“तुम्हारे पिता हैं?”
जूही ने फोन अपनी तरफ मुड़ते पहले देखा। पकड़े हुई लड़की बाद में दिखी।
हॉल के दूसरी ओर महेंद्र फर्श से कागज उठा रहे थे।
चश्मा नाक पर खिसका था।
कागज और पंजीकरण डेस्क के बीच बार-बार देखने पर कोई हँसने लगा था।
फोन वाली लड़की जूही की सहकर्मी थी।
जूही चौबीस की, वह छब्बीस की थी।
दोनों छोटी संचार एजेंसी में काम करती थीं।
सोमवार को यह वीडियो दफ्तर की केतली के पास मजाक बनने वाला था।
जूही को उतना विश्वास था जितना दूसरे वीडियो पर हँस चुके व्यक्ति को होता है।
“नहीं,” उसने कहा। “बस हमारे इलाके के हैं।”
पिता ने ऊपर देखा।
उसे नहीं पता था सुना या नहीं।
बाकी दिन पता करने से बचती रही।
* * *
महेंद्र उनचास साल के थे।
ज्यादातर कामकाजी जीवन कर्मचारियों की बस चलाते बिताया था।
ठेकेदार का एक रास्ता छूटा तो उनके नियमित घंटे चले गए।
जहाँ मिलता, अस्थायी ड्राइविंग काम करते।
बदलाव से ऐसा समय बचा जो नहीं चाहते थे।
कुछ समय में फिर आयोजित भारतीय रमी खेलने लगे।
सालों पहले पसंद थी। फिर काम के समय से नियमित जाना मुश्किल हो गया।
आयोजन वयस्कों के थे।
अभ्यास में ज्यादातर नौकरी वाले या सेवानिवृत्त लोग थे। जल्दी आने और जल्दी जाने के अपने कारण थे।
महेंद्र खेल को कमाई की जगह नहीं मानते थे।
ऐसी जगह चाहिए थी जहाँ किसी काम में मेहनत करें और सुधार देख सकें।
जूही को लगता था जरूरत से ज्यादा कोशिश कर रहे हैं।
ठीक ऐसे नहीं कहा।
पूछा कि पुरानी खेल वाली जैकेट सच में जरूरी है?
* * *
माँ सरोज ने ध्यान दिया।
“जैकेट में क्या खराबी है?”
“कुछ नहीं।”
“तो पहनने दो।”
जूही ने कहा कि ऐसे आयोजनों में लोग अब अलग कपड़े पहनते हैं।
महेंद्र चेन जाँच रहे थे।
खुद को देखा।
“नीली कमीज़ पहन सकता हूँ।”
जूही को खुश होना चाहिए था।
इसके बजाय चिढ़ हुई।
खुद को बताया, उन्हें शर्मिंदगी से बचा रही है।
उन्हें नहीं पता छोटा मूर्खतापूर्ण क्षण कितनी जल्दी ऑनलाइन फैलता है।
पिता ने सप्ताहांत के आयोजन में चलने को पूछा।
उसने शायद कहा।
फिर सहकर्मी रिया ने बताया कि छोटा स्थानीय वीडियो बनाने जा रही है।
जूही उसके साथ जाने को मान गई।
पिता को नहीं बताया कि साथ पहुँचेंगी।
* * *
पंजीकरण हॉल में भीड़ थी।
महेंद्र के पास जरूरी कागज थे।
दूसरा अधिक उम्र का प्रतिभागी बहुत चीजें पकड़े था। डेस्क के पास फोल्डर गिरा दिया।
महेंद्र ने पन्ने उठाने में मदद की।
उसी समय स्वयंसेवक ने अगले व्यक्ति को बुलाया। दो अलग कतारों की तरफ इशारा किया।
महेंद्र ने पूछा, कागज लौटाकर किसमें लगें?
सामान्य सवाल था।
रिया के छोटे वीडियो में सामान्य कम लगा।
फोल्डर गिरने के बाद से शुरू था।
महेंद्र के हाथ में दूसरे के पन्ने थे।
कतार का दोहराया सवाल था।
पास की हँसी रही।
व्याख्या नहीं रही।
शाम तक ऊपर लिखा था कि अंकल पहुँच जाते हैं, करना क्या है पता नहीं होता।
जूही ने लौटते समय देखा।
रिया से बदलने को नहीं कहा।
* * *
खाने पर महेंद्र ने आयोजन बताया।
अच्छा नहीं खेले।
पहला सत्र उम्मीद से तेज लगा। वातावरण की फिर आदत चाहिए।
सरोज ने खाना पूछा।
जूही प्लेट देखती रही।
पिता ने पूछा, अंत का पुरस्कार कार्यक्रम देखा?
उसने कहा, जल्दी निकल गई थी।
उन्होंने सिर हिलाया।
फिर बोले, “पंजीकरण के पास देखा था तुम्हें।”
कमरा शांत हुआ।
जूही ने पानी लिया।
“दोस्त के साथ।”
“हाँ।”
उन्होंने उसकी बात दोहराई नहीं।
इसीसे समझ गई कि सुन लिया था।
खाना खत्म करके अपनी प्लेट सिंक तक ले गए।
* * *
सोमवार को वीडियो दफ्तर पहुँचा।
रिया ने दो लोगों को दिखाया।
किसी ने महेंद्र का उलझा चेहरा बनाया।
जूही एक बार बहुत जल्दी हँस दी।
फिर शौचालय गई। बात बदलने तक रही।
घर में पड़ोसी तक वीडियो पहुँचा था।
सरोज को भेजा। कहा, हल्का मजाक है।
महेंद्र ने उनके फोन पर देखा।
बनाने वाला पूछा।
सरोज ने कहा, जूही जानती है।
उन्होंने फोन लौटाया।
शाम को जूही ने बंद अभ्यास कॉपी मेज पर देखी।
एक पल लगा, छोड़ दिया।
राहत हुई।
फिर उस राहत पर शर्म आई।
* * *
अगले दिन अभ्यास गए।
पुरानी जैकेट पहनी।
जूही ने दरवाजे के पास बैग देखते पाया।
बोली, नीली कमीज़ बेहतर लगती है।
वह देखते रहे।
“इसमें आराम है।”
जवाब नाराज नहीं था।
बस पूरा था।
कई शाम सामान्य घर की बातें ही हुईं।
चाबी किसे चाहिए।
दूध है या नहीं।
अस्थायी ड्राइविंग पाली कब शुरू होगी।
सरोज ने खाने पर जबरन बातचीत नहीं करवाई।
एक बार जूही ने पिता के दूर रहने की शिकायत की।
माँ बोलीं, “उन्होंने सुना था।”
जूही जानती थी।
आशा थी बिना कहे जान लेना पर्याप्त होगा।
नहीं था।
* * *
पूरी रिकॉर्डिंग संयोग से मिली।
रिया दूसरे स्थानीय काम के लिए आयोजन की सामग्री साझा फोल्डर में डाल रही थी।
जूही काम के हिस्से के रूप में फाइलें देख रही थी।
हॉल था।
पिता थे।
इस बार दूसरा प्रतिभागी फोल्डर गिराता दिखा।
महेंद्र रुककर मदद करते दिखे।
स्वयंसेवक का अस्पष्ट निर्देश सुनाई दिया।
दो बार पूछने का कारण सुनाई दिया।
बड़े आदमी का धन्यवाद सुना।
फिर चित्र के किनारे अपनी आवाज सुनी।
बस हमारे इलाके के हैं।
महेंद्र का चेहरा बदला।
ज्यादा नहीं।
काफी।
जूही ने वीडियो रोक दिया।
माउस पर हाथ रखे बैठी रही, जब तक सहकर्मी ने नहीं पूछा कि फाइल खराब है क्या।
* * *
दोपहर रिया से बात की।
“छोटे वीडियो में असली बात नहीं है।”
रिया ने कंधे उचकाए।
“मजाक था।”
“मदद कर रहे थे।”
“सब जानते हैं ऐसे वीडियो गंभीर नहीं होते।”
जूही ने भ्रामक प्रति हटाने और जिस खाते से डाली थी वहाँ सुधार करने को कहा।
रिया बोली, निजी बना रही है।
जूही ने देखा।
“मेरे पिता हैं।”
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एक पल रिया कुछ नहीं बोली।
फिर पूछा, मना क्यों किया था?
अच्छा जवाब नहीं था।
जूही ने बनाया नहीं।
“गलत बात पर शर्म आ रही थी।”
* * *
दफ्तर में सच बता देने से जूही को कहानी में साफ भूमिका नहीं मिल गई।
हँसे हुए सहकर्मी ने पूछा, पिता थे तो खुद क्यों हँसी?
उसने कहा कि ध्यान अपने ऊपर से हटवाना चाहती थी।
ऊँची आवाज में जवाब ज्यादा खराब लगा।
जवाब वही था।
दोपहर सामान्य काम के लिए दूसरा छोटा वीडियो देख रही थी।
विराम काट देने से बोलने वाला सवाल का जवाब न दे पाता दिखता था।
जूही ने इस्तेमाल से पहले पूरी रिकॉर्डिंग देखी।
वह माइक हटने का इंतजार कर रहा था।
जरूरी संदर्भ वापस रखा। समीक्षा के लिए भेज दिया।
सामान्य काम में छोटा सुधार था।
किसी ने तारीफ नहीं की।
बस में लौटते समय सोचा कि कितनी बार दूसरे की शर्मिंदगी को उबाऊ दोपहर बदलने की चीज मान लिया।
हर भूले चेहरे से माफी नहीं माँग सकती थी।
अगले चेहरे को उपलब्ध सामग्री मानना छोड़ सकती थी।
घर पहुँचकर उसने इस काम की बात पिता को नहीं सुनाई। यह ऐसा उपहार नहीं था जिसके बदले उन्हें तुरंत उसे माफ कर देना चाहिए। वह उनकी चाय के पास बैठी और पूछा कि दिन कैसा रहा।
* * *
रिया ने अपनी पोस्ट से वीडियो हटाया।
छूटे संदर्भ का सुधार लिखा।
हर प्रति नहीं हटी।
दफ्तर में जूही की हँसी नहीं मिटी।
अगली शाम पिता से बात करने को पूछा।
वह बैठ गए।
जूही ने लंबी रिकॉर्डिंग और रिया से कही बात बताई।
उन्होंने सुना।
फिर कहा, “हॉल में क्या हुआ, मुझे पता था।”
जूही ने देखा।
“वहीं था।”
उसकी व्याख्या हाथ में टूट गई।
छूटे संदर्भ से दूसरे जो देखते थे, वह बदला था।
उसने जो कहा, वह नहीं बदला।
पिता होने से मना करने की माफी माँगी।
इस बार नहीं जोड़ा कि उन्हीं की चिंता थी।
* * *
महेंद्र पतलून की सिलाई पर अँगूठा फेरते रहे।
“उस दिन के खेल पर गर्व करने को नहीं कह रहा था।”
जूही ने सिर हिलाया।
“खराब खेलता तो भी पिता कह सकती थीं।”
वह रोने लगी।
वह थके दिखे। जीतते हुए नहीं।
सालों उसकी निराशाओं में साथ रहे थे।
यह नहीं पूछा था कि उससे खुद मूर्ख दिखते हैं क्या।
उसने खराब मजाक को दूर हटने का कारण बना दिया।
उन्होंने टिश्यू दिया।
दयालुता थी।
सब ठीक हो जाने की घोषणा नहीं।
इस बार वह समझी।
* * *
जूही ने बेहतर वीडियो बनाने को कहा।
महेंद्र ने मना कर दिया।
तुरंत जवाब से वह चौंकी।
सोचा था अभ्यास रिकॉर्ड करेगी। संदर्भ देगी। दूसरा रूप दिखाएगी।
“एक और ऐसा वीडियो नहीं बनना चाहता जिसे तुम्हें ठीक करना पड़े।”
उसने फोन रख दिया।
“क्या मदद होगी?”
उन्होंने सोचा।
“कौन-सी कमीज़ में कम शर्म आती है, बताना बंद करो।”
उसने नीचे देखा।
“ठीक है।”
एक हफ्ते बाद उन्होंने फोन में तारीखें व्यवस्थित करने की मदद माँगी।
उसने दिखाया।
एक तारीख खुद डालना चाहते थे।
फोन हाथ से लेने के बजाय पूरा करने दिया।
समय ज्यादा लगा।
किसी ने इसे इतना कठिन नहीं माना कि मजाक जरूरी हो।
* * *
उसने जो रिकॉर्ड रखना शुरू किया वह फिल्म से छोटा था।
उनकी सहमति से अभ्यास कार्यक्रम और याद रखने वाले नोटिस की तस्वीरें लीं।
फोन में साधारण फोल्डर बनाया।
कभी पिता समूह की अनुमति वाले अभ्यास विवरण का हिस्सा रिकॉर्ड करने को कहते, ताकि बाद में देख सकें।
फाइलें उसी काम के लिए रहीं।
जूही व्यक्ति को रिकॉर्ड करने और उसका मनचाहा रूप बनाने का फर्क सीख रही थी।
लंबे विराम थे।
दोहराए सवाल थे।
सामान्य गलती के बाद सामान्य सुधार था।
संगीत नहीं लगाया।
जिसे मिटाने को कहा, मिटाया।
सिर्फ बनाया है इसलिए बचाना जरूरी नहीं था।
* * *
पहली अभ्यास रिकॉर्डिंग बारह मिनट की थी।
जूही ने छोटा करने की पेशकश की।
महेंद्र ने पूछा, कौन-से हिस्से हटेंगे?
“विराम। जहाँ वही बात फिर करते हैं।”
उन्होंने वह जगह दिखाई जहाँ पहली बार गलत समझे थे।
“यही तो चाहिए।”
उसने साथ फिर देखा।
दोहराया सवाल खाली समय नहीं था।
उससे पता चलता था कि जवाब कहाँ बदलना शुरू हुआ।
जूही ने पूरी फाइल रखी।
बाद में पिता ने खुद वह हिस्सा खोजा। पास बैठने को नहीं कहा।
दूसरे कमरे से वही वाक्य तीन बार सुनाई दिया।
जूही लगभग पूछने वाली थी कि अब समझ आया या नहीं।
इसके बजाय अपने काम पर लौटी।
पिता बाहर आए तो बोले, ज्यादा साफ नोट बना लिया।
उसने चाय पूछी।
इस बार फोन मेज पर पड़ा रहा। उन्हें बातचीत के बीच अपनी प्रगति कैमरे पर दिखाने की जरूरत नहीं थी। जूही ने दो कप निकाले और चीनी कितनी चाहिए, वही पुराना घर का सवाल किया।
* * *
उनके बाकी दिन दिखने लगे।
उसके अलार्म से पहले शुरू अस्थायी पाली।
वॉशबेसिन में कमीज़ धोना।
काम के बाद अभ्यास जाने से पहले आधा घंटा शांत बैठना।
वह छिपे तौर पर हर बात में असाधारण नहीं थे।
रसीद रखकर भूलते।
बस देर करे तो चिढ़ते।
कभी सत्र की लंबी बात करते जब सरोज घर का खर्च पूछना चाहती थीं।
मगर कहने पर सुनते थे।
रिया के वीडियो काटने से बहुत पहले जूही ने अपने पिता की तस्वीर से ये साधारण हिस्से हटा दिए थे।
कैमरों वाले कमरे में अटपटा अधेड़ आदमी देखा था।
खुद को वहाँ तक लाने वाला व्यक्ति देखना छोड़ दिया था।
* * *
महेंद्र के नतीजे धीरे सुधरे।
वीडियो हटने से नाटकीय बदलाव नहीं हुआ।
खराब दिन अब भी थे।
एक शाम चिढ़कर लौटे। हफ्ते भर काम की हुई गलती फिर की थी।
जूही दिलासा देने लगी।
फिर पूछा, समझाना चाहते हैं या छोड़ना?
“समझाना।”
उसने सुना।
हर विवरण नहीं समझी।
उन्हें बुरा नहीं लगा।
असली सवाल पूछा तो जवाब दिया।
पंद्रह मिनट बात हुई।
फिर उन्होंने उसका काम पूछा।
कई हफ्तों में पहली बार कोई सवाल ऐसी नाजुक चीज नहीं लगा जिसे टूटने से बचाने के लिए सँभाल रहे हों।
* * *
अगला जरूरी आयोजन कई महीने बाद था।
लौटते और अनुभवी स्थानीय वयस्क खिलाड़ियों की श्रेणी थी।
प्रवेश की शर्तें पूरी थीं।
काम के आसपास यात्रा तय की।
जूही ने पूछा, वह आए तो अच्छा लगेगा?
उन्होंने कहा, चाहे तो आ सकती है।
पहले वाला न्योता नहीं था।
उनका उत्साह फैसला उठाकर नहीं ले जा सकता था।
अपनी छुट्टी तय की।
दफ्तर में रिया ने सप्ताहांत पूछा।
“पिता को खेलते देखूँगी।”
पास किसी ने मुस्कराकर पूछा, वीडियो वाले?
“हाँ।”
जूही रुकी।
फिर कहा, “वीडियो में असली घटना गलत दिखाई थी।”
बात आगे चली गई।
वह टकराव की उम्मीद कर रही थी।
कभी शर्म इसलिए बनी रहती थी क्योंकि किसी ने परखा ही नहीं कि उसका जोर कितना कम है।
* * *
पहला दिन आगे बढ़ने जितना अच्छा रहा।
जूही अनुमत दर्शक स्थान में बैठी थी।
सत्रों के बीच कुछ पढ़ा।
हर हरकत पर कैमरा नहीं किया।
विराम में पिता आए। पूछा, ऊब रही है?
“थोड़ी।”
वह हँसे।
“बाहर चाय है।”
दो कप लाई।
खिड़की के पास खड़े होकर पिए।
पिता ने अगला सत्र मुश्किल बताया।
जूही ने कहा, बाद में वहीं होगी।
भविष्यवाणी नहीं।
गर्व करवाने का वादा नहीं।
महेंद्र चाय पूरी करके लौट गए।
* * *
अगला सत्र मुश्किल था।
पीछे हुए। बाहर आए तो दुखी लगे।
जूही अपनी जगह रही।
वह पहले आगे निकल गए। फिर लौटे।
“कुछ मिनट चाहिए।”
उसने सिर हिलाया।
बिना बोले पास बैठ गए।
लोग बैग और खाने के डिब्बे लेकर गुजरते रहे।
किसी ने ड्राइवर को फोन किया।
स्वयंसेवक ने दीवार का नोटिस बदला।
जूही ने चुप्पी सामान्य रहने दी।
कुछ देर बाद महेंद्र ने बोतल पूछी।
कुर्सी के नीचे थी।
उसने दी।
पानी पिया। खड़े हुए।
“ठीक है।”
कमरे में लौट गए।
* * *
आखिरी हिस्सा बेहतर रहा।
कुल अंकों की जाँच तक स्थान तय नहीं था।
जूही ने उन्हें बोर्ड पढ़ते देखा।
तुरंत खुशी नहीं मनाई।
फिर मुड़े।
पहला।
नतीजे तक पहुँचने से पहले चेहरे से पता चल गया।
एक पल पुराना वीडियो वाला आदमी दिखा।
नाक पर चश्मा।
हाथ में कागज।
किसी को खोजता हुआ।
इस बार नजर नहीं हटाई।
पास गई।
वह अंतर समझाने लगे।
जूही हँसी। कहा, एक मिनट में सब बता सकते हैं।
फिर गले लगी।
बीच में कागज मुड़ गए।
* * *
पुरस्कार में संचालक ने परिवार पूछा।
आसपास देखना खत्म होने से पहले जूही खड़ी हुई।
महेंद्र के एक हाथ में पुरस्कार था।
नाम या निमंत्रण का इंतजार किए बिना आगे गई।
अपनी झिझक से बचाने के लिए किसी की जरूरत नहीं थी।
फोटोग्राफर ने कैमरा उठाया।
“रिश्ता?”
“इनकी बेटी हूँ।”
संचालक के पास वाले माइक से शब्द साफ सुनाई दिए।
महेंद्र ने देखा।
जूही कैमरे के बजाय उनकी तरफ मुड़ी।
“पापा, थोड़ा हटिए। साथ आ नहीं पा रही।”
वह खिसके।
दोनों हँसे।
तस्वीर में उनका हाथ उसके कंधे के पास हल्का टिका था।
* * *
निकलने से पहले किसी ने तस्वीर भेज दी।
जूही ने दिखाई।
“रख सकती हूँ?”
“बिलकुल।”
“परिवार में भेज दूँ?”
उन्होंने हाँ कहा।
उसने भेजी।
अपनी बहादुरी का लंबा विवरण नहीं लिखा।
उनका नाम, आयोजन और नतीजा लिखा।
सरोज ने घर आने का समय पूछा।
मौसी ने छोटे रंगीन चिह्नों के फूल भेजे।
तस्वीर उन्हें जानने वालों के बीच गई।
पुराने वीडियो पर हँसे हर अजनबी को हराना जरूरी नहीं था।
जूही ने फोन रखा।
यात्रा के लिए खरीदा खाना उठाने में मदद की।
* * *
घर में सरोज ने पुरस्कार के लिए जगह बनाई।
महेंद्र तुरंत आखिरी सत्र बताना चाहते थे।
उन्होंने पहले हाथ धोने को कहा।
जूही हँसी।
खाने के बाद उन्होंने बताया।
मुश्किल सत्र भी रखा।
शांत बैठने की जरूरत भी।
बाद में मौसी का फोन आया तो जूही ने वह हिस्सा नहीं काटा।
अगली सुबह महेंद्र नीली कमीज़ में अस्थायी ड्राइविंग पाली पर गए।
पुरानी जैकेट दरवाजे के पीछे थी।
जूही ने ढीला कफ देखा।
पूछा, दफ्तर के पास दर्जी को दे आए?
उन्होंने जाँचा।
“हाँ, दे आना।”
उसने बैग में रखी।
दफ्तर में रिया ने जैकेट देखी। पूछा, किसकी है?
“मेरे पिता की,” जूही बोली।
कैमरा नहीं था।
उसी तरह कहा।