1. Yes Spin: हॉल के बाहर मैंने क्या कहा
मैंने हॉल के बाहर खड़े लोगों से कहा कि मैंने अपनी बहन को जानबूझकर जीतने दिया था।
यह वाक्य बोलना आसान था। बरसों से मैं इसके अलग-अलग रूप बोलता आया था। इशिता वह मोटर ठीक कर देती जिसे मैं ठीक नहीं कर पाता, तो मैं कहता कि आसान काम उसके लिए छोड़ दिया था। अभ्यास में वह मुझे हरा देती, तो कहता कि मैं नई चाल आजमा रहा था। उसके काम को अपनी मेहरबानी बताने का कोई रास्ता मुझे हमेशा मिल जाता था।
उस रात मैंने कहा कि किसी भाई को फाइनल में अपनी छोटी बहन का दिल तोड़ने की क्या जरूरत है।
चाय की दुकान के पास खड़ा आदमी मुझे देर तक देखता रहा। फिर उसने फोन निकाला और आखिरी बोर्ड की रिकॉर्डिंग चला दी।
छोटी स्क्रीन पर मेरा चेहरा था। मैं होंठ भींचे, कंधे उठाए, गोटियों की स्थिति देख रहा था। इशिता की आखिरी सफेद गोटी गिरते ही मैंने ऐसे आँखें बंद कर ली थीं जैसे अचानक तेज रोशनी पड़ गई हो।
आदमी ने कहा, “अगली बार उदार दिखने का थोड़ा अभ्यास करके आइएगा।”
किसी ने मेरे साथ हँसने की कोशिश नहीं की।
मैं इकतालीस का था। इशिता तैंतीस की थी। उसने अभी जिला कैरम फाइनल में मुझे हराया था। मैं बाहर खड़ा ऐसा वाक्य खोज रहा था जो उसकी जीत को फिर मेरे फैसले में बदल दे।
वह सीढ़ियों से उतरी। एक हाथ में कप था, दूसरे में मरम्मत के औजारों वाला पुराना बैग। लोग उसे बधाई देने के लिए रास्ता बनाते गए।
पहली बार किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि वह कौन है।
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2. Yes Spin की कहानी: मेरे पिता की पत्नी की बेटी
मेरे पिता ने दूसरी शादी की थी, तब मैंने इशिता की माँ से कहा था कि मैं उनकी बेटी का ध्यान रखूँगा। मेहमानों के सामने यह बात कहना मुझे खास अच्छा लगता था। इससे मैं अपनी उम्र से ज्यादा जिम्मेदार और दयालु दिखाई देता था।
बरसों बाद, जब हम दोनों बड़े हो चुके थे, एक पारिवारिक कार्यक्रम में मैंने इशिता का परिचय दिया: मेरे पिता की पत्नी की बेटी। एक चचेरे भाई ने पूछा कि इसका सीधा मतलब मेरी बहन ही तो हुआ।
मैंने बात बदल दी।
वह हमारी मरम्मत की दुकान पर काम करती थी। ग्राहक जान गए थे कि किसी और के ठीक करने के बाद खराबी लौट आए तो इशिता से पूछना चाहिए। हिसाब मैं रखता था। उसकी मेहनत की मजदूरी को मैं परिवार की मदद कहता था।
उसकी माँ की मृत्यु के बाद मैंने तय किया कि उसका कमरा किराए पर दिया जा सकता है। वह दुकान पर थी जब मैंने दरवाजे पर नया ताला लगवा दिया। कपड़े और औजार सीढ़ियों के पास दो गत्ते के डिब्बों में रख दिए गए।
उसने पूछा, “मैं सोऊँगी कहाँ?”
मैंने कहा कि अब वह इतनी बड़ी हो गई है कि अपना इंतजाम कर सकती है।
कुछ जवाब सुनने के बाद लोग एक खास तरह से चुप हो जाते हैं। इशिता वैसे ही चुप हो गई। फिर वह डिब्बे में माँ का दिया छोटा पेचकस ढूँढ़ने लगी।
जाने से पहले उसने कैरम प्रतियोगिता की उस प्रविष्टि के बारे में पूछा जिसे जमा करने का वादा मैंने किया था। मैंने वह प्रविष्टि रद्द कर दी थी। उसके खेलने जाने पर दुकान मुझे सँभालनी पड़ती।
मैंने कहा कि आयोजकों ने अपना कार्यक्रम बदल दिया है।
उसने विश्वास कर लिया। फिर प्रतियोगिता का ड्रॉ प्रकाशित हुआ।
3. जिस नतीजे को मैंने नहीं पढ़ा
इशिता ने एक और वयस्क मरम्मत कर्मचारी के साथ रहने के लिए कमरे का कोना किराए पर लिया। कई हफ्ते वह अपने औजार हर जगह साथ ले जाती रही। वहाँ ऐसी अलमारी नहीं थी जिस पर अपना ताला लगा सके।
यह मुझे इसलिए मालूम है क्योंकि एक बार मैं ग्राहक का पुर्जा लेने वहाँ गया था। खराब पंखों वाली शेल्फ के पास उसका बिस्तर लपेटकर रखा था। उसने पुर्जे के पेंच गिनकर छोटी थैली में रखे और मुझे पकड़ा दिए। बैठने के लिए नहीं कहा।
उसका नया अभ्यास बोर्ड एक मनोरंजन समूह का था। उसने बोर्ड का स्टैंड ठीक किया, उस काम की तय मजदूरी ली, फिर शाम के अभ्यास सत्रों में शामिल होने का तरीका पूछा। वहाँ ऐसे खिलाड़ी थे जिनसे एक बोर्ड जीतने के लिए भी अच्छी मेहनत करनी पड़ती थी।
मैंने सुना कि वह अपना शुरुआती क्लब मैच हार गई है। यह खबर मैंने कई लोगों को सुनाई। अगला मैच वह जीत गई। उस नतीजे का जिक्र मैंने नहीं किया।
बाद में एक क्वालिफायर में मैंने उसे खेलते देखा। पहले वह एक मुश्किल रिबाउंड आजमाती। उस दिन उसने आसान और साफ रास्ते से बोर्ड समाप्त करना चुना। बोर्ड जीता, फिर मैच भी। मैंने खुद से कहा कि सामने वाले ने मौका दे दिया होगा।
फिर जिला प्रतियोगिता की क्वालिफाइंग सूची आई। उसका नाम मेरे नाम से ऊपर था।
मैंने सूची दो बार पढ़ी। शायद अंक जोड़ने का कोई ऐसा नियम मिल जाए जिससे क्रम बदल जाए।
क्रम नहीं बदला। उसने अपनी जगह हासिल की थी। मैंने भी अपनी जगह बनाई थी। शुरुआती मुकाबले हम दोनों जीत लेते, तो फाइनल में एक ही बोर्ड के आमने-सामने बैठना तय था।
4. कैमरा उसके हाथ पर था
प्रतियोगिता से पहले मैंने इशिता को एक पुराने स्ट्राइकर के बारे में संदेश भेजा था जो कभी उसे दिया था। जवाब में उसने छोटा वीडियो भेजा। उसमें वापसी के लिए पैक किया स्ट्राइकर दिखाई दिया, फिर कुछ सेकंड उसका अभ्यास।
मैंने पैकेट देखा। अभ्यास वाले हिस्से पर ध्यान नहीं दिया।
फाइनल के बाद उसने पूरा अभ्यास क्रम मुझे देखने दिया। कैमरा उसके चेहरे की ओर नहीं, हाथ की ओर था। बोर्ड के किनारे की कुशन के पास एक सफेद गोटी पड़ी थी। जिस दिशा से वह आम तौर पर सामने की ओर स्ट्रोक लेती थी, उस रास्ते का जरूरी संपर्क दूसरी गोटी रोक रही थी।
उसने बेसलाइन पर स्ट्राइकर को दूसरी वैध जगह रखा। फिर अँगूठे से पीछे की तरफ पतला कट लगाया। पहली कोशिश चूक गई। दूसरी में सफेद गोटी का जरूरत से ज्यादा हिस्सा छू गया। तीसरी में गोटी तो गई, लेकिन स्ट्राइकर अगली गोटी के लिए खराब जगह रुका।
कैमरे के पीछे से आवाज आई, “फिर वही स्थिति लगाओ।”
अगली रिकॉर्डिंग दूसरे बोर्ड की थी। वहाँ स्ट्राइकर उम्मीद से ज्यादा आगे गया। उसने ताकत कम की और फिर कोशिश की।
उसकी नोटबुक में संपर्क का बिंदु, ताकत और स्ट्राइकर के रुकने की जगह लिखी थी। एक गोटी पॉकेट करना काम का सिर्फ पहला हिस्सा था। उसके बाद भी खेलने लायक रास्ता बचना चाहिए था।
मैं महीनों से लोगों को समझा रहा था कि मशीनें ठीक करने के कारण उसके हाथ स्थिर हैं। वीडियो में गलत कोशिशें, बदली हुई पकड़ और बार-बार सजाई गई गोटियाँ दिखाई दे रही थीं। उन्हीं हाथों को कैरम के लिए तैयार करने में उसने कितनी शामें लगाई थीं, पहली बार मैंने पूरा देखा।
5. पहला गेम मैं जीता
फाइनल तीन गेम में से दो जीतने का था। हर गेम पच्चीस अंक या घोषित आठ बोर्ड की सीमा तक खेला जाना था। इशिता मेरे सामने बैठी। उसने औजारों का बैग कुर्सी के नीचे रखा और अंपायर की घोषणा का इंतजार किया।
पहला गेम मैंने पच्चीस-चौदह से जीता।
मैं अच्छा खेला था। उसने जो मौके छोड़े, मैंने लिए। क्वीन के लिए काम आने वाले कवर बचाए। दो बार उसके ज्यादा तेज स्ट्रोक का फायदा उठाया। दूसरी गलती के बाद उसके कंधों में तनाव आया। वह भाव मैं दुकान से पहचानता था।
बरसों तक वह भाव देखते ही मैं उसके हाथ का काम अपने हाथ में ले लेता था, फिर सबके सामने जोर से समझाता था कि सही तरीका क्या है।
अंतराल में लगभग कह ही दिया था कि उसके लिए यहाँ तक आना काफी है।
मेरे बोलने से पहले वह मुड़ गई। खेलने की जगह से बाहर अपने अभ्यास साथी से बात करने लगी। उनकी बातचीत मुझे सुनाई नहीं दी। लौटकर उसने कुर्सी ठीक की और मेरी ओर देखे बिना हाथ की स्थिति परखी।
दूसरे गेम में उसकी चाल बदल गई। जो गोटियाँ उपलब्ध थीं, उन्हें लेती गई। हर भीड़ वाले हिस्से को तुरंत खोलने की कोशिश नहीं की। कोई स्ट्रोक चूकता, तो अगली बारी में सामने की मौजूदा स्थिति देखती। पिछले मौके को जबरदस्ती वापस बनाने में नहीं पड़ती।
मुझे मौके अब भी मिल रहे थे। लेकिन उनसे फायदा लेने के लिए सही जगह और सही ताकत चाहिए थी।
दूसरे गेम के बीच तक मैंने सोचना बंद कर दिया कि जीतने के बाद रिश्तेदारों से क्या कहूँगा। अगला स्ट्रोक खेलने के लिए पूरा ध्यान बोर्ड पर रखना पड़ रहा था।
6. दूसरे गेम की रफ्तार उसने तय की
दूसरा गेम इशिता ने पच्चीस-अठारह से जीता।
कई बोर्डों में उसने बढ़त बनाई। एक बोर्ड में क्वीन पॉकेट करने से पहले अगली गोटी का सीधा कवर तैयार रखा। दूसरे में आकर्षक हमला छोड़ दिया, क्योंकि उससे मेरी बची हुई गोटियाँ बहुत आसानी से खुल जातीं।
उसके फैसलों पर मुझे गुस्सा इसलिए आ रहा था क्योंकि उनकी वजह साफ दिखाई दे रही थी।
मैंने खेल की रफ्तार बढ़ाने की कोशिश की। अपना स्ट्राइकर जल्दी तैयार कर लेता। उसकी बारी आती तो आगे झुककर बैठ जाता। वह तय समय के भीतर खेलती रही। जिस संपर्क की जरूरत थी उसे देखकर ही स्ट्रोक लेती।
निर्णायक गेम में पहले मैंने थोड़ी बढ़त बनाई। उसने बराबरी की। मैं फिर आगे हुआ। बीच में हमें तरफ बदलनी पड़ी। जिन कोणों पर पूरी शाम भरोसा किया था, वे दूसरी सीट से बदल गए थे।
उसने मेरी उम्मीद से जल्दी खुद को ढाल लिया। मुझे लगा था कि एक गोटी उसके लिए बहुत खराब जगह छोड़ी गई है। नई जगह से उसे उसका रास्ता मिल गया। उसने छोटा, नियंत्रित स्ट्रोक लिया और स्ट्राइकर को पॉकेट से दूर रखा।
छह बोर्डों के बाद मेरे बीस अंक थे। उसके उन्नीस।
नियम के अनुसार दो बोर्ड बाकी हो सकते थे। लेकिन हममें से कोई भी उससे पहले पच्चीस तक पहुँचकर गेम समाप्त कर सकता था।
मैंने अंक देखे। अंदर वही पुरानी बेचैनी थी कि अगला नतीजा साबित करे, मैं उसके बारे में हमेशा सही कहता आया हूँ।
इशिता ने अंकतालिका से नजर हटाकर नई सजी गोटियाँ देखीं। अंपायर ने खेल शुरू करने को कहा।
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7. तीन सफेद, तीन काली
सातवें बोर्ड की एक शुरुआती बारी में इशिता ने क्वीन पॉकेट करके उसका वैध कवर भी कर लिया। जवाब में मैंने कई काली गोटियाँ निकाल लीं। क्वीन उसके पास थी, लेकिन बोर्ड जीतने के लिए अपनी बाकी गोटियाँ भी समाप्त करनी थीं।
कुछ देर बाद बोर्ड पर उसकी तीन सफेद और मेरी तीन काली गोटियाँ बची थीं।
मेरी एक काली तक पहुँचने का मुश्किल रास्ता था। वह चली जाती तो आगे का स्ट्रोक भी बन सकता था। मैंने कोण देखा, ताकत तय की और स्ट्राइकर मारा। काली गोटी पॉकेट के किनारे से लगी, मगर अंदर नहीं गई।
बाद में उसी चूक को मैंने तोहफा कहने की कोशिश की। उस समय पेट के अंदर जो ऐंठन उठी थी, वह मुझे अच्छी तरह याद है।
बारी इशिता के पास गई।
उसकी एक सफेद गोटी किनारे की कुशन के पास थी। जिस सामने वाले रास्ते से उसके खेलने की उम्मीद थी, मेरी एक काली उसे रोक रही थी। पहली गोटी के बाद नियंत्रण बना रहता, तभी बाकी दो सफेद अच्छी तरह उपलब्ध रहतीं।
मुझे लगा था कि मुझे एक बारी और जरूर मिलेगी।
उसने बेसलाइन पर स्ट्राइकर को दूसरी वैध जगह खिसकाया। हाथ की स्थिति बदली। वह अँगूठे वाला स्ट्रोक तैयार करने लगी जिसे पुराने वीडियो में मैंने अनदेखा कर दिया था।
पहचान पहले आई, समझ बाद में। यह गोटियों का जमाव मैं देख चुका था। लेकिन याद नहीं आ रहा था कि इसके बाद उसके दूसरे स्ट्रोक की दिशा क्या थी।
उसने सफेद गोटी और पॉकेट को देखा। स्ट्राइकर स्थिर किया। फिर पीछे की तरफ बहुत पतला कट लगाया।
सफेद गोटी रुकावट से अलग होकर निकली। मेरी काली वहीं रह गई।
8. मैं स्ट्राइकर के गिरने का इंतजार करता रहा
पहली सफेद गोटी पॉकेट में गई। इशिता का स्ट्राइकर बोर्ड पर सुरक्षित रहा।
उसकी बारी जारी थी।
अगली सफेद का स्ट्रोक छोटा था। वह उसे तैयार कर रही थी और मैं उम्मीद कर रहा था कि अब वह उत्साह में ज्यादा जोर लगा देगी। शायद आखिरी गोटी बिगड़ जाएगी। शायद एक मौका फिर मेरे पास आ जाएगा।
उसने उतनी ही ताकत इस्तेमाल की जितनी गोटी को पूरा रास्ता देने के लिए चाहिए थी। आखिरी सफेद खेलने लायक जगह पर रही।
अंतिम स्ट्रोक से पहले ही मुझे हिसाब मालूम था। मेरी तीन काली गोटियाँ बोर्ड पर बची थीं। इशिता अपनी आखिरी सफेद निकाल देती, तो उसे इन तीन गोटियों के तीन अंक मिलते। क्वीन उसने पहले कवर की थी। उसके उन्नीस अंक होने के कारण क्वीन के तीन अंक भी मिलते। कुल छह उसे सीधे पच्चीस पर पहुँचा देते।
मैं थोड़ा पीछे बैठ गया ताकि मेरी देह उसकी नजर के रास्ते में न आए। बरसों तक उसके हर काम के सामने खड़े रहने के बाद यह बहुत छोटा-सा हटना था।
उसने आखिरी स्ट्रोक लिया।
सफेद गिर गई। मेरी आँखें स्ट्राइकर पर थीं। कोई फाउल हो जाए तो अभी देखा नतीजा बदल सकता था। स्ट्राइकर की रफ्तार कम हुई। वह सुरक्षित रुक गया।
अंपायर ने छह अंक घोषित किए। पच्चीस-बीस। निर्णायक गेम इशिता का था। मैच भी दो-एक से उसका।
नतीजा पक्का होने तक वह बैठी रही। फिर उसने हाथ बढ़ाया।
मैंने हाथ मिलाया। उसकी पकड़ गर्म और स्थिर थी। बरसों से लोगों को इन्हीं हाथों के बारे में समझाता आया था। उस क्षण मेरे पास कहने को कुछ नहीं था।
9. रिकॉर्डिंग ने मेरी बात नहीं मानी
नतीजे की शीट पर तीनों गेम क्रम से लिखे थे। पच्चीस-चौदह, मेरे पक्ष में। पच्चीस-अठारह, इशिता के पक्ष में। पच्चीस-बीस, इशिता के पक्ष में।
मैंने हस्ताक्षर किए।
पुरस्कार लेते समय उसने उन लोगों के नाम लिए जिन्होंने उसके साथ अभ्यास किया था। मनोरंजन समूह को समय देने के लिए धन्यवाद कहा। मुश्किल स्ट्रोक रिकॉर्ड करने वाले साथी का नाम लिया। उस सूची में मेरा नाम नहीं था।
वजह मुझे पूरी मालूम थी। फिर भी अपना नाम न सुनकर बुरा लगा।
वही खीझ लेकर मैं बाहर आया था। चाय की दुकान पर खड़े लोगों से कहा कि मैंने उसे जीतने दिया। रिकॉर्डिंग ने उन्हें मेरी बात सुनने के बजाय मेरा चेहरा देखने पर मजबूर कर दिया।
बाद में आयोजक ने आखिरी बोर्ड की छोटी-सी समीक्षा में मुझे बुलाया। इशिता वहाँ पहले से थी। वीडियो उसके अँगूठे वाले स्ट्रोक से ठीक पहले रोका गया।
“उसे यहाँ क्या दिखाई दिया?” आयोजक ने पूछा।
मैं अपनी छूटी हुई काली के बारे में फिर बोल सकता था। इसके बजाय स्क्रीन पर रुकी स्थिति देखी।
“बेसलाइन से दूसरी दिशा,” मैंने कहा। “और उसके बाद दोनों सफेद गोटियों का रास्ता बचाए रखने का तरीका।”
इशिता ने वीडियो आगे चलने दिया। पहली सफेद गिरी। स्ट्राइकर सुरक्षित रुका।
आयोजक ने पूछा, “अगर वह आपको दूसरी बारी देती, तो आप निकाल सकते थे?”
“मौका मिलता।”
उसने सिर हिलाया और अगला स्ट्रोक चलाया। इशिता समझाने लगी कि पहले और दूसरे स्ट्रोक में ताकत क्यों बदली थी।
इस बार मैंने उसकी बात पूरी होने दी।
10. वह फॉर्म जो मैं उसके लिए नहीं भर सका
एक हफ्ते बाद मैं इशिता के नए काम के कमरे पर गया। दरवाजे पर उसका नाम लिखा था। अंदर खुली हुई पंखे की मोटर के पास कैरम का व्यवस्थित बैग रखा था। अभ्यास बोर्ड दीवार से लगा था। दिन की मरम्मत पूरी होने पर उसे उतारा जा सकता था।
मैं उस प्रतियोगिता की फीस लाया था जिसकी प्रविष्टि मैंने रद्द की थी। पुराने संदेश भी साथ थे, जिनसे साफ दिखाई देता था कि मैंने क्या किया था। मैंने सीधे बताया कि आयोजकों ने उसकी जगह कभी रद्द नहीं की थी।
उसने संदेश पढ़े। पैसे एक लिफाफे में रखे और छोटी-सी रसीद लिखी।
“यह देना बाकी था,” उसने कहा।
“हाँ।”
वह मोटर की ओर लौट गई। मैंने इंतजार किया। ढक्कन के पेंच कसकर पूरा करने के बाद मैंने पूछा कि अगली प्रतियोगिता के पंजीकरण के लिए उसे छोड़ आऊँ क्या।
उसने कहा कि अभ्यास साथी के साथ जाने का इंतजाम हो चुका है।
पंजीकरण वाले दिन मैंने उसे अपना फॉर्म भरते देखा। तारीखें जाँचीं, हस्ताक्षर किए और अधिकारी को पकड़ा दिया। वह कागज मेरे हाथ से होकर नहीं गया।
फाइनल में मुझे देख चुका एक स्वयंसेवक पास आया। उसने पूछा कि हम एक-दूसरे को कैसे जानते हैं।
“मेरी बहन है,” मैंने कहा।
इशिता ने सुन लिया। पेन रखते हुए उसका हाथ एक पल रुका। फिर उसने अधिकारी को धन्यवाद कहा और बाहर अपने अभ्यास साथी से मिलने चली गई।
मैं अपनी प्रविष्टि जाँचने के लिए रुक गया। नतीजों वाले बोर्ड पर पहुँचा तो हमारा फाइनल अब भी लगा था।
इस बार किसी ने उसके बारे में पूछा, तो मैंने कहा, “उसने मुझे हराया था।”
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