1. Yono Rummy: कूड़ेदान में पड़ा बैज
शंकर को अपना क्लब बैज रिसेप्शन के पास कूड़ेदान में मिला। पिन इतनी मोड़ी गई थी कि धातु टूट गई थी।
वह चवालीस वर्ष का विधुर था। एयरपोर्ट शटल चलाता और बेटे को अकेले पालता था। ग्यारह वर्ष अशोका रिक्रिएशन क्लब में रम्मी खेली थी। आयोजनों के बाद मेजें साफ कीं, स्टेशन से खिलाड़ी लाया और कोच प्रदीप पर अपने फैसले से अधिक भरोसा किया।
फिर एक टीम मुकाबले के दौरान उसके बाईस वर्षीय बेटे का मोटरसाइकिल एक्सीडेंट हुआ। शंकर ने प्रदीप से जाने की अनुमति माँगी। कोच ने कहा था, “जाओ। मैं संभाल लूँगा।”
टीम प्रतियोगिता से बाहर हुई तो प्रदीप ने समिति को बताया कि शंकर किसी को सूचित किए बिना चला गया।
सदस्यता निलंबित हुई। सुनवाई में प्रदीप ने उसकी आँख में देखकर कहा, “हाथ मुश्किल होते ही भागने वाले आदमी पर भरोसा नहीं कर सकते।”
बेटा बाहर बैसाखियों पर इंतजार कर रहा था। खुले दरवाजे से इतना सुन लिया कि समझ सके पिता खाली हाथ क्यों लौटे।
बस में शंकर कमीज की उस फीकी जगह को रगड़ता रहा जहाँ बैज था।
बेटे ने कहा, “आपको मुझे अस्पताल में छोड़ देना चाहिए था।”
शंकर इतनी तेजी से उसकी ओर मुड़ा कि वह चुप हो गया।
“यह बात दोबारा कभी मत कहना।”
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2. हर हाथ के भीतर की आवाज
दो महीने शंकर ने पत्ते नहीं छुए। बेटे की हालत धीरे सुधरी। घर में मोड़कर रखने वाला वॉकिंग फ्रेम, अस्पताल की रसीदें और ऐसी चुप्पी आई जिसे दोनों हटाना नहीं जानते थे।
एक शाम बेटे को बिस्तर के नीचे पुराना अभ्यास बॉक्स मिला।
“मेरे लिए मुकाबला छोड़ा था,” उसने कहा। “खेल भी छोड़ना जरूरी नहीं।”
शंकर ने बॉक्स लिया, मगर आधी रात के बाद खोला।
पहले निजी अभ्यास में असुविधाजनक आदत दिखी। बनावट कठिन होते ही वह कल्पना करता कि जोकर आकर ठीक कर देगा। प्रदीप उसे शानदार फिनिश का इंतजार करना सिखाता था। सफल कोशिश की तारीफ, असफल की वजह खराब भाग्य।
कोच पास नहीं था तो शंकर को सुनाई दिया कि उसकी सोच का कितना हिस्सा उधार का है।
उसने हर रखे पत्ते का कारण लिखा। कई कारण बस इतने थे कि कोई मददगार चीज आ सकती है। यह हमेशा गलत नहीं, पर हर देरी के लिए पर्याप्त भी नहीं था।
हर अभ्यास हाथ बदलने से पहले तस्वीर ली। बाद में उन रास्तों से तुलना की जिन्हें अनदेखा किया था।
बेटे आदित्य ने सत्र रिकॉर्ड करने की पेशकश की। शंकर एक शर्त पर मान गया: कॉपी अच्छे परिणामों जितनी स्पष्टता से खराब फैसले भी दिखाएगी।
उन्होंने सामान्य लाइन वाली कॉपी से शुरुआत की। घर में वही उपलब्ध थी।
3. बचाने वाले पत्ते के बिना अभ्यास
शंकर ने ऐसा अभ्यास बनाया जिसमें शुरुआती हाथ और चुने हुए अभ्यास ड्रॉ में जोकर न हो। यह प्राकृतिक बनावट बनाने का अभ्यास था, वास्तविक डील में क्या मिलेगा उसका दावा नहीं।
पहले सत्र खराब थे। वह अलग-थलग पत्ते देर तक रखता और आदर्श बनावट की प्रतीक्षा में उपयोगी संबंध तोड़ देता। आदित्य हर चरण की तस्वीर लेकर पूछता कि पिता किस नतीजे की उम्मीद कर रहे थे।
“कुछ बेहतर,” शंकर ने एक बार कहा।
“कौन सी चीज?”
उत्तर नहीं था।
उन्होंने सवाल बदला। कौन से पत्ते एक से अधिक हिस्से सुधार सकते हैं? कौन से समूह सुरक्षित हैं? कौन सी उम्मीद भरी जोड़ी जरूरी सीक्वेंस में मदद किए बिना जगह घेर रही है?
शंकर ने छोटे क्रम, बीच के क्रम, सामान्य पत्तों से बनते सेट और कहीं न जुड़ने वाले मुश्किल पत्तों पर काम किया। उसने वह काम गिनना सीखा जो वास्तव में बचा है, न कि वह जो कोई जोकर भविष्य में कर सकता है।
कई हाथ फिर भी असफल हुए। आदित्य ने यह भी लिखा।
अभ्यास ने मनचाहा पत्ता बुलाना नहीं सिखाया। पूरी योजना एक तरह के बचाव पर टाँगना बंद कराया।
देर की ड्राइविंग शिफ्ट के बाद पिता रसोई की मेज पर बैठता। पास बेटा पैर की कसरत करता। बातचीत फिर विशिष्ट हुई। छोड़े गए नौ पर बात हो सकती थी, अस्पताल या क्लब पर नहीं।
4. खुली प्रतियोगिता
नगर रम्मी चैम्पियनशिप में खुले क्वालिफायर से व्यक्तिगत प्रवेश था। शंकर ने तीन बार शर्तें पढ़ीं कि क्लब सदस्यता आवश्यक तो नहीं।
पंजीकरण डेस्क पर पुराने परिचित ने पहचानकर पूछा कि निलंबन हटा या नहीं।
“नहीं,” शंकर ने कहा। “यह स्वतंत्र प्रवेश है।”
स्वयंसेवक ने दस्तावेज देखे और खिलाड़ी नंबर दिया। एक मिनट से कम लगा। महीनों अपमानजनक बातचीत की मन में तैयारी करने के बाद सरल बातचीत को समझना भी अजीब लगा।
पहले क्वालिफायर से वह बाहर हो गया।
नए अभ्यास ने बिना जोकर बनावट बनाना सिखाया, लेकिन उसने उसे दूसरी गलती बना लिया। जोकर मिल भी जाए तो ठीक उपयोग करने से हिचकता था। स्वतंत्रता साबित करने की चाह में मददगार पत्ता नैतिक परीक्षा बन गया।
घर लौटते आदित्य ने पूछा कि अभ्यास छोड़ दें क्या।
“नहीं। अभ्यास और असली मुकाबले को एक समझना छोड़ें।”
शंकर ने क्वालिफायर के फैसले दोबारा देखे। जहाँ जोकर उपयोगी हो, इस्तेमाल करेगा। जहाँ न हो, काम जारी रखेगा। योजना हाथ के पत्तों के लिए होनी थी, अपने बारे में पसंदीदा कहानी के लिए नहीं।
दूसरा क्वालिफायर बाकी था। इस बार दोनों तरह के हाथों की तैयारी की। वह न मदद का इंतजार करके जम जाना चाहता था, न मदद उपलब्ध होने पर उसे सिद्धांत के नाम पर ठुकराना। यही संतुलन अब अभ्यास का उद्देश्य बना।
5. अलग तरह की याददाश्त
पुरानी कॉपियाँ शानदार फिनिश से भरी थीं। उन सामान्य चालों का लगभग रिकॉर्ड नहीं था जिनसे फिनिश संभव या असंभव हुआ।
शंकर ने नए पन्नों को फैसलों के नाम दिए: रास्ता बदलना, अलग पड़ा पत्ता छोड़ना, प्योर सीक्वेंस बचाना, घोषणा जाँचना। जीत में खराब फैसला हो सकता था। हार में कई अच्छे फैसले।
आदित्य ने तस्वीरें उसी तरह बाँटीं।
उन्होंने खुली जानकारी से निकाले जा सकने वाले उचित निष्कर्ष भी देखे। विरोधी पत्ता उठाए तो उस पत्ते में रुचि दिखती है। पूरा हाथ नहीं खुल जाता। प्रदीप कभी ऐसे बोलता था मानो आत्मविश्वास से ज्ञान बनता हो। शंकर अब वहाँ प्रश्नचिह्न लिखता जहाँ पहले निश्चितता लिखता था।
दूसरे क्वालिफायर में पुराने क्लब का कोई दर्शक नहीं था। वह दो सत्र पार कर गया। कुछ डील हारा, दूसरी में नुकसान सीमित रखा।
एक निर्णायक हाथ में जल्दी जोकर मिला। उसने बिना संकोच उचित उपयोग किया। दूसरे में दोनों सीक्वेंस सामान्य पत्तों से पूरी कीं और बिना जोकर समाप्त किया।
किसी नतीजे को नारा नहीं बनाया।
शाम को फाइनलिस्ट सूची में उसका नाम था। प्रदीप का भी। आदित्य ने पन्ना छापकर पुराने टूटे बैज के पास रखा, जिसे शंकर बाद में कूड़ेदान से उठा लाया था।
दो वस्तुएँ थीं। उसकी जगह बताने के दो बिल्कुल अलग तरीके।
6. शिक्षक के सामने
अंतिम चरण राउंड रॉबिन समूह से शुरू हुआ। प्रकाशित कार्यक्रम के अनुसार शीर्ष दो खिलाड़ी खिताबी मैच खेलते। कठिन आखिरी सत्र के बाद शंकर बहुत कम अंतर से वहाँ पहुँचा।
प्रदीप पहले स्थान पर था।
खिताबी मैच से पहले कोच पानी की मेज के पास आया।
“हमेशा कहा था तुममें क्षमता है। बस अनुशासन चाहिए था।”
शंकर ने उस आदमी को देखा जिसने उसे अविश्वसनीय कहा था, जबकि बाहर बेटा बैसाखियों पर था।
“आप जानते थे मैं क्यों गया।”
प्रदीप ने दर्शकों की ओर देखा। “यह बात करने की जगह नहीं है।”
“नहीं,” शंकर बोला। “यह खेलने की जगह है।”
आयोजक के घोषित आमने-सामने प्रारूप में चार सही डील पहले जीतने वाला चैम्पियन होता। पहली प्रदीप जीता। दूसरी शंकर। तीसरी कोच के पास गई, क्योंकि शंकर आखिरी उलझा समूह ठीक नहीं कर पाया।
पुराने खिलाड़ी की क्षमता अचानक गायब नहीं हुई थी। उसे खेल आता था और शंकर की कई आदतें भी पता थीं।
लेकिन वह रसोई वाले अभ्यास या फैसलों के अनुसार बाँटी तस्वीरें नहीं जानता था। वह कॉपी नहीं देखी थी जिसमें पुराने शिष्य ने निश्चित उत्तरों की जगह प्रश्न रखना शुरू किया।
शंकर ने अगली शफल के लिए पत्ते जोड़े। सामने वही प्रतिद्वंद्वी था। लेकिन वह अब हर हाथ के भीतर बोलने वाली आवाज नहीं था।
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7. कोई जोकर नहीं आता
छठी डील के बाद मैच तीन-तीन था। अगली सही जीत खिताब तय करती।
शंकर के अंतिम शुरुआती हाथ में जोकर नहीं था। उसने वाइल्ड रैंक बताने वाला संकेतक देखा, फिर अपने तेरह पत्ते। उनमें उस भूमिका का कोई पत्ता नहीं था।
प्रदीप ने उसे देर तक देखते पाया।
“मदद का इंतजार है?” उसने पूछा।
पर्यवेक्षक ने दोनों को विरोधी पर टिप्पणी से बचने को कहा। शंकर पहले ही पत्तों पर लौट चुका था।
एक प्राकृतिक प्योर सीक्वेंस और कई अधूरी संभावनाएँ थीं। एक जोड़ी आकर्षक थी, लेकिन बाकी से संबंध नहीं। बीच के दो पत्ते अकेले प्रभावशाली नहीं थे, पर एक से अधिक रास्तों में जुड़ सकते थे।
उसने लचीलापन बचाया।
पहला ड्रॉ मददगार नहीं था। दूसरा भी नहीं। उसने अलग पड़ा बड़ा पत्ता छोड़ा और देखता रहा कि वास्तव में क्या बदला। जोकर आता तो उपयोग करता। लेकिन सोच में उसके लिए खाली सिंहासन नहीं रखता।
प्रदीप ने खुले ढेर से उठाकर उसी सहजता से पत्ते बदले जिसे शंकर पहचानता था।
एक पल भीतर का पुराना शिष्य मान लेना चाहता था कि कोच लगभग तैयार होगा।
शंकर ने दूसरे के हाथ में काल्पनिक पत्ते नहीं लिखे। उसने वही हाथ खेला जिसे देख सकता था। पत्ते कठिन थे, लेकिन अब सोच उनकी कठिनाई से बड़ी कहानी नहीं बना रही थी।
8. हाथ की बनावट बदलती है
एक उपयोगी मध्य पत्ता आया। उसने हाथ पूरा नहीं किया। उसने यह बदल दिया कि किस अधूरे रास्ते पर आगे जाना बेहतर है।
शंकर ने पुराने क्रम को बचाने पर सोचा, क्योंकि कई चालें उसी पर खर्च हुई थीं। फिर रसोई की तस्वीरें याद आईं। लगाया हुआ समय किसी बेकार पत्ते को उपयोगी नहीं बना देता।
उसने दो पत्ते मजबूत सीक्वेंस वाले रास्ते में रखे। नई बनावट में अनावश्यक हुआ पत्ता छोड़ दिया।
प्रदीप के अगले पिकअप से पास की रैंक में संभव रुचि दिखी। शंकर ने नोट किया, पूरा नक्शा नहीं माना। जब समान रूप से समझदार विकल्प था, तो सामने दिखाई दे रहे संबंध में लापरवाही से पत्ता नहीं दिया। मगर अनुमान की रक्षा में अपना ढाँचा भी नहीं बिगाड़ा।
दूसरी सीक्वेंस सामान्य पत्तों से बन गई।
अब बाकी समूह सुलझाने थे। उसने हर समूह में लगे पत्ते गिने। कोई दो जगह नहीं था। हाथ करीब था, लेकिन करीब होना सही घोषणा नहीं था।
सीमा के पीछे आदित्य दोनों पैर जमीन पर रखकर देख रहा था। वॉकिंग फ्रेम जा चुका था। पिता के कंधे, जो प्रदीप की आवाज से तन जाते थे, अब आराम में थे।
कोच अधिक समय लेने लगा। उसके पास जो भी था, अभी घोषणा नहीं बना था।
शंकर को उम्मीद हुई। उसने उम्मीद को पत्तों से अलग रखा।
9. तेरह पत्ते, उधार का भरोसा नहीं
प्रदीप ने ऐसा पत्ता छोड़ा जो शंकर का एक शेष समूह पूरा करता था। खुले ढेर से उसे लिया जा सकता था, लेकिन उसके बाद भी एक हिस्सा अनसुलझा रहता।
शंकर ने लिया, क्योंकि हाथ सुधरता था। इसलिए नहीं कि कानों में तालियाँ शुरू हो गई थीं।
दो चाल बाद उसे अंतिम जरूरी पत्ता मिला।
एक पल दिमाग कप, टूटे बैज और क्लब के दरवाजे तक दौड़ गया। उसने दौड़ रोकी और नीचे देखा।
तेरह पत्ते। दो सीक्वेंस, जिनमें आवश्यक प्योर सीक्वेंस थी। बाकी समूह सही। कोई पत्ता दो बार नहीं गिना गया। अंतिम बनावट में जोकर की जरूरत नहीं पड़ी थी।
एक बार फिर जाँचा, फिर घोषणा की।
पर्यवेक्षक ने हाथ देखा। प्रदीप आगे झुका। समूहों में ऐसे खोज रहा था मानो छिपी गलती दोपहर को पुराने परिचित रूप में लौटा दे।
गलती नहीं थी।
“सही घोषणा। मैच शंकर राव के नाम, चार डील से तीन।”
आदित्य बहुत जल्दी उठा, फिर खुद को सँभालकर हँसा। तालियों से पहले वह आवाज पिता तक पहुँची।
शंकर ने तुरंत हाथ नहीं उठाए। पूरे हाथ को देखकर असफल अभ्यास याद किए। किसी ने परिणाम का वादा नहीं किया था। सबने मिलकर उस समय फैसले करने की तैयारी कराई थी जब नतीजा अनिश्चित था।
प्रदीप ने हाथ बढ़ाया। शंकर ने एक बार मिलाया और छोड़ दिया।
10. बैज टूटा ही रहता है
इंटरव्यू लेने वाले ने पूछा कि पुराने कोच ने क्या सिखाया था। कमरे का ध्यान अलग तरह से जागा।
“शुरुआत की बहुत बातें,” शंकर ने कहा। “आज कुछ ऐसी बातें भी चाहिए थीं जो मैंने जाने के बाद सीखीं।”
उसने आदित्य को अभ्यास साथी बताया। बेटा शर्म और खुशी से नीचे देखने लगा।
पुरस्कार के दौरान समिति का सदस्य आया। सदस्यता पर फिर बात करने का सुझाव दिया। शंकर ने उचित बैठक का लिखित निमंत्रण लेने को कहा, जिसमें निलंबन की परिस्थितियों की समीक्षा भी हो। उसने कप के साथ तस्वीर के बदले सच्चाई नहीं छोड़ी।
शाम को पिता-बेटा घर के पास छोटे डोसा रेस्तराँ गए। मालिक ने शेल्फ ढूँढ़ी, तब तक कप तीसरी कुर्सी पर था।
“आप फिर चले जाते?” आदित्य ने पूछा।
शंकर समझ गया किस दिन की बात है।
“हाँ।”
बेटे ने सिर हिलाया। उसके लिए यह उत्तर स्कोर से अधिक जरूरी था।
घर पर शंकर ने टूटा बैज दराज में रख दिया। तीन दिन बाद लिखित निमंत्रण आया। उसमें निलंबन को दुर्भाग्यपूर्ण मतभेद कहा गया था और वापसी पर चर्चा का प्रस्ताव था।
उसने उस वाक्य पर निशान लगाया और पत्र लौटा दिया।
“कोच ने जाने की अनुमति दी थी। यह बात बैठक के विषयों में लिखिए।”
समिति से फोन आया। पूछा, शब्द बदल दें तो क्या वह आएगा? आदित्य ने सुना कि पिता जवाब देने से पहले सुधारी हुई प्रति माँग रहे हैं। जो दफ्तर पहले चाहता था कि शंकर उसकी बात मान ले, अब उसकी एक-एक पंक्ति पढ़े जाने का इंतज़ार कर रहा था।
शंकर ने स्पीकर चालू किया ताकि बेटा भी सचिव को सुधार की पुष्टि करते सुन सके। उसके बाद उसने बैठक के लिए हाँ कही। टूटा बैज दराज में ही रहा। उसे फिर पहनने का कोई वादा नहीं हुआ था।
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