ढक्कन हरि के हाथ में रह गया। डिब्बा फर्श पर था, और चावल लोगों के जूतों तक बिखर गए थे।
ऋषभ अभी भी हँस रहा था। थोड़ी देर पहले वह मनोरंजन भवन के दरवाजे पर खड़े दो सदस्यों को अपनी जीत का कोई दाँव समझा रहा था। खाने की छुट्टी पर बैठे हरि प्रसाद ने बस इतना पूछा था कि उससे पहले वाले फैसले का हिसाब कहाँ गया।
“अब गार्ड हमें खेलना सिखाएगा!” ऋषभ ने कहा था।
“मैंने सवाल पूछा है।”
“हाँ, रात भर बैठकर सबको खेलते देखते हो। मुफ्त की ट्रेनिंग!”
उसने हाथ झटका। कलाई डिब्बे से टकराई। एक पल के लिए तीनों चुप हुए, फिर उनमें से एक ने फोन थोड़ा और ऊँचा कर लिया।
हरि ने ढक्कन मेज पर रखा। उन लोगों के सामने झुककर चावल बटोरने की हिम्मत नहीं हुई। पेट खाली था, लेकिन भूख जैसे कहीं अटक गई थी।
“दरवाजा खाली रखिए,” उसने कहा।
आवाज इतनी सीधी निकली कि उसे खुद हैरानी हुई।
* * *
पाली खत्म होने से पहले भवन के प्रबंधक ने उसे बुलाया। कंप्यूटर पर उसी घटना का वीडियो खुला था। ऊपर लिखा था—हमारा अगला चैंपियन।
हरि इंतजार करता रहा कि प्रबंधक खाने के बारे में कुछ कहेगा।
“सदस्य यहाँ आराम करने आते हैं। उनकी बातचीत में मत पड़ा करो।”
“वो मेरी मेज के सामने खड़े थे।”
“तो हटने को कहो। खेल समझाने की क्या जरूरत थी?”
पीछे दीवार पर वर्षगाँठ की प्रदर्शनी का नमूना लगा था। हरि ने तस्वीर पहचान ली। पच्चीस साल पहले खिंचवाई थी। वह सबसे बाएँ, उधार की नीली कमीज में खड़ा था। डिजाइनर ने पेंसिल से जो किनारा बनाया था, उसमें हरि कट रहा था।
“उस तस्वीर में गलती है।”
प्रबंधक ने पीछे देखा। “तुम भी थे उसमें?”
फिर उसे कुछ याद आया। “अरे, तुम्हारा नतीजा तो रद्द हुआ था न? एक प्रदर्शनी के लिए अब सारे पुराने मामले थोड़े खोलेंगे।”
उसने स्टेपलर उठा लिया। हरि समझ गया कि जाना है। सुबह पाँच बजे उसी ने सजावट वालों के लिए प्रदर्शनी का कमरा खोला।
* * *
हरि तिरसठ साल का था। सात साल से इस भवन में रात की सुरक्षा का काम कर रहा था। उससे पहले भी ऐसी नौकरियाँ की थीं जिनमें दूसरों की नींद के समय जागना पड़ता था।
सदस्य जानते थे कि उसके पास चाबियाँ सुरक्षित रहती हैं। यह भी कि आपातकालीन दरवाजे के आगे सामान रखने पर वह किसी की नहीं सुनता। उसके बारे में अधिकतर लोगों की जानकारी यहीं खत्म हो जाती थी।
बहुत कम लोग जानते थे कि वह कभी इंडियन रमी की प्रतियोगिताओं में खेलता था। अब भी मोहल्ले के खिलाड़ियों के साथ कभी-कभार बैठ जाता। वहाँ कोई पुराने नतीजों की फाइल नहीं खोलता था।
कोई पूछता कि बड़े आयोजनों में क्यों नहीं जाता, तो कह देता, काम बढ़ गया। झूठ नहीं था। बस बाकी बात नहीं बताता था।
चाबियों में प्लास्टिक की एक फीकी पट्टी लटकती थी। उस पर सत्ताईस लिखा था। छेद टूटने लगा था तो उसने धागा बाँध दिया था।
खाना गिरने वाली रात तनिष की नजर उसी पर पड़ी।
* * *
चौबीस साल का तनिष अभ्यास सत्रों में आने के बदले भवन के पुराने रिकॉर्ड सँभालने में मदद करता था। उस शाम वह कुर्सियाँ उठा रहा था। उसने सब देखा था।
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कैंटीन से दूसरा खाना ले आया। हरि ने धन्यवाद देकर पैसे रख दिए। तनिष ने लौटाने चाहे।
“तुमने थोड़े गिराया था।”
खाते समय तनिष ने चाबियों की तरफ इशारा किया। पुरानी तस्वीरें छाँटते हुए उसने पट्टी पर बना प्रतियोगिता का निशान देखा था।
“आप उसमें खेले थे?”
हरि ने चाबियाँ मुट्ठी में कर लीं। “बहुत पहले।”
“नाम क्या लिखवाया था?”
“हरि प्रसाद। यही नाम है मेरा।”
बताने के बाद उसे अपने पर झुँझलाहट हुई। फिर बोला, “इसकी फिल्म मत बना देना।”
तनिष ने फोन जेब में ही रहने दिया। पूछा कि पुराने नतीजे देख सकता है क्या। हरि ने हाँ कह दी। देख लेने में क्या जाता था।
* * *
उस प्रतियोगिता में हरि दूसरे स्थान पर आया था। उसके क्लब का महेंद्र तीसरे पर। फिर एक नया अंकपत्र जमा हुआ, जिसमें आँकड़े बदले हुए थे। कहा गया कि हरि ने अपना नतीजा बेहतर करने के लिए उसे भेजा है।
जाँच पूरी होने तक हरि का स्थान रोक दिया गया। महेंद्र दूसरे पर आ गया।
हरि ने कहा था कि वह कागज उसका नहीं है। मूल अंकपत्र माँगा था। अपील भी दी थी। हर बार अगली तारीख मिलती रही। कभी सचिव नहीं आए थे, कभी बैठक नहीं हुई थी। आखिर एक आदमी ने कहा कि मामला तय हो चुका है।
उन दिनों काम पक्का नहीं था। पत्नी की देखभाल करनी थी, किराया देना था। दफ्तर के हर चक्कर में मजदूरी कटती या बस का किराया लगता। एक दिन उसने जाना बंद कर दिया।
बाहर बची कहानी बहुत छोटी थी—हरि ने बेईमानी की थी। महेंद्र को उसका सही स्थान मिल गया था।
इतनी बार दोहराई गई कि किसी को यह पूछने की जरूरत नहीं लगी कि फैसला किसने देखा था।
* * *
तनिष को पहले कार्यक्रम की पुस्तिका मिली। फिर विवादित कागज आने से पहले छपा परिणाम मिला। उसमें साफ लिखा था—हरि प्रसाद, दूसरा स्थान।
समिति की सूची में अपील की फाइल का नंबर भी था। फाइल क्षेत्रीय कार्यालय के संग्रह में भेजी गई थी। तनिष दोनों प्रतियाँ लाया और सुरक्षा मेज पर ऐसी जगह रखीं कि आते-जाते सदस्य झाँक न सकें।
“फिर वही बातें शुरू होंगी?” हरि ने पूछा।
“हो सकती हैं।”
ऊपर से हथौड़े की आवाज आ रही थी। प्रदर्शनी की तस्वीर इतनी बड़ी बनने वाली थी कि महेंद्र की कमीज के बटन गिने जा सकें। हरि का कंधा तक उसमें नहीं रहता।
“फाइल मिल सकती है?”
“आपकी अर्जी चाहिए।”
अर्जी में कारण लिखने के लिए तीन लाइनें थीं। हरि उसे घर ले गया। सुबह तक उसने छह पन्ने लिख डाले थे।
* * *
कार्यालय के काउंटर पर बैठे लिपिक ने पाँच पन्ने लौटा दिए।
“फॉर्म भरिए। अपील की रसीद लगाइए। हमें फाइल नंबर चाहिए।”
हरि रसीद के साथ पुराने पत्र, फोटो कॉपी के बिल और एक बस टिकट भी लाया था। टिकट देखकर उसे वह दिन याद आया जब पूरी मजदूरी गँवाकर पहुँचा था और सचिव दोपहर के खाने पर चले गए थे। वह बताने लगा।
लिपिक ने पीछे लगी कतार देखी। “फाइल नंबर?”
हरि का मन हुआ कागज समेटकर चला जाए। पहले भी यही किया था—गुस्सा पी लिया, कागज उठाए, घर लौट आया। उसके पीछे हमेशा कोई इंतजार कर रहा होता था। जिस आदमी से मिलना होता, वह कहीं और होता था।
इस बार वह बगल की मेज पर गया। रसीद की फीकी स्याही में नंबर ढूँढ़ा, फॉर्म में उतारा और फिर कतार में लगा। अर्जी जमा हुई तो उसकी प्राप्ति की मुहर वाली प्रति माँगी। रखने से पहले तारीख जाँची।
शाम को प्रबंधक ने पूछा, “कहाँ गए थे?”
“छुट्टी के समय अपना काम था।”
“सुना है पुराना झगड़ा उठा रहे हो। यहाँ अच्छी-भली नौकरी है। सब पहचानते हैं। अब खुद अपनी बेइज्जती क्यों करवानी?”
ऊपर कोई माइक जाँच रहा था—एक, दो, एक, दो। हरि को नौकरी चाहिए थी। किराया तनख्वाह से जाता था, सुधरे हुए परिणाम से नहीं जाता। उसने दरवाजे की चौखट पकड़ ली। उखड़े रंग का खुरदरा हिस्सा हथेली में चुभा।
“मेरे काम की कोई शिकायत है?”
“नहीं। समझा रहा हूँ।”
“तो मैं अपनी पाली पूरी कर लूँ।”
मेज पर लौटकर उसके हाथ काँप रहे थे। तनिष अभ्यास के लिए आया, मगर उस दिन खेल नहीं हुआ। हरि बार-बार मुहर वाली प्रति देखता रहा। कहीं कुछ छूट तो नहीं गया था जिसकी वजह से उसे फिर लौटा दिया जाए।
* * *
पुराना संग्रह पूरा नहीं था, लेकिन खाली भी नहीं था। वर्तमान रिकॉर्ड अधिकारी अनूप को मूल अंकपत्र और कुछ पत्र मिले। मेज पर दर्ज मूल अंक हरि के दूसरे स्थान की पुष्टि करते थे। बाद में जमा हुआ कागज उनसे अलग था।
महेंद्र का उसी समय दिया गया बयान भी मिला। उसने लिखा था कि वह मेज से समिति तक कागज ले गया था और विवादित नए आँकड़े उसने भरे थे। अंक दर्ज करने वाले अधिकारी के नोट में था कि हरि ने उसके सामने उस कागज पर न हस्ताक्षर किए थे, न उसे जमा किया था।
पुरानी समिति ने और जानकारी माँगी थी। उसके बाद उन प्रमाणों पर कोई अंतिम, कारण सहित फैसला फाइल में नहीं मिला।
मौजूदा संस्था ने समीक्षा शुरू की। हरि ने अपने पास बचे कागज दिए। महेंद्र से जवाब माँगा गया। पुराने अधिकारियों में जो उपलब्ध थे, उनसे भी संपर्क हुआ।
नंबर वाली पट्टी देखकर फैसला नहीं हो सकता था। महीनों लगे। हरि इस दौरान रात की नौकरी करता रहा।
* * *
कभी-कभी उसे लगता कि सब छोड़ देना चाहिए। एक पुराने सदस्य ने भी यही सलाह दी।
“नाम आपका होता तो छोड़ देते?” हरि ने पूछा।
वह आदमी दूसरी बात करने लगा।
उधर ऋषभ ने प्रबंधक के जरिए खाने के लिए माफी भेजी। हरि ने कहा कि वीडियो का मजाक भी उसी घटना का हिस्सा है। भवन की शिकायत प्रक्रिया में बात गई। ऋषभ ने सामने आकर माफी माँगी और वीडियो डालने वालों से उसे हटाने को कहा। कुछ ने हटा दिया।
हरि हर शाम बची हुई प्रतियाँ खोजता नहीं रहा। समय मिलने पर तनिष के साथ अभ्यास करता। शुरू में तनिष उसकी गलती बताने से भी बचता था।
“गलत खेला है तो कहो।”
तनिष ने कहा। हरि को अच्छा नहीं लगा। घर जाते समय वही चाल याद आती रही। अगले अभ्यास तक मान चुका था कि लड़का ठीक कह रहा था।
उसके बाद दोनों के बीच खेल की बातचीत आसान हो गई।
* * *
समीक्षा ने हरि का दूसरा स्थान बहाल कर दिया। मूल अंकपत्र उसके पक्ष में थे। उपलब्ध प्रमाणों से बदला हुआ कागज उसका मानना सही नहीं था। महेंद्र का दर्ज स्थान तीसरा कर दिया गया।
हरि ने पूरा निर्णय दो बार पढ़ा। उसमें देखा गया हर रिकॉर्ड और मिले हुए जवाब दर्ज थे। तारीख थी। हस्ताक्षर थे। फैसला था। पच्चीस साल से बीच में अटकी बात आखिर पूरी हुई थी।
संस्था ने कहा कि नया प्रमाणपत्र डाक से भेज देंगे।
“सुधरा हुआ नतीजा कहाँ लगेगा?”
“हमारे रिकॉर्ड में।”
“और प्रदर्शनी में?”
फोन पर कुछ देर चुप्पी रही। फिर बताया गया कि भवन के पैनल छपने जा चुके हैं।
हरि ने अपने सामने रखा पत्र देखा। वह इसे दराज में रख सकता था। बाहर लोग वही तस्वीर, वही नाम देखते रहते।
“तो वह पैनल दोबारा छपवाना पड़ेगा।”
उसने भवन को निर्णय की प्रति भेजी। वर्षगाँठ के समारोह में सुधार पढ़कर सुनाने को भी कहा। इस बार अर्जी छोटी थी। अब उसे अपना कारण साबित नहीं करना था।
* * *
वर्षगाँठ पर वरिष्ठ खिलाड़ियों की आमंत्रण प्रतियोगिता भी होनी थी। बहाल परिणाम से हरि मूल्यांकन में बैठ सकता था। सीधे प्रतियोगिता में जगह नहीं मिली थी।
पहला सत्र खराब गया। रात की नौकरी से सीधा आया था। आँखें दुख रही थीं, मगर मानने को तैयार नहीं था। तनिष ने बाद में उसकी जल्दबाजी वाली गलतियाँ दिखाईं।
“कुर्सियाँ बहुत खराब हैं,” हरि ने कहा।
“हैं। पर जल्दी आपने की।”
हरि हँसा। फिर उसे लगा कि महीनों से निष्पक्ष जाँच माँग रहा था; अब अपने खेल में रियायत क्यों माँगे। अगली बार उसने दूसरे गार्ड से पाली बदल ली। बदले में उसका रविवार का काम किया। सोकर आया तो समय भी बचा और ध्यान भी।
दूसरे मूल्यांकन में उसका चयन हो गया। महेंद्र का नाम भी सूची में था। छपी पुस्तिका में उसे पुराने आयोजन का उपविजेता बताया गया था। आयोजक ने माफी माँगी—पुराना मसौदा छपने चला गया था।
“बदलवाएँगे?” हरि ने पूछा।
“घोषणा कर देंगे।”
“लोग पुस्तिका घर ले जाएँगे।”
आयोजक छपाई का खर्च समझाने लगा। हरि ने लिफाफे से फोटो कॉपी की पुरानी रसीद निकाली। तह पर कागज फट रहा था।
“अपनी सारी प्रतियों के पैसे मैंने दिए थे। अपनी प्रतियों के आप दे दीजिए।”
आवाज ऊँची निकल गई थी। उसे खुद संकोच हुआ। आयोजक ने रसीद देखी, फिर छापेखाने को फोन किया। दो दिन बाद सुधरी पुस्तिका आई। हरि ने उसी मेज पर खड़े होकर पढ़ी जहाँ उसका खाना गिरा था। खिलाड़ियों की सूची में उसका नाम था। उसके आगे कोई सफाई नहीं लिखनी पड़ी थी।
* * *
प्रतियोगिता से पहले पानी की मशीन के पास महेंद्र मिला।
“तब सब पर दबाव था,” उसने कहा। “कागजों में गड़बड़ हो जाती है।”
“कागज समीक्षा में देख लिए गए हैं।”
“इतना निजी बनाने की क्या जरूरत है?”
हरि ने उसे देखा। उसका नाम निजी था। पुराने प्रतिद्वंद्वी को दुकान में देखकर दूसरी तरफ मुड़ जाने की शर्म भी निजी थी। वह सूची सुनाने नहीं लगा।
“जाँच में कुछ जोड़ना है तो संस्था को भेजिए।”
महेंद्र ने नई शुरुआत की बात की।
“आज की प्रतियोगिता खेल सकते हैं।”
हरि अपनी मेज पर चला गया। तनिष दर्शकों में था। प्रबंधक दरवाजे के पास कुर्सियाँ ठीक करवा रहा था। हरि ने सामने बैठे खिलाड़ियों की तरफ ध्यान किया।
खेल आसान नहीं था। कुछ लोग लगातार प्रतियोगिताओं में आते रहे थे। हरि से एक ऐसी गलती भी हुई जिसका दोष न उम्र को दे सकता था, न थकान को। विराम में उसे समझा और वापस बैठा।
महेंद्र अच्छा खेल रहा था। पहले इस बात पर गुस्सा आया। फिर ध्यान सँभला। पुराना अन्याय अपने आप आज की जीत नहीं दिलाता।
आखिरी दौर तक अंक करीब रहे। हरि ने उस कल्पना को छोड़ा जिसमें पूरा कमरा महेंद्र को हारते देख रहा था। उसे अगला फैसला ठीक करना था। फिर उसके बाद वाला।
अंतिम कुल जुड़ा तो हरि सबसे आगे था। उसने खुद अंकपत्र जाँचा। फिर सावधानी से रख दिया। इस बार कोई उसे उठाकर नहीं ले गया।
* * *
पुरस्कारों से पहले संस्था के सचिव ने पुराने परिणाम का सुधार पढ़ा। आयोजन का नाम, साल और समीक्षा का निष्कर्ष सुनाया। हरि का स्थान रोके रखने का आधार नहीं था। उसका दूसरा स्थान बहाल था।
महेंद्र सामने बैठा था। सुधरे स्थान पढ़े गए तो उसने पुस्तिका खोली और फिर बंद कर दी।
हरि मंच पर गया। उसे अपनी बेइज्जती न करवाने की सलाह देने वाले प्रबंधक ने हाथ बढ़ाया। हरि ने पहले प्रमाणपत्र लिया। कमरे के सामने अपना नाम जाँचा।
फिर आज का परिणाम घोषित हुआ। पहला स्थान—हरि प्रसाद।
वह अपनी कुर्सी की तरफ लौटने लगा था। गलियारे में रुक गया। क्षण भर समझ नहीं आया कि तालियाँ अब तक क्यों बज रही हैं। फिर तनिष दिखा, मुसकराते हुए मंच की तरफ इशारा कर रहा था।
हरि वापस मुड़ा। इस बार जल्दी नहीं की। पुराना प्रमाणपत्र फोल्डर में सुरक्षित रखा। फोटोग्राफर को इंतजार करना पड़ा। उसके बाद नया पुरस्कार लिया।
* * *
समारोह के बाद महेंद्र दो पुराने सदस्यों को साथ लेकर आया। इतनी ऊँची आवाज में बोला कि दोनों सुन सकें।
“अच्छा हुआ गलतफहमी दूर हो गई।”
हरि ने साथ आए आदमियों को देखा। एक ने बरसों पहले उसका फोन उठाना बंद कर दिया था।
“कौन-सी गलतफहमी?”
महेंद्र की मुसकराहट अटक गई। “वही रिकॉर्ड की। सब अपनी तरफ से कोशिश कर रहे थे।”
“नए आँकड़े आपने लिखे थे। जवाब मैं पच्चीस साल देता रहा।”
दोनों सदस्य चुप हो गए। हरि नहीं जानता था कि उस दिन महेंद्र की नीयत क्या थी। उससे मनचाहा कबूलनामा नहीं निकलवा सकता था। जो साबित हो चुका था, वही काफी था। महेंद्र ने नजर हटाई तो हरि प्रदर्शनी के कमरे में चला गया।
पैनल बदल दिया गया था। पूरी तस्वीर में वह बाएँ खड़ा था। नीली कमीज की ढीली कफ पर उसका हाथ था। पत्नी ने कहा था कि तस्वीर में कफ अंदर मोड़ लेना। वह भूल गया था। इतने साल बाद उसे देखकर अचानक हँसी निकली। उसने फोल्डर को अँगूठे से जोर से दबा लिया।
प्रबंधक सजावट वाले के साथ आया। तस्वीर के नीचे छोटी शीशे की पेटी तैयार थी। प्रदर्शनी के लिए नंबर वाली पट्टी माँगी।
“सिर्फ प्रदर्शनी तक,” हरि ने कहा।
रसीद पर लौटाने की तारीख पढ़ी, हस्ताक्षर किए। फिर चाबियों से पुराना धागा खोला। पट्टी निकलते ही गुच्छा अजीब खाली लगा।
प्रबंधक ने उसे कर्मचारियों की तस्वीर के पास रखने को कहा। हरि ने पट्टी उठा ली। नीली कमीज और मुड़ी हुई कफ की तरफ इशारा किया।
“उस तस्वीर के नीचे।”
सजावट वाले ने स्टैंड खिसकाया। लेबल लिखा—हरि प्रसाद। खिलाड़ी संख्या 27। दूसरा स्थान, बहाल।
हरि झुककर शीशे के पार पढ़ने लगा। आज किसी को समझाना नहीं पड़ा कि वह कौन है।