1. SVIP 777: खाली कुर्सी
रोहन ने पुराने विद्यार्थियों के मिलन समारोह के लिए दो सीटें रखवाई थीं। उसके पिता को गुजरे ग्यारह महीने हो चुके थे, लेकिन दूसरी कुर्सी के नामपत्र पर अब भी प्रकाश मेहता लिखा था। वह चाहता था कि एक बार चौकीदार का नाम सामने के दरवाजे से मेहमान बनकर भीतर आए।
वीरेन ने दो उँगलियों से नामपत्र उठाया। “कर्मचारियों का खाना नीचे है, मालूम है न?”
तैंतीस साल का रोहन उसके बाद की हँसी पहचानता था। सत्रह की उम्र में भी यही सुनी थी। स्कूल की अलमारी से चाँदी का कप गायब हुआ था। वीरेन ने कहा था कि प्रकाश को वहाँ देखा है। जाते विद्यार्थियों के सामने प्रधानाचार्य ने चौकीदार का बैग खोला। खाना सड़क पर गिरा। किसी ने रोटी पर पैर रख दिया।
अगली सुबह कप बंद अभ्यास-कक्ष की अलमारी में मिला। स्कूल ने निजी माफी भेजी। उन्हीं बच्चों को बुलाकर सच नहीं बताया गया।
प्रकाश ने पत्र नौकरी की पुस्तिका में रखा। रोहन ने हँसी भीतर रख ली।
अब वीरेन ने रमी की तैयार मेजों की ओर इशारा किया। पुराने विद्यार्थियों के क्लब का वार्षिक फाइनल था। वह दो बार जीत चुका था। प्रवेश पर उसकी तस्वीर लगी थी।
“ध्यान से देखना,” उसने कहा। “कुछ जगह परिवार का स्तर पता चल जाता है।”
रोहन ने पिता का नामपत्र वापस रखा।
“मैं देखने नहीं आया हूँ।”
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2. वह निमंत्रण जो उसने कमाया था
वीरेन ने फाइनल की सूची खुद देखी। रोहन का नाम चौथा था। दो खुले शुरुआती आयोजनों के नतीजों से वह योग्य हुआ था। आयोजक ने दया में जगह नहीं दी थी। अंकों ने दिलाई थी।
“मुझे बता सकते थे,” वीरेन बोला।
“तुमने कभी पूछा नहीं कि मैं क्या खेलता हूँ।”
रोहन रेलवे में टिकट बुकिंग का काम करता था। वर्षों से वयस्क पड़ोसियों के साथ रमी खेलता आया था। पहले साधारण बैठकों में, फिर व्यवस्थित क्लब मुकाबलों में। नियम जानता था, लेकिन कभी नियम जानने को अच्छे फैसले लेने की क्षमता समझ बैठता था। शुरुआती प्रतियोगिता पर्चियाँ दंड अंकों से भरी थीं।
समारोह से छह महीने पहले पुराने सहपाठी ने वीरेन की पिछले साल के कप वाली तस्वीर भेजी। नीचे टिप्पणी थी कि कुछ लोग घर से अनुशासन सीखते हैं, स्कूल के फाटक से नहीं।
रोहन ने जवाब नहीं दिया। प्रवेश की शर्तें छाप लीं।
पिता ने कभी बदला माँगा नहीं था। एक बार प्रधानाचार्य का सामना करने की बात पर प्रकाश ने पूछा था, माफी चाहिए या अपने अपमान के लिए एक और भीड़?
सवाल अब भी चुभता था। रोहन ने पुराने सुधार-पत्र की प्रति निकालकर सचिव को अलग से भेज दी थी। सचिव अपना काम करता तो रिकॉर्ड सुधरता।
फाइनल दूसरी बात तय करता: वीरेन उस आदमी को हरा सकता था या नहीं, जिसे वह अब भी बराबरी से देखने को तैयार नहीं था।
3. बुरी खबरों की सैंतीस पर्चियाँ
रोहन ने पुरानी स्कोर-पर्चियाँ जुटाईं। मोड़कर रखी मेज के ऊपर सैंतीस हारें लगाईं। तारीख के बजाय गलती के अनुसार बाँटा।
एक ढेर घोषणा का था। सुंदर सीक्वेंस देखकर उसने दूसरे अवैध सेट को अनदेखा किया था। दूसरा लगाव का था। अच्छी शुरुआत छोड़ना बुरा लगता, इसलिए महँगे अकेले पत्ते पकड़े रखे। तीसरा गुस्से का था। अक्सर बहस, ताने या खराब सफर के बाद ऐसी पर्चियाँ बनती थीं।
वह सब अभ्यास समूह ले गया। कोई अकेला गुरु उसे बचाने नहीं आया। सेवानिवृत्त लेखाकार हिसाब पूछता। ड्यूटी के बीच खेलने वाली नर्स उसकी याददाश्त जाँचती। छियालीस वर्षीय अध्यापक बिना किस्मत खराब कहे फैसला समझाने को कहता।
वे सीटें बदलते और आने वाले फाइनल जैसे प्रकाशित अंकों पर खेलते। कम संयुक्त दंड जीतता था। हाथ जीतने पर शून्य मिलता; बाकी पत्तों का दंड आयोजन के नियम से जुड़ता। रोहन ने हर हाथ को अपनी कीमत का फैसला माने बिना अंकतालिका पढ़ना सीखा।
एक शाम पाँच हाथ हारकर भी उसने पूरे सत्र पर नियंत्रण नहीं खोया। दो बार नुकसान घटाया था और एक बार संदिग्ध घोषणा रोकी थी।
अध्यापक ने उन फैसलों पर गोला बनाया।
“अब यही तब करना, जब सामने वह बैठा हो जिससे तुम्हें नफरत है।”
रोहन ने सामने की खाली कुर्सी देखी। अभ्यास समूह उसे सब दे सकता था, उस पल का धैर्य उधार नहीं दे सकता था।
4. वह सीक्वेंस जो आता ही नहीं था
सबसे उपयोगी अभ्यास में 6♣–7♣, तीन बिखरे बड़े पत्ते और पान का पूरा सीक्वेंस मिला। रोहन ने 5♣ या 8♣ मिलने की कल्पना की। फिर रानियों का सेट सोचा। फिर दूसरी संभावना दिखी। देखते ही देखते वह लगभग हर पत्ता बचा रहा था।
उसकी कल्पना में हाथ शानदार होता गया। प्रतिद्वंद्वी असली पत्ते खेलते रहे।
वह बुरी तरह हारा।
समूह ने वही शुरुआत दोबारा रखी और आगे अलग पत्ते दिए। एक बार पहला विचार सफल हुआ। दूसरी बार हीरे के नए जुड़े पत्ते बेहतर निकले। तीसरी बार कुछ नहीं बना। तब प्राकृतिक सीक्वेंस बचाते हुए अधूरे बड़े पत्ते घटाना ही उपयोगी काम था।
उसने लिखा: रास्ता होना, मंजिल की गारंटी होना नहीं है।
अभ्यास कम चमकदार हुआ। वह तेरह पत्ते समूह-दर-समूह जाँचता। मन में एक ही पत्ते को दो संयोजनों में रखना छोड़ा। समझा कि प्रतिद्वंद्वी का छोड़ा पत्ता उठाना उस पत्ते में रुचि बताता है, उसका पूरा छिपा हाथ नहीं।
देर की ड्यूटी के बाद सुबह तक जागने के बजाय चालीस मिनट अभ्यास किया। सप्ताह में एक बार पूरे आठ हाथ खेले। प्रतीक्षा की ऊब और पीछे होने की खीझ भी अभ्यास में शामिल थीं।
आखिरी तैयारी मुकाबले में तीन हाथ बाद साठ अंक पीछे था।
अंत में नौ अंक से हारा।
पहली बार हार का छोटा हुआ अंतर बता रहा था कि मेहनत काम कर रही है।
5. आठ हाथ, बचने का रास्ता नहीं
फाइनल में चार खिलाड़ियों की एक मेज पर आठ हाथ थे। सभी शून्य से शुरू हुए। आयोजक ने अंक की शर्तें पढ़ीं, पर्चियाँ सामने रखीं और दर्शकों को खेल के दौरान शांत रहने को कहा।
रोहन के सामने वीरेन था। पास विद्यालय प्रशासक लता और तीन बार फाइनल पहुँचकर भी न जीता अब्बास थे। दोनों किसी पुराने स्कूल के झगड़े में सहायक पात्र बनने नहीं आए थे।
वीरेन ने कैमरे के लिए हाथ बढ़ाया। उसकी पकड़ जरूरत से एक पल अधिक कसी।
“उम्मीद है भावुकता के अलावा भी कुछ लाए हो।”
रोहन ने मेज का नंबर देखा और पर्ची के पास कलम रखी। दर्शकों में पिता का नामपत्र था। बगल की सीट पर बड़ी बहन मीरा बैठी थी।
शुरुआत से पहले सचिव ने प्रकाश के विषय में छोटा सुधार पढ़ा। गायब कप दूसरी जगह मिला था। पुराना शक निराधार था। घोषणा पूरी होने तक वीरेन पत्ते देखता रहा।
उससे सड़क वाला दिन मिट नहीं गया। लेकिन उस कमरे में पुराने झूठ को स्वीकृत सच बने रहने से रोक दिया गया।
लता ने अधिकारी से पूछा कि अब शुरू कर सकते हैं क्या।
रोहन को उसकी अधीरता अच्छी लगी। महीनों से उसने इस कमरे की कल्पना की थी। अब बाईं ओर असली प्रतिद्वंद्वी, दाईं ओर दूसरा और सामने तेरह पत्ते थे। उन्हें उसके आने के कारण से कोई मतलब नहीं था।
6. चौवन अंक पीछे
पहला हाथ वीरेन जीता। घोषणा के असर से अब भी विचलित रोहन अधूरा संयोजन बहुत देर पकड़े रहा था। उसके बहत्तर दंड अंक बने। उसने सहानुभूति वाला चेहरा ढूँढ़े बिना पर्ची पर हस्ताक्षर किए।
दूसरा हाथ लता जीती। रोहन के चौदह और वीरेन के अठारह जुड़े। अब्बास दोनों को देख रहा था, लेकिन उसे अपनी सुधरती स्थिति से अधिक मतलब था।
तीसरा अब्बास जीता। रोहन के दस, वीरेन के चौबीस जुड़े। तीन हाथ बाद रोहन छियानवे और वीरेन बयालीस पर था।
बीच में चौवन अंक थे।
दर्शक ने फुसफुसाकर कहा कि नतीजा समझ आ गया है। मीरा ने सुना। उसकी नजर मेज पर रही।
छोटे अनुमत विराम में रोहन ने दोनों हाथ बहते पानी के नीचे रखे। नौ अंक से हारा अभ्यास मुकाबला याद आया। सवाल यह नहीं था कि चौवन अंक एकदम कैसे लौटेंगे। ऐसी कोई चाल थी ही नहीं। सवाल था कि पहले हाथ की कौन-सी गलती उसने अगले दो में दोहराने से बचाई।
लौटा तो वीरेन दर्शक-सीमा के बाहर दोस्त से खाने की व्यवस्था पर बात कर रहा था।
“अभी तस्वीर तय मत करना,” लता बोली। “पाँच हाथ बचे हैं।”
वीरेन हँसा, पर नजर रोहन पर लौटी।
रोहन बैठ चुका था। वह तस्वीर नहीं, अंकतालिका देख रहा था। उसके पास बहत्तर वाले हाथ को बदलने की शक्ति नहीं थी। चौथे हाथ को वैसा बनने से रोकने की जिम्मेदारी थी।
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7. अंतर का आकार बदलता है
चौथे हाथ में रोहन ने दो प्राकृतिक सीक्वेंस बनाए और फिर सेट पूरा किया। वैध घोषणा से शून्य मिला। वीरेन के अधूरे पत्तों से तीस जुड़े। चौवन का अंतर चौबीस हो गया।
पहली बार वीरेन ने हिसाब दिखाने को कहा।
अधिकारी ने दिखाया। कुछ नहीं बदला।
रोहन उस पल का आनंद लेना चाहता था। अगले हाथ में उलझे पत्ते देखकर उसने ध्यान वापस खींचा। दो जुड़े छोटे पत्तों के पास रखी रानी बचाने का मन हुआ, मानो पास रखे होने से उसका संबंध बन गया हो। उसने रानी अलग की और उपयोगिता अलग जाँची।
पाँचवाँ हाथ वीरेन पहले पूरा कर गया। रोहन के आठ जुड़े। कुल 104 हुआ। वीरेन बहत्तर पर रहा। अंतर फिर बत्तीस हो गया।
कमरे का उत्साह धीमा पड़ा। वापसी सीधी चढ़ती जाए तो ताली देना आसान होता है।
रोहन ने मीरा को नहीं देखा। जानता था कि उसका चेहरा बहुत मेहनत से भरोसा दिलाने की कोशिश करेगा। अगले हाथ में वह किसी और की उम्मीद सँभालना नहीं चाहता था।
अब्बास ने हाथों के बीच जरूरी गड्डी-जाँच माँगी। अधिकारी ने पूरी की। लता ने कुर्सी ठीक की। उनके ध्यान से मेज फिर सामान्य लगी।
रोहन ने खाली कागज का कोना मोड़ा, फिर सीधा किया।
पाँच हाथ पूरे। तीन बाकी। अंकतालिका अब तक जो हुआ उसका रिकॉर्ड थी। आगे क्या होना ही चाहिए, उसका आदेश नहीं थी।
8. चौदह अंक और एक हाथ
छठा हाथ रोहन जीता। वीरेन के बाईस जुड़े। दोनों के कुल 104 और चौरानवे हुए। अंतर अब दस था।
वीरेन ने दर्शकों से बात बंद कर दी।
सातवें हाथ में रोहन की पहली इच्छा बड़ा पत्ता बचाने की थी, जिससे सेट बन सकता था। शुद्ध सीक्वेंस तैयार था, बाकी हाथ असमान। उसने उपलब्ध जोड़ देखे, अकेला पत्ता छोड़ा और छोटे अधूरे समूह को बचाया।
वीरेन ने उससे पहले घोषणा की। रोहन का दंड चार था।
कुल 108 हुआ। वीरेन चौरानवे पर रहा। एक हाथ बाकी और चौदह अंक बीच में। लता तथा अब्बास इतने पास थे कि दोनों में से किसी की बड़ी गलती उनका मौका बन सकती थी।
आखिरी विराम में पानी के पास वीरेन आया।
“तुम्हारे पिता गर्व करते कि यहाँ तक पहुँचे।”
रोहन उसकी ओर मुड़ा। “जब आरोप लगाया था, उनका नाम जानते थे। अब भी बोल सकते हो।”
वीरेन ने मुँह खोला, फिर पास खड़े सचिव को देखा।
“प्रकाश,” उसने कहा।
रोहन ने बोतल बंद की। “हाँ।”
उसने दूसरा भाषण नहीं माँगा। अगला हाथ तैयार हो रहा था। दिन में पहली बार वीरेन लौटने से हिचकता लगा।
मीरा ने पिता का नामपत्र थोड़ा घुमाकर मेज की ओर कर दिया। रोहन ने बैठते समय देखा। फिर हाथ पत्तों के पास रखे और संकेत की प्रतीक्षा की।
9. आखिरी तेरह पत्ते
रोहन ने जल्दी 3♥–4♥–5♥ पूरा कर लिया। उसके पास 7♣–8♣ और अलग सूट के तीन गुलाम भी थे। बाकी हीरे धीरे-धीरे 9♦–10♦–J♦–Q♦ बने। अब चिड़ी का सीक्वेंस अधूरा था और एक अकेला बादशाह था, जिसे जरूरी सुधार आने पर छोड़ना था।
वह 6♣ या 9♣ को बुला नहीं सकता था। वीरेन की चुप्पी से उसके छिपे पत्ते भी नहीं पढ़ सकता था। रोहन असली बारियाँ खेलता रहा। दर्शकों की खामोशी को अद्भुत जानकारी में नहीं बदला।
लता ने उपयोगी छोड़ा पत्ता उठाया। अब्बास ने व्यवस्था बदली। वीरेन ने बिना सिर उठाए नया पत्ता लिया और एक छोड़ा।
फिर रोहन के पास 9♣ आया।
उसने दो बार जाँचा: पान का सीक्वेंस, चिड़ी का सीक्वेंस, J♣–J♥–J♠ और हीरे का चार-पत्ती सीक्वेंस। तेरह पत्ते। अकेला बादशाह छोड़कर उसने घोषणा की।
अधिकारी ने स्वीकार किया।
रोहन 108 पर रहा। वीरेन के अट्ठाईस जुड़े, कुल 122 हुआ। लता 126 और अब्बास 135 पर समाप्त हुए।
अधिकारी ने कुल फिर पढ़े। रोहन जीत गया था।
एक पल कोई नहीं हिला। फिर मीरा उठी। सचिव उठा। उस कतार में तालियाँ फैल गईं जहाँ पिता का नाम रखा था।
वीरेन आखिरी पर्ची देखता रहा। आठ हाथ और आठ हस्ताक्षर। कोई काटी तस्वीर या निजी सफाई इस परिणाम को बदल नहीं सकती थी।
10. दरवाजे से ऊपर आया नाम
प्रस्तुति में वीरेन पुराने सहपाठियों की तस्वीर के लिए रोहन के पास खड़ा होना चाहता था। रोहन ने फोटोग्राफर को रुकने को कहा।
“पहले मीरा। पूरा मुकाबला मेरे साथ रही है।”
बहन पिता का नामपत्र लाई। दोनों ने कप के नीचे साफ दिखाई देता हुआ पकड़ा। उस तस्वीर में किसकी अनुपस्थिति थी, कोई गलत नहीं समझ सकता था।
सचिव ने कुछ शब्द कहने को कहा। रोहन ने लता और अब्बास का नाम लिया। पाँचवें हारे हाथ का उल्लेख किया। उस अभ्यास समूह को धन्यवाद दिया जिसने दिलासा देने के बजाय हारी स्थितियाँ फिर खेलने को कहा था।
फिर उसने वीरेन को देखा।
“मेरे पिता फाटक की रखवाली करते थे। उस काम को सम्मान देने के लिए उन्हें तुम्हारी जरूरत नहीं थी।”
कमरा इतना शांत रहा कि वाक्य बिना सहारे पूरा असर कर सके।
बाद में वीरेन ने धीमे स्वर में माफी माँगी। रोहन ने सुना। दूसरी तस्वीर के लिए हाथ नहीं मिलाया।
पुराने विद्यार्थियों की सूचना में सुधार और पूरा परिणाम साथ आए। रोहन नामपत्र घर लाया और पिता की तस्वीर के पास रखा। मीरा ने उसके नीचे प्रतियोगिता वाली तस्वीर लगाई। इस बार तस्वीर में मौजूद हर व्यक्ति ठीक जानता था कि सामने किसका नाम रखा गया है।
तस्वीर छापने से पहले पूर्व छात्र कार्यालय ने मंजूर विवरण भेजा। वीरेन का सुझाया वाक्य, प्रेरक पृष्ठभूमि, हट गया था। उसकी जगह रोहन का पूरा नाम, पिता का नाम और टूर्नामेंट का नतीजा था।
मीरा ने पढ़कर सुनाया। रोहन ने कोई भाषण जोड़े बिना मंजूरी दी। तस्वीर लगी तो वीरेन बाकी सहपाठियों के साथ उसके नीचे खड़ा था। चौकीदार का नाम दरवाज़े से पढ़ा जा सकता था। इस बार वीरेन को ऊपर देखना पड़ा।
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