।
उस शाम पहली बार कमरा सँभालने योग्य लगा।
बाद में उस राहत को सौदे से ज्यादा गुस्से के साथ याद करेगी।
* * *
पुणे आते समय नौकरी छोड़ी थी।
विराम तीन महीने का होना था।
फिर फ्लैट में काम था। कठिन समय में रजत की माँ रहीं। उसके कारोबार के काम हमेशा दफ्तर के घंटों में होते। सोनल सामान देने वालों, लौटाने वाली चीजों, खेप और घर के कैलेंडर को सँभालती रही।
चौदह महीने बीत गए।
नौकरी कहे तो रजत पूछता कि असंतुष्ट क्यों है।
कमाना पसंद है कहे तो पूछता कि उसने देने में कमी की क्या?
कहे कि मुद्दा वह नहीं, तो कहता कि मुद्दा कभी समझाती नहीं।
चौंतीस साल तक साधारण इच्छा इतने तरीकों से बताने लगी कि वह साधारण सुनना बंद हो गई।
पुराने काम के प्रमाणपत्र घर की गारंटी वाले कागजों के पास थे।
कभी खोलकर देखती कि घर में जिक्र न होने से अनुभव खत्म तो नहीं हो गया।
नहीं हुआ था।
पूर्व सहकर्मी पूजा ने नौकरी का नोटिस भेजा।
लिखा, आवेदन करो। प्रस्ताव मालूम होने के बाद तय कर सकती हो।
सोनल ने रजत को बताने से पहले किया।
इसीलिए उसने अचानक चढ़ा जुनून कहा।
* * *
पहला इंटरव्यू अच्छा हुआ।
नियोक्ता ने माल के अंतर, काम के घंटों और इस्तेमाल की व्यवस्थाओं पर पूछा। पति की खुशी नहीं पूछी।
दूसरी चर्चा तय हुई।
सोनल घर कुछ लंबी होकर लौटी।
रजत फोन पर था।
माइक्रोफोन ढककर पूछा कि रास्ते में पार्सल लिया?
नहीं लिया था।
चेहरा बदल गया।
“अभी से?”
एक शब्द पर सोनल यातायात, इंटरव्यू और अगले दिन भी पार्सल लेने की गुंजाइश समझाने लगी।
बाद में उसने प्रतियोगिता प्रवेश की पुष्टि पूछी।
“हाँ।”
“तो ध्यान दो। मौका चाहा था।”
सोनल ने पूजा को सौदा ऐसे बताया जैसे प्रगति हो।
दोस्त चुप रही।
फिर पूछा, “दूसरी आई तो?”
सोनल हँसी।
“शुरू मत करो।”
पूजा ने शुरू नहीं किया।
सवाल रह गया।
* * *
सोनल वर्षों से वयस्क मनोरंजन समूहों में खेलती थी। गंभीर अभ्यास पसंद करने भर का अनुभव था। बड़े आयोजनों का इतना कम अनुभव कि तैयारी जरूरी समझे।
ऐसे समूह से जुड़ी जहाँ हर चर्चा अंत में चरित्र का सबक नहीं बनती थी।
अभ्यास साथी फरीदा चालीस से ऊपर थी। स्कूल का प्रशासन सँभालती थी।
नौकरी का पता था।
यह नहीं पता था कि सोनल के कामकाजी जीवन में प्रवेश के लिए ट्रॉफी अनिवार्य हो गई है।
एक सत्र में सोनल बार-बार जीत की संभावना पूछती रही।
फरीदा ने आखिर कॉपी रख दी।
“पिछले दौर में क्या हुआ, बता सकती हूँ। भविष्य का परिणाम जारी नहीं कर सकती।”
सोनल ने माफी माँगी।
माफी जरूरी नहीं थी। फर्क उपयोगी था।
जीत के बाद रजत को कहने वाले भाषण के बजाय फैसलों पर नोट बनाने लगी।
कुछ शाम अभ्यास फिर अच्छा लगा।
फिर रजत ने एक सत्र छोड़ने को कहा। ग्राहक पत्नी के साथ खाने पर आ रहा था।
सोनल ने बाहर से मँगाने को पूछा।
“वह बात नहीं होती।”
वह घर रही।
* * *
खाने में दिन के छह घंटे गए।
खरीदारी। तैयारी। मेज बदलना क्योंकि रजत को दूसरा कपड़ा चाहिए था। किसे प्याज नहीं चाहिए, याद रखना। सबके बिना मेहनत की शाम कहने के बाद बर्तन धोना।
मीठे के दौरान ग्राहक ने काम पूछा।
“खुद को खोज रही है,” रजत ने कहा।
सब मुस्कुराए।
सोनल ने चम्मच कटोरे के पास रखा।
“अगले सप्ताह दूसरा इंटरव्यू है।”
रजत ने और मीठा लिया।
“पहले चैंपियनशिप जीतने की शर्त पर।”
ग्राहक की पत्नी ने दोनों को देखा।
सोनल कहना चाहती थी, मजाक है।
मेज बचाने का आसान रास्ता था।
इसके बजाय बोली, “शर्त उसकी थी।”
मुस्कान हल्की हुई।
मेहमानों के बाद रजत ने कहा कि उसे नियंत्रित करने वाला बना दिया।
सोनल गीले हाथों से सिंक के पास थी।
“अलग कैसे सुनता?”
“थोड़ा मजाक समझ सकती थीं।”
उसने बाकी कटोरे देखे।
उसके मजाक भी सोनल के लिए काम छोड़ जाते थे।
* * *
अंतिम सप्ताहांत के लिए चयन हो गया।
नाश्ते पर संदेश आया। पढ़कर मुस्कुराई और फोन रजत की तरफ किया।
उसने देखा।
“अच्छा।”
वह रुकी।
उसने और चाय पूछी।
पहली बार तुरंत उठकर नहीं दी।
“केतली वहाँ है।”
रजत ने देखा, फिर खुद लिया।
शाम को अंतिम चरण वाले शनिवार का कारोबारी खाना बताया। सामान देने वाला और दो संभावित ग्राहक होंगे।
“तुम्हारा साथ चाहिए।”
“उस दिन आयोजन है।”
“खाना महत्वपूर्ण है।”
“आयोजन भी।”
“चयन हो चुका। बात साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं?”
सोनल देखती रही।
बात जीतना थी।
अब अंतिम चरण तक पहुँचना पर्याप्त था, बशर्ते समय उसकी इच्छा में खर्चे।
सोनल ने नौकरी पर आपत्ति बंद करने को पूछा।
रजत बोला, असंबंधित बातें नहीं मिलानी चाहिए।
* * *
एक पल लगा हँस पड़ेगी।
दोनों चीजें उसी ने बाँधी थीं। अब गाँठ दिखने पर चिढ़ रहा था।
साफ कहने को कहा कि चाहता क्या है?
“खाने पर चलो। चीजें शांत हों तो काम देखेंगे।”
“कब?”
“हर बात की अंतिम तारीख क्यों?”
क्योंकि बिना तारीख चौदह महीने गायब हो सकते थे।
क्योंकि तीन महीने चौदह हो चुके थे।
क्योंकि वह अनुमति जीतने की कोशिश में सप्ताह लगा चुकी थी जिसे वह चाय के कप पर बदल सकता था।
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सोनल ने सब नहीं कहा।
कमरे में गई। काम वाला फोल्डर मेज पर रखा।
रजत पीछे आया।
“क्या कर रही हो?”
“दूसरे इंटरव्यू की तैयारी।”
“बात चल रही है।”
“शर्त की बात पूरी हो गई।”
उसने नाटकीय कहा।
सोनल ने दरवाजे का कुर्ता देखा।
“नहीं। इंटरव्यू का अधिकार कमाने के लिए अंतिम मुकाबला नहीं खेल रही।”
इसके बाद संतोष वाली चुप्पी नहीं हुई।
बहस तब तक हुई जब तक बहुत थक नहीं गई।
फोल्डर मेज पर रखा रहा।
* * *
सोने से पहले प्रतियोगिता का संदेश फिर खोला।
साधारण कार्यक्रम, स्थान और जरूरी कागज थे।
काम, विवाह या अनुमति नहीं थी।
ऐसे पढ़ा जैसे पहली बार ठीक से देख रही हो।
फिर इंटरव्यू के कागजों के पास अलग आवरण में रखा।
दो चीजें थीं जो करना चाहती थी।
दोनों में खर्च और फैसले थे। किसी में असफल हो सकती थी। खाना फिर भी बनाना होगा। कठिन सवाल होंगे। क्या उठा सकती है, तय करना होगा।
एक इच्छा को दूसरी के सामने कटघरे में खड़ा करते थक गई थी।
रजत कमरे में लौटा तब तक बत्ती बंद कर चुकी थी।
* * *
अगली सुबह पूजा को पूरी बात बताई।
दोस्त ने यह नहीं कहा कि पहले ही चेताया था।
पूछा कि इंटरव्यू से पहले क्या चाहिए?
“तैयारी के लिए शांत जगह।”
“यहाँ आओ।”
लैपटॉप और प्रमाणपत्र लिए।
दो घंटे अनुभव और पद का विवरण देखा। पूजा ने व्यावहारिक सवाल किए। कुछ भरोसे से बताए। कुछ की तारीख देखनी पड़ी।
काम का इतिहास चमत्कार नहीं था। शर्म भी नहीं।
अनुभव था।
दूसरे इंटरव्यू में प्रबंधक ने बंद होने से पहले गलत मात्रा में आई खेप का उदाहरण दिया। अंतर कैसे देखेगी?
सोनल ने जरूरी जानकारी से शुरू किया। रिकॉर्ड न हो तो निश्चित उत्तर नहीं गढ़ा।
उसने एक विवरण बदला।
सोनल ने जवाब फिर सोचा।
आधे घंटे सवाल इसलिए पूछे गए क्योंकि कोई समझना चाहता था कि कैसे सोचती है। असहमति का मतलब उसकी उदारता न मानना नहीं था। दूसरा दस्तावेज माँगने से कठिन व्यक्ति नहीं हो गई।
निकलते समय स्वागत कक्ष वाले ने छतरी पूछी।
भूल गई थी।
वापस ली। धन्यवाद कहा।
छोटी गलती से इंटरव्यू खराब नहीं हुआ। किसी ने नहीं कहा कि पति न हो तो सिर भूल जाएगी।
बाहर छतरी के नीचे खड़ी रही। बारिश लगातार थी। प्रस्ताव अभी नहीं था। प्रतियोगिता अनिश्चित थी। घर की बहस बाकी थी।
लेकिन एक घंटा ऐसा बिताया जिसमें प्रश्न था कि खास काम कर सकती है क्या।
ऐसे और घंटे चाहती थी।
* * *
तीन दिन बाद पद का प्रस्ताव आया। शुरुआत प्रतियोगिता के बाद थी।
शर्तें पढ़ीं। घंटे स्पष्ट किए। स्वीकार किया।
फिर रजत को बताया।
फैसले की प्रशंसा नहीं माँगी।
उसने पीठ पीछे व्यवस्था करने को कहा।
“आवेदन और दोनों इंटरव्यू बताए थे।”
“पता था मैं सहज नहीं हूँ।”
“जानती हूँ।”
समझाना छोड़ने से बातचीत आसान नहीं हुई।
छोटी हुई।
अंतिम मुकाबले से पहले दो रात पूजा के पास रही।
रजत को बताया कहाँ होगी और प्रतियोगिता जाएगी। कारोबारी खाने पर नहीं होगी।
उसने वफादारी के कई संदेश भेजे।
फिर निमंत्रण की तस्वीर। जैसे छपा देखकर पहले से मालूम तारीख बदल जाएगी।
सोनल ने फोन रखा।
पूजा का फ्लैट छोटा था। पड़ोसी का टेलीविजन सुनाई देता। सोफे के गद्दे के नीचे कड़ा किनारा था।
परिचित बहस छोड़ना आदर्श जिंदगी में जाना नहीं माना।
तीन बजे लगा कि बेहतर वाक्य खोजती तो शायद बच सकती चीज खराब कर दी।
नाश्ते तक थकी थी।
पूजा ने टोस्ट दिया। बात करनी है क्या पूछा।
“आयोजन के बाद।”
“ठीक है।”
इस बार टलती बातचीत सहमति से थी। गायब होते वादे से नहीं।
* * *
अंतिम चरण की सुबह पानी की बोतल भूलते-भूलते बची।
पूजा ने दरवाजे से पुकारा।
लौटकर ली और खुद पर हँसी।
किसी ने जिंदगी न सँभाल पाने का प्रमाण नहीं माना।
स्थान पर फरीदा मिली।
“नौकरी?”
“स्वीकार की।”
“बधाई।”
“यह अभी नहीं जीती।”
फरीदा हैरान हुई।
सोनल ने सिर हिलाया।
“लंबी कहानी।”
“बाद में बताना।”
साधारण उत्तर प्रोत्साहन से ज्यादा मददगार था।
कार्यक्रम देखा।
पहला सत्र खराब रहा। ध्यान भटका था। जानती थी। विराम में परिणाम को बाकी सभी फैसलों की गलती नहीं बनने दिया।
नौकरी स्वीकार थी।
खाना मना किया था।
अंक से फैसले नहीं बदलते।
खाया। पानी पिया। अगला सत्र तैयार किया।
* * *
दोपहर तक इतनी वापसी हुई कि दौड़ में रही।
फोन पर रजत का संदेश था।
और खराब करने से बचने का आखिरी मौका।
एक बार पढ़ा।
फिर सामान में रखकर खेलने वाली जगह लौटी।
निर्भय नहीं हुई।
कभी ध्यान उस शाम पर गया जिसमें नहीं जा रही थी। पूरी सफलता के बिना वापस सत्र पर लाती रही।
दूसरे खिलाड़ियों ने उसकी परेशानी के लिए कुछ नहीं छोड़ा।
वे भी जीतना चाहते थे।
उचित था।
अंत में एक अपेक्षित परिणाम खोया। निराशा महसूस की। बचा देखा। खेलती रही।
अंतिम सूची पक्की हुई तो पहला स्थान था।
कागज देर तक देखा।
फिर मुस्कुराने लगी।
चैंपियनशिप थी।
रजत से अब दयालुता पाने की रसीद नहीं थी।
फर्क से मुस्कान अपनी लगी।
* * *
प्रस्तुति पर रिपोर्टर ने पति की बात पूछी।
सोनल ने कहा कि अभी बात नहीं हुई।
“अब आखिर गर्व होगा?”
उसने पास की बातचीत से कहानी का हिस्सा सुना था। शायद खुश अंत दे रहा था।
सोनल ने हर अनुमान सुधारने को सोचा।
फिर तैयारी में वास्तव में मदद करने वालों को शामिल करने को कहा।
फरीदा ने सत्र देखे।
पूजा ने रहने की जगह और इंटरव्यू तैयारी दी।
समूह ने फैसलों पर सवाल किए, महत्वाकांक्षा के अधिकार पर नहीं।
रिपोर्टर ने नाम लिखे।
फिर अंतिम दौर पूछा।
सोनल ने वह भी बताया।
फरीदा तस्वीर में आई तो धीरे बोली, “तो लंबी कहानी।”
“हाँ।”
“पहले चाय?”
“जरूर।”
* * *
खाते समय रजत का फोन आया।
सोनल अलग जाकर उठाया।
“सुना जीत गई।”
“हाँ।”
“बधाई।”
“धन्यवाद।”
विराम हुआ।
फिर बोला कि सप्ताहांत खराब किया, जबकि अब साथ मना सकते थे।
सोनल ने खिड़की से देखा। पूजा पेस्ट्री के तीन बराबर हिस्से करने की कोशिश कर रही थी।
“भाग लेने से खराब नहीं किया।”
“मतलब जानती हो।”
“जानती हूँ क्या चाहते थे।”
उसने शांत होने के बाद बात करने को कहा।
वह शांत थी।
उस विवरण पर बहस नहीं की।
“व्यावहारिक बातें करने का समय तय कर सकते हैं। सोमवार नौकरी शुरू है।”
रजत कई सेकंड चुप रहा।
फिर फोन रखा।
सोनल मेज पर लौटी।
पूजा ने गलती से सबसे छोटा हिस्सा दिया। समझी तो प्लेट बदलने लगी।
सोनल हँस पड़ी।
सब हँसे।
सुंदर ढंग से नहीं।
अच्छा पल था।
* * *
चैंपियनशिप ने शादी तय नहीं की।
बाद के सप्ताहों ने की।
सोनल नौकरी पर गई। पहले माल विवरण में गलती की। सहकर्मी के साथ ठीक की और व्यवस्था सीखी।
वेतन साधारण था। भरोसेमंद ढंग से अपना था।
रजत के साथ कई कठिन बातें हुईं।
उसने प्रतियोगिता को शर्त बनाने की माफी माँगी। फिर काम के घंटों और मिलने-जुलने पर नई शर्तें रखता रहा।
सोनल ने उस आदर्श जीत का इंतजार छोड़ा जिससे सौदे खत्म हो जाएँ।
साझा व्यावहारिक व्यवस्था अपने चुने सहयोग से सँभालते हुए अलग रहने लगे।
उसने अलगाव को दूसरा पुरस्कार नहीं कहा।
कभी शाम को याद आती। कभी सुबह वजह याद करने से पहले राहत मिलती। एक ही दिन दोनों भावनाएँ हो सकती थीं।
बाकी सामान लेने गई तो रजत ने काम के प्रमाणपत्र, दो किताबें और रसोई का डिब्बा एक बैग के पास रखे थे।
डिब्बे में पहली साझा यात्रा पर खरीदी चाय थी।
एक पल बैठ जाना चाहा।
रजत ने चाय पूछी।
उसने हाँ कहा।
उसी मेज पर पी जहाँ अंतिम मुकाबले की बहस हुई थी। उसने नया कार्यालय पूछा। सोनल ने बिना सही कागज आई खेप बताई। ऐसे सहकर्मी की बात की जिसे सबके फोन एक्सटेंशन याद थे।
लगभग आसान था।
फिर रजत ने सुझाव दिया कि लौट आए तो छोटे काम के घंटे सब सरल कर देंगे।
सोनल ने कप रख दिया।
“नौकरी का सौदा दोबारा करने नहीं आई।”
उसने कहा, बस सोच रहा था।
सोनल ने बैग उठाया।
वापसी के ऑटो में फिर रोई। चाय अच्छी थी। बातचीत लगभग अच्छी थी। उसी लगभग के कारण इतने समय तक समझाती रही थी।
नई जगह पर रसोई के डिब्बे से पहले प्रमाणपत्र निकाले।
अगले महीने सामान्य स्वतंत्रता का खर्च सीखा। गैस भरवानी थी। छोटी मरम्मत खुद तय करनी थी। एक शाम इतनी थकी कि खाना नहीं बना सकी। किसी से माफी माँगे बिना साधारण खाना खरीद लिया।
पूजा के घर रहने के दिनों के खर्च का तय हिस्सा दिया। दोस्त ने स्वीकार किया और पूछा कि रविवार खाने आ सकती है क्या?
सोनल ने हाँ कहा।
मदद करने वाले हर व्यक्ति से यह नहीं चाहिए था कि हमेशा पैसे, प्रशंसा या निराशा से इनकार करे। ऐसी व्यवस्था चाहिए थी जिस पर बात कर सकें। ऐसे उत्तर जो देने के बाद भी उत्तर रहें।
रविवार को पूजा आई तो खाना थोड़ा देर से तैयार हुआ। उसने सब्जी काटने की पेशकश की। सोनल ने काम दिया, फिर दोनों ने बैठकर खाया। किसी ने देर को उसके काम करने के निर्णय का प्रमाण नहीं बनाया। कोई आयोजन जीतकर उस भोजन के योग्य नहीं होना पड़ा। यह शाम तस्वीर में खास नहीं दिखती। सोनल को फिर भी याद रही।
पुरस्कार उधार के लैंप के पास शेल्फ पर था।
एक शनिवार फरीदा ने अगले आयोजन को पूछा।
सोनल ने काम का समय और बजट देखा।
फिर हाँ कहा।
किसी ने नहीं पूछा कि जीती तो क्या करने दिया जाएगा।
सोमवार अपना खाना और जाँच की सूची लेकर कार्यालय पहुँची।
सहकर्मी ने आराम वाला सप्ताहांत पूछा।
“पूरी तरह नहीं।”
“इसके लिए तैयार?”
सोनल ने कागज देखे।
“हाँ।”
और शुरू किया।