Top One — उसकी सगाई में ड्राइवर
Top One

Top One — उसकी सगाई में ड्राइवर

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

रवि के हाथ में फूलों का गुलदस्ता था, जब प्रिया ने फोटोग्राफर से कहा कि वह ड्राइवर है। “इन्हें छोड़िए। पहले परिवार की तस्वीर ले लीजिए।” फोटोग्राफर ने कैमरा…

रवि के हाथ में फूलों का गुलदस्ता था, जब प्रिया ने फोटोग्राफर से कहा कि वह ड्राइवर है।

“इन्हें छोड़िए। पहले परिवार की तस्वीर ले लीजिए।”

फोटोग्राफर ने कैमरा नीचे कर लिया।

रवि ने प्रिया को देखा। प्रिया की नज़र फूलों पर थी।

तीन साल में उसने कई बार उससे कहा था—पापा से मिलना हो तो दाढ़ी बनाकर आना, फीके कॉलर वाली कमीज़ मत पहनना, हर बार बेकरी की बातें मत करने लगना। आज सुबह उसने जल्दी आने को कहा था। उसके पिता कोई ज़रूरी घोषणा करने वाले थे।

इसीलिए रवि ने नई सफेद कमीज़ खरीदी थी।

“इन्हें कहाँ रखूँ?” उसने पूछा।

“दरवाज़े के पास। और यहाँ मत खड़े रहो, प्लीज़।”

पीछे एक वेटर ने हॉल के दरवाज़े खोले। सफेद गुलाबों की दीवार के सामने दो नाम चमक रहे थे।

प्रिया और अरमान।

रवि ने दोबारा पढ़ा।

वह उनतीस साल का था। प्रिया को तब से जानता था जब वह चौबीस की थी। उसे मालूम था कि गर्म कप पकड़ते समय वह दोनों हथेलियाँ इस्तेमाल करती है। उसके घर की कौन-सी सीढ़ी चरमराती है। पिता का फोन बंद मिले तो उसे कितना डर लगता है।

बस यह नहीं मालूम था कि आज उसकी सगाई है।

किसी ने उसके सीने से गाड़ी की चाबी लगा दी।

“सिल्वर वाली गाड़ी। डिक्की में बैग हैं।”

सामने लगभग उसी की उम्र का आदमी था। उसकी घड़ी का पट्टा रवि के जूतों के चमड़े से भी मुलायम लग रहा था।

अरमान।

प्रिया ने कुछ कहने को मुँह खोला, फिर बंद कर लिया।

रवि ने इंतज़ार किया। वह बताएगी कि गलती हुई है।

“प्लीज़,” उसने कहा। “मेहमान आए हुए हैं।”

रवि फूल लेकर दरवाज़े की तरफ चला गया। गीले कागज़ से नई कमीज़ पर पानी फैल गया।

* * *

सात हफ्ते पहले प्रिया ने पिता के दफ्तर के बाहर से फोन किया था।

“ऊपर मत आना,” उसने धीरे से कहा था। “पापा बहुत शर्मिंदा हैं।”

रवि ऊपर चला गया था।

मोहन सेठी मेज़ पर दोनों हाथों में चेहरा छिपाए बैठे थे। सप्लायरों का भुगतान रुका था। बड़ा ऑर्डर रद्द हो गया था। शुक्रवार तक पैसे नहीं मिले तो लोग घर आ जाएँगे, उन्होंने कहा।

प्रिया चुपचाप रो रही थी।

रवि कुछ समय से माँ की छोड़ी छोटी बेकरी बेचने के बारे में सोच रहा था। ओवन बदलने थे। एक बड़े कारोबार में रसोई का काम भी मिल रहा था। मोहन ने कहा था कि उनके पैसे आते ही रवि के लिए बेहतर जगह देखेंगे।

“साथ में,” प्रिया ने कहा था।

खरीदार ने लिखित समझौते के तहत सात लाख रुपये अग्रिम दिए। पूरा सौदा होना बाकी था। नाप लेने के लिए रवि ने अस्थायी तौर पर दुकान की चाबियाँ दे दीं और पैसे मोहन को भेज दिए।

बैंक की रसीद संभालकर रखी।

अविश्वास की वजह से नहीं।

माँ के जाने के बाद से वह हर कागज़ रखता था। उसे डर था कि कहीं कोई ज़रूरी चीज़ सिर्फ इसलिए न खो दे कि उसे उसकी अहमियत समझ नहीं आई।

मोहन ने अपने दफ्तर के लेटरहेड पर कर्ज़ मिलने की पुष्टि लिखकर दस्तखत किए थे।

“तुम तो परिवार के ही हो,” उन्होंने कहा था।

आज वही आदमी उसे सर्विस लिफ्ट के पास रोक रहा था।

“तुम जो भी समझ रहे हो, यहाँ बात करने की जगह नहीं है।”

“हुआ क्या है?”

मोहन ने हॉल की ओर देखा।

“तुमने मदद की। हम एहसान मानते हैं।”

“प्रिया ने कहा था—”

“परेशानी में इंसान बहुत कुछ बोल देता है।”

एक ट्रॉली बीच से निकली। रवि रास्ते से हट गया। मोहन वहीं खड़े रहे।

“आपने मुझसे सात लाख उधार लिए थे।”

“लौटा दूँगा। शांति से। मदद करके तमाशा मत बनाओ।”

अंदर तालियाँ बजने लगीं।

मोहन ने कोट सीधा किया।

“पहले बैग ले आओ। बाद में बात करेंगे।”

* * *

प्रिया ड्रेसिंग रूम के पास मिली। वह एक कान में झुमका पहन रही थी। दूसरा मेज़ पर पानी की बंद बोतल के पास रखा था।

“कब से?” रवि ने पूछा।

“रवि।”

“तुम्हें कब से पता था?”

उसने शीशे में खुद को देखा।

“पापा ने अगस्त में मिलवाया था।”

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अगस्त। उस फोन से पहले। पैसे देने से पहले।

“तुमने मुझे दुकान बेचने दी।”

“तुम खुद बेचना चाहते थे।”

“तुम्हारे घर की मदद के लिए।”

“किसी ने मजबूर तो नहीं किया।”

रवि चुप हो गया।

प्रिया ने दूसरा झुमका उठाया। पहली बार सही नहीं बैठा। उसने फिर कोशिश की।

“तुम अच्छे इंसान हो। लेकिन हमारे बीच आगे भी दिक्कतें आतीं।”

“कैसी दिक्कतें?”

“हमारी ज़िंदगी अलग है। हमारी चाहतें अलग हैं। हर बात पैसों पर खत्म नहीं हो सकती।”

रवि के मुँह से छोटी-सी हँसी निकली। उसे खुद अजीब लगी।

दरवाज़े पर दस्तक हुई। प्रिया ने आधा दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गई।

रवि मेज़ के पास खड़ा रहा।

होटल में उस पानी की बोतल की कीमत शायद उसके छोड़े हुए दोपहर के खाने से भी ज़्यादा थी।

उसने बोतल खोलकर पानी पी लिया।

* * *

वह जा रहा था कि अरमान ने बुला लिया।

कुछ रिश्तेदार उसके फोन पर तस्वीर देख रहे थे। बाकी दुकान दिखने से पहले ही रवि ने हरे शटर पहचान लिए।

माँ की दुकान।

“इसके लिए छोटा-सा डेज़र्ट प्लेस बनवा रहे हैं,” अरमान ने कहा। “व्यस्त भी रहेगी।”

एक महिला प्रिया की ओर मुस्कराई।

“कितना खयाल रखता है।”

अरमान ने तस्वीर बड़ी की।

“पूरा इंटीरियर बदलना पड़ेगा। पुराने मालिक ने कुछ किया ही नहीं।”

“वह काउंटर मेरी माँ ने बनवाया था,” रवि बोला।

बातचीत रुक गई।

अरमान ने ध्यान से उसे देखा।

“अच्छा। तुम हो।”

मोहन तुरंत आ गए।

“रवि पहले यही दुकान चलाता था।”

“पहले?” रवि ने पूछा। “बाकी भुगतान हुआ नहीं है।”

अरमान ने ऐसे मुस्कराकर दूसरों को देखा जैसे कोई असुविधाजनक मज़ाक हो गया हो।

“ये सब ऑफिस देखता है।”

“मेरी चाबियाँ आपके एजेंट के पास हैं।”

“पैसे मिल जाएँगे।”

प्रिया ने रवि की बाँह पकड़ ली।

“बस करो।”

रवि ने उसकी उँगलियाँ देखीं।

बरसों से इतना छूना उसे रोकने के लिए काफी था।

उसने उसका हाथ हटा दिया।

“पापा से पूछो, अग्रिम के पैसे कहाँ गए।”

मोहन का चेहरा बदल गया।

“बहुत हो गया।”

अरमान की निगाह रवि की गीली कमीज़ से जूतों तक गई।

“शाम का काम कम पड़ रहा है तो होटल वालों से बात करो। यहाँ इसे शर्मिंदा मत करो।”

रवि ने जेब से अपनी चाबियाँ निकालीं। गुच्छे में छोटी पीतल की चाबी बची थी—बेकरी के पिछले दरवाज़े की।

उसने मुट्ठी बंद की और बाहर चला गया।

कोई पीछे नहीं आया।

* * *

किराए के कमरे में वह कमीज़ के बटन नहीं खोल पा रहा था। उँगलियाँ काँप रही थीं।

बिस्तर के किनारे बैठा रहा। हाथ शांत हुए तो शालिनी मौसी को फोन किया।

वह चावल और दाल का स्टील का डिब्बा लेकर आईं। उन्होंने मजबूत बनने को नहीं कहा। पहले खाना खिलाया।

फिर सारे कागज़ बिस्तर पर फैलाए।

बिक्री का समझौता। बैंक ट्रांसफर। मोहन की लिखी पावती। नाप लेने वाले संदेश।

“कल,” उन्होंने कहा, “किसी जानकार से पूछेंगे।”

अगले दिन वकील देविका ने बिना टोके सब पढ़ा।

उन्होंने दुकान वापस मिलने का वादा नहीं किया।

समझाया कि अधूरा सौदा भी सौदा होता है। दिए जा चुके पैसे गायब नहीं हो सकते। कब्ज़ा और कागज़ ठीक करने के लिए सहमति या उचित प्रक्रिया चाहिए।

खरीदार के रूप में अरमान की कंपनी का नाम था।

रवि पन्ने को देखता रहा।

“उसे पता था।”

देविका ने मोहन की पावती उठाई।

“यह अलग मामला है।”

“अग्रिम लौटाने के लिए मुझे यही पैसे चाहिए।”

“हाँ।”

“और उन्हें यह भी पता है।”

उन्होंने तुरंत उत्तर नहीं दिया।

बाहर एक डिलीवरी वाला गलत पते पर किसी से बहस कर रहा था।

“अभी क्या करूँ?” रवि ने पूछा।

“कागज़ संभालिए। फोन पर बहस बंद कीजिए। पहले मुझे लिखने दीजिए।”

उसने मौसी से शुरुआती खर्च के लिए उधार लिया, रसोई में अतिरिक्त शिफ्टें कीं और इंतज़ार किया।

मोहन का उत्तर नहीं आया।

* * *

तीन हफ्ते बाद हरीश बत्रा उस रेस्तराँ में आए जहाँ रवि काम करता था।

पंद्रह साल तक उन्होंने रवि की माँ से ब्रेड खरीदी थी। रसोई के दरवाज़े से रवि दिखा तो उसके ब्रेक तक रुके रहे।

“दुकान का क्या हुआ?”

रवि ने जितने कम शब्दों में हो सकता था, बताया।

हरीश कोट बाँह पर रखे सुनते रहे।

“अब यहाँ काम करते हो?”

“अभी।”

“तीन पत्ती अब भी खेलते हो?”

रवि को पहले लगा कि मज़ाक हो रहा है।

हरीश ने चेहरा देखकर सिर हिलाया।

“मोहल्ले वाली शामें याद हैं। तुम्हारी माँ कप ताश से दूर रखवाती थीं।”

रवि को भी याद थीं। काउंटर पर बेलन, मक्खन की खुशबू, माँ का हरीश को कहना कि बातों से खेल नहीं जीतेंगे।

हरीश एक व्यापारिक संस्था की आमंत्रित कार्ड संध्या के आयोजन में मदद कर रहे थे। प्रायोजक ने निश्चित नकद पुरस्कार रखा था। एक प्रतिभागी ने नाम वापस लिया था।

“जगह खाली है। शामिल होने के लिए तुम्हें पैसे नहीं देने।”

“और कौन खेल रहा है?”

उन्होंने कई नाम लिए।

फिर अरमान का।

रवि ने रसोई की तरफ देखा।

“मैं कुछ सुनिश्चित नहीं कर सकता,” हरीश ने कहा। “जीत तो बिल्कुल नहीं।”

“उसे पता है आपने मुझसे पूछा?”

“उससे क्यों पूछूँ?”

* * *

रवि ने लगभग मना कर दिया।

उसे पैसों की ज़रूरत थी। इसी वजह से निमंत्रण साधारण खेल की शाम जैसा नहीं लग रहा था।

उसने कार्यक्रम के कागज़ देविका को दिखाए।

उन्होंने लिखित व्यवस्था पढ़कर लौटा दी।

“दुकान का विवाद खेल से अलग रहेगा। मेज़ पर जो भी हो, उसका काम अलग चलेगा।”

अगले पखवाड़े रवि सुबह और शाम काम करता रहा। खाली दोपहर में हरीश और दो सेवानिवृत्त पड़ोसियों के साथ अभ्यास करता।

इतना हारता कि उम्मीद करने पर भी शर्म आने लगती।

एक दिन उसने कुर्सी कुछ ज़ोर से पीछे खिसका दी।

हरीश ने ताश समेट ली।

“घर जाओ।”

“अभी आया हूँ।”

“तो एक चक्कर लगाकर आओ।”

रवि बाहर गया। मुश्किल से वहन कर सकने वाली चाय खरीदी और हार्डवेयर की दुकान के बाहर खड़ा रहा। जब मदद करने वाले से लड़ने का मन नहीं रहा, वापस आया।

उसकी कुर्सी खाली थी।

कार्यक्रम से एक दिन पहले प्रिया का फोन आया।

उसने नहीं उठाया।

संदेश आया।

पापा कह रहे हैं तुम वकील तक पहुँच गए। क्या इसकी ज़रूरत थी?

उसने तीन अलग जवाब लिखे।

तीनों मिटा दिए।

कागज़ देविका के पास थे।

* * *

कार्ड संध्या उसी होटल में थी।

रवि ने चचेरे भाई की गहरे रंग की कमीज़ पहनी। सफेद कमीज़ अभी भी कमरे के दरवाज़े के पीछे टँगी थी।

रिसेप्शन पर युवती ने सूची में नाम ढूँढ़ा।

“मिस्टर रवि मेनन?”

उसने सिर हिलाया।

उसे प्रतिभागी का बैज दिया गया।

गलियारे में अरमान मिल गया।

“अब भी सामान लेने आते हो?”

रवि ने बैज देखा और लगा लिया।

हरीश बीच में आ गए।

“खिलाड़ियों को बुला रहे हैं।”

अंदर मेज़ों पर सीट नंबर रखे थे। अधिकारी थे, खेल रिकॉर्ड करने वाले कैमरे और कुछ दर्शक।

पीछे मोहन के पास प्रिया खड़ी थी।

रवि को उसके आने की उम्मीद नहीं थी।

एक पल में वही पुरानी शाम लौट आई—गीले फूल, ठंडा पानी, ड्रेसिंग रूम से निकलने भर का दरवाज़ा।

अधिकारी ने बैज माँगा।

उसने दे दिया।

पहला दौर खराब गया।

हथेलियाँ गर्म थीं। पीछे की हर खाँसी जानबूझकर की गई लगती। एक खराब परिणाम के बाद दूसरी मेज़ से अरमान की हँसी आई तो उसे लगा उसी पर हँस रहा है।

ब्रेक में वह वॉशरूम गया। कलाई पर ठंडा पानी बहने दिया।

मौसी का फोन आया।

“खाना खाया?”

“अभी नहीं।”

“खाओ।”

“जल्दी बाहर हो सकता हूँ।”

“तो घर आने से पहले खा लेना।”

उसने सैंडविच लिया और बाहर छोटी दीवार पर बैठकर खाया।

अंदर लौटा तो प्रिया को ढूँढ़ना बंद कर दिया।

* * *

वह थोड़े अंतर से अगले दौर में पहुँचा।

फिर एक और दौर पार किया।

शाम छोटी चीज़ों में बँटने लगी। कालीन में अटकता कुर्सी का पाया। अधिकारी का नया पेन निकालना। दर्शकों के पास खड़े हरीश का माथा मलना।

अंतिम चरण तक बचे खिलाड़ियों में रवि और अरमान दोनों थे।

मोहन बार-बार फोन देखने लगे।

अरमान बीच-बीच में सहजता से बातें करता रहा। किसी नई प्रॉपर्टी, आने वाली गाड़ी और ऐसे लोगों की जिन्हें रवि जानता नहीं था।

“कुछ लोगों की बस एक रात अच्छी निकल जाती है,” उसने कहा।

रवि ने पानी पिया।

बाद में एक नतीजा अरमान के खिलाफ गया। उसकी बातचीत बंद हो गई। पहले बताई गई बातें भी वह अधिकारी से दोहराने को कहने लगा।

मुकाबला किसी एक चमत्कारी पल में तय नहीं हुआ।

रवि पीछे गया। कुछ संभला। एक और खिलाड़ी आगे निकला। आखिरी तय हाथ नज़दीक आए तो कमरे में आवाज़ें कम हो गईं।

अंतिम खुलासे पर रवि ने अधिकारी की पुष्टि का इंतज़ार किया। उसके बाद ही ऊपर देखा।

उसका नाम पुकारा गया।

कुछ पल वह बैठा रहा।

हरीश सबसे पहले खड़े हुए।

दूसरी तरफ अरमान अब भी पत्तों को देख रहा था।

“दोबारा जाँचिए।”

अधिकारी ने जाँच लिया।

नतीजा वही रहा।

तस्वीरें ली गईं। माइक्रोफोन आया। प्रायोजक के दस लाख के पुरस्कार वाला बोर्ड उसे पकड़ाया गया।

उसने दोनों हाथों से पकड़ा।

किसी ने पूछा, कैसा महसूस हो रहा है।

कैमरे के पार प्रिया दिखी।

“थक गया हूँ,” रवि ने कहा।

लोग हल्के से हँसे।

उस शाम पहली बार किसी हँसी ने उसे छोटा महसूस नहीं कराया।

* * *

अगली सुबह नाश्ते से पहले खाते में पैसे नहीं आ गए।

दस्तावेज़ थे, सत्यापन था और ऐसी व्यवस्थाएँ थीं जिन्हें वह बिना मदद समझने का नाटक नहीं करना चाहता था।

वह काम पर जाता रहा।

पुष्टि के बाद रकम उपलब्ध हुई तो देविका ने अगले कदम लिखे।

अब रवि मोहन की अदायगी का इंतज़ार किए बिना अग्रिम लौटाने का प्रस्ताव दे सकता था। अधूरा खरीद सौदा फिर भी ठीक तरह निपटना था। मोहन का कर्ज़ अलग था।

अरमान की कंपनी ने पहले मना किया।

फिर उसके हिसाब विभाग ने प्रश्न पूछने शुरू किए।

सात लाख गए थे, खरीद पूरी नहीं हुई थी। अरमान दुकान को पूरा हो चुका उपहार बता रहा था। वित्तीय साझेदार जानना चाहता था कि कागज़ कुछ और क्यों कह रहे हैं।

प्रिया ने फिर फोन किया।

इस बार रवि ने उठाया।

“क्या हम वकीलों के बिना मिल सकते हैं?”

“नहीं।”

“तुम बदल गए हो।”

उसने मेज़ पर रखी पीतल की छोटी चाबी देखी।

“हाँ।”

* * *

बैठक छह हफ्ते बाद हुई।

फूल नहीं थे।

रवि देविका के साथ बैठा। दूसरी तरफ अरमान, कंपनी का प्रतिनिधि, मोहन और भुगतान समझाने आया अकाउंटेंट था।

प्रिया देर से पहुँची।

आधे घंटे तक किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। कागज़ इधर से उधर गए। तारीखें जाँची गईं। प्रस्तावित शर्तें सुधारी गईं।

फिर मोहन ने सात लाख को परिवार की मदद बताने की कोशिश की।

देविका ने दस्तखत वाली पावती बैंक ट्रांसफर के पास रख दी।

“दस्तखत करते समय इसका क्या मतलब समझा था?”

मोहन ने चश्मा ठीक किया।

अरमान उनकी ओर मुड़ा।

“आपने कहा था इसे भुगतान हो चुका है।”

मोहन ने प्रिया को देखा।

वह ट्रांसफर की तारीख पढ़ रही थी।

उस फोन के अगले दिन की तारीख, जब वह सीढ़ियों के पास रो रही थी।

“आपने कहा था चाचा ने पैसे भेजे,” उसने कहा।

कोई नहीं बोला।

रवि महीनों से इस पल की कल्पना करता रहा था। कल्पना में उसके पास हमेशा लंबा जवाब होता था।

अभी वह अकाउंटेंट को एक रकम के नीचे लकीर खींचते देखता रहा।

लिखित समझौते से अधूरी खरीद निपटी। रवि ने तय अग्रिम लौटाया। कब्ज़ा और कागज़ दर्ज व्यवस्था के अनुसार संभाले गए। मोहन के कर्ज़ को मिटा हुआ मानने के बजाय उसकी अदायगी की व्यवस्था स्वीकार की गई।

अरमान अब दुकान को अपना उपहार नहीं कह सकता था।

बाहर सीढ़ियों के पास प्रिया ने रवि को रोका।

“मुझे सब नहीं पता था।”

“इतना पता था कि मुझे ड्राइवर कहना है।”

वह रोने लगी।

रवि कुछ क्षण खड़ा रहा। पहले वह उसके कहने से पहले ही पास चला जाता।

“बाकी बात,” उसने कहा, “अपने पिता से कर लेना।”

वह नीचे चला गया।

* * *

चार महीने बाद बेकरी खुली।

रवि ने माँ का काउंटर रखा। टूटा काँच बदला, हरे शटर ठीक करवाए। पहले से कम चीज़ें थीं। वह उन्हें ठीक से बनाना चाहता था।

मौसी जल्दी आईं और नए स्टूल ऊँचे होने की शिकायत की।

हरीश पत्नी के साथ आए।

देविका ने ब्रेड खरीदी। मुफ्त लेने से साफ मना किया।

दोपहर के करीब मोहन के एक नियमित ग्राहक का कैटरिंग मैनेजर आया। सगाई में भी मौजूद था।

पेस्ट्री देखते हुए उसने रवि को पहचाना।

“अच्छा।”

रवि रुका रहा।

“अगले महीने एक ऑर्डर हो सकता है।”

“कितने लोग?”

उसने अनुमान बताया।

रवि ने विवरण लिखा, अग्रिम समझाया और कीमतों का कागज़ दे दिया।

“बाद में हिसाब नहीं कर सकते? पहचान तो है।”

“पहले ऑर्डर पर अग्रिम लगेगा।”

मैनेजर ने कागज़ फिर पढ़ा।

फिर भुगतान कर दिया।

दुकान बंद करते समय रवि को काउंटर के पीछे थैले में सफेद कमीज़ मिली। मौसी बिना बताए धोकर इस्त्री कर लाई थीं।

उसने ऑफिस के हुक पर टाँग दी।

आखिरी ग्राहक ने काँच के बाहर से हाथ हिलाया। रवि ने हाथ उठाया, बोर्ड पलटा और आगे का ताला देखा।

फिर बेकरी से होता हुआ पिछले दरवाज़े तक गया।

पीतल की छोटी चाबी आसानी से घूम गई।

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