X89: अंग्रेजी में ठहरी, फिर भांजे को रमी में हराया
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X89: अंग्रेजी में ठहरी, फिर भांजे को रमी में हराया

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

X89 की मौलिक रमी कहानी: कमला हैदराबाद में अपना खेल समूह बनाती है और दो लंबी प्राकृतिक सीक्वेंस तथा चार पत्तों के सेट से सात बाजियों का मैच जीतती है।

1. X89 कहानी: हर पत्ता उसे समझ आता था

घोषणा से पहले रोहित अपनी मौसी की ओर झुका और हिंदी में इतना धीरे बोला कि बात चिंता जैसी लगे। “निर्देश कठिन लगें तो मुझे जवाब देने दीजिए। नए शहर में शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं।”

कमला ने हर शब्द समझा। वह अट्ठावन साल की थी, चार महीने पहले लखनऊ से हैदराबाद आई थी और अंग्रेजी में ठहरने को विचार में ठहरना समझे जाने से थक चुकी थी।

सामुदायिक हॉल में लोग तेलुगु, हिंदी, अंग्रेजी और सुनने वाले के अनुसार बदलते मेल में बोलते थे। अधिकतर एक-दूसरे के लिए जगह बनाते। तैंतीस साल का भांजा रोहित उसके लिए जगह बनाने के नाम पर उसकी जगह लेने लगा था।

आयोजक ने काल्पनिक चुनौती के नियम पढ़े। आमने-सामने रमी मैच, पहले चार वैध बाजियाँ जीतने वाला विजेता, अधिकतम सात बाजियाँ। कमला ने सहज पढ़ी जा सकने वाली भाषा में लिखित सार माँगा था। आयोजक ने मैच से पहले दिया। उसने खुद जाँचा था।

अधिकारी ने पूछा कि दोनों समझे क्या, तो रोहित दो लोगों की तरफ से जवाब देने लगा।

कमला ने हाथ उठाया। “समझ गई। जरूरत होगी तो पूछूँगी।”

वह पीछे हुआ। दर्शक सीमा के पीछे बेटी रिया बैठी थी। टखने पर अब भी सहारा बँधा था। कमला मदद करने शहर आई थी और धीरे-धीरे अपना हर अलग घंटा खोती गई थी।

अब तेरह पत्ते सामने थे। रोहित घोषणा समझा सकता था। कौन-सा पत्ता रखना है, यह नहीं चुन सकता था।

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2. पहली शाम जब वह अकेली गई

हैदराबाद के पहले महीने में कमला का दिन रिया की जाँच, भोजन और काम के फोन के अनुसार चलता था। अपना छोटा शिल्प का ठेला अस्थायी रूप से बंद करके आई थी। घर व्यवस्थित होते लौटने की उम्मीद थी। हर नई व्यवस्था में मान लिया गया कि वह उपलब्ध रहेगी।

रोहित ने हॉल में परिचय ऐसी मौसी का दिया जिसे घर के पत्ते पसंद हैं, लेकिन तेज खिलाड़ियों को देखना बेहतर लगेगा। उसने एक शाम देखा, फिर खेलने को कहा। रोहित ने समूह से कहा कि वह केवल शिष्टता कर रही है।

बस में घर लौटते कमला ने कहा कि अनुरोध सच था। वह हँसा और बोला कि असुविधाजनक अनुभव से बचाया। कमला अपने स्टॉप तक खिड़की से बाहर देखती रही।

अगले सप्ताह अकेली गई। काव्या नाम की खिलाड़ी ने पूछा कि किस भाषा में निर्देश आसान होंगे। कमला ने हिंदी कहा। काव्या ने प्रक्रिया साफ समझा सकने वाला खिलाड़ी बुलाया, फिर कमला को अपना हाथ खेलने दिया।

वह अभ्यास की तीन बाजियाँ हारी। किसी ने इसे दर्शक कुर्सी पर लौटने का प्रमाण नहीं माना। उसके फैसले पूछे। सवाल रोहित की व्याख्याओं से कठिन और अधिक सम्मानजनक थे।

कमला सप्ताह में दो बार जाने लगी। निकलने से पहले रिया को बाहर रहने के घंटे बताती और उस समय की जरूरी व्यवस्था में मदद करती। रिया ने समायोजन किया। घर उसकी हर समय उपलब्धता इसलिए भी मान रहा था क्योंकि उसने दूसरा विकल्प स्पष्ट कहा ही नहीं था।

3. नाम बदले, रिश्ते वही रहे

शुरू में अपरिचित शब्दों पर कमला ठहरती थी। पत्तों के आकार और अंक जानती थी, लेकिन तेज व्याख्या से कभी लगता कि नया नियम आया है क्या। छोटा शब्दों वाला पन्ना रखने लगी। हर शब्द खेल से पहले जाँचती, विरोधी की सक्रिय बारी में नहीं।

जरूरी सीख शब्दों से आगे थी। घर के खेल में पत्ते तीन-तीन की साफ जोड़ में बाँटने की आदत थी। हॉल में काव्या ने पूछा कि न्यूनतम लंबाई मिलने पर प्राकृतिक सीक्वेंस बढ़ना क्यों बंद करे। चौथा या पाँचवाँ लगातार पत्ता उसी सीक्वेंस में रह सकता है। पूरे तेरह पत्तों की वैध बनावट जरूरी है।

कमला ने लंबी सीक्वेंस और अलग निशानों वाले चार पत्तों के सेट का अभ्यास किया। हाथ बेहतर रास्ता दे तो उन्हें छोड़ने का भी। लंबी जोड़ उसमें मौजूद पत्तों से उपयोगी थी, छोटी से अधिक विद्वान दिखने से नहीं।

हर पूरी बाजी के बाद निशानों से समूह कागज पर बनाती। जो लोग उसके सारे बोले शब्द नहीं साझा करते, वे भी पन्ना समझते। उसी दिखाई जानकारी पर उँगली रखकर फैसलों की बहस होती।

रोहित ने पन्ना देखकर स्कूल का अभ्यास कहा। कमला लिखती रही। चिह्न दिखाते कि पत्ता कहाँ लगा, क्या अलग बचा और कौन-सा आने वाला पत्ता मदद करेगा। फैसले जाँचने में आसान हुए, वे भी जिनकी जगह वह दूसरा निर्णय लेना चाहती थी।

4. एक बाजी पीछे

चुनौती की पहली बाजी रोहित ने जीती। जरूरी सीक्वेंस जल्दी बनाईं और कमला के पूरा करने से पहले बाकी समूह बना लिया। उसका अपना हाथ पास था, लेकिन घोषणा नहीं थी। उसका परिणाम पक्का होने के बाद पत्ते फैलाकर देखा कि निष्फल जोड़ी ज्यादा देर रखी थी।

रोहित ने गलती अंग्रेजी में समझाई, फिर उसके लिए अपनी बात हिंदी में बताने लगा। पहले वाक्य पर कमला ने रोक दिया।

“देख लिया। आगे खेलें।”

दूसरे हाथ का ढाँचा अलग था। पहली बाजी की मरम्मत के लिए वही जोड़ी इस बार सफल बनाने की कोशिश नहीं की। प्राकृतिक चिड़ी की सीक्वेंस जल्दी बनी। उपयोगी चौथा पत्ता रखा, दूसरी सीक्वेंस से बाकी व्यवस्था की और वैध अंत तक पहुँची।

एक-एक।

अधिकारी ने पुष्टि सीधे उससे की। उसने उसी साफ हाथ से परिणाम पर हस्ताक्षर किए जिससे ठेले की सूची लिखती थी। पीछे रिया ने फोन रख दिया और रोहित से पूछे बिना स्कोर देखना शुरू किया।

जाँच के बाद भांजे ने खुला हाथ देखा। चार पत्तों की सीक्वेंस सामान्य रमी थी, लेकिन बाकी समूह बदलते हुए मौसी उसे इतनी सहजता से बचाए रखेगी, यह उम्मीद नहीं थी। लौटाने से पहले अपने पत्ते फिर सजाए और छूटा विकल्प परखा।

कमला ने पानी पिया। मैच दोनों खिलाड़ियों का होने लगा था। अगली बाजी के लिए उसने खाली मेज पर हाथ रखा और नई गड्डी की प्रतीक्षा की।

5. तीसरी और चौथी बाजी

तीसरी में रोहित अच्छे समायोजन से जीता। मदद बंद कर चुका बड़ा पत्ता छोड़ा और छोटी सीक्वेंस पूरी की। हाथ खुलने पर कमला ने फैसला देखा। खराब सुनने वाला था इसलिए खराब खिलाड़ी मानना उसका उद्देश्य नहीं था।

वह दो-एक आगे हुआ।

विराम में पूछा कि कमला थक गई है क्या। दूसरे स्वर में सवाल चिंता होता। यहाँ उसमें उम्मीद थी कि वह चुनौती छोड़ने का सुविधाजनक कारण ले लेगी।

“चार बाजियाँ उपलब्ध हैं,” उसने कहा। “अगली के लिए तैयार हूँ।”

चौथी धीमी प्रतियोगिता बनी। दोनों के उपयोगी शुरुआती समूह थे। तुरंत अंत किसी को नहीं मिला। कमला ने खुले ढेर से उठे पत्ते देखे, पूरा हाथ पता होने का दावा नहीं किया। एक संभावित त्याग उसके लिए मददगार लगा तो दूसरा विकल्प तुलना किया। सब कुछ अनिश्चित काल रखने नहीं लगी।

चुने रास्ते में काम की संभावना रही। कई बारी बाद पूरा करके घोषणा की। अधिकारी ने सीक्वेंस और बाकी सेट जाँचा। सही।

दो-दो।

रोहित ने उन घोषणाओं का अनुवाद करना बंद किया जिनका वह जवाब दे चुकी थी। बदलाव छोटा था। कमला ने छोटा रहने दिया। अगला हाथ खेलना था।

हॉल के दूसरी तरफ काव्या देख रही थी। उसकी कॉपी बंद बैग में थी। अभ्यास अब केवल सीखी आदतों के रूप में कमला के साथ आ सकता था। उसने आगे झुककर अगली बाजी के पत्ते लिए और उन्हें अपने ढंग से सजाया।

6. बढ़त और उसका उत्तर

पाँचवीं बाजी कमला जीती। शुरुआत में आकर्षक अंक बहुत थे, संबंध कम। हर बड़ी जोड़ी बचाने के बजाय ऐसा संयोजन चुना जिसमें दो वास्तविक सीक्वेंस के रास्ते थे। नए पत्तों से चुनाव साफ हुआ तो बाकी छोड़े।

अंतिम घोषणा जाँची गई। वह तीन-दो आगे हुई। एक जीत और मैच पूरा होता।

रोहित कुछ सेकंड स्थिर बैठा। फिर छठी बाजी उस एकाग्रता से खेला जो कमला शुरू से चाहती थी। खुला ढेर देखा, जरूरत पर योजना बदली और उसके पूरा करने से पहले सही हाथ बनाया।

तीन-तीन। सातवीं सब तय करती।

रिया सावधानी से पानी भरने उठी। विराम में कमला उससे खेल क्षेत्र के किनारे मिली। बेटी ने पूछा कुछ चाहिए क्या। कमला ने कहा कि जरूरत का सब है।

“मुझे नहीं पता था इतना अभ्यास कर रही हो,” रिया ने कहा।

“तुम्हें पता था बाहर जाती हूँ।”

रिया संकोच में आई, फिर मुसकराई। “अगली बार पूछूँगी कि किस पर काम कर रही हो।”

कमला ने उसकी बाँह छुई और मेज पर लौटी। बातचीत इतनी छोटी थी कि मैच की एकाग्रता बची रही। रोहित पहले से बैठा वही प्रारूप पढ़ रहा था जिसे उसने सोचा था कि मौसी कठिन समझेगी। पहले चार जीत। एक बाजी बाकी।

कमला ने कुर्सी थोड़ा सीधी की। पूरे दिन की मेहनत को अगले पत्ते से अलग रखते हुए उसने आखिरी वितरण का इंतजार किया।

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7. बारह पत्तों की अपनी जगह

आखिरी हाथ ऐसे बना जैसा रोहित ने उससे कम देखा था। छोटी-छोटी कई जोड़ खोजने के लिए बाँटने के बजाय कमला ने बढ़ती पान की सीक्वेंस साथ रखी। दस, गुलाम, बेगम और बादशाह से चार प्राकृतिक पत्ते बने।

अलग चिड़ी की सीक्वेंस दो, तीन, चार, पाँच हुई। चार सात, हर निशान का एक, सही सेट बने। बारह पत्तों की कानूनी जगह थी। अकेला ईंट का नौ बाहर था।

उसे उपयोगी तेरहवाँ चाहिए था जो किसी सीक्वेंस को बढ़ाए और नौ छोड़ा जा सके। अगला पत्ता मिलने का कोई अधिकार नहीं था। रोहित भी हाथ बना रहा था। उसकी घोषणा पहले आ सकती थी।

उसने बंद गड्डी से उठाया, व्यवस्था देखी और पान का इक्का छोड़ा। अपने हाथ में अकेला था। उसे कमला की छिपी पान की सीक्वेंस नहीं दिख रही थी। ठीक कितना उपयोगी होगा, नहीं जान सकता था।

कमला ने खुले इक्के को देखा। पुराने ढंग में सोचती तो चार पत्तों की सीक्वेंस में पाँचवाँ अनावश्यक लगता। अब सही काम दिखा। बादशाह और इक्के पर समाप्त प्राकृतिक सीक्वेंस का हिस्सा बनेगा और अलग ईंट का नौ निकलेगा।

उसने खुले ढेर से इक्का उठाया। रोहित उसे हाथ में लगाते देखता रहा। पहली बार उस शाम ऐसा लगा कि वह एक पल पूछना चाहता है कि उसने क्या देखा। कमला ने उत्तर बोलने के बजाय समूह दोबारा गिने।

8. पाँच, चार, चार

अंतिम त्याग से पहले कमला ने बनावट जाँची। पान के दस-गुलाम-बेगम-बादशाह-इक्का। चिड़ी के दो-तीन-चार-पाँच। चिड़ी, ईंट, पान और हुकुम के सात। पाँच पत्ते, चार पत्ते, चार पत्ते—तेरह।

इक्का पान की सीक्वेंस के बड़े सिरे पर था। चिड़ी की सीक्वेंस अलग थी। चार सात के निशान अलग थे। हर वास्तविक पत्ते की एक जगह। उसने ईंट का नौ छोड़ा और घोषणा की।

अधिकारी ने समूह रखने को कहा। रोहित ऐसे हिला जैसे व्यवस्था समझाने वाला हो, फिर रुक गया। कमला ने खुद हर समूह साफ रखा।

हाथ सही था। सातवीं बाजी और चार-तीन से मैच उसका था।

पहली आवाज रिया की एक तेज ताली थी। फिर बाकी जुड़े। अधिकारी का परिणाम लिखना पूरा होने तक कमला पत्तों को देखती रही। फिर रोहित को देखा।

उसने पाँच पत्तों की पान की सीक्वेंस जाँची। विजयी बनावट को जटिल भाषण नहीं चाहिए था। उस छोटी व्यवस्था से आगे पत्ते की भूमिका देखनी थी जिसे वह मौसी का पूरा ज्ञान समझ रहा था।

“चारों सात रखे,” उसने कहा।

“वे अपना काम कर रहे थे। नौ नहीं।”

वह एक बार बिना उपहास हँसा और हस्ताक्षर किए। अधिकारी ने नाम और अंतिम अंक पढ़े। रोहित ने सबकी तरह साफ सुना—कमला, चार; रोहित, तीन। अब उसके पास समझाने के लिए किसी और की आवाज नहीं थी।

9. वह सवाल जो ठीक से पूछा

पुरस्कार में रोहित उसके आगे नहीं, बगल खड़ा था। आयोजक ने अंतिम हाथ पूछा तो उसने कमला की तरफ देखा और इंतजार किया।

उसने बताया कि इक्का क्यों काम आया। एक श्रोता ने पूछा कि केवल वही इंतजार था क्या। कमला ने सीक्वेंस बढ़ाने वाले दूसरे संभावित पत्ते बताए, यह दिखावा किए बिना कि कौन आएगा जान सकती थी। बात बचाई बनावट की थी, गड्डी की भविष्यवाणी की नहीं।

काव्या अतिरिक्त गड्डी लाई और इक्का आने से पहले की स्थिति बनाने में मदद की। कमला ने अकेला नौ और पहले से व्यवस्थित बारह दिखाए। नए श्रोता जुड़े तो समझाना हिंदी और अंग्रेजी के बीच गया। पत्तों के चिह्न वही रहे।

रोहित ने पूछा कि चार पत्तों का सेट पहले तोड़ना बेहतर होता क्या। स्थिति का वास्तविक प्रश्न था, चिंता में छिपा निर्देश नहीं। कमला ने पुरानी बारी उसके साथ देखीं और प्रत्येक पर उपलब्ध जानकारी बताई।

रिया आराम से टखना रख सकने वाली कुर्सी में पास बैठी थी। आयोजक ने तस्वीर को कहा तो उसने माँ के जवाब पूरे होने के बाद लेने को कहा।

कमला ने देखा। खड़े होने से पहले समझा रही लाइन पूरी की।

विजेता की पट्टिका बैग में शब्दों वाले पन्ने के पास गई। दोनों ने नए शहर में जगह बनाने में मदद की थी। किसी को दूसरे को छिपाने की जरूरत नहीं थी। उसने बैग बंद किया और रिया के साथ दरवाजे की ओर चली।

10. वह घंटा जो उसका रहा

अगले सप्ताह रिया घर का अधिक काम फिर सँभालने लगी। कमला के दो अभ्यास दोपहर बने रहे। रसोई के कैलेंडर में साथ समय लिखा। आसपास की व्यवस्था सामान्य हुई, जीत के बाद दिया उपकार नहीं।

रोहित एक सत्र में सातवीं बाजी का स्कोर और पुराने त्याग का सवाल लाया। समूह को नमस्कार किया, कमला के सामने बैठा और काव्या से उसकी बात पूरी होने दी। अधिकारी ने अंग्रेजी में घोषणा की तो एक बार उसे देखा, मगर जवाब नहीं दिया।

कमला ने न समझा शब्द पूछा। अधिकारी ने समझाया। फिर पत्ते बाँटे गए और उसने अपने फैसले किए।

महीने में बाद में वह लखनऊ गई और कुछ दिनों के लिए शिल्प का ठेला खोला। ग्राहकों के बीच पुराने खेलने वाले दोस्त को अंतिम तेरह पत्तों की बनावट दिखाई। उसने पहले का निर्णय सुधारने की कोशिश की। दोनों खुशी से बहस करते रहे, जब तक ग्राहक ने पूछा कि फैले पत्ते भी सामान का हिस्सा हैं क्या।

कमला ने गड्डी रखी और ग्राहक को सामान दिया। शाम को हैदराबाद समूह में लौटने की तारीख पक्की लिखी।

अगली कुर्सी अभ्यास की सूची में थी। रोहित ने पूछा कि अगला आयोजन समझने में मदद चाहिए क्या। उसने नियमों की तस्वीर भेजी, जिस पर एक सही प्रश्न चिह्नित था।

इस बार उसने केवल उसी प्रश्न का उत्तर दिया। कमला ने उसे पढ़ा, अपनी कॉपी में छोटी टिप्पणी की और अगले अभ्यास की तारीख घेर दी।

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