1. Wininr कथा: मैंने पिता को क्या कहा
मैंने प्रशिक्षण केंद्र के लोगों से कहा कि वह हमारी पुरानी गली के आदमी हैं।
पिता ने सुन लिया।
वह लकड़ी की शतरंज लौटाने आए थे। माँ और मैं मौसी के फ्लैट में रहने गए तो सेट पीछे रह गया था। कारखाना बंद हुआ, किराए का घर गया और पिता जहाँ काम मिलता अस्थायी शिफ्ट करने लगे। रहने की जगह मजदूरों का साझा कमरा था।
बाईस साल की उम्र में मुझे लगता था कि सही शब्द चुनूँ तो शर्म बाहर रख सकती हूँ।
उन्होंने बैग बढ़ाया। “सफेद घोड़ा अलमारी के नीचे था।”
मैंने हाथ छुए बिना ले लिया।
कोच चौधरी ने पूछा कि और कोई काम है? पिता ने एक बार मुझे देखा और मना किया।
उनके जाने पर कोच ने कहा कि आसपास की असफलताएँ अपने खेल में ढोना बंद करना होगा। मैं मान गई। यह स्वीकार करने से आसान था कि अभी मैं खुद उन असफलताओं में शामिल हो गई थी।
उस सत्र की तीन मुलाकातों में यह पहली थी।
आखिरी में पिता प्रतियोगिता के फाइनल में चौधरी के सामने बैठे थे। मैं रस्सी के पीछे खड़ी थी। एक चाल से भी किसी की मदद नहीं कर सकती थी।
उन मुलाकातों के बीच जाना कि जिसे प्यार करते हैं उसी के पहचानने से इनकार करने के बाद भी इंसान कितना कर सकता है।
उनका नाम वीरेन था। उम्र चवालीस थी। घोड़ा कैसे चलता है, मुझे उन्होंने सिखाया था।
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2. पहली स्कोर शीट
पिता ने नहीं पूछा कि मैंने ऐसा क्यों कहा। दो सप्ताह सिर्फ जरूरी संदेश भेजे। माँ की दवा आई या नहीं। किसी कागज़ पर हस्ताक्षर चाहिए या नहीं। घड़ी की अतिरिक्त बैटरी मिली या नहीं।
फिर स्कोर शीट भेजी।
वह रहने की जगह के पास वयस्कों की सप्ताहांत प्रतियोगिता खेले और पहले दौर में हारे थे। तस्वीर में आखिरी मिनटों तक समझदार चालें थीं। फिर लिखावट सिकुड़ गई और दो चालों में मोहरा गया।
पुरानी आदत जानती थी। दो ठीक योजनाओं में चुनने पर बहुत समय लगाते। असली सामरिक फैसला आता तो जल्दी करते।
मैंने घड़ी पर टिप्पणी लिखी और मिटा दी। सिर्फ स्क्रीन से उनका चेहरा दूर था, इसलिए कोच बनने का अधिकार नहीं मिल गया था।
दूसरा संदेश आया। देख सकती हो कहाँ स्थिति पर नियंत्रण गया?
मैंने वही सवाल लिया जो पूछा था।
इक्कीसवीं चाल में प्यादा बढ़ाते समय नहीं जाँचा कि कौन सा खाना उसकी रक्षा से निकल रहा है। विरोधी घोड़ा दोहरे हमले के साथ आया। कम समय ने गलती जल्दी कराई, लेकिन कारण बिसात पर था।
उन्होंने सुधरी स्थिति की तस्वीर भेजी।
अगले सप्ताह दूसरी हार आई। इस बार घड़ी कारण नहीं थी।
पुराना घर छोड़ने के बाद पहली बार हमारे संदेशों में ऐसी चीज़ थी जिसकी जरूरत होने के लिए किसी को माफ़ी नहीं माँगनी थी। मैंने अगला खेल खोलते समय फोन की चमक बढ़ाई और पूरी बाज़ी पढ़ी।
3. काम के बाद पैंतालीस मिनट
महीनों बाद मैंने उनके बिस्तर के पास रखी कॉपी देखी। उस समय सिर्फ भेजी तस्वीरें जानती थी।
सप्ताह में चार शाम अभ्यास करते, अक्सर पैंतालीस मिनट। कुछ शिफ्ट देर से खत्म होतीं। वे शामें सच लिखते। कार्यक्रम को ऐसा दावा नहीं बनाते जो पूरा नहीं हुआ।
एक स्थिति और तीन संभावित चालों से काम शुरू होता। चुनने से पहले हर चाल पर विरोधी का सबसे मजबूत जवाब बताना था। घड़ी साथ रखते क्योंकि असीम समय वाले कमरे के लिए तैयारी नहीं थी।
साथ रहने वाला एक आदमी खाने के बाद अभ्यास खेलता। आक्रामक था और खुले राजाओं पर हमला पसंद करता था। पिता ने डरावनी और मजबूर करने वाली चाल में अंतर सीखा।
एक बाज़ी में राजा के पास वज़ीर देखकर घबरा गए और रक्षक हटा दिया। खुद को कमजोर करने के बाद ही हमला वास्तविक हुआ।
स्थिति फिर खेली। इस बार पहले हमला करने वाला घोड़ा बदला। वज़ीर खतरनाक दिख रहा था, लेकिन निर्णायक काम नहीं बचा।
दोनों रूप संदेश में साथ देखे। नीचे लिखा था—डर वही, उत्तर अलग।
वे शांत नहीं बन गए थे। ऐसी प्रक्रिया बना ली थी जो डरते समय भी काम कर सके।
मैंने तस्वीर सहेजी।
अगले अभ्यास में चौधरी ने हिचकने पर आलोचना की। मैंने पूछा कौन सा उत्तर गिनना छूटा था। उन्हें सवाल पसंद नहीं आया। पहली बार उनकी नाराज़गी से पहले मैंने बिसात देखी।
4. दूसरी मुलाकात
पिता की दूसरी मुलाकात बरसाती शनिवार को हुई। जिला ओपन के लिए क्वालिफाई कर चुके थे। मौसी के भंडार कमरे से पुरानी जैकेट लेने आए थे।
सुरक्षा कर्मी ने ऊपर फोन किया तो मैं गेट पर पहुँची। कंधों पर शर्ट भीगी थी। तौलिया पहले नहीं लिया। दोबारा बढ़ाया तो ले लिया।
“सुना है आप खेल रहे हैं,” मैंने कहा।
“बाज़ियाँ तुम्हें भेजी थीं।”
उत्तर नाराज़ नहीं था। मेरे वाक्य को उतना ही मूर्ख बना गया जितना वह था।
मौसी के मेहमान थे, इसलिए सीढ़ियों पर बैठे। उन्होंने हाथी वाला हारा अंतिम चरण दिखाया। मैंने आसान करने के लिए हाथी बदलने को कहा।
सिर हिलाया। उसके बाद प्यादों का अंत हारता था। हाथी सक्रिय रहता तो बगल से शह और विरोधी प्यादों पर हमला मिल सकता था।
मैंने फिर देखा। वह सही थे।
वर्षों तक उन्हें ऐसा माना था जिसे शतरंज की शुरुआत आती है और आगे मुझसे समझना चाहिए।
जाने से पहले प्रशिक्षण केंद्र के गेट की बात शुरू करनी चाही।
उन्होंने तौलिया ध्यान से मोड़ा। “यह मत समझाओ कि कौन सी बात कम चोट पहुँचाएगी। जो मतलब था, वह बताओ।”
उस दोपहर नहीं कर पाई।
वह जैकेट लेकर बारिश में लौट गए। गली मुड़ने तक देखती रही। सीढ़ी पर उनका दिखाया अंतिम चरण अभी खुला था। मैंने हाथी अपनी जगह वापस रखा। जिसे सरल बनाना चाहती थी, पहले उसे समझना था।
5. जिस नतीजे को कोच नहीं टाल सके
पिता की जिला बाज़ियाँ मजबूत होने लगीं। चमत्कारी नहीं, बस तोड़ना कठिन।
सिर्फ कम मोहरे सुरक्षित लगते हैं, इसलिए बदलना बंद किया। विरोधी की मदद करने वाले बदले। अपनी स्थिति को काम देने वाले रखे।
एक खेल में प्रवेश का खाना नियंत्रित करने वाले घोड़े के लिए ऊँट दिया। बाद में उसी खाने से राजा कमजोर प्यादे पर पहुँचा। दूसरे में अलग-थलग प्यादा स्वीकार किया क्योंकि खुली फाइल पर हाथियों को पर्याप्त सक्रियता मिली।
कॉपी में किसी को सार्वभौमिक नियम नहीं कहा। हर फैसला एक स्थिति का था।
वह शहर की चैंपियनशिप के लिए पहुँचे। चौधरी भी नामांकित थे।
सूची केंद्र में लगी तो कोच ने पिता का नाम पढ़कर मुझे देखा।
“तुम्हारी गली वाले आदमी?”
आसपास हर व्यक्ति सवाल का हिस्सा बन गया।
“मेरे पिता।”
चौधरी रुके। शायद हँसने या नरम करने का इंतज़ार था।
मैंने फिर कहा।
उन्होंने कहा स्थानीय परिणाम लोगों को खुद को बड़ा समझने लगवा देते हैं। फिर सूची देखने लगे।
शाम को पिता को फोन किया। ठीक बताया पहली मुलाकात में क्या कहा, क्यों कहा और लगभग अनजान लोगों के सामने गरीब होने से कितनी शर्म महसूस की।
उन्होंने मुझे स्पष्टीकरण से बचाए बिना सुना।
पूरा होने पर कहा, “पहली बार भी सुन लिया था।”
“जानती हूँ।”
हम फोन पर रहे। किसी ने जल्दी विषय बदलकर बातचीत को सहज नहीं बनाया। पहली बार खामोशी काटने की चीज़ नहीं लगी।
6. तीसरी मुलाकात बिसात पर शुरू हुई
चैंपियनशिप उसी केंद्र परिसर में थी। पिता फिर आए। इस बार किसी को और काम पूछने की जरूरत नहीं थी। नाम जोड़ी सूची में था।
मैं दर्शक बनकर आई। स्वयंसेवक के पूछने से पहले बताया किसकी अतिथि हूँ।
पिता पहली बाज़ी जीते, दूसरी बराबर हुई। कठिन तीसरे दौर में लगातार शह का रास्ता खोजकर बचे। बराबरी को अपमान नहीं माना। स्थिति खराब थी और बचाव आधे अंक का अधिकारी था।
सेमीफाइनल में विरोधी ने जल्दी हमला किया। पिता ने विकास पूरा करने के लिए प्यादा लौटाया। फिर खुले विरोधी राजा का उपयोग करके सामग्री वापस ली।
लंबे अंत के बाद जीते।
चौधरी दूसरी तरफ से फाइनल में आए। पास खड़े लोगों को सुनाई देने लायक विनम्र बधाई दी।
फिर जोड़ा, “बेटी ने तैयारी में मदद की होगी।”
पिता ने मेरी ओर देखा। “कुछ बाज़ियाँ साथ देखीं।”
खुद बड़े दिखने के लिए मेरा योगदान नहीं नकारा। पूरा सत्र मेरा भी नहीं कहा।
फाइनल प्रकाशित समय नियंत्रण और जरूरत पड़ने पर टाईब्रेक के अनुसार होना था। टाईब्रेक की जरूरत नहीं पड़ी।
दोनों बैठे। पिता ने मोहरे ठीक किए। चौधरी ने कफ।
मैं रस्सी के पीछे जगह लेकर हाथ स्थिर रखे खड़ी रही। मुझे पता था कि यहाँ संबंध, शिकायत या माफ़ी कोई चाल नहीं चल सकती। सामने जो स्थिति बनेगी, उसे पिता को खुद पढ़ना होगा। इस बार मैं उनसे अपना बोझ जीतकर दिखाने को नहीं कह रही थी।
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7. घोड़े को पीछे जाना था
चौधरी ने ऐसी स्थिति चुनी जिसमें उनका ऊँट शानदार दिख रहा था। केंद्र से पिता के राजा की तरफ जाता था। पिता का घोड़ा उपयोगी खाना नहीं खोज पा रहा था।
पाठ में कोच का वाक्य पहचानती थी। खराब मोहरा। निष्क्रिय खिलाड़ी। महत्वाकांक्षा नहीं।
पिता ने घोड़ा पीछे किया।
पास दर्शक ने आह भरी। मैं भी लगभग भरती। फिर पहली चाल को आँकने के बजाय अगला खाना देखा।
पीछे लौटने से घोड़े को केंद्रीय मजबूत खाने की राह मिली। चौधरी उसे रोकने के लिए प्यादा चलाते तो दूसरी जगह कमजोरी बनती।
उन्होंने रोकना चुना।
पिता सिर्फ शुरू की थी इसलिए योजना पर अड़े नहीं रहे। हाथी नई कमजोरी की ओर किया। रक्षक हटता तो जगह का उपयोग करने के लिए घोड़ा अभी उपलब्ध था।
चौधरी ने सक्रिय जवाब खोजा। राजा की ओर लाइन खोलने के लिए प्यादा दिया। पिता ने गणना में समय लगाया, सारा समय नहीं। प्यादा नहीं लिया। अपना लाभ देखने से पहले बचाव की चाल पूरी की।
उसमें कॉपी दिखाई दी। संभावित चालें, मजबूत उत्तर, फिर चुनाव।
बाज़ी अभी बराबर थी। कोच के सामने बैठने से पिता कोई अलग प्रकार के मनुष्य नहीं हो गए थे।
लगातार तीन ठीक फैसले किए थे। अगला अभी भी कमाना था। मैं उनकी घड़ी देखती, फिर खुद को याद दिलाती कि चेहरे से नहीं, बिसात से स्थिति समझनी है।
8. दो काम वाला रक्षक
निर्णायक स्थिति में चौधरी का हाथी एक केंद्रीय खाना बचा रहा था और पिता के आगे बढ़े प्यादे को रोक रहा था। प्यादा तुरंत बढ़ता तो हाथी शह के साथ मारता। संभावित दोहरे हमले से बचने का समय मिल जाता।
पिता ने पहले ऐसी धमकी के साथ वज़ीर चलाया जिसे देखना जरूरी था। चौधरी ने बैठकर बचाव नहीं किया, सक्रिय जवाब दिया। कई चाल धमकियाँ बदलीं, उन्हें उठाने वाले मोहरे नहीं।
उन चालों में पिता राजा को हाथी की शह वाली लाइन से बाहर ले आए। फिर प्यादा बढ़ाया।
अब उसे लेने पर हाथी घोड़े के मनचाहे खाने से हटता, लेकिन शह का अतिरिक्त समय नहीं मिलता। छोड़ने पर सहारे वाला पास्ड प्यादा प्रमोशन के करीब आता। पहले की चालों ने स्वीकार की जाने वाली कीमत बदल दी थी।
कोच ने प्यादा हटाना चुना।
पिता का घोड़ा वज़ीर और हाथी पर दोहरे हमले के साथ आया।
मोहरे से हाथ हटने के एक सेकंड बाद मुझे फोर्क दिखा। पीछे कहीं हल्की आवाज़ निकली। अंपायर ने दर्शकों की ओर देखा।
चौधरी ने वज़ीर बचाया। पिता ने हाथी लिया और सामग्री में आगे हो गए।
अंत नहीं था। राजा कमजोर था और लापरवाह गणना से तेज कोच धमकियाँ बना सकते थे।
पिता ने कुछ और करने से पहले चाल लिखी।
उस छोटी क्रिया ने मुझे मार से अधिक स्थिर किया। यहाँ वह पहले परिणाम तक जल्दी पहुँचने में जीत बिगाड़ देते थे।
9. जीतती चाल के बाद का खेल
चौधरी कठिन लड़े। उनसे इतना सीखा था कि बचाव की गुणवत्ता पहचान सकूँ। वज़ीर सक्रिय रखा और ऐसी शह बनाईं जो पिता के राजा को किनारे धकेलतीं।
पिता ने राजा को सुरक्षित जगह देने के लिए प्यादा लौटाया। किसी ने पूछा सामग्री में आगे खिलाड़ी कुछ क्यों छोड़ता है।
मुझे सीढ़ियों वाला हाथी अंत याद था। मोहरों की गिनती नहीं बताती कि वे क्या कर सकते हैं।
पिता ने बाकी मोहरे जोड़े, खतरनाक शह रोकीं और वज़ीर बदलने का मौका तभी दिया जब उसके बाद का अंतिम चरण साफ बेहतर था।
चौधरी पहले बचे। इससे एक और रियायत देनी पड़ी। आखिर बदला और ऊँट से नाकाबंदी बनाने लगे।
मध्य खेल में पीछे गया घोड़ा अब उसके आसपास नया रास्ता खोज रहा था। पिता ने एक प्यादा निशाना बनाया, फिर दूसरी तरफ ध्यान भेजा। एक कमजोरी बचाते हुए दूसरी न छोड़ना हमेशा संभव नहीं था।
अंतिम प्यादे की तोड़ लगभग चार घंटे बाद आई।
चौधरी ने स्थिति पढ़ी और घड़ी रोक दी।
पिता ने ऊपर देखा, जैसे खामोशी का अर्थ पुष्टि करना चाहते हों। फिर हाथ मिलाया।
मैं तुरंत आगे नहीं दौड़ी। अधिकारियों का काम पूरा होने दिया।
पहली बार इंतज़ार करना उन्हें बाहर छोड़ना नहीं लगा। वह अपने परिणाम के पास बैठे थे। किसी की अनुमति नहीं चाहिए थी। मैंने फोन जेब में रखा ताकि जब उनकी निगाह उठे तो मुझे स्क्रीन के पीछे न पाएँ।
10. घर की राह
केंद्र का फोटोग्राफर पिता से पहले मुझे पहचान गया। पूछा विजेता के साथ फोटो चाहिए?
“हाँ। अपने पिता के साथ।”
कोई नहीं हँसा। किसी ने नहीं पूछा जैकेट कोच से पुरानी क्यों है या पूरा सत्र साझा कमरे में क्यों रहे।
कप देते समय चौधरी पास खड़े थे। आयोजक के पूछने पर घोड़े की यात्रा स्वीकार की। शब्द छोटे थे, लेकिन पहले उनकी उपेक्षा सुनने वालों को साफ सुनाई दिए।
पिता ने धन्यवाद दिया और मेरी ओर लौटे।
फाइनल के दौरान यह पल कई बार सोच चुकी थी। सुंदर माफ़ी माँगूँगी। वह पूरी तरह माफ़ करेंगे। तस्वीर कठिन साल को ऐसी सड़क बना देगी जिसे यहाँ लाने के लिए बनाया गया था।
इसके बजाय पूछा, खाना खाया?
वह हँसे। “अपनी माँ जैसी बोल रही हो।”
कैंटीन से कुछ लिया और खिड़की की मेज़ पर बैठे। कप बीच में था। बात उस कमरे की हुई जिसे वह किराए पर लेने की कोशिश कर रहे थे और माँ की कौन सी चीज़ें मौसी के यहाँ थीं।
दरवाज़े पर आयोजक ने पूछा, पिता के लिए टैक्सी बुलाए क्या? पिता परेशानी मना करते, उससे पहले मैंने उत्तर दिया।
“हम साथ जा रहे हैं।”
पुराना शतरंज सेट याद से ज्यादा भारी था। उनके हाथ से लेकर बाहर निकलते लोगों के बीच बराबर चली। किसी ने पूछा, हमारा क्या रिश्ता है? अकादमी में रोका जवाब इस बार दे दिया।
“ये मेरे पिता हैं।”
वह उतना धीमे चले कि साथ रह सकूँ। हम गेट तक साथ पहुँचे। कोई तस्वीर नहीं सज रही थी और हमारी तरफ से कोई दूसरा जवाब नहीं दे रहा था।
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