Teen Patti Master — हार के बाद पैसे वापस आए
Teen Patti Master

Teen Patti Master — हार के बाद पैसे वापस आए

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

आठ हजार रुपये तब आए जब संदीप अपनी मोटरसाइकिल बेच रहा था। खरीदार कुछ पैसे गिन चुका था। पूछ रहा था कि दूसरी चाबी ठीक से काम करती है या नहीं। संदीप ने फोन की…

आठ हजार रुपये तब आए जब संदीप अपनी मोटरसाइकिल बेच रहा था।

खरीदार कुछ पैसे गिन चुका था। पूछ रहा था कि दूसरी चाबी ठीक से काम करती है या नहीं। संदीप ने फोन की सूचना देखी, फिर मोटरसाइकिल, फिर स्क्रीन पर रकम देखी।

इस्तेमाल न हुए हिस्से की वापसी।

रविवार को उसके सबसे पुराने दोस्त ने कहा था कि एक-एक रुपया डूब गया। सोमवार को वही दोस्त उस आदमी के पास खड़ा था जो चौबीस हजार और माँग रहा था। अब गुरुवार था।

खरीदार चाबी आगे किए जवाब का इंतजार कर रहा था। अगली गली में गाड़ी धोने की मशीन चल रही थी।

“एक मिनट दीजिए,” संदीप ने कहा।

आदमी ने माथा सिकोड़ लिया। “दाम तय हो गया है।”

संदीप ने अग्रिम उसके हाथ में वापस रख दिया। जानता था कि माफी से आने-जाने का खर्च नहीं भरेगा। वह भी दिया। फिर मोटरसाइकिल पर बैठे-बैठे, बिना चालू किए, रकम के पास दिख रहे नंबर पर फोन किया।

* * *

बात एक मैच और हेमंत के संदेश से शुरू हुई थी। पाँच दोस्त मिलकर क्रिकेट पर रकम लगा रहे थे। हर व्यक्ति के आठ हजार। नकुल इंतजाम करेगा। हेमंत ने कहा था कि जोखिम उसी रकम तक है।

यह बात एक बार से ज्यादा हुई थी। संदीप के पास फालतू पैसा कम था। दोस्तों के साथ शाम बिताने के नाम पर कर्ज नहीं लेना चाहता था।

मना कर देना चाहिए था। अब जानता था। तब रकम इतनी छोटी लगी कि मन ललचा जाए और इतनी बड़ी थी कि जाने पर चोट लगे। हेमंत कह रहा था, महीनों बाद सब साथ बैठेंगे।

संदीप इंदौर में डिलीवरी वैन चलाता था। हेमंत बिजली का सामान बेचता था। स्कूल की बेंच साझा की थी। किराए का कमरा साझा किया था। संदीप के पिता के मरने के बाद उनकी अलमारी तीन मंजिल नीचे उतारने का बोझ भी साथ उठाया था।

हेमंत ने कहा कि आगे कोई देनदारी नहीं होगी तो संदीप ने समूह में लिखने को कहा। उसने लिखा, साथ में दोस्त की अनुबंधों में नई दिलचस्पी पर मजाक किया।

सबने हँसने वाले निशान भेजे। संदीप ने आठ हजार भेज दिए।

* * *

मैच नकुल की दुकान के पीछे किराए के कमरे में देखा। प्लास्टिक की कुर्सियाँ थीं, उधार की स्क्रीन थी। क्रिकेट से ज्यादा पैसे की चर्चा थी।

संदीप को उम्मीद जितना मजा नहीं आया। हेमंत बार-बार फोन देखता रहा। नकुल दो बार बाहर गया। दोनों बार ऐसे चेहरे के साथ लौटा जैसे इतना महत्वपूर्ण काम किया हो कि समझाने का समय न हो।

जिस टीम पर उनकी उम्मीद थी वह हार गई। संदीप चाहता रहा कि आखिरी मिनट पहले की सारी बात बदल दें। उस इच्छा की बेवकूफी उसे परिचित लगी।

वह उठा और घर जाने को कहा। नकुल ने पूछा, कहाँ जा रहा है?

“घर।”

“हिसाब करना है।”

संदीप ने कहा, अपना हिस्सा दे चुका है। नकुल ने हेमंत को ऐसे देखा जैसे बड़े लोगों की बातचीत में वह कोई बच्चा ले आया हो।

हेमंत ने कंधे पर हाथ रखा। “बैठो। थोड़ी गड़बड़ हो गई है।”

* * *

नकुल ने कहा, शाम के दौरान और रकम की जिम्मेदारी ली गई थी। कुल नुकसान एक लाख साठ हजार हुआ। पाँच में बाँटें तो बत्तीस हजार प्रति व्यक्ति। आठ के बाद चौबीस और देने हैं।

संदीप ने पूछा, किसने सहमति दी?

नकुल बोला, सब कमरे में थे।

“कमरे में होना सहमति देना नहीं होता।”

हेमंत ने आवाज नीची रखने को कहा। संदीप को पता ही नहीं चला था कि ऊँची हो गई है। उसने सीमा वाला संदेश खोला। नकुल ने पढ़े बिना फोन की तरफ हाथ हिलाया। मैच के दौरान योजना बदलती है। सब समझते हैं।

संदीप नहीं समझता था। बाकी दो आदमी प्लेटों की तरफ देखने लगे। पाँचवाँ, तारिक, बेटी की तबीयत खराब होने से जल्दी चला गया था। नकुल ने कहा, उसका हिस्सा अलग निपटा लेगा।

संदीप ने अतिरिक्त माँग मना कर दी। घर निकला तो हेमंत दरवाजे तक साथ आया। अब भी उसे थोड़ी गड़बड़ कह रहा था।

* * *

अगली सुबह नकुल डिलीवरी डिपो आ गया। शुरुआत में चिल्लाया नहीं। पर्यवेक्षक से पूछा, संदीप अपनी जिम्मेदारियों के बारे में हमेशा इतना गैरभरोसेमंद रहता है क्या? ड्राइवर सामान देखना छोड़कर सुनने लगे। किसी ने क्लिपबोर्ड नीचे कर लिया।

संदीप का चेहरा गर्म हो गया। उसने नकुल को काम की जगह से जाने को कहा। जवाब मिला, इज्जतदार आदमी के पीछे काम तक नहीं आना पड़ता।

दस मिनट बाद हेमंत आया। कहने को बात शांत करने। संदीप को खड़ी वैन के पीछे ले गया।

“दे दो। बाद में सब समझ लेंगे।”

“कहाँ से?”

“गाड़ी है तुम्हारे पास।”

मोटरसाइकिल छह साल से उसे सुबह की पालियों तक पहुँचाती थी। हेमंत इंजन की खास खाँसी जानता था। अपनी स्कूटर खराब होने पर माँगकर ले गया था।

संदीप उसे देखता रह गया। हेमंत ने नजर हटाई और कहा, बाइक से बुरी चीजें भी खो सकती हैं।

* * *

पर्यवेक्षक ने चेताया कि फिर ऐसा हुआ तो पालियों पर असर पड़ेगा। वह कथित कर्ज का फैसला नहीं कर रही थीं। अनजान लोगों से गाड़ियाँ निकलने का काम नहीं रुकवा सकती थीं। इस फर्क से आँखों के पीछे का दर्द कम नहीं हुआ।

संदीप ने मौसी कमला से चौबीस हजार लिए। रसोई की टपकती दीवार के लिए बचाए थे। कहा, मोटरसाइकिल बेचकर हफ्ते के भीतर लौटा देगा।

उन्होंने पूछा, पूरी बात बता रहा है?

उसने मूल रकम, हार और नई माँग बताई। रकम बोलकर सुनाने से और बुरा लगा। कमला ने यह कहकर दिलासा नहीं दिया कि कोई भी ऐसा कर सकता था।

“अपनी रकम का जोखिम तुमने माना,” उन्होंने कहा। “बाद में रकम वे क्यों चुन रहे हैं?”

उसके पास समझदार जवाब नहीं था। भुगतान इसलिए किया कि वे कार्यस्थल से हटें। हेमंत बार-बार वादा कर रहा था कि दबाव कम होते ही समझा देगा।

* * *

मंगलवार को हेमंत ने मोटरसाइकिल का खरीदार सुझाया। बुधवार को संदेश भेजकर याद दिलाया कि कमला के पैसे लौटाने में देर न करे। ध्यान रखने वाला संदेश था। बाद में वही बात और बुरी लगी।

गुरुवार को आठ हजार वापस आए।

फोन उठाने वाली मीनल थी, नकुल की चचेरी बहन। दुकान के हिसाब में मदद करती थी। उसे मैच वाली शाम के इस्तेमाल न हुए हिस्से लौटाने को कहा गया था। संदीप ने चौबीस हजार अतिरिक्त बताए तो आवाज बदल गई।

“उसके बारे में नहीं पता।”

उसने पूछा, उसके मूल भुगतान के बारे में मिला निर्देश भेज सकती है? मीनल ने कहा, देखेगी कि क्या साझा कर सकती है, फिर फोन करेगी।

संदीप ने पूरा इंतजाम समझाने को मजबूर नहीं किया। रिकॉर्ड न मिटाने और भेजी रकम का विवरण न बदलने को कहा।

फिर हेमंत को फोन किया।

* * *

हेमंत ने पाँचवीं बार उठाया।

“कुछ रकम का हिसाब बदला होगा।”

“आठ हजार। मेरा पूरा पहला हिस्सा।”

“अच्छा है। अब उतनी खराब हालत नहीं है।”

संदीप देख रहा था कि खरीदार की खाली जगह के पास से लड़का साइकिल धकेलकर ले जा रहा है।

“मेरा हिस्सा इस्तेमाल हुआ था?”

“नकुल से पूछना पड़ेगा।”

“उससे पूछ रहा हूँ जिसने कहा सब डूब गया।”

हेमंत ने कहा, तब जो बताया गया था वही कहा। कुछ पैसे लौटे हैं तो दोस्तों के पीछे पड़ने की जरूरत नहीं।

बरसों से यह शब्द संदीप को रोक देता था। दोस्त। उसमें अलमारी थी, स्कूल की बेंच थी, वे शामें थीं जब दूसरे किसी ने फोन नहीं उठाया और हेमंत ने उठाया।

इस बार उसने अपनी कथित सहमति और भुगतान के इस्तेमाल का रिकॉर्ड माँगा। हेमंत बोला, ऐसे पेश आ रहा है जैसे वे अपराधी हों।

संदीप ने इस वर्णन का जवाब नहीं दिया। रिकॉर्ड की माँग दोहराई।

* * *

बाकी लोगों में पहले तारिक से बात हुई। उसके आठ हजार भी लौटे थे। नकुल ने कहा था, रकम लगाने के इंतजाम में समस्या हुई। उसका हिस्सा बताए गए तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। उससे अतिरिक्त पैसा माँगा ही नहीं गया था।

“कहा था सबको पता है,” तारिक बोला।

संदीप कमला की रसोई में बैठा था। दीवार के पास बाल्टी में पानी टपक रहा था। उसने तारिक से केवल अपनी भागीदारी और वापसी वाले संदेश भेजने को कहा। तारिक मान गया। दूसरे आदमियों के बारे में अंदाजे आगे नहीं भेजे।

बाकी दोनों ने अलग बातें बताईं। एक ने अतिरिक्त माँग चुकाई थी। दूसरे ने नहीं। किसी ने एक लाख साठ हजार के नुकसान का रिकॉर्ड नहीं देखा था। तय सीमा बढ़ाने की सहमति भी नहीं दी थी।

इससे हर भुगतान नहीं समझ आ गया। लेकिन नकुल के बोले कुल को स्थापित तथ्य मानना रोकने के लिए काफी था।

* * *

कमला ने पास कॉपी रख दी।

“जो दिया लिखो। फिर जो जानते हो लिखो।”

उसने आठ हजार लिखे। फिर चौबीस हजार। कुल बाहर गए बत्तीस। वापस आए आठ। अभी बाहर चौबीस।

अलग पन्ने पर हर व्यक्ति की बात लिखी। जिन दावों की पुष्टि नहीं थी, उनके पास कारण भरने के बजाय जगह खाली छोड़ी।

शाम को मीनल ने फोन किया। अपने किए भुगतान और मूल हिस्से को इस्तेमाल न हुआ बताने वाले निर्देश की पुष्टि कर सकती थी। उचित जाँच में रिकॉर्ड देगी। दुकान का हिसाब समूह की बातचीत में फैलाने के लिए तैयार नहीं थी।

संदीप मान गया। कमला ने कुल देखा।

“और मेरा पैसा?”

“अब भी चौबीस।”

“ठीक। कम दुखने के लिए आठ हजार को दो बार वापस मत गिन लेना।”

खाने के लिए उसने कॉपी बंद कर दी। उस हफ्ते पहली शाम इतना खाया कि भोजन का स्वाद महसूस हुआ।

* * *

नकुल ने शनिवार को दुकान बुलाया। संदेश में कहा, सब होंगे। मर्दों की तरह गलतफहमी सुलझा लेंगे। हेमंत ने अलग से किसी को शर्मिंदा न करने को लिखा।

संदीप निमंत्रण समझ गया। कुर्सियाँ होंगी, दर्शक होंगे। भुगतान के बजाय उसके चरित्र पर बहस होगी। वह नहीं गया।

स्थानीय परामर्श सेवा के वकील की सलाह से सामग्री व्यवस्थित की। विवादित वसूली और कार्यस्थल पर दबाव की औपचारिक शिकायत की। अपनी भागीदारी भी बताई। ऐसा नहीं बनाया कि शुरू में रकम लगाई ही नहीं थी।

मीनल और बाकी लोगों के नाम संबंधित रिकॉर्ड रखने वालों के तौर पर दिए। यह दावा नहीं किया कि उन्होंने उसकी हर बात का समर्थन किया है।

प्राप्ति के कागज सँभाले। लिखकर कहा कि आगे की बातचीत असली दावों पर हो, नियोक्ता के यहाँ पहुँचने पर नहीं।

साधारण कामकाजी दिन का काम था। उसने सोचा था, ज्यादा शोर वाला महसूस होगा।

* * *

पहला जवाब गुस्सा था। नकुल बोला, हिसाब में देर पर दोस्ती तोड़ दी। हेमंत ने कहा, बाहरी लोग बात खराब करें उससे पहले शिकायत वापस लेने का समय है।

संदीप ने पूछा, इस्तेमाल न हुए हिस्से को पूरा नुकसान क्यों बताया? अतिरिक्त वसूली सबके लिए समान क्यों नहीं थी?

दोनों सवालों का जवाब किसी ने नहीं दिया।

फिर नकुल ने बारह हजार तुरंत देने की पेशकश की। बदले में सब निपट जाने का बयान चाहिए था। आठ पहले लौट चुके हैं, इसलिए इसे उदारता बताया।

संदीप जवाब से पहले प्रस्ताव सलाह देने वाले के पास ले गया। माँग अब भी अस्पष्ट वसूली के चौबीस हजार की थी। जो लौटे उसका साफ रिकॉर्ड चाहिए था। एक और मौखिक आश्वासन को घटना का अकेला प्रमाण नहीं बनाना था।

डिपो में पर्यवेक्षक से अलग बात की। बताया कि माँग पर विवाद दर्ज किया है और परेशान किए जाने को रोकने के कदम लिए हैं। छूटी पाली वापस नहीं मिली। लेकिन आगे आने वालों को माल भेजने वाली जगह से दूर करने की बात हुई।

* * *

रविवार को हेमंत कमला के घर आया। संतरे लाया था। उन्होंने रसोई में रखे और दोनों को मेज पर छोड़ दिया। बाल्टी की जगह उथली ट्रे थी, क्योंकि गीले हिस्से के नीचे ज्यादा ठीक बैठती थी।

हेमंत बोला, सारी जानकारी नहीं थी। फिर कहा, नकुल से उसे पैसे लेने थे और अतिरिक्त वसूली को सही माना था।

संदीप ने पूछा, उसके दिए पैसे में से कुछ उस उधार में गया था?

हेमंत ने ट्रे देखी।

“आठ हजार।”

रकम फिर आई, इस बार दूसरे अर्थ के साथ।

दोस्त वैन के पीछे खड़ा रहा था। मोटरसाइकिल बेचने को कहा था। मौसी को लौटाने की याद दिलाई थी। उसी समय उससे वसूले पैसे का हिस्सा स्वीकार कर लिया था।

“बताने वाले थे?”

हेमंत ने कहा, अपनी हालत सुधरते ही लौटाना चाहता था। यह बताने वाले सवाल का जवाब नहीं था।

* * *

बाद में संदीप ने बातचीत लिखी और शिकायत देखने वाले को नई जानकारी दी। रसोई को छिपा हुआ प्रसारण नहीं बनाया। हेमंत ने बाद में आठ हजार लिखकर स्वीकार किए और लौटाए।

संदीप ने प्राप्ति की पुष्टि की। पूरा मामला निपट जाने की नहीं। अब विवादित रकम सोलह हजार बची।

रिकॉर्ड देखे जाने पर नकुल की सफाई बदली। उसने अब यह नहीं कहा कि बड़े दायित्व को संदीप ने निजी तौर पर स्वीकार किया था। साझा नुकसान के दावे उससे की गई वसूली का हिसाब नहीं देते थे।

अगले हफ्तों में सोलह हजार दो दर्ज भुगतानों से लौटे। शामिल लोगों के आचरण के सवाल अलग चलते रहे। संदीप ने नहीं माना कि वापसी से मूल माँग सही साबित हो जाती है।

बत्तीस हजार दिए। आठ पहले लौटे। आठ हेमंत से। सोलह नकुल से।

अपना पैसा वापस था। छूटी पालियाँ और रुकी हुई मोटरसाइकिल की बिक्री का खर्च अपने आप नहीं मिटा।

* * *

कमला का पूरा पैसा लौटाया। मामला चलते समय मोटरसाइकिल बेचने का वही वादा दोहराने के बजाय उनके साथ लौटाने का वास्तविक समय तय किया था। अंतिम रकम पहुँची तो दोनों ने साथ जाँची।

उन्होंने दीवार की मरम्मत बुक कर दी। आदमी उस दिन आए जब संदीप मेज हटाने में मदद कर सकता था। नीचे हेमंत की मुलाकात में गिरा बोतल का ढक्कन मिला। किसी को दिखाए बिना कूड़े में डाल दिया।

कमला ने पूछा, कॉपी रखनी है?

रखनी थी। काम के रिकॉर्ड थे। बाकी जिंदगी मेज पर खुली रखने की जरूरत नहीं थी।

एक हफ्ते बाद समूह में फिर संदेश आने लगे। किसी ने दूसरा मैच साथ देखने को कहा। किसी ने कहा, पुराने दोस्तों के बीच पैसे को नहीं आने देना चाहिए।

संदीप ने पढ़े। मौजूदा मामले के लिए जरूरी हिस्सा सुरक्षित किया और समूह छोड़ दिया।

* * *

अगले महीने हेमंत डिपो के बाहर मिला। इस बार फाटक से बाहर रहा। पूछा, कम से कम चाय पी सकते हैं?

संदीप ने मुलाकात कई बार सोची थी। किसी कल्पना में चिल्लाता था। किसी में ऐसा तीखा वाक्य कहता कि हेमंत आखिर सब समझ जाए।

असली दोपहर गर्म थी। वैन हटानी थी। खाना देर से हुआ था।

“आज नहीं।”

हेमंत ने पूछा, कोई और दिन होगा?

“पता नहीं।”

यही सच था। जिस आदमी ने इतने पल कठिन किए, उसका एक कठिन पल आसान बनाने के लिए दोस्ती वापस मिलने का वादा नहीं करेगा। पर्यवेक्षक ने बुलाया तो फाटक से अंदर चला गया। निकलने से पहले काम खत्म करना था।

* * *

शाम मोटरसाइकिल दूसरी कोशिश में चालू हुई। संदीप कमला के यहाँ डिब्बा लेने रुका। रसोई की दीवार सूखी थी। मेज खिड़की के नीचे वापस रखी थी। वह शिकायत कर रही थीं कि रंग करने वाला स्विच पर निशान छोड़ गया है।

उन्होंने खाना बाँधा, उसने निशान साफ किया। घर जाते समय चाय की दुकान पर क्रिकेट चल रहा था। रुका, चाय ली और ऐसी जगह खड़ा हुआ जहाँ स्क्रीन दिखे। तारिक बेटी के साथ आया। पूछा, अगला स्टूल खाली है?

संदीप ने हेलमेट हटा लिया। मैच चलता रहा, वे लड़की के स्कूल प्रोजेक्ट पर बात करते रहे। उसने चलने को कहा तो तारिक ने अपने पेयों का हिसाब दिया और उठ गया। किसी ने नहीं कहा कि जल्दी जाने से देनदारी बदलती है।

संदीप ने चाय पूरी की, अपना बिल माँगा और मोटरसाइकिल की तरफ चला गया।

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