Yono Rummy — जब मेज पर सिर्फ दो खिलाड़ी बचे
Yono Rummy

Yono Rummy — जब मेज पर सिर्फ दो खिलाड़ी बचे

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

“उसे पहली बार खेलने की जगह दिलाने वाली बात फिर कहिए।” कैमरामैन ने हाथ नीचे किया और अनन्या ने वाक्य दोहरा दिया। “मुझसे मिलने से पहले कबीर ऐसी जगह के अंदर भी…

“उसे पहली बार खेलने की जगह दिलाने वाली बात फिर कहिए।”

कैमरामैन ने हाथ नीचे किया और अनन्या ने वाक्य दोहरा दिया।

“मुझसे मिलने से पहले कबीर ऐसी जगह के अंदर भी नहीं आ सकता था।”

कबीर कैमरे के बाहर तीन कदम दूर उसका फोन और हैंडबैग पकड़े खड़ा था।

पहली बार उसने सोचा था कि अनन्या इमारत की बात कर रही है। उसके पिता सदस्य थे। उसी ने कबीर को मेहमान बनाकर बुलाया था। इतनी बात सच थी।

दूसरी बार समझ आया कि वह उसकी जिंदगी की बात कर रही है।

पीछे लगे बैनर पर क्लब के वयस्क तीन पत्ती प्रदर्शन मुकाबले की सूचना थी। खिलाड़ियों में उसका नाम छोटे अक्षरों में था। अनन्या के परिवार के कारोबार का नाम दरवाजे से पढ़ा जा सकता था।

कैमरामैन ने उसे पास बुलाया।

“कंधे पर हाथ रखिए। आभारी बॉयफ्रेंड वाली छोटी मुस्कान।”

कबीर ने बैग अनन्या को दे दिया।

“मैं मुकाबले का खिलाड़ी हूँ।”

कैमरामैन ने अनन्या को देखा। शायद समझना चाहता था कि मजाक हुआ है क्या।

अनन्या हँस दी।

“आज तो दोनों एक ही बात हैं।”

* * *

डेढ़ साल पहले किताबों की दुकान के कैफे में मिले थे।

कबीर घरेलू उपकरण ठीक करता था। अनन्या परिवार के होटल कारोबार में काम करती थी। पहली बातचीत काउंटर के ऊपर शोर कर रहे पंखे पर हुई थी।

उसने आवाज पर ध्यान दिया था। कबीर ने ढीली फिटिंग पर।

कुछ समय तक जिंदगी का अंतर दोनों को दिलचस्प लगता था। वह अभी हथियार नहीं बना था।

अनन्या को अच्छा लगता था कि कबीर कमरे में घुसकर देख लेता है कि क्या ठीक करना है। कबीर को अच्छा लगता था कि वह सवाल पूछती है, पहले से सब जानने का दिखावा नहीं करती।

मोहल्ले के मनोरंजन भवन में उसके खेलने का पता चला तो उसने बेहतर अभ्यास वाले क्लब में परिचय कराने की बात कही।

कबीर ने स्वीकार किया।

एक प्रतियोगिता की यात्रा का खर्च जन्मदिन के उपहार में उसने दिया था। कबीर ने धन्यवाद कहा, गया, हारा और लौटते हुए उसकी पसंद की दुकान से मिठाई लाया।

इन बातों में अपनापन था।

बाद में हर परिचय में एक ही कहानी आने लगी।

“मैंने इसे खोजा था।”

पहले कबीर मजाक करता। फिर उसने ऐसा न कहने को कहा।

फिर सार्वजनिक जगहों पर कहना छोड़ दिया, क्योंकि बाद में अनन्या की मुस्कान मिलती थी। धैर्य वाली, निराश मुस्कान। जैसे वह कोई आसान परीक्षा पास नहीं कर पाया हो।

* * *

प्रदर्शन मुकाबले के खिलाड़ियों का चयन दर्ज किए गए अभ्यास परिणामों से हुआ था।

कबीर के अंक पर्याप्त थे।

उसे पता था क्योंकि आखिरी सत्र के बाद वह गलत दर्ज कुल ठीक करवाने रुका था। अपनी तरफ की गलती से भी जगह नहीं लेना चाहता था।

क्लब ने प्रविष्टि सुधारी। वह फिर भी चयनित था।

लेकिन प्रचार वीडियो में कोई चयन सत्र नहीं था। अनन्या बता रही थी कि कुछ लोगों के लिए सही व्यक्ति का दरवाजा खोल देना काफी होता है।

फिर उसके साथ मुस्कुराता कबीर था।

संपादन में वह पल लगाया गया था जब कैमरे के बाहर किसी का लाइट स्टैंड गिरा और कबीर चौंककर हँस पड़ा था।

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मरम्मत की दुकान पर सहकर्मी ने वीडियो प्रदर्शन वाले टेलीविजन पर चला दिया।

“अब पता चला तुम्हारी प्रतिभा का खर्च कौन देता है।”

दो ग्राहक मुड़े।

कबीर ने रिमोट माँगा।

सहकर्मी ने एक सेकंड और हाथ दूर रखा। सबका ध्यान अपने पर देखकर मजा ले रहा था। फिर दे दिया।

वह अतिरिक्त सेकंड पूरी दोपहर कबीर के साथ रहा।

उसने वॉशिंग मशीन की नली बदली, रसीद लिखी और घर लौटा। ग्राहक का पता दिमाग में घूम रहा था, क्योंकि लिखते समय डर लगा था कि कहीं गलत न लिख दे।

* * *

अनन्या ने कहा कि वीडियो से कोई नुकसान नहीं है।

“अच्छी कहानी बनती है।”

“पूरी कहानी नहीं है।”

“छोटे वीडियो में पूरी होती भी कहाँ है?”

“तो मेरी जगह छोटी करके अपनी बड़ी मत करो।”

अनन्या सचमुच आहत दिखी।

“मैंने मदद की थी।”

“हाँ।”

“समझ नहीं आता, तुम्हें इसमें शर्म क्यों आती है।”

वे उसी कैफे में आमने-सामने बैठे थे। पंखा कई महीने पहले बदल गया था। सिर के ऊपर अब ऐसी कोई खराबी नहीं थी जिस पर बात कर सकें।

कबीर ने फिर कोशिश की।

“लोगों को बताता हूँ कि तुमने मदद की। यह नहीं कहता कि मेरी जगह तुमने खेल सीखा।”

अनन्या ने कप की कागज वाली पट्टी मोड़ी।

“मेरे बिना वहाँ खेल रहे होते?”

“उस क्लब में, शायद नहीं।”

“बस।”

कबीर अगले सवाल का इंतजार करता रहा। क्या इसका मतलब यह था कि उसके बाद वह जिस कुर्सी पर बैठे, उस पर अनन्या का अधिकार होगा?

वह सवाल नहीं आया।

एक घंटे तक उसी बात के चारों तरफ घूमते रहे।

निकलते समय कबीर ने कहा कि वह हर जगह उसके बनाए हुए व्यक्ति की तरह पेश नहीं हो सकता।

अनन्या ने कहा कि वह ऐसे आदमी के साथ नहीं रह सकती जिसे उसकी उदारता से शिकायत हो।

किसी भी वाक्य ने घर लौटना आसान नहीं किया।

* * *

रिश्ता खत्म होने के साथ क्लब की पहुँच भी चली गई।

कोई छिपी सजा नहीं थी। अभ्यास में प्रवेश सदस्य के अतिथि के रूप में मिलता था। वह व्यवस्था समाप्त हुई तो कार्यालय ने सदस्यता के विकल्प और खर्च बताए।

कबीर वह खर्च नहीं उठा सकता था।

अनन्या ने उसका सामान शॉपिंग बैग में लौटाया। उसने चाबियाँ और एक कार्यक्रम के लिए उधार ली जैकेट वापस की।

आखिरी बहस में यात्रा के उपहार का जिक्र आया।

कबीर ने किस्तों में लौटाने को कहा।

लंबी खामोशी के बाद अनन्या बोली कि वह उपहार था।

कबीर ने मान लिया। जिस कर्ज की बात उसने वापस ले ली, उसे खुद नहीं बनाया।

अगले रविवार उसी समय क्लब के सामने से गुजरा जब अंदर जाता था।

फाटक के पार कुर्सियाँ लग रही थीं।

घर में कई सप्ताह पहले छापी चयन सूची निकाली। नाम अब भी था। सुधरा कुल अब भी पर्याप्त था।

उसने कागज दराज में रख दिया।

किसी बात का सच होना जानने से पूरी दोपहर खुद को उसका प्रमाण देना सुखद नहीं हो जाता।

* * *

सुधीर ने उसे मनोरंजन भवन में पाया। कबीर ऐसे आदमी के सामने खराब खेल रहा था जो हर फैसले पर बोलता रहता था।

सत्र के बाद सुधीर ने पूछा कि आलोचना चाहिए या चाय।

“चाय।”

दोनों ठेले तक गए।

सुधीर बासठ साल का सेवानिवृत्त बस चालक था। पहले क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं में नियमित जाता था। हाल में कहने लगा था कि यह उसका आखिरी सत्र है।

कोई नहीं पूछता था कि आखिरी का मतलब क्या है।

कबीर ने पूछा।

सुधीर ने चाय हिलाई।

“मतलब यह सुनते-सुनते थक जाना कि कभी अच्छा खिलाड़ी था।”

कबीर ने उसे देखा।

सुधीर हँसा।

“इतनी उम्मीद से मत देखो। तुम्हें गोद नहीं लिया है।”

हफ्ते में दो दिन अभ्यास तय हुआ। दोनों मुश्किल फैसलों के लिखे रिकॉर्ड लाएँगे। दूसरे के सामने जानकार दिखने के लिए कुछ जानने का नाटक नहीं करेंगे।

भवन का छोटा साझा शुल्क बराबर बाँटा।

पहली शाम सुधीर कपड़े के बैग में पत्ते, पढ़ने का चश्मा और डिब्बे में कटे अमरूद लाया।

कबीर कॉपी और टाइमर लाया।

“बहुत गंभीर हो,” सुधीर ने कहा।

फिर टाइमर का समय बदलने का तरीका पूछा।

* * *

अभ्यास तुरंत सुंदर नहीं हो गया।

सुधीर बीच में टोकता। कबीर हार का बचाव ऐसे करता जैसे सड़क पर किसी अनजान ने आरोप लगाया हो।

तीसरी शाम बीस मिनट ऐसे फैसले पर बहस हुई जिसे दोनों ने सही लिखा ही नहीं था।

कबीर ने कहा, समय खराब हो रहा है।

सुधीर चश्मा समेटने लगा।

कबीर की नजर आधे खाली अमरूद के डिब्बे पर पड़ी। अपनी आवाज ऐसी लगी जो किसी की मेहनत को एक वाक्य में बेकार कर सकती है।

“गुरुवार को आना।”

सुधीर रुका।

“पहले लिखना कि हुआ क्या था।”

गुरुवार को उन्होंने लिखा।

कागज ने दिखाया कि दोनों कुछ हिस्से गलत याद कर रहे थे।

वे उस समय उपलब्ध जानकारी और बाद में पता चले तथ्यों को अलग करने लगे। यह भी मानने लगे कि कभी परिणाम समझदारी से ज्यादा संयोग पर निर्भर था।

कबीर ने सुधीर के रिकॉर्ड इस तरह रखने में मदद की कि पुराने उदाहरण मिल सकें।

सुधीर ने कबीर को यह समझने में मदद की कि हर सवाल इस बात की परीक्षा नहीं है कि वह कुर्सी के योग्य है या नहीं।

कभी दोनों चिढ़कर जाते।

फिर भी लौटते।

एक महीने बाद सुधीर ने सत्र को अपना आखिरी समय बिताने का तरीका कहना छोड़ दिया।

अब वह उसे मंगलवार और गुरुवार कहता था।

* * *

एक खुली वयस्क प्रतियोगिता में क्लब सदस्यता के बिना चयन चरणों से आगे जाने का रास्ता था।

दोनों ने खर्च और कार्यक्रम अलग-अलग जाँचे। कोई दूसरे के लिए महँगे सप्ताहांत का वादा नहीं कर सकता था।

कबीर ने काम की पालियाँ तय कीं। सुधीर ने भरोसे वाली बसों के हिसाब से यात्रा बनाई।

दोनों ने प्रवेश लिया।

अलग चयन समूहों से आगे बढ़े। सुधीर एक सत्र बुरी तरह हारा। शाम कबीर की बालकनी में हर गलती बताता रहा, जब तक कबीर ने खाने को नहीं कहा।

एक सप्ताह बाद कबीर अपने समूह से मुश्किल से आगे आया।

पहला मन हुआ कि परिणाम अनन्या को भेज दे।

पुरानी बातचीत खोली।

आखिरी संदेशों के ऊपर तस्वीरें थीं। बारिश में कैफे की खिड़की। टूटी चप्पल जिस पर अनन्या ने उसे हँसाया था। मिठाई की प्लेट।

उसने बातचीत बंद कर दी।

परिणाम सुधीर को भेजा।

दो जवाब आए।

अच्छा।

गुरुवार को वह हाथ लाना जिसे लगभग खराब कर दिया था।

कबीर इतनी जोर से हँसा कि माँ ने रसोई से पूछा, किसने मजेदार बात कही है?

* * *

अंतिम आयोजन में एक स्वयंसेवक ने प्रचार वीडियो से पहचान लिया।

“वही हो न जिन्हें गर्लफ्रेंड ने शुरू करवाया था?”

कबीर का चेहरा गरम हुआ।

उसके बोलने से पहले सुधीर ने कहा, “ये दस बजे मेज चार पर खेलने वाले हैं।”

फिर स्वयंसेवक से पीने के पानी का स्थान पूछा।

यह कोई बड़ी रक्षा नहीं थी। बस कबीर को अगला मिनट बिताने की जगह मिल गई।

दो दिनों में खिलाड़ी कम होते गए।

कबीर अच्छा खेला, फिर लापरवाह हुआ, फिर सँभला। सुधीर की एकाग्रता को कई लोग गुस्सा समझ रहे थे।

दौरों के बीच खाना बाँटा, लेकिन वह जानकारी साझा नहीं की जिस पर प्रतियोगिता में रोक थी। दोस्ती को छूट मानने के बजाय अधिकारी से सीमा समझ ली।

दूसरी दोपहर कबीर ने सुधीर को अंक सूची देखते पाया।

“सामना हो सकता है,” सुधीर ने कहा।

कबीर ने सिर हिलाया।

“अफसोस वाला चेहरा मत बनाओ।”

“नहीं बना रहा।”

“अच्छा है। इतनी कमीजें शालीनता से हारने के लिए नहीं लाया।”

* * *

अंतिम दौर में सिर्फ दो खिलाड़ी बचे।

कबीर ने बाकी कुर्सियाँ हटते देखीं।

सुधीर ने चश्मा उतारा, साफ किया और पहन लिया। हरकत इतनी परिचित थी कि एक पल अमरूद का डिब्बा आने की उम्मीद हुई।

इसके बजाय अधिकारी ने अंतिम दौर की प्रक्रिया समझाई।

दोनों ने सुना।

शुरुआत में कबीर को ज्यादा महसूस हो रहा था कि सामने उसकी कमजोरियाँ जानने वाला आदमी बैठा है। एक फैसला ऐसा लिया जिस पर सुधीर का सवाल लगभग सुन सकता था।

सुधीर आगे हो गया।

अनुमत विराम में दोनों गलियारे के अलग सिरों पर थे। कबीर ने पानी पीया। इस मुकाबले को यह दिखाने की कोशिश बनने से रोका कि उसे अब किसी की जरूरत नहीं।

लोगों की जरूरत थी।

ऐसा साथी चाहिए था जो अभ्यास पर आए। ऐसा दोस्त जो रिकॉर्ड गलत बताए। दुकान का मालिक चाहिए था जो पाली बदल दे।

उनमें से किसी ने उसका हाथ नहीं खेला था।

वह लौटा और अगले फैसले पर ध्यान दिया।

अंतर धीरे बदला। सुधीर ने जवाब दिया, फिर सँभला, फिर दबाव बनाया। कोई एक चमकदार चाल नहीं थी जिसने बड़े खिलाड़ी को मूर्ख बना दिया हो।

अंतिम परिणाम की पुष्टि हुई तो कबीर जीत गया था।

सुधीर ने कुल देखा।

फिर हाथ बढ़ाया।

“अब बीच वाले हिस्से पर बहस कर सकते हैं।”

* * *

आँखें भीगने का पता चलने से पहले कबीर हँस पड़ा।

उसने ठीक से हाथ मिलाया।

पुरस्कार देते समय संचालक ने पूछा कि उसे किसने खोजा था।

शायद सवाल निर्दोष था। संचालक छोटी परिचय पर्ची देख रहा था।

कबीर गुस्से वाला जवाब दे सकता था। कमरे में न मौजूद व्यक्ति को माइक से सजा दे सकता था।

इसके बजाय बताया कि शुरुआत मोहल्ले के भवन में हुई। अलग अभ्यास समूहों में सीखा। हाल के महीने सुधीर के साथ काम किया।

संचालक ने सुधीर को प्रशिक्षक कहा तो कबीर ने दोहराया, “साथ काम किया। हम अभ्यास साथ करते हैं।”

दूसरे स्थान के पास खड़े सुधीर ने नीचे देखा और माथा मल लिया।

तस्वीर के लिए बुलाया गया।

इस बार कबीर को कहाँ खड़ा होना है, इसलिए बताया गया ताकि दोनों खिलाड़ी एक फ्रेम में आ सकें।

सुधीर ने अपना पुरस्कार पकड़ा।

कबीर ने अपना।

किसी के हाथ में दूसरे का बैग नहीं था।

* * *

पुरस्कार से कबीर को कुछ राहत मिली।

एक हिस्सा काम के टाले जा रहे उपकरण सुधारने में लगाया। बाकी बचत में रखा।

उससे हमेशा अच्छा महसूस करने का अधिकार नहीं मिल गया।

तीन दिन बाद अनन्या की इतनी याद आई कि पुराने कैफे तक चला गया। फिर आगे चलने का फैसला किया।

शाम उसका बधाई संदेश आया।

उसने धन्यवाद कहा।

दो संदेशों के नीचे कोई बहस नहीं थी। यह वादा भी नहीं था कि एक तस्वीर ने मतभेद खत्म कर दिए हैं।

सुधीर की परेशानी दूसरी थी।

खेलना चाहता था, लेकिन यात्रा और प्रवेश खर्च तय करेंगे कि कितनी बार जा सकता है। उसने भवन में कुछ घंटे काम खोजने का जिक्र किया।

“वयस्क शुरुआती खिलाड़ियों के सत्र के लिए कोई चाहिए। सालों पहले पूछा था। नंबर छोड़ने को कहा था।”

कबीर को याद आया कि खराब परिणाम और खराब फैसले का फर्क सुधीर ने कितने धैर्य से सिखाया था।

“अब भी करना चाहते हो?”

“हाँ।”

“तो वास्तविक खाली जगह के बारे में पूछते हैं।”

* * *

कबीर ने कार्यक्रम समन्वयक से संपर्क किया और सुधीर की सिफारिश की।

उनके अभ्यास के बारे में बताया। पूछा कि क्या सुधीर अपनी सिखाने की पद्धति दिखा सकता है।

उससे हारने के पुरस्कार में नौकरी बनाने को नहीं कहा।

समन्वयक ने परीक्षण कक्षा के लिए बुलाया।

कबीर इसलिए गया क्योंकि सुधीर पीछे एक परिचित चेहरा चाहता था।

पहले दस मिनट सुधीर बहुत जल्दी बोला। एक व्यक्ति ने दोहराने को कहा। वह रुका, साँस ली और दूसरा उदाहरण लिया।

कुछ देर बाद तीन लोग एक फैसले पर असहमत थे।

सुधीर ने सबको वजह बताने दी।

एक व्यक्ति ने ऐसा सवाल पूछा जिसका जवाब बोर्ड के उदाहरण से नहीं दिया जा सकता था। कबीर ने परिचित ठहराव देखा। लोग इंतजार कर रहे थे, इसलिए निश्चित दिखने का प्रलोभन था। सुधीर ने नोट देखे, एक संख्या काटी और कहा कि अगली बार बेहतर उदाहरण लेना होगा।

कोई उठकर नहीं गया।

पीछे बैठा कबीर सहज हुआ। डर था कि परीक्षण कक्षा दोस्त से वैसा आत्मविश्वास दिखवाएगी जिस पर संदेह करना दोनों कई महीने से सीख रहे थे।

कक्षा के बाद समन्वयक ने भुगतान वाले अंशकालिक काम पर बात की। विवरण तय होने में एक सप्ताह और लगा।

प्रस्ताव पक्का हुआ तो सुधीर पत्र मोड़कर अमरूद के डिब्बे में अभ्यास पर लाया।

“कागज रखने का भयानक तरीका,” कबीर ने कहा।

“फिर भी नौकरी मिल गई।”

कबीर ने पूछा कि चाय खिला सकता है क्या।

सुधीर ने हाँ कहा। फिर जोड़ा कि चाय से शाम की समीक्षा छोड़ने का हक नहीं मिलेगा।

* * *

सुधीर के पढ़ाना शुरू करने के बाद पहले मंगलवार उनकी मेज पर उसकी कक्षा के कुछ लोग बैठे थे।

दोनों को इंतजार करते देखकर वे उठने लगे।

सुधीर ने पूरा करने को कहा।

कबीर दीवार के पास से दो कुर्सियाँ लाया। एक का पेंच ढीला था। काम के लिए साथ रखने वाले छोटे औजार से कस दिया।

दोनों बगल की मेज पर बैठ गए।

सुधीर ने कॉपी खोली। कबीर ने टाइमर रखा।

कुछ देर अपने अंतिम मुकाबले की समीक्षा की। कबीर ने माना कि एक फैसला याद से ज्यादा खराब था। सुधीर ने माना कि एक मौका उसने खोया था, जिसका दोष पत्तों को दे दिया था।

फिर नया अभ्यास हाथ बाँटा।

कोई वीडियो नहीं बना रहा था।

किसने किसे बनाया, इसकी कहानी नहीं चाहिए थी।

दो कप चाय थी। अमरूद का डिब्बा था। दो आदमी थे जिन्हें उम्मीद थी कि दूसरा गुरुवार को लौटेगा।

कबीर ने अपने पत्ते देखे।

“तैयार?”

सुधीर ने चश्मा ठीक किया।

“तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।”

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