“बताओ सबको, गए क्यों नहीं।”
अर्जुन खाने की मेज़ के पास खड़ा था। उसके सौतेले पिता जवाब का इंतज़ार कर रहे थे।
छह रिश्तेदार दोपहर के खाने पर आए थे। छोटा सौतेला भाई रोहित नए फोन की स्क्रीन से प्लास्टिक उतार रहा था।
कविता ने खाना परोसने वाला चम्मच रख दिया।
“गया था।”
महेश ने उसे अनदेखा किया।
“उससे पूछ रहा हूँ।”
अर्जुन को अब भी रजिस्ट्रेशन हॉल के बाहर की गर्मी महसूस हो रही थी। बैग, पहचान पत्र और कविता का काम पर जाने से पहले पैक किया नाश्ता लेकर पहुँचा था।
डेस्क पर बैठी महिला को उसका नाम मिल गया था।
फिर स्क्रीन उसकी तरफ घुमा दी थी।
नाम वापस लिया गया।
उसने नाम वापस नहीं लिया था।
दो घंटे कोई समझाने वाला खोजता रहा, जबकि बाकी खिलाड़ी अंदर जाते रहे।
अब महेश खाने पर उससे उसी घटना का प्रदर्शन चाहते थे।
“बोलो,” उन्होंने कहा। “हिम्मत नहीं हुई।”
“मैंने रद्द नहीं किया।”
एक चाचा ने सिर हिलाया।
“डरने में शर्म की बात नहीं।”
कविता ने रोहित का नया फोन देखा।
“कितने का है?”
महेश ने मेज़ पर हथेली मारी।
“अपने भाई की नाकामी में उसे मत घसीटो।”
अर्जुन की माँ सुषमा ने सामने रखे खाने को देखा।
“बस करो। मेहमान हैं।”
कविता ने एप्रन उतार दिया।
उस दोपहर पहली बार सबने उसकी तरफ देखा।
“तो परोसिए।”
वह रसोई से निकल गई।
अर्जुन पीछे गया।
महेश ने एक बार उसका नाम पुकारा।
वह नहीं मुड़ा।
* * *
अर्जुन अट्ठाईस साल का था। कविता बत्तीस की।
पिता की मृत्यु के समय वह कॉमर्स पढ़ रही थी और अर्जुन स्कूल में था। माँ की दूसरी शादी तक कविता दो छोटी दुकानों का हिसाब करने लगी थी।
उसने अर्जुन से कहा था कि अपनी पढ़ाई बाद में पूरी कर लेगी।
बाद में एक ऐसा वाक्य बन गया जिसे परिवार उसकी किसी महँगी जरूरत पर इस्तेमाल करता।
प्रोफेशनल अकाउंटिंग कोर्स।
बेहतर कंप्यूटर।
ऐसा कमरा जहाँ काम करते समय कोई चाय न माँगे।
रोहित की जरूरतें बाद में तक नहीं रुकती थीं।
फोन महँगे कवर के साथ आया।
कोर्स की फीस याद दिलाने से पहले भर दी जाती।
अर्जुन प्रिंटिंग के काम में नौकरी करता और घर में पैसे देता था। बरसों से इंडियन रम्मी खेलता था। पहले बड़े रिश्तेदारों के साथ, फिर स्थानीय क्लब में।
इतना अच्छा था कि बाकायदा प्रतियोगिता आजमाना चाहता था।
इतना निश्चित नहीं कि जीत मानकर चले।
कई महीनों से वह और कविता शिफ्टों के बीच तैयारी फिट कर रहे थे। उसे खेल की हर बात नहीं आती थी। उसका समय पता था। यह भी जानती थी कब वह मजाक करके अपनी घबराहट छिपा रहा है।
“नाम लिखाना है तो लिखाओ,” उसने कहा था।
क्षेत्रीय श्रृंखला में कई क्वालिफाइंग आयोजन थे। उसने सबसे पास वाला चुना।
कविता ने रजिस्ट्रेशन और यात्रा के खर्च का कुछ हिस्सा उधार दिया। वह वेतन से लौटाने वाला था, उस पुरस्कार से नहीं जो अभी जीता ही नहीं था।
भुगतान घर की उस व्यवस्था से हुआ जिसे महेश अपने हाथ में रखते थे।
“सारे पैसे एक जगह,” वह कहते। “वरना किसी को नहीं पता कहाँ क्या जा रहा है।”
अर्जुन को अब पता था उसके कहाँ गए।
बस रिकॉर्ड अभी नहीं था।
* * *
बस स्टॉप पर कविता ने घर से लाया डिब्बा खोला।
दो रोटियाँ बची थीं।
एक उसे दी।
“आयोजक ने क्या कहा?”
“बुकिंग में दिए संपर्क से नाम वापस लेने को कहा गया।”
“किसके संपर्क से?”
उसने कविता को देखा।
शुरुआती रजिस्ट्रेशन महेश ने किया था। उनका कहना था कि जानते हैं ये चीज़ें कैसे होती हैं।
नंबर उनका था।
आयोजक रद्द करने की पुष्टि कर चुके थे। रकम मूल भुगतानकर्ता को लौटा दी थी। अर्जुन के पहुँचने तक जगह प्रतीक्षा सूची के किसी और खिलाड़ी को दे दी गई थी।
परिवार ने झूठ बोला था, इसलिए पूरा आयोजन दोबारा शुरू नहीं हो सकता था।
कविता चुपचाप चबाती रही।
अर्जुन चाहता था वह चिल्लाए। कोई उतना शोर करे जितना उसके भीतर हो रहा था।
इसके बजाय उसने पूछा, “दूसरा क्वालिफायर है?”
“अगले महीने।”
“कहाँ?”
“दूर।”
उसने खाली डिब्बा बंद किया।
“तो खर्च पता करते हैं।”
“तुमसे पैसे नहीं लेता रह सकता।”
“तो मत लो। योजना बनाते हैं।”
उसने कविता की कलाई देखी।
काम शुरू करने पर खरीदी सस्ती घड़ी अब भी पहनती थी। काँच पर दरार थी।
“तुम्हारा कोर्स शुरू होना था।”
“हाँ,” उसने कहा।
वह इंतज़ार करता रहा।
उसने बाद में नहीं जोड़ा।
* * *
शाम को घर लौटे।
रिश्तेदार जा चुके थे। रोहित का फोन टीवी के पास चार्ज हो रहा था।
महेश सबसे अच्छी कुर्सी पर बैठे थे।
“मैंने रद्द किया।”
अर्जुन के बोलने से पहले कह दिया।
“किसी को तो करना था।”
कविता ने रद्द होने की छपी पुष्टि मेज़ पर रखी।
“तो सबसे क्यों कहा कि डर गया?”
“यह सब और बढ़ने से पहले रोकने को।”
“वापस आए पैसे?”
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“घर में लगे।”
रोहित ने नज़र फेर ली।
“घर के किस हिस्से में?” कविता ने पूछा।
महेश खड़े हो गए।
“यहाँ खाते हो। सोते हो। मेरे घर में खड़े होकर हर रुपये का हिसाब मत पूछो।”
माँ बीच में आ गईं।
“मदद करना चाहते थे।”
अर्जुन ने उन्हें देखा।
दोपहर की बातें सुनी थीं।
उसे खड़ा देखा था।
“जो उन्होंने किया, उसके लिए मुझे डरपोक कहा।”
“आवाज,” माँ फुसफुसाईं। “धीरे बोलो।”
उसने ऊँची नहीं की थी।
कविता ने हैंडबैग उठाया।
“आज कहीं और रुकेंगे।”
महेश हँसे।
“किस पैसे से?”
सवाल ठीक था।
इसीलिए पूछते हुए इतने खुश लग रहे थे।
* * *
पहले कमरे में एक बिस्तर, प्लास्टिक की कुर्सी और दीवार की तरफ खुलती खिड़की थी।
काम से परिचित एक महिला ने हफ्ते भर के लिए दिया था।
अर्जुन फर्श पर सोया।
दूसरी रात माँ ने कविता को ग्यारह बार फोन किया।
कुछ बातें उसे सुनाई दीं।
हाँ, खा लिया।
नहीं, वह अर्जुन को दूर नहीं रख रही।
नहीं, सिर्फ माफी माँगने वापस नहीं आएगी।
फिर कविता ने बोलना बंद कर दिया।
अर्जुन ने फोन खत्म होने दिया।
“क्या कहा?”
“कुछ काम का नहीं।”
उसने दोबारा नहीं पूछा।
सुबह कविता उससे पहले उठी मिली। कमरों के किराए और कोर्स की फीस मिला रही थी।
वह प्लास्टिक की कुर्सी के पास बैठ गया।
“मैं नहीं खेलूँगा।”
उसने पन्ना बंद किया।
“क्योंकि मन नहीं है?”
“क्योंकि यह सब देखो।”
उसने कमरे में देखा।
“दस साल से इससे बुरे रूप में यही चुनाव देख रही हूँ।”
“कविता—”
“मैं कोर्स कर रही हूँ।”
उसने सिर हिलाया।
“तुम तय कर रहे हो खेलना है या नहीं। दोनों फैसला कर सकते हैं।”
उन्होंने बजट बनाया।
तकलीफदेह हद तक छोटा था।
दूसरा कमरा मिला। अर्जुन ने अतिरिक्त भुगतान वाली शिफ्टें लीं। कविता ने कोर्स की जमा रकम नहीं छुई।
नए रजिस्ट्रेशन में अर्जुन के अपने संपर्क थे। उसने पुष्टि खुद जाँची।
अब कोई भलाई के नाम पर उसका नाम वापस नहीं लेगा।
* * *
अगला क्वालिफायर जीत की कहानी नहीं था।
सफर से थका पहुँचा। शुरुआती चरण खराब गया।
दोपहर को कविता को फोन किया।
“शायद वही सही थे।”
“बिना बताए रद्द करने के बारे में?”
“मेरे बारे में।”
वह काम पर थी। कोई दुकानदार पूछ रहा था कि इनवॉइस कहाँ रखी है।
“पहले बाकी खेलो,” उसने कहा। “बस में खुद को बुरा-भला कह लेना।”
चाहे बिना भी वह हँस पड़ा।
दोपहर बाद कुछ सँभला।
क्वालिफाई करने जितना नहीं।
वापसी में बस अड्डे की सबसे सस्ती चाय ली और जो हुआ, लिख लिया।
लौटा तो कविता पढ़ रही थी।
सफर के बचे पैसे उसकी कॉपी के पास रखे।
“नहीं हुआ।”
उसने सिर हिलाया।
“चावल हैं।”
उसने खाया।
फिर पूछा कि क्या पढ़ रही है।
कविता ने कॉपी उसकी तरफ की।
एक घंटे दोनों ऐसी चीज़ से जूझते रहे जो उसकी थी।
सोने से पहले अर्जुन ने बाकी क्वालिफायर का कार्यक्रम खोला।
उससे छिपाया नहीं।
* * *
अगले उपलब्ध आयोजन में उसका चयन हो गया।
अंतर किसी गुप्त चाल या अचानक बदल जाने से नहीं आया था।
इस बार ऐसा सफर चुना जिसमें सो सके। जितना समय सच में था, उसी में अभ्यास किया। थकान को समर्पण बताने का नाटक नहीं किया। वहाँ उन लोगों की प्रतिक्रिया देखना छोड़ा जो उसे जानते भी नहीं थे।
हाथ अब भी हारा।
एक गलती जरूरत से ज्यादा देर दिमाग में रही।
लेकिन तय दौर पूरे होने पर अंक पर्याप्त थे।
उसने आधिकारिक सूची की तस्वीर ली।
फिर, क्योंकि अपनी खुशी को एक स्क्रीन पर छोड़ना सीख चुका था, डेस्क से पुष्टि भी की।
बाहर कविता को फोन किया।
उसने धीरे से जवाब दिया।
“क्लास में हूँ।”
“क्वालिफाई कर लिया।”
चुप्पी।
फिर फोन हिला। दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।
“फिर कहो।”
उसने कहा।
वह हँसने लगी।
दीवार की तरफ खुलती खिड़की वाले कमरे के बाद पहली बार वह हँसी सुनी।
* * *
फाइनल छह हफ्ते बाद था।
प्रकाशित कार्यक्रम के अनुसार आयोजकों ने अंतिम खिलाड़ियों के रहने की व्यवस्था की थी। सफर, काम से छुट्टी और रोज के खर्च अर्जुन को सँभालने थे।
कविता आना चाहती थी।
नियोक्ता ने एक दिन का काम बदलने दिया। टिकट उसने खुद किया। पुष्टि हैंडबैग की छोटी चेन वाली जेब में रखी।
घर में खबर पैसे से हमेशा तेज पहुँचती थी।
एक चाचा ने फोन करके परिवार का गर्व बताया।
महेश का संदेश आया।
अच्छा है। अब विनम्र रहना।
अर्जुन ने स्टील की थाली धोते हुए पढ़ा।
उत्तर नहीं दिया।
दो दिन बाद महेश का फोन आया।
“लगता होगा सब अकेले किया।”
“नहीं।”
संतुष्ट चुप्पी।
“कविता ने मदद की।”
चुप्पी बदल गई।
“छत किसने दी, मत भूलना।”
अर्जुन ने थाली रैक पर रखी।
“कुछ नहीं भूला।”
फिर सुखाने लगा।
* * *
फाइनल से पहले की शाम दोनों आयोजन स्थल के पास खाना खा रहे थे, तभी कविता का फोन आया।
रोहित था।
वह सुनती रही, फिर इतनी जल्दी खड़ी हुई कि कुर्सी दीवार से टकराई।
“क्या हुआ?” अर्जुन ने पूछा।
“मम्मी की तबीयत खराब है। कह रहा है ले जा रहे हैं।”
वह माँ को फोन कर रही थी।
उत्तर नहीं।
फिर महेश को।
उन्होंने तुरंत उठाया।
“अब याद आए हम?”
“हुआ क्या?”
“ब्लड प्रेशर। इतनी चिंता।”
“कौन-सा अस्पताल?”
“सवाल मत शुरू करो। घर आओ।”
अर्जुन खड़ा हो गया।
कविता ने हाथ से रोका।
“कहाँ हैं, बताइए।”
महेश ने क्लिनिक का नाम लिया, फिर पिछले कई हफ्तों की बात शुरू कर दी।
कविता ने फोन बंद किया। माँ को अच्छी तरह जानने वाली पड़ोसन से संपर्क किया।
वह घर गईं।
माँ वहीं थीं। रिश्तेदार के साथ बैठी थीं। पहले तबीयत कुछ खराब लगी थी, लेकिन कहीं ले नहीं जाया गया था। पड़ोसन ने उन्हें फोन दिया।
“ठीक हो?” कविता ने पूछा।
“हाँ। परेशान थी।”
“अभी इलाज की व्यवस्था करवानी है?”
“नहीं। बस घर आ जाओ।”
कविता ने आँखें बंद कीं।
पीछे वेटर दो गिलास पानी लिए इंतज़ार कर रहा था।
“कल,” माँ ने कहा। “भाई एक खेल छोड़ सकता है।”
कविता ने अर्जुन को देखा।
वह समझ गया कि किसे चुनने को कहा जा रहा है।
इस बार उसने उत्तर में समय लगने दिया।
“रात में फिर पूछेंगे। लेकिन पूरी बात बताए बिना डराने पर हम यहाँ से नहीं निकलेंगे।”
फोन रख दिया।
हाथ काँप रहे थे।
अर्जुन ने कुर्सी निकाली।
दोनों ने लगभग कुछ नहीं खाया।
* * *
रात और सुबह कविता ने फिर पता किया।
माँ घर पर थीं। पड़ोसन जरूरत होने पर खबर देने को तैयार थीं।
महेश के तीन संदेश आए।
एहसानफरामोश।
अपना परिवार होगा तब समझोगे।
फिर कुछ माँगने मत आना।
अर्जुन ने कविता को बातचीत म्यूट करते देखा।
“माफ करना,” उसने कहा।
“किसलिए?”
“और मुश्किल बनाने के लिए।”
उसने फोन पर अब भी खुली टिकट की पुष्टि देखी।
“खुद यहाँ आना चाहती थी, इसलिए खरीदी।”
वह इंतज़ार करता रहा।
“किसी को परोसने की जरूरत थी, इसलिए नहीं आई।”
दोनों साथ आयोजन स्थल गए।
प्रवेश पर अधिकारी ने खिलाड़ियों और दर्शकों के अलग रास्ते बताए।
कविता ने उसका कॉलर ठीक किया।
फिर रुककर खुद पर हँसी।
“जाओ। अपनी कमीज़ ठीक कर सकते हो।”
* * *
अर्जुन का पहला सत्र अस्थिर रहा।
दूसरी तरफ कविता दिख रही थी। देखने से अचानक शांति नहीं मिली। हर खराब नतीजा उसके किए काम का एक और घंटा बर्बाद करता लगता।
ब्रेक में वह पेय मशीन के पास मिली।
“फिर माफी मत कहना।”
“नहीं कहने वाला था।”
कहने वाला था।
उसने बिस्कुट दिए।
“अगला सत्र बताओ।”
उसने कार्यक्रम समझाया।
फिर कविता ने पूछा वॉशरूम कहाँ है और कैंटीन में दो के बाद खाना मिलता है या नहीं।
साधारण सवाल।
उसने जवाब दिए।
मेज़ पर लौटने तक बहन के दस साल एक दोपहर में चुकाने की कोशिश नहीं कर रहा था।
सामने का सत्र खेल सकता था।
नतीजे सुधरे।
सलीम नाम का आदमी आगे चल रहा था। विनम्र, अनुभवी और हराना मुश्किल।
अर्जुन को पसंद आया।
इससे काम आसान नहीं हुआ। लेकिन कमरा महेश के साथ बहस जैसा कम लगने लगा।
उसकी अंतिम मेज़ पर चार लोग थे।
हर कोई जगह बनाकर आया था।
* * *
आखिरी तय डील से पहले अंतिम संयुक्त अंक तालिका में अर्जुन सलीम से नौ पेनल्टी अंक पीछे था।
अंतर पता था क्योंकि अधिकारी ने दिखाया था।
यह भी जानता था कि नौ रह सकता है, बढ़ सकता है या ऐसे बदल सकता है जिसका उसके जीत चाहने की तीव्रता से संबंध न हो।
पत्ते आए।
वह हाथ में सचमुच मौजूद पत्तों को देखता रहा।
सामने सलीम की आस्तीन कलाई पर एक बार मुड़ी थी।
दर्शकों में किसी ने खाँसा।
घर का दोपहर का खाना याद आया।
बोलो। हिम्मत नहीं हुई।
फिर विचार हट गया, क्योंकि अगले पत्ते पर ध्यान चाहिए था।
हाथ धीरे-धीरे बना।
जब वैध व्यवस्था पूरी हुई, घोषणा से पहले उसने जाँच की।
अधिकारी ने खुले पत्ते देखे।
मान्य।
बाकी खिलाड़ियों के पेनल्टी अंक गिने गए।
सलीम के चौदह थे।
अर्जुन ने संख्या सुनी, फिर रुका।
पूरी अंक तालिका आने तक अपने हिसाब पर भरोसा नहीं किया।
पाँच अंकों से जीत गया था।
सलीम ने बोर्ड देखा और लंबी साँस छोड़ी।
फिर हाथ बढ़ाया।
“अच्छा खेले।”
अर्जुन ने हाथ मिलाया।
दूसरी तरफ कविता मुँह पर दोनों हाथ रखे खड़ी थी।
* * *
पहला पुरस्कार छह लाख रुपये था।
पुरस्कार देते समय अर्जुन ट्रॉफी ठीक से नहीं पकड़े था। एक हाथ पतले हिस्से पर बहुत ऊपर था।
मेजबान ने सफर पूछा।
“परिवार ने जरूर समर्थन किया होगा।”
अर्जुन ने कविता की ओर देखा।
“बहन ने किया।”
“और पिता ने?”
एक क्षण महेश की तस्वीर आई। रिश्तेदारों को क्लिप दिखाकर बताते हुए कि लड़के को सफलता के लिए कैसे आगे धकेला।
“पिता बचपन में गुजर गए,” अर्जुन बोला। “सौतेले पिता ने पहला रजिस्ट्रेशन मुझे बताए बिना रद्द कर दिया था।”
मेजबान रुक गया।
कोई उत्तर आसान बनाकर बदल दे, उससे पहले अर्जुन आगे बोला।
“वहाँ पहुँचा तो जगह जा चुकी थी। घर पर कहा गया सबको बताऊँ कि डर गया। नहीं डरा था। मेरा नाम वापस लिया गया था।”
हर बहस नहीं बताई।
माइक को मुकदमा नहीं बनाया।
जरूरत होने पर आयोजक को मूल रद्द रिकॉर्ड की पुष्टि करने की अनुमति दी। फिर उस इंसान पर लौटा जिसे धन्यवाद देना चाहता था।
“कविता ने दोबारा नाम लिखाने में मदद की। इस साल अपना कोर्स भी शुरू किया है।”
मेजबान ने उसे साथ आने को कहा।
वह हिचकी।
अर्जुन ने खाली हाथ बढ़ाया।
आ गई तो तस्वीर के लिए ट्रॉफी दोनों के बीच रख दी।
हैंडबैग कंधे पर था।
अंदर वह टिकट था जिसे लगभग इस्तेमाल न करने के लिए मना लिया गया था।
* * *
उनसे पहले क्लिप घर पहुँच गई।
महेश ने अर्जुन को बारह बार फोन किया।
एक चाचा ने कहा, बड़े को शर्मिंदा करने की जरूरत नहीं थी।
अर्जुन ने एक बार जवाब दिया।
“दोपहर के खाने पर मुझे भी शर्मिंदा करने की जरूरत नहीं थी।”
फिर फोन पर बहस बंद कर दी।
अगले हफ्ते माँ मिलने आईं।
स्टील के डिब्बे में खाना लाई थीं।
कविता ने लिया और चाय बनाई।
कुछ देर सफर की बात हुई।
फिर सुषमा ने कप रखा।
“धीरे बोलने को कहने से पहले पूछना चाहिए था क्या हुआ।”
अर्जुन ने उन्हें देखा।
“चिल्ला नहीं रहा था।”
“जानती हूँ।”
कविता छोटी रसोई के काउंटर के पास खड़ी थी।
माँ उसकी तरफ मुड़ीं।
“और तुम्हें फाइनल छोड़ने को नहीं कहना चाहिए था।”
“नहीं,” कविता बोली।
तुरंत गले नहीं मिले।
चाय पूरी की।
उस मुलाकात के लिए इतना काफी था।
* * *
पुरस्कार भुगतान पूरा होने में समय लगा।
अर्जुन काम करता रहा।
रकम आई तो कविता का उधार लौटाया। फिर उसके कोर्स की बाकी फीस में योगदान पर बात की।
उसने पहले घर का बजट देखने की जिद की।
जीवन खर्च और अर्जुन की योजनाओं के पैसे रखे। यह दिखावा नहीं किया कि छह लाख हर सपना एक साथ पूरा कर सकते हैं।
कोर्स कार्यालय में कविता भुगतान डेस्क पर खड़ी हुई।
कर्मचारी ने पूछा रसीद भाई के नाम चाहिए?
“मेरे,” उसने कहा।
अर्जुन उसका बैग लिए बाहर था।
पहले कभी ध्यान नहीं दिया था कितना भारी है।
बाहर आई तो बैग लिया और रसीद जाँची।
“शनिवार नौ बजे क्लास है।”
“नाश्ता बना दूँगा।”
“अपने लिए भी।”
वह मुस्कराया।
महीनों बाद कविता ने अगला मूल्यांकन पूरा किया तो परिणाम उसकी ट्रॉफी के पास रखा।
अर्जुन ने कागज़ की जगह बनाने को ट्रॉफी थोड़ी खिसका दी।
शनिवार सुबह उठा तो दरवाज़े के पास उसके जूते नहीं थे।
पतीले में चाय थी। एक कप इंतज़ार कर रहा था।
इस्तेमाल के बाद उसने कप धोया।
फिर अपना दिन शुरू किया।