1. YN777: बिना विरोधी का निमंत्रण
कुसुम के निमंत्रण में समय, जगह और वर्षगाँठ की तस्वीर के लिए अच्छे कपड़े पहनने का अनुरोध था। विरोधी नहीं था। छियालीस साल की उसने दो बार पढ़कर सचिव को फोन किया।
“छोटी प्रदर्शनी है। नए खिलाड़ियों के साथ बैठ सकती हैं। पुराने योगदान का सम्मान करेंगे।”
कुसुम ने ओपन प्रतियोगिता में प्रवेश माँगा था। सचिव ने पुराने अभ्यास साथी अरुण को फोन दिया। वह उस नरमी से बोला जो अपमान से ज्यादा बुरी लगती। “बहुत समय बाहर रही हो। सुखद दोपहर देने दो।”
अनुपस्थिति में नौकरी, परिवार और छोटे भाई की कठिन बीमारी से उबरने की देखभाल थी। क्लब आगे चला, समझने योग्य था। बिना चयन खेल देखे वापसी को तस्वीर बना देना एक चुनाव था।
फॉर्म लेने गई तो अरुण ने स्मृति शॉल दिया। कुछ तालियाँ बजीं। मुस्कुराने को कहा गया। चमकती रोशनी में कपड़ा पकड़े लगा जैसे बिना सहमति समारोह में उसका खेल दफन किया जा रहा हो।
उसने शॉल मेज़ पर रखकर फिर फॉर्म माँगा। अरुण की मुस्कान रुकी। सचिव ने छपी पात्रता देखी। वह पूरी करती थी। उसी स्याही में नाम गया जिसमें बाकी लिखे थे।
कुसुम ने प्रति ली और बैग में रखी। किसी ने फिर तस्वीर को नहीं रोका। वह फॉर्म लेकर बाहर निकली। अगली मुलाकात में सामने खाली कुर्सी की जगह खिलाड़ी का नाम होना चाहिए था। अब उसी के लिए तैयारी करनी थी।
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2. YN777 कथा: बिसात के उस पार की जगह
पहला अभ्यास कठोर था। कुसुम योजनाएँ उनके परिणाम गिनने से बेहतर याद करती। परिचित हमला विरोधी के शांत बचाव से खत्म हुआ। वह अंतखेल हारी जिसे कभी बिना मोहरा चलाए समझा सकती थी। अरुण दूसरी मेज़ से देख रहा था। “प्रदर्शनी ज्यादा दयालु होती।”
कुसुम लिखी स्थितियाँ समेटकर बिना उत्तर घर गई। अब स्वतंत्र रहने वाले भाई ने खाना रख छोड़ा था। नोट में पूछा अभ्यास कैसा रहा। उसने खराब लिखा और बोर्ड खोलने से पहले खाया।
ईमानदारी ने शुरुआत दी। पुरानी तस्वीर का खिलाड़ी एक साथ वापस नहीं चाहिए था। उसी शाम की हारी स्थिति समझनी थी।
शांत बचाव के बाद चुनाव था। गायब हमला बनाए रखने की कल्पना, या अप्रिय मगर खेलने योग्य अंतखेल। उसने काल्पनिक हमला चुना।
अंतखेल लगाकर दोनों तरफ खेली। तीसरी कोशिश में वह बचाव मिला जो पहले से उपलब्ध था। अगली सुबह वयस्क अध्ययन समूह से जुड़ने को पूछा। हारी बाजी और सुधरी पंक्ति लाई। वर्षगाँठ की तस्वीर नहीं।
समूह ने उसे जगह दी और पहला सवाल पूछा कि किस चाल पर विकल्प छूटा। उसने बोर्ड की तरफ उँगली की। लंबे समय बाद उसका परिचय पुराने योगदान से नहीं, सामने के निर्णय से शुरू हुआ। जवाब अपूर्ण था, मगर बाकी लोग उसे सुनकर बेहतर पंक्ति खोजने लगे। कुसुम ने पेंसिल निकाली और पहला नया नोट लिखा।
3. पुरानी कॉपी के पास घड़ी
समूह ने अलग ताकत वाले वयस्कों से जोड़ा। एक जल्दी रणनीतिक चाल गिनता, अंतखेल छोड़ देता। दूसरा बचाव जानता, सामान्य चाल से पहले बहुत समय लेता। दोनों दोष खुद में मिले।
प्रतियोगिता के क्लासिकल समय से अभ्यास किया। छोटे सत्र में जाँचा घड़ी दूसरा विरोधी बनने से पहले मुख्य फैसला पहचान सकती है या नहीं। क्रम स्पष्ट हुआ। खतरा क्या है? कौन सा जवाब स्थिति बदलता है? सबसे मजबूत बचाव के बाद क्या? समीक्षा में लिखती, लाइव बाजी में नहीं।
तंग स्थितियाँ देखीं जहाँ हाथी का कम मूल्य वाले मोहरे से बलिदान सक्रिय बचाव दे सकता था। अतिरिक्त सामग्री का हर अंक बचाने से बेहतर कब लौटाना है, यह भी। प्यादा अंतखेल में राजा के रास्ते असली बोर्ड पर गिने। एक बची प्यादा चाल किसे पीछे हटना पड़ेगा तय कर सकती थी।
कुछ शाम पुराना ज्ञान जल्दी लौटा। दूसरी शाम आसान गलतियाँ हुईं और समझने को रुकी। भाई कभी लेने आता। केवल मदद करने आया है इसलिए सत्र अच्छा बताना छोड़ा।
शॉल अलमारी में मोड़ा रहा। कॉपी के पास घड़ी पर समय अभ्यास में हाथ पड़ने का निशान बना। एक चीज़ समारोह दर्ज करती थी। दूसरी काम दर्ज करने लगी।
वह घड़ी घर ले जाकर भी रखती। खाली मिनट में केवल तेज चलना नहीं, सही समय पर रुककर गिनना अभ्यास था। पुरानी गति लौटाने से पहले सही निर्णय का क्रम लौटना चाहिए था। उसने वही क्रम दीवार पर लिखा।
4. चयन के दौर
काल्पनिक लेकसाइड ओपन में चयन चरण के बाद शीर्ष दो का फाइनल था। पहले क्लासिकल बाजी। ड्रॉ पर प्रकाशित रैपिड अतिरिक्त मुकाबला। कुसुम ने पहले दौर से पहले पूरी शर्तें पढ़ीं। अरुण को उम्मीद थी प्रवेश लेगी, शालीन हारेगी और प्रदर्शनी कुर्सी लौटेगी।
पहला दौर हारी। फिर अगले दो जीती। तीसरा जरूरी था क्योंकि बढ़त के बाद विरोधी अच्छा बचा। राजा सुधारना, दबाव रखना और रक्षक को खोलने वाला प्यादा कदम रोकना पड़ा। जीत में अंत की तालियों से ज्यादा समय लगा।
चौथे में कठिन ड्रॉ बचाया। पाँचवें में शुरुआती गलती से उबरकर विरोधी के अधिक बढ़ने पर जीती। परिणाम से दूसरी रही। अरुण पहला। दोनों फाइनल में मिलते।
घोषणा में सचिव कहने लगा उसे फिर शतरंज का आनंद लेते देखना सुंदर है। कुसुम ने चयन स्कोर भी पढ़ने को कहा। उसने पढ़ा। कमरे ने वहाँ लाने वाली जीत और ड्रॉ सुने।
अरुण अंतिम कार्यक्रम लिए पास था। वापसी सुखद कह सकता था, मगर अगली दोपहर उसके सामने बैठना पड़ता।
कुसुम ने तारीख और रंग की प्रक्रिया जाँची। पहले दौर की हार भी कॉपी में रही। फाइनल तक आने से वह गलती गायब नहीं हुई थी। उसने सबसे कमजोर बचाव वाली स्थिति शाम को दोहराई। अगला विरोधी उसे एक सम्मानपूर्ण हार आसानी से नहीं देने वाला था। उसे खेलकर अपना पूरा मौका लेना था।
5. हर मोहरा इस्तेमाल करने वाला ड्रॉ
क्लासिकल फाइनल लंबा स्थितिगत संघर्ष बना। अरुण ने जगह ली और मोहरे बचाव में बाँधने चाहे। कुसुम ने दबाव घटाने वाली अदला बदली निकाली, आसान जीत दिए बिना।
एक जगह दूर से सुंदर हमला बनाने को सामग्री दे सकती थी। सबसे मजबूत बचाव गिना। पहल सामग्री लौटने से पहले खत्म होती। कठिन बचाव चुना।
अरुण ने दबाव बढ़ाया। कुसुम ने हाथी सक्रिय करने को प्यादा दिया और ढीले मोहरे पर बार बार धमकी से वापस लिया। सही खेल में नए अंतखेल से कोई जीत मजबूर नहीं कर सकता था। बचाव साफ होने तक खेले। ड्रॉ हुआ।
अरुण ने चश्मा उतारा। थका लग रहा था। कुसुम भी थकी थी, मगर बाजी ने ऐसी चीज़ लौटाई जिसे वर्षगाँठ की तस्वीर नहीं छू सकती थी। उसने उसे घंटों गणना करवाई थी।
घोषित विराम के बाद रैपिड होता। अधिकारियों ने समय और आगे की बराबरी प्रक्रिया पक्की की। कुसुम ने हल्का खाना, पानी और अनुमति वाले व्यावहारिक नोट देखे। पूरी दोपहर फिर हल करने की कोशिश नहीं की।
लौटे तो छोटी घड़ी हर बेकार विचार महँगा करती थी। अरुण सफेद था। उसने काले लगाए और पहली चाल आने दी।
इस बार मैच का अंत अधिक जल्दी आ सकता था। तैयारी में सीखे क्रम को उसी गति में स्पष्ट रखना था। उसने पहले मोहरे की जगह देखी, फिर राजा की तरफ बनने वाले रास्तों पर ध्यान लगाया।
6. हाथी का बलिदान
रैपिड में अरुण ने मजबूर पंक्ति चुनी ताकि जमने से पहले समस्या आए। कुसुम ने शुरुआत सही बचाई, मगर राजा पर दबाव बना। जरूरी रक्षक हटाने को उसने हाथी के बदले कम मूल्य वाला मोहरा लेने का बलिदान दिया। प्रस्ताव इतना सही था कि सम्मान चाहिए। हमला समझे बिना सामग्री लेना खतरनाक था।
कुसुम ने शह, वज़ीर प्रवेश और राजा के खाने गिने। बलिदान लिया और बनी स्थिति बचाने लगी।
अरुण के मोहरे सक्रिय हुए। दूसरा रास्ता खोलने की धमकी आई। दर्शक पास आए।
कुसुम को उपयोगी बचाव का एक क्रम मिला। पहले तत्काल प्रवेश रोको, फिर हमलावर बदलो, फिर बचा हाथी लाओ। पहले दो उलटते तो मजबूर पंक्ति रोक नहीं सकती थी। उसने समय देकर पक्का किया और खेला।
अरुण ने दूसरा खतरा निकाला। उसे भी रोका। अतिरिक्त सामग्री को अभी जीत घोषित करने नहीं दिया।
हमला धीमा पड़ा। उसके बचे मोहरे सक्रिय थे, अपना राजा आराम में नहीं। सामग्री पकड़ सकती थी या कुछ लौटाकर खतरा पूरी तरह हटने की संभावना देख सकती थी। पुरानी कॉपी में वही प्रश्न था।
उसने बोर्ड से नजर नहीं हटाई। जवाब नोटबुक से पढ़ने का समय नहीं था। याद की हुई विधि से सामने का हिसाब करना था। राजा कहाँ पहुँचेगा और कौन सा प्यादा बाद में बचेगा, यह अंतिम तुलना तय करने वाला था। उसने दोनों तरफ की सर्वोत्तम चालें गिनीं।
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7. हाथी वापस देना
कुसुम ने सामग्री लौटाकर सक्रिय मोहरे बदलने का क्रम देखा। प्यादा अंतखेल में उसके राजा का रास्ता और बची प्यादा चालें ठोस बढ़त देतीं। अंत तक गिनना जरूरी था। अच्छा दिखता राजा काफी नहीं अगर अरुण बाहर का बढ़ा प्यादा पहले बना ले।
गिना। फिर उसकी तरफ से गिना। एक पंक्ति विफल थी क्योंकि समय पर प्यादा बढ़ाकर उसका राजा दूर करता। उसने क्रम बदला। पहले शह से उसका राजा कम उपयोगी खाने पर किया, फिर अंतिम अदला बदली दी।
अरुण ने देखा हमला गया। सरलता से बचने पर बहुत खराब सामग्री स्थिति मिलती। प्यादों का अंतखेल और बचे व्यावहारिक मौके चुने। बड़े मोहरे हटे।
कुसुम का राजा केंद्र आया। अरुण ने आमने सामने राजा की बढ़त चाही। उसने दूसरे हिस्से में बची प्यादा चाल सही समय पर इस्तेमाल की, जिससे उसके राजा को जगह छोड़नी पड़ी।
जो दर्शक आतिशबाजी चाहते थे, अब दो राजा और कुछ प्यादे देख रहे थे। घड़ी दबने की आवाज़ साफ थी। समय मनचाहे से कम, स्थिति इतनी सटीक कि एक लापरवाही दंड देती। उसने गिनी चाल चली।
अरुण की उँगली राजा पर गई, फिर हटी। उसने फिर देखा। अब चुनावों का दायरा छोटा था। कुसुम ने अपने अगले उत्तर को एक बार और जाँचा। खेल सरल दिखने से हल्का नहीं हुआ था। हर बचा खाना मायने रखता था।
8. जहाँ वह नहीं पहुँच सका
अरुण ने दूसरी तरफ जवाबी दौड़ बनाई। उम्मीद थी कुसुम का राजा धमकाए प्यादों से हटे। उसने जवाब से पहले समय गिना। तुरंत लेने पर उसे जरूरी चाल मिलती। पहले अपना आगे निकल सकने वाला प्यादा बढ़ाया, जिससे उसके राजा को पास का खतरा देखना पड़ा।
वह दिशा बदल गया। उसके बाद ही प्यादा लिया जब आगे का रास्ता सही रहा। स्थिति उस दौड़ में सिमटी जिसे अदला बदली के समय गिना था। उसका राजा अपने प्यादे को सहारा देता। अरुण का राजा करीब आता, मगर जरूरी रोकने वाले खाने पर समय से नहीं।
उसने सबसे जिद्दी बचाव चुना। कुसुम ने आखिरी बढ़त जल्दी नहीं की। बचा सुरक्षित खाना लिया, राजा पास रखा और पदोन्नति उसके नियंत्रण से बाहर कर दी। उसने घड़ी रोक दी। रैपिड उसका था। फाइनल उसका था।
अरुण कुछ सेकंड खाली फाइलें देखता रहा जहाँ हाथी थे। शानदार बलिदान दिया था। उसे सामग्री लौटाने के सही क्षण ने हराया।
कुसुम ने हाथ बढ़ाया। उसने धीरे लिया। सामने सचिव ने माइक उठाया। इस बार परिणाम पहले पढ़ा। क्लासिकल ड्रॉ। रैपिड जीत। प्रतियोगिता चैंपियन कुसुम राव।
कुसुम ने अपनी घड़ी की बची संख्या देखी। पर्याप्त थी। आखिरी चाल के लिए समय बचा था क्योंकि बीच की गणना ने चुनाव स्पष्ट कर दिया था। वह कुर्सी से उठी। इस बार समारोह खेलने के बाद आया था।
9. मेज़ पर शॉल
पुरस्कार में वर्षगाँठ शॉल फिर आया। कोई कार्यालय से लाया था, मानकर कि वही समारोह अब अधिक सफल हो सकता है। कुसुम ने ट्रॉफी ली और शॉल मूल योजना के अनुसार वर्षगाँठ मेहमानों के लिए रखने को कहा। प्रतियोगिता पदक परिणाम प्रमाणपत्र के पास चाहिए था। फर्क इतना साफ था कि बहस नहीं हुई।
अरुण किनारे था जब अगले सीजन का खुला चयन घोषित हुआ। वरिष्ठता से आरक्षित पहला बोर्ड मान रहा था। समिति ने कहा प्रकाशित चयन परिणाम लाइनअप तय करेंगे।
कुसुम ने पूछा बचाव करने वाले चैंपियन पर भी? “हाँ।” “अच्छा।”
अरुण ने उसे देखा, फिर तारीखें। जिसे पहले से भरा मानता था वह स्थान कमाना पड़ेगा। उसे भी। उसने अभी दिखाया था कि शर्त निभा सकती है।
तस्वीरों बाद पुराने नरम स्वर में आया। “सुखद वापसी चाहता था।” कुसुम ने हस्ताक्षर वाला फाइनल उठाया। “यह खेलने आई थी।”
उसने परिणाम देखा और स्पष्टीकरण वहीं छोड़ा। प्रदर्शनी वाली कुर्सी नए खिलाड़ियों की मेज़ के पास थी। कुसुम उसे पार करके जीते बोर्ड के मोहरे समेटने गई।
उसने राजा वापस डिब्बे में रखा, फिर हाथी। जिसने बलिदान लिया था और बाद में लौटाया था, वह हाथी अब अगली बाजी तक साधारण मोहरा था। लेकिन उस शाम कमरे में उसका अर्थ सबने देख लिया था। कुसुम ने ढक्कन बंद किया और अपनी पर्ची उठाई।
10. अगले सीजन का फॉर्म
कुसुम घर में अगला प्रवेश फॉर्म भर रही थी। भाई ने पूछा शुरू होने से पहले एक हफ्ता आराम नहीं कर सकती? “ले रही हूँ। फॉर्म की अंतिम तारीख है।” वह हँसा और लिफाफा लाया।
समूह में रैपिड का सरल करने वाला क्रम देखा। एक सदस्य ने अनचुनी वैकल्पिक पंक्ति में बचाव खोजा। कुसुम ने हिसाब के पास लिखा। जीती बाजी अगले सत्र के काम का हिस्सा बनी।
पहले चयन की हार भी लाई। कोने में रखी ट्रॉफी से अधिक समय उसी पर लगा।
अरुण अगले सीजन के खुले अभ्यास में आया। अपना फॉर्म उसी ट्रे में रखा। नए वयस्क खिलाड़ियों को घड़ी समझाने के लिए स्वयंसेवक पूछे गए। कुसुम ने एक दोपहर दी और उपलब्ध समय स्पष्ट किया।
सिखाना चुनेगी तो सिखाएगी। खेलने प्रवेश लेगी तो खेलेगी।
घर में अनुपस्थिति से पहले की पुरानी तस्वीर खोली। नई के पास थोड़ी देर रखी, फिर दोनों दराज़ में। बोर्ड मेज़ पर रहा। अगला विरोधी अभी मालूम नहीं था। प्रवेश फॉर्म उसी के लिए था।
उसने छुट्टी वाले सप्ताह का पहला दिन खाली छोड़ा। अगले दिन कठिन प्यादा अंतखेल देखने का समय लिखा। अब हर खाली जगह किसी और की यादों से भरनी जरूरी नहीं थी। पुराने सम्मान और नए मुकाबले की अलग जगह थी। वह दोनों चुन सकती थी, और अगली बार सामने कौन बैठेगा यह जानने की उत्सुकता फिर लौट आई थी।
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