सविता को खाली लिफाफा मिला तो जूते अभी डिब्बे में ही थे।
उसने लिफाफे पर तीन बातें लिखी थीं। अपना नाम, प्रतियोगिता की तारीख और चार हजार दो सौ।
नमन ने कुछ काटा नहीं था। यह बात और बुरी लगी। उन्हीं शब्दों के नीचे से लिफाफा खोलकर हर नोट निकाल लिया था।
डिब्बा खाने की मेज पर जन्मदिन के कार्ड के पास रखा था।
“किसके जूते?”
“अर्जुन के। हम सबने मिलकर दिए हैं।”
“इससे?”
बेटे ने लिफाफा देखा, फिर फोन।
“वापस रख दूँगा।”
“कब?”
“ऐसा मुँह क्यों बना रही हो? किराए के पैसे तो नहीं थे।”
सविता ने मेज पर हाथ रखा। सैंतालीस साल की उम्र में पैरों में दर्द होने पर भी खड़ा रहना आता था। दफ्तर की कैंटीन में काम करती थी। बैठना वह काम था जो दूसरे करते थे जब वह उनकी प्लेटें भरती थी।
“मैंने अलग रखे थे।”
“ताश की प्रतियोगिता के लिए, माँ।”
“अपने प्रवेश के लिए।”
नमन छोटा, असहज सा हँसा।
“इस उम्र में? जाओगी और हिस्सा लेने का प्रमाणपत्र लेकर लौट आओगी।”
सविता ने जूते फिर देखे। सफेद थे, हरी किनारी थी। रविवार को अर्जुन बाईस साल का होने वाला था।
उसका जन्मदिन पैसे खर्च करने की समझदार वजह था।
उसकी अपनी योजना नहीं।
* * *
सविता ने जनवरी से जोड़ना शुरू किया था।
सस्ती बस से जाने के बाद बचे बीस रुपये। कुछ अतिरिक्त काम। घर की खरीदारी उम्मीद से कम में हो जाए तो बची रकम।
पुराने कैलेंडर के पीछे तारीख डालकर लिखती थी। नहीं तो छोटी रकम दूसरों की जरूरतों में गायब हो जाती थी।
इंडियन रमी उसके लिए नया नहीं था।
वर्षों से मोहल्ले के परिचितों के साथ वयस्क मनोरंजन सत्रों में खेलती थी। हाल में स्थानीय आयोजक ने खुली प्रतियोगिता का सुझाव दिया।
पंजीकरण जाँच होगी। प्रकाशित कार्यक्रम होगा। ऐसे लोग होंगे जिनके साथ वह पहले नहीं खेली।
आखिरी बात अच्छी लगी।
घर में सब उसे ऐसी व्यक्ति जानते थे जो याद रखती है कि क्या खत्म हो रहा है।
चावल। साबुन। गैस। बुजुर्ग पड़ोसन की गोलियों की पट्टी, जिसे लाने को कभी-कभी कहा जाता।
वह ऐसे कमरे में जाना चाहती थी जहाँ पहला सवाल उसका नाम हो, यह नहीं कि कुछ लाई है क्या।
चार हजार दो सौ में प्रवेश और तय यात्रा खर्च था। दो बार रकम जाँची थी।
लिफाफा छिपा नहीं था।
कभी नहीं सोचा था कि उद्देश्य लिख देने से उसे खारिज करना आसान हो जाएगा।
* * *
नमन इक्कीस साल का था। गाड़ियों की कार्यशाला में काम सीखता था।
कमाता था, लेकिन पैसा ज्यादा देर टिकता नहीं था। फोन की किस्त। दोस्तों के साथ खाना। समूह की खरीद में हिस्सा, जो अचानक जरूरी हो जाता क्योंकि कोई और पहले पैसे दे चुका होता।
अर्जुन अक्सर मोटरसाइकिल दे देता था।
नमन जन्मदिन पर याद रहने लायक उपहार लेकर जाना चाहता था।
सविता को यह ऐसे समझाया जैसे इससे लिफाफे का कारण भी समझ आता हो।
“तो अपना वेतन लगाओ।”
“इस महीने खत्म हो गया।”
“इसलिए मेरा लिया।”
“कहा तो लौटाऊँगा।”
उसने जूते वापस करने को कहा।
नमन ने डिब्बा उससे दूर किया।
“बाकी सब जानते हैं। मैं कंजूस लगूँगा।”
सविता ने लिफाफा पुरानी तह पर मोड़ा।
कई बहसें सोची थीं। शायद दूसरे पैसे समझ लिए हों। कोई जरूरी समस्या आई हो। माँगते शर्म लगी हो।
इसके बजाय वह बता रहा था कि जूते लौटाने में ज्यादा शर्म आएगी, उसके पैसे लेने में नहीं।
सविता रसोई में गई और दाल के नीचे आँच बंद की।
कुछ देर याद नहीं आया कि नमक डाल चुकी है या नहीं।
* * *
पंजीकरण बंद होने में नौ दिन थे।
कैंटीन प्रबंधक दो शाम के कार्यक्रमों में अतिरिक्त काम दे सकता था। उसने दोनों स्वीकार किए।
बाकी कर्मचारियों को वजह नहीं बताई।
पहले कार्यक्रम में आखिरी ट्रे के चावल किनारों से सूखने तक काउंटर के पीछे खड़ी रही।
दूसरे में बर्तन धोए क्योंकि बुलाया सहायक जल्दी चला गया था।
अतिरिक्त कमाई वास्तविक थी।
पर्याप्त नहीं थी।
घर में नमन उसके सामने मेज पर बैठने से बचने लगा। एक बार कहा कि पैसे के लिए किसी से पूछ लेगा।
सविता ने पूछा, क्या ऐसे लोगों से उधार लेगा जिन्हें खुद लौटा सके?
बोला, बाद में सँभाल लेंगे।
“नहीं। बताओगे कि कैसे लौटाओगे। इस वादे की जगह दूसरा वादा नहीं लूँगी।”
उसने जिद्दी कहा।
उस रात घुटनों में इतना दर्द था कि पैर धोने के लिए बाथरूम के स्टूल पर बैठी।
बाल्टी के पास फोन पर प्रतियोगिता का नोटिस खुला था।
पाँच दिन बाकी।
तारीख पढ़ी। फोन उलटा रख दिया।
* * *
दोस्त जसप्रीत ने कम पड़ती रकम देने को कहा।
कैंटीन के बाहर नीची दीवार पर बैठे थे। दफ्तर के दोपहर वाले खाने से पहले कर्मचारी वहीं खाते थे।
सविता ने धन्यवाद कहा।
फिर मना किया।
जसप्रीत ने पूछा कि मदद न लेने से हालात बेहतर होंगे क्या।
“नहीं। पर अभी तय नहीं किया कि कितना उधार सँभाल सकती हूँ।”
जसप्रीत यह जवाब समझ सकती थी।
कुछ देर चुप खाईं।
बाद में सविता ने आयोजन कार्यालय से पूछा कि क्या जगह रोक सकते हैं और अंतिम तारीख के बाद पूरा भुगतान कर सकती है?
Telegram · WhatsApp Channel · WhatsApp Group
बताया गया कि पक्के प्रवेश के लिए प्रकाशित समय से पहले भुगतान जरूरी है। प्रतीक्षा सूची थी, लेकिन उससे जगह की गारंटी नहीं थी।
सविता ने जवाब देने वाले से बहस नहीं की।
बहुत साल ऐसे ग्राहकों को खाना दिया था जिन्हें लगता था कि निराशा किसी दूसरे की गलती बननी चाहिए।
आखिरी दोपहर काम पूरा किया। कमाई गिनी। कैलेंडर बंद कर दिया।
अब भी कम था।
इस बार मेहनत कहानी बचाने के लिए समय पर नहीं पहुँची।
अगले दिन अभ्यास समूह की महिला ने आयोजन की तस्वीरें भेजीं। तीन चेहरे पहचाने। कुर्सियों की वह कतार भी थी जिसमें बैठने की कल्पना की थी। आगे बढ़ी खिलाड़ी को बधाई लिखी।
फिर शाम के लिए बातचीत की सूचनाएँ बंद कर दीं।
सबके सामने उदार दिखना नहीं चाहती थी। एक रात ऐसी चाहिए थी जिसमें आयोजन छूटने का दुख बिना समझाए महसूस कर सके।
काम पर उस पाली के बदलाव को वापस लिया जो प्रतियोगिता के लिए तय किया था। उसकी जगह काम करने वाले सहकर्मी ने पूछा कि घर में सब ठीक है क्या।
सविता ने कहा, नहीं। लेकिन खाने की ट्रे के पास बात नहीं करना चाहती।
उसने सिर हिलाया और पुरानी पाली फिर लिख दी।
उस सप्ताह पहली बातचीत थी जिसमें उसका जवाब उतना ही रहने दिया गया जितना वह देना चाहती थी।
* * *
चार्जर खोजते समय नमन को अंतिम तारीख का पता चला।
छपा नोटिस मेज के पीछे गिर गया था। उठाया तो देखा कि पंजीकरण छह बजे बंद था।
छह अट्ठाईस हो चुके थे।
कागज रसोई में ले गया।
“किसी को फोन नहीं कर सकती?”
“किया था।”
“कोई और जगह होगी।”
“अब मेरे लिए पक्की नहीं हो सकती।”
उसने तारीख फिर देखी।
जूते आने के बाद पहली बार लगा कि बात केवल पैसे की शिकायत नहीं थी। समय, कमरा और माँ के नाम वाली कोई चीज उसके बिना हो चुकी थी।
उसने कहा कि अर्जुन से जूते वापस ला सकता है।
“अब उसका उपहार है।”
“समझा दूँगा।”
“क्या बताना है, तुम तय करो। उससे पंजीकरण नहीं खुलेगा।”
नमन बैठ गया।
सविता माफी चाहती थी। अब आती दिख रही थी तो इतना थक चुकी थी कि उसके लिए आसान नहीं कर सकती थी।
“माफ कर दो,” उसने कहा।
सविता ने सिर हिलाया।
यह नहीं कहा कि सब ठीक है।
* * *
अगली सुबह एक कागज पर पैसे लौटाने की योजना लिखी।
अगले वेतन से शुरू होकर सात सौ की छह किस्तें। कमाई बदले तो तारीख से पहले बात करनी होगी। माँ को बाद में एक और खाली वादा नहीं मिलना चाहिए।
नमन रकम देखता रहा।
“उधार की तरह?”
“बिना पूछे लिए पैसे की तरह।”
उसने पूछा कि हर महीने माँ याद दिलाएगी क्या।
“अपना याद दिलाने वाला संदेश लगा सकते हो।”
नाश्ते के दौरान कागज मेज पर रहा।
काम पर जाने से पहले नमन ने पहली तारीख लिखी।
सविता ने शाबाशी नहीं दी।
शाम को नई बचत ऐसी जगह रखी जहाँ वह नहीं पहुँच सकता था। प्रतियोगिता का बजट घर के पैसे से अलग किया।
बेटे के साथ वाले घर में ऐसा करना अच्छा नहीं लगा।
कभी भरोसे का मतलब था कि यह जरूरी नहीं होगा।
अभी भरोसे का मतलब होगा कि वह इन सीमाओं का सम्मान करता है या नहीं।
सप्ताहांत में अभ्यास पर लौटी।
जसप्रीत ने हाल पूछा तो सच कहा।
“अब भी गुस्सा है। खेलें?”
* * *
खुली प्रतियोगिता का अगला आयोजन चार महीने बाद था।
सविता ने तारीख को घर की घोषणा नहीं बनाया।
अपनी पालियाँ तय कीं। प्रवेश की रकम अलग रखी। खुद पंजीकरण किया।
पुष्टि काम पर आलू छीलते समय आई।
हाथ धोकर सुखाए। फिर खोली।
नाम सही लिखा था।
तस्वीर सहेजी। काम के बाद कागज पर प्रति निकाली और फोल्डर में रखी।
इन महीनों में नमन ने पहली दो किस्तें समय पर दीं।
पहली से पहले उसने खर्च की सूची देखने को कहा। सविता का मन तुरंत समाधान करने लगा। यह खरीद रोक दे। वह खर्च बाद में। अपना कोई छोटा खर्च चुपचाप छोड़ दे।
उसने खुद को रोका।
“तुम्हारे हिसाब से क्या बदल सकता है?”
नमन ने दोस्तों के साथ दो खाने काट दिए। फिर पूछा कि घर से खाना ले जा सकता है क्या।
“हाँ। खुद पैक करना और डिब्बा धोना।”
पहली सुबह डिब्बा सिंक में छोड़ गया। माँ ने वहीं रहने दिया। शाम को उसने पूछा कि कल का खाना किसमें ले जाएगा। सविता ने उसकी तरफ इशारा किया।
उसने धो दिया।
कोई चिल्लाया नहीं। सविता को आश्चर्य हुआ कि परिचित काम खुद न करने में कितना ध्यान लग रहा था। दूसरे के करने का इंतजार असहज था। इसका मतलब यह नहीं था कि उसे फिर अपने हाथ में ले लेना चाहिए।
तीसरी लगभग बहस बनी। दोस्त से सप्ताहांत की यात्रा में पैसे देने का वादा किया था।
सविता ने उसके दायित्व दोबारा नहीं सजाए।
वह घर में रहा। किस्त दी।
कुछ दिन ऐसी चुप्पी रही जो चाहती थी कि माँ उसका त्याग देखे।
उसने देखा।
यह भी याद था कि उसका पूरा आयोजन छूटा था।
किसी ने जोर से नहीं कहा।
धीरे चुप्पी सामान्य हुई। उसने प्याज पूछे। माँ ने बारिश से पहले खिड़की बंद करने को कहा।
परिवार अब भी थे।
इसके लिए रकम गायब होना जरूरी नहीं था।
* * *
अभ्यास में सविता को पता चला कि गुस्सा ध्यान की जगह नहीं लेता।
हर परिणाम से नमन को कुछ साबित करना चाहती थी। जितना चाहती, सामने हो रही बात देखना उतना कठिन होता।
आखिर जसप्रीत ने भुने चने की प्लेट सरकाई।
“तुम्हारा बेटा इस मेज पर नहीं है।”
सविता लगभग झल्ला गई।
फिर हँस पड़ी।
“न होकर भी जगह घेरता है।”
“किराया लो।”
मजाक से तनाव कुछ खुला।
सत्र पर लौटीं। बाद में छोटी बात लिखने लगी। क्या देखा। क्या मान लिया। किस फैसले पर फिर सोचना है।
कई शाम संतोष से ज्यादा सवाल मिले।
फिर भी आती रही।
एक युवा वयस्क खिलाड़ी ने दो बार हराया और फिर मुश्किल स्थिति पर समीक्षा माँगी। सविता को उम्र की इज्जत बचाने की पुरानी इच्छा हुई।
इसके बजाय जो छूटा था, माना।
उसने भी अपनी गलती मानी।
दोनों ने कुछ सीखा।
बैठने का साहस दिखाने के लिए किसी ने उसे हिस्सा लेने का प्रमाणपत्र नहीं दिया।
* * *
प्रतियोगिता से एक सप्ताह पहले नमन ने आने को पूछा।
सविता काम के कपड़े इस्तरी कर रही थी।
“देखने?”
“हाँ।”
“आना चाहते हो?”
उसने माँ के बजाय गरम इस्तरी देखी।
“लगता है।”
उसने स्थान और दर्शकों की अनुमति वाले सत्र बताए।
छुट्टी लेने, यात्रा भरने या दिन को भरपाई बनाने को नहीं कहा।
आयोजन की सुबह उसकी कार्यशाला में जल्दी पाली थी। सविता उससे पहले अपना बैग लेकर निकली।
अंदर पंजीकरण कागज, खाना, पानी और छोटे अक्षर पढ़ने वाला चश्मा था।
ऐसी रकम वाला लिफाफा नहीं था जिसका उद्देश्य कोई और बदल सके।
स्थान पर अधिकारी ने प्रवेश जाँचा और प्रतीक्षा वाली जगह बताई।
लगभग उसकी उम्र की महिला ने पूछा कि पास की सीट खाली है क्या।
सविता ने हाँ कहा।
बात नाम से शुरू हुई।
और कुछ जरूरी नहीं था।
* * *
शुरुआती सत्र में वह सब पर भारी नहीं पड़ी।
कुछ हिस्सा अच्छा गया। दूसरे ने ऐसी आदत दिखाई जिसे अभ्यास में पर्याप्त ठीक नहीं किया था।
विराम में बाहर खाना लेकर बैठी और ऐसा नोट लिखा जिसे बाद में मुश्किल से पढ़ सकी।
हाथ काँप रहे थे।
उम्र से नहीं।
बहुत परवाह होने से।
अनुमति वाले सत्र देखने आई जसप्रीत ने पूछा कि साथ चाहिए या शांति।
“साथ। सलाह नहीं।”
जसप्रीत ने आधी रोटी ली।
“अच्छा है। तैयार भी नहीं थी।”
दिन के अंत तक सविता अंतिम चरण में पहुँच गई।
नमन काम से आया। कलाई पर ग्रीस का निशान था। दरवाजे पर तब तक खड़ा रहा जब तक माँ ने नहीं देखा।
“कैसा रहा?”
“अभी अंदर हूँ।”
वह इतना खुलकर मुस्कुराया कि एक पल स्कूल के बाहर इंतजार करने वाला बच्चा दिखा।
फिर पूछा कि बाकी खिलाड़ी अच्छे हैं क्या।
सविता ने उसे देखा।
उत्तर देने से पहले ही उसने खुद सुधारा।
“होंगे ही। माफ करना।”
सविता ने खाली खाने का डिब्बा घर ले जाने को दे दिया।
* * *
अंतिम मुकाबला अगली दोपहर था।
नमन दर्शकों में बैठा। जसप्रीत पास थी, इसलिए बिना माँगे टिप्पणी नहीं दे पाया।
खेल शुरू होने से पहले सविता ने एक बार देखा।
फिर मेज देखी।
प्रतियोगिता छोटी होती गई, आसान नहीं हुई। एक ठीक फैसला खराब परिणाम लाया। एक गलत फैसले से सौभाग्य से सँभल गई।
दोनों को एक समझने से बची।
अंत की तरफ एहसास हुआ कि जूते याद नहीं आ रहे हैं।
घर में परिणाम अभी सँभालने थे। उन्हें इस कमरे के हर हिस्से में बैठने की जरूरत नहीं थी।
कुल पक्का हुआ तो अधिकारी ने उसका नाम पहले लिया।
सविता एक पल बैठी रही।
पास वाली महिला ने बाँह छुई और मुस्कुराई।
अब उठी।
नमन ताली बजा रहा था। वीडियो नहीं बना रहा था। अच्छा कोण नहीं ढूँढ़ रहा था। खुद को कैमरे की तरफ नहीं कर रहा था।
माँ को देख रहा था।
सविता को लगा कि उसे तस्वीर में चाहती है।
हाथ से बुलाया।
* * *
पुरस्कार लेने तक वह रुका।
फिर बहुत कसकर गले लगाया और फिर माफी माँगी।
माँ ने कुछ पल थामा।
“खुश हो सकते हो। पूरी शाम माफी में नहीं बितानी है।”
जसप्रीत के साथ साधारण खाना खाने गए।
नमन ने आयोजन पर सवाल किए। उन जवाबों को सुना जिनमें दूसरे खिलाड़ियों के नाम भी थे।
सविता को कहानी सुनाना अच्छा लगा, बिना बाकी सबको अपनी राह की बाधा बनाए।
पुरस्कार बहुत बड़ा नहीं था। आयोजन खर्च के बाद अधिकतर अलग रखा। काम के लिए आरामदायक जूते खरीदे।
नमन ने डिब्बा देखा।
कोई बेवकूफी वाली बात नहीं कही।
अगली वेतन तारीख पर सात सौ रुपये आए। विवरण वही था जो तय हुआ था।
चौथी किस्त।
उस शाम उसने पूछा कि पुरस्कार मिलने से बाकी किस्तें रुक सकती हैं क्या।
अनिश्चित होकर पूछा। जैसे जवाब जानता हो।
“नहीं,” सविता ने कहा।
कुछ पल बाद उसने सिर हिलाया।
* * *
आखिरी किस्त दो महीने बाद आई।
नमन ने लिखा कि पूरा हो गया है। जाँचने को कहा।
सविता ने जाँचा।
फिर अंतिम खाने पर निशान लगाया।
कागज नाटकीय तरह से फाड़ना आसान था। स्थायी चेतावनी बनाकर लगाना भी।
उसने दोनों नहीं किया। भुगतान रिकॉर्ड के साथ रखा और खाना बनाने लगी।
बाद में नमन ने दूसरे जूतों की बिक्री का विज्ञापन दिखाया।
“मेरे लिए। अपने पैसे से। खर्च के बाद।”
सविता ने दाम देखा।
“तुम्हारा चुनाव।”
वह रुका। शायद स्वीकृति या मजाक की उम्मीद थी।
माँ ने फोन वापस किया।
मेज के ऊपर पुरस्कार था। पास अगले आयोजन के नोटिस वाला फोल्डर।
नमन ने तारीख दिखाई।
“जा रही हो?”
“तय कर रही हूँ।”
उसने नहीं बताया कि जीत सकती है या नहीं।
माँ रसोई में लौटी तो उसने फोल्डर हटाए बिना मेज साफ की।
उस शाम के लिए इतना काफी था।