1
निखिल ने पहली बार खुद को सिंगल बताया, तब तारा उसकी मेज़ के नीचे बैठी थी। आवाज़ का तार ढीला था। वह दो उँगलियों से उसे दबाए हुए थी ताकि प्रसारण बीच में न रुक जाए।
उसके गाल के पास निखिल का जूता था। ऊपर स्क्रीन पर टिप्पणियों के बीच छोटे लाल दिल तैर रहे थे।
“न बीवी, न गर्लफ्रेंड। बस मैं और क्रिकेट।”
तारा ने अपनी उँगलियों को देखा। छोड़ देती तो आवाज़ गायब हो जाती। उस शाम पहले ही दो बार गड़बड़ हो चुकी थी। उसने अगला सवाल खत्म होने दिया। विज्ञापन आया, तब पीछे की ओर सरककर बाहर निकली।
निखिल ने माइक बंद किया। “अभी मत शुरू हो जाना।”
उसने कुछ कहा भी नहीं था।
“कैमरे के सामने कुछ बातें कहनी पड़ती हैं,” उसने समझाया।
पीछे की शेल्फ पर पीतल का हाथी रखा था। शादी में उसकी माँ ने दिया था। तारा ने दोपहर को उसे चमकाया था। कैमरे की रोशनी में अच्छा लग रहा था।
2
ठाणे के उनके घर में दो कमरे थे। एक में बिस्तर, कपड़े सुखाने का स्टैंड और बरसात में अटकने वाली अलमारी थी। दूसरा निखिल के कार्यक्रम का कमरा था।
शुरुआत में वे उसे अपना कार्यक्रम कहते थे। उधार के ट्राइपॉड के बीच ज़मीन पर बैठकर खाना खाते समय दोनों अगले एपिसोड की बात करते। निखिल को क्रिकेट पसंद था। तारा को उलझी हुई बातचीत से देखने लायक कार्यक्रम बनाना आता था।
वह आठ बेकार सेकंड ऐसे निकाल सकती थी कि बोलने वाला बीच में कटा हुआ न लगे। उसे पता था कि कौन सी चुप्पी हटानी है और किस चुप्पी में पूरी बात छिपी है।
डेढ़ साल उसने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी। फिर एक विज्ञापनदाता ने पूरे सीज़न का अनुबंध दिया। निखिल बोला, “दूसरों का काम कब तक बनाती रहोगी? अपना कुछ बनाते हैं।”
उसकी तनख्वाह तय नहीं हुई। घर के खर्च का पैसा साझा खाते से निकल जाता। निखिल इसे आज़ादी कहता था। तारा की माँ पूछतीं, “तुम कमाती कितना हो, पता तो होना चाहिए।” तारा ने उनसे काम की चर्चा कम कर दी।
3
तीसरे सीज़न तक निखिल की राय पर बहस होने लगी थी। लोग कमेंट में मैच पर लगाए पैसों की बातें करते। जिस टिप्पणी से झगड़ा बढ़ता, निखिल उसे ऊपर लगा देता।
कैमरा बंद होने पर उसका भरोसा इतना पक्का नहीं रहता था। कौन सी तस्वीर लगानी है, तारा तय करती। मेहमान की बेटी की परीक्षा कब है, तारा याद रखती। खिलाड़ी की चोट की खबर चार दिन पुरानी है, तारा पकड़ती।
कोई आने से मना करता तो दूसरा मेहमान वही ढूँढ़ती। निखिल गुस्से में बोलने लगता तो पानी का गिलास फ्रेम के बाहर रख देती।
छोटे चैनल के दिनों में उनकी शादी छिपी नहीं थी। पुरानी तस्वीरें मौजूद थीं। बस धीरे-धीरे उसने तारा का ज़िक्र बंद कर दिया। फिर बैठक से शादी की तस्वीर उतार दी। कहा, शीशे में लाइट चमकती है।
तारा ने मान लिया। अलमारी में रखने की जगह भी उसने ही बनाई।
लेकिन सिंगल कहना अलग था। अब उसे तस्वीर से नहीं हटाया गया था। वह नीचे बैठकर उसका काम बचा रही थी और ऊपर उसकी शादी मिटाई जा रही थी।
4
प्रसारण के बाद निखिल ने बिरयानी मँगाई।
“बारह हज़ार लोग एक साथ देख रहे थे। एक शाम तो खुशी से बिता सकते हैं?”
तारा ने कहा कि वह अपनी बात ठीक करे।
“कैसे? अब अपनी निजी ज़िंदगी पर घोषणा करूँ?”
“वह तो कर चुके हो।”
उसने खाने का डिब्बा उसकी ओर बढ़ाया। वही तेज़ मिर्च वाला, जो तारा को पसंद नहीं था।
“एजेंसी एक तरह की इमेज चाहती है। तुम्हें तो ये सब समझ में आता है।”
तारा ने ढक्कन बंद कर दिया। वह फोन लेकर पीछे आया। उसे एक ग्राफ दिखाया। रिश्तों की बात शुरू होते ही दर्शकों की संख्या बढ़ी थी।
बाद में तारा को यही बात याद रही। वह उसे दिखाने आया था कि उसका दिल दुखाना फायदे का रहा।
ग्यारह बजे उसने पूछा, छोटी क्लिप तैयार हैं? बारह बजे तीन हिस्सों के समय भेजे। बारह बजकर सत्रह मिनट पर बगल के कमरे से संदेश आया, काम को तो सज़ा मत दो।
तारा ने फोन बंद कर दिया। पहली बार उसने अधूरा काम देखकर भी वापस कुर्सी नहीं खींची।
5
सुबह सास का फोन आया।
“इंटरनेट पर लोग ऐसी बातें करते रहते हैं। हर बात दिल पर थोड़े लेते हैं।”
तारा दवा की दुकान के बाहर अपनी माँ की पर्ची लिए खड़ी थी। उधर फोन में पुराने मैच की आवाज़ आ रही थी।
“मैं कह दूँ कि मेरी शादी नहीं हुई तो आपको ठीक लगेगा?”
“तुम बात बिगाड़ रही हो।”
दुकानदार ने दूसरी बार उसका नाम पुकारा। तारा ने रविवार को आने का वादा किए बिना फोन रख दिया।
उसे लगता था कि घर छोड़ने की शुरुआत सूटकेस से होगी। शुरुआत दवाइयाँ खरीदने से हुई। उसे किसी से पूछना नहीं पड़ा कि मैच के किस ब्रेक में दवा पहुँचाना सुविधाजनक रहेगा।
घर आकर उसने एजेंसी की प्रोड्यूसर सलोनी को लिखा। शुक्रवार तक तय दो वीडियो पूरे कर देगी। उसके बाद कार्यक्रम का काम नहीं करेगी। संदेश निखिल को भी भेजा। कोई इलज़ाम नहीं लिखा।
वह पढ़कर बोला, “मुझे डरा रही हो?”
तारा ने जवाब दिया, “शुक्रवार तक की बात लिखी है। पढ़ लो।” इस बार उसने संदेश का मतलब समझाने में शाम नहीं लगाई।
6
एक हार्ड ड्राइव को लेकर चालीस मिनट बहस हुई। निखिल के मुताबिक कमरे में रखा सब उसका था। तारा ने बताया कि ड्राइव में शादी का वीडियो, उसकी माँ की जाँच रिपोर्ट और शादी से पहले बनाई डॉक्युमेंट्री भी थी।
सलोनी ने काम सौंपने का तरीका तय करवाया। कार्यक्रम की तैयार फाइलें चैनल के पास रहीं। निजी फोल्डर अलग किए गए। साझा सेवाओं की पहुँच संबंधित लोगों के सामने बदली गई। तारा ने एक भी तैयार वीडियो नहीं मिटाया।
उसने चार पन्नों में लिखा कि कौन सा प्लग खराब है, किस मेहमान को दोबारा याद दिलाना पड़ता है और कौन सा बिल मंज़ूरी के लिए रुका है।
निखिल ने पन्ने पलटे। “पेशेवर होती तो ढंग की गाइड बनाती।”
तारा ने आखिरी पंक्ति के नीचे माइक वाले का नंबर जोड़ दिया।
अब तक उसके मन का एक छोटा सा हिस्सा इंतज़ार कर रहा था कि निखिल कहेगा, तुम्हारे बिना कैसे होगा। यह सुनकर उसे खुद पर शर्म आती थी। अब वह चाहती थी कि उसके बिना हो जाए। काम उसके रुकने का बहाना न बने।
7
अदिति के पास अतिरिक्त गद्दा था, कमरा नहीं। तारा किताबों की अलमारी के पास सोती। सूटकेस दरवाज़े के पीछे खड़ा रहता।
पहली रात दो बजे उसकी आँख खुली। लगा, कोई वीडियो अपलोड करना भूल गई है। दूसरी रात उसने चैनल खोल लिया। नया सहायक कुछ सेकंड कैमरे में आया। निखिल ने कहा, आज इसने बचा लिया।
तारा ने फोन उलटा रख दिया। शायद उस लड़के ने सचमुच प्रसारण बचाया था। इसमें उसकी क्या गलती थी?
सुबह अदिति ने धनिया लाने को कहा। सब्ज़ी की दुकान पर इतनी मामूली बात से तारा रो पड़ी। किसी को तस्वीर नहीं चाहिए थी, न तीसरी बार बदला हुआ वीडियो, न पुराना लोगो हटाकर नया वाला। बस धनिया चाहिए था। गलती से पुदीना ले जाती तो पूरी शाम बर्बाद नहीं होती।
वह दोनों ले आई। अदिति ने बिना सवाल किए दोनों गुच्छे धो दिए। फिर तारा से पूछा कि चाय पीएगी या पहले नहाएगी। घर में उसके हिस्से का फैसला इतना सा था।
8
पहला स्वतंत्र काम उम्मीद से कम पैसे का मिला। ग्राहक ने शुरुआत बदलवाई। उपशीर्षक का आकार दो बार मंज़ूर करने के बाद फिर बदलने को कहा।
तारा ने बदलाव किए। निखिल को छोड़ देने से बाकी दुनिया समझदार नहीं हो गई थी।
उसने अपनी फीस की सूची बनाई। एक रकम घटाई, फिर भेजने से पहले वापस बढ़ा दी। अगली वीडियो कॉल पर अपने मुँह से सुना, “इस बदलाव का अलग शुल्क लगेगा।”
चेहरा गरम हो गया। ग्राहक ने कहा, “ठीक है।”
घर में पैसे की बात शुरू होते ही उसे बताया जाता था कि वह कितनी चीज़ों की कद्र नहीं करती। यहाँ बात ग्यारह सेकंड में खत्म हो गई।
एक छोटी प्रोडक्शन कंपनी से खेल से जुड़े स्थानीय कार्यक्रमों का काम मिलने लगा। सफर लंबा होता, समय कम। एक दोपहर उसने स्विमिंग पूल के चेंजिंग रूम के टूटे दरवाज़ों पर बनी रिपोर्ट काटने में चार घंटे लगाए।
काम में इतनी उलझ गई कि निखिल का चैनल देखना भूल गई। रात को याद आया तो फोन खोलने के बजाय खाना गरम किया।
9
निखिल उसे नहीं भूला था। पहले उन पासवर्ड के बारे में पूछा जो कागज़ पर लिखे थे। फिर कहा, नया प्रोड्यूसर कार्यक्रम की लय बिगाड़ रहा है, एक बार आ जाओ। फिर पीतल के हाथी की तस्वीर भेजी।
तुम्हारी तरफ की शेल्फ खाली लगती है।
तारा देर तक संदेश देखती रही। उसे पता था कि कौन सी याद छूने से वह नरम पड़ती है। वे पुराने दिन, ज़मीन पर साथ खाया खाना, उधार के कैमरे।
उसने लिखा, हाथी नहीं रखना तो मेरी किताबों के साथ पैक कर देना।
रविवार के प्रसारण में निखिल ने मुश्किल निजी दौर का ज़िक्र किया। नाम नहीं लिया। कहा, कुछ लोग अपने करीबी की कामयाबी सह नहीं पाते।
अदिति सार्वजनिक जवाब देना चाहती थी।
“उसे अगला एपिसोड चाहिए,” तारा ने कहा।
उसने सलोनी से काम की बात ईमेल पर रखने को कहा। फिर अपने लिए वैवाहिक काउंसलर का समय लिया। वहाँ पहले अकेले जाएगी। उसे अपनी बात सुनने के लिए भी अब किसी तीसरे की शांत जगह चाहिए थी।
10
नए कार्यक्रम का विचार सलोनी का था। प्रोडक्शन कंपनी के पास छह छोटे एपिसोड का बजट था। विषय था, मोहल्लों और छोटे मैदानों में खेल चलाते रहने वाले लोग।
उन्हें ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो निर्माण और संपादन दोनों संभाल सके। हर बातचीत को झगड़ा न बनाए।
तारा ने पहली तेज़ बारिश के दिन मैदान संभालने वाले आदमी के साथ रहने का सुझाव दिया। सलोनी ने पूछा, “पानी भरा ही नहीं तो कहानी कहाँ है?”
“फिर देखेंगे कि भरा क्यों नहीं।”
उसे पूरी शृंखला नहीं, पहले एक नमूना बनाने का मौका मिला। शूट पर मैदान वाले ने कैमरे के लिए वही वाक्य दोबारा कहने से मना कर दिया। तारा ने अधूरा सा पहला वाक्य रहने दिया। पीछे उसकी पोती हँसी। वह हँसी भी रखी।
नमूने में शोर नहीं था। अगला मैच किसी की ज़िंदगी बदल देगा, ऐसा दावा भी नहीं था। सलोनी ने बाकी पाँच एपिसोड मंज़ूर कर दिए।
अनुबंध में तारा का काम, फीस और भुगतान की तारीखें थीं। उसने दस्तखत करने से पहले पूरा पन्ना दो बार पढ़ा।
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चौथे महीने तारा और निखिल काउंसलर के कमरे में मिले। उसने सिंगल कहने के लिए माफी माँगी। बोला, बिना सोचे निकल गया था।
“सोचा था,” तारा ने कहा। “बाद में ग्राफ दिखाकर समझाया भी था।”
निखिल ने काउंसलर की ओर देखा, जैसे तारा ने बातचीत का कोई नियम तोड़ दिया हो।
तारा नहीं चाहती थी कि उसका कार्यक्रम बंद हो। वह अपनी शादी की हर बात दर्शकों को बताने की माँग भी नहीं कर रही थी। उसने पूछा कि क्या निखिल समझता है, घर में उसके लिए पत्नी होने और काम आने के बीच कोई सीमा ही नहीं बची थी।
“ऐसे बोल रही हो जैसे मैं तुम्हारा मालिक था।”
“नौकरी होती तो तनख्वाह मिलती।”
इतनी देर चुप्पी रही कि बाहर का ट्रैफिक सुनाई देने लगा।
वे दो बार और गए। तीसरी मुलाकात के बाद तारा ने अलग रहने का फैसला साफ कर दिया। लौटते समय ट्रेन में उसे बहुत दुख हुआ। उसने सोचा था कि सही फैसला कर लेने के बाद कुछ हल्का लगेगा। उस शाम सिर्फ थकान लगी।
12
छठा एपिसोड महिलाओं की क्रिकेट टीम पर था। जिस मैदान में वे अभ्यास करती थीं, वहाँ निजी बुकिंग आ जाती तो उन्हें हटना पड़ता।
कप्तान नगर बस में कंडक्टर थी। इंटरव्यू के बीच उसने घड़ी देखी। तारा ने पूछा, रोक दें?
“बेटे को लेने जाना है। कामकाजी माँ सुनते ही लोग चाहते हैं कि एक घंटा और बैठकर प्रेरणा देती रहूँ।”
उन्होंने वहीं रोक दिया।
इस एपिसोड को पहले से काफी अधिक लोगों ने देखा। कप्तान ने शिफ्टों के बीच अभ्यास का समय निकालने की बात जिस सीधे तरीके से कही थी, वह लोगों को पसंद आई। एक स्कूल ने सुबह का खाली समय देने की पेशकश की। मैदान इस्तेमाल करने की शर्तें अलग से तय हुईं।
अगले अभ्यास पर तारा बिना कैमरे गई। कप्तान एक खिलाड़ी को कैच का अंदाज़ा लगाना सिखा रही थी। किसी ने धन्यवाद का भाषण नहीं दिया। एक लड़की ने कहा, थोड़ा हटिए, रनअप में खड़ी हैं।
तारा हट गई। उसने कुछ होने में मदद की थी। अब उसे वहीं रहकर हमेशा तार पकड़े रहने की ज़रूरत नहीं थी।
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निखिल का प्रस्ताव प्रोडक्शन कंपनी के सामान्य अतिथि फॉर्म से आया। उसका चैनल खत्म नहीं हुआ था। दर्शक अब भी थे। मगर नई शृंखला उन लोगों तक पहुँच रही थी जो उसका भविष्यवाणी वाला कार्यक्रम नहीं देखते थे।
उसकी एजेंसी ने क्षेत्रीय फाइनल से पहले संयुक्त चर्चा सुझाई। सलोनी ने प्रस्ताव तारा को भेजा। पूछा, चाहो तो दूसरा प्रोड्यूसर संभाल लेगा।
तारा अपने किराए के घर की मेज़ पर बैठी पढ़ रही थी। स्कूल छूटने पर नीचे बहुत शोर होता था। घर के लिए उसने अभी दो ही कुर्सियाँ खरीदी थीं।
उसने कप्तान और एक स्कूल कोच को साथ बुलाने का सुझाव दिया। निखिल तीन मेहमानों में से एक होगा। उसने लिखा कि वह काम कर सकती है, बाकी एपिसोड जैसी फीस और शर्तों पर।
अगले दिन मन हुआ मना कर दे। फिर समझ आया कि अब भी उसकी पूरी नौकरी निखिल की मदद करने या उससे बचने के हिसाब से तय होगी। वह दोनों में से कुछ नहीं चाहती थी।
14
निखिल बीस मिनट देर से मिठाई लेकर आया। सहायक ने डिब्बा सबके लिए रख दिया। निजी मुलाकात न होने से उसके चेहरे पर निराशा दिखी।
उसने तारा से पूछा, “मुझे सच में किनारे वाली कुर्सी पर बैठाओगी?”
“बीच का कोई मुख्य मेहमान नहीं है। बातचीत है।”
“समझ रही हो मेरा मतलब।”
वह समझ रही थी। पहले उसकी सुविधा तय हो, बाकी बातें तारा बाद में समझाए। वही पुराना इंतज़ाम वह वापस चाहता था।
आवाज़ जाँचने के लिए बुलाया गया। स्टूडियो में आते हुए निखिल ने तारा के कंधे पर हाथ रखा। टीम से बोला, “मेरी बीवी काम बहुत सख्ती से करवाती है।”
तारा मेकअप करने वाली लड़की को रास्ता देने के लिए हट गई।
“हम अलग रह रहे हैं। तारा कहना ठीक है।”
उतनी ही आवाज़ में कहा जितनी में कुर्सी खिसकाने को कहती। कोई चौंककर नहीं रुका। फ्लोर मैनेजर ने घड़ी देखी। काम चलता रहा। उस सामान्य व्यवहार से उसे उतना सहारा मिला जितना किसी तालियों से नहीं मिलता।
15
चर्चा में निखिल ने कप्तान की बात दो बार काटी। तीसरी बार तारा ने प्रस्तोता के कान में लगे उपकरण पर कहा, उन्हें पूरा बोलने दें। प्रस्तोता ने वैसा ही किया।
कप्तान बता रही थी कि रविवार का मैच खेलने के लिए शिफ्ट बदलवानी पड़ती है, बच्चे का इंतज़ाम और बस का किराया देखना पड़ता है। निखिल ने घर से अनुमति मिलने का मज़ाक करना चाहा। किसी को खास हँसी नहीं आई। उसने संभलकर अगला सवाल बेहतर पूछा।
बातचीत बेहतर होने लगी। तारा ने प्रचार की छोटी क्लिप के लिए एक हिस्सा चिन्हित किया। दूसरे कैमरे वाले से कप्तान पर रहने को कहा। उसे बोलने दिया जाए तो अच्छा एपिसोड बन सकता था।
सीधा प्रसारण खत्म होने के बाद आखिरी पंक्ति के लिए कैमरे ठीक किए जा रहे थे। निखिल उसके पास झुका।
“ये सब साथ में कर सकते थे।”
तारा ने उसकी कमीज़ पर लगा माइक देखा। साउंड वाला कमरे की आवाज़ अभी रिकॉर्ड कर रहा था।
“तुम्हारा माइक चालू है।”
वह तुरंत माइक की तरफ हाथ ले गया। तारा मॉनिटर पर लौट आई। आगे क्या बोलना था, अब उसे खुद तय करना था।
16
माइक उतरने के बाद वह फिर आया।
“सबके सामने टोकने से पहले बता सकती थीं।”
“बीवी कहने पर?”
“ऐसे बोलने पर जैसे सब खत्म हो गया।”
तारा ने हेडफोन उतारे। आसपास तार लपेटे जा रहे थे, बैटरियाँ गिनी जा रही थीं, किराए के उपकरण डिब्बों में रखे जा रहे थे। उसे कभी लगता था कि शादी किसी बड़े आखिरी वाक्य पर खत्म होती होगी। यहाँ एक ही बात बार-बार कहनी पड़ रही थी, क्योंकि दूसरा सुन नहीं रहा था।
“हो गया है।”
निखिल ने कमरे में देखा। शायद कोई होता जो उसे बात नरम करने को कहता। कप्तान बस का रास्ता पूछ रही थी। सलोनी अगले दिन का काम देख रही थी। कोई उनकी बातचीत को समझौते की बैठक बनाने के लिए खाली नहीं था।
निखिल मिठाई छोड़कर चला गया। सामान समेटने के बाद सहायक ने तारा को आखिरी टुकड़ा दिया। उसने आधा लिया, आधा उसे लौटाया। संपादन बाकी था। दोनों ने दोपहर का खाना नहीं खाया था।
17
अंतिम वीडियो में निजी बातचीत नहीं थी। कमरे की वह रिकॉर्डिंग तारा ने इस्तेमाल नहीं की। एपिसोड कप्तान की इस बात पर खत्म हुआ कि पहली बार उसके बेटे ने उसे खेलते कब देखा था।
तारा की फीस तय तारीख पर आई।
एक महीने बाद अलग होने के इंतज़ाम अब भी बाकी थे। कुछ किताबें लानी थीं, कागज़ पढ़ने थे। शादी की तस्वीर का क्या करें, दोनों नहीं जानते थे। कुछ सुबह अच्छी होतीं। कुछ शाम उसे उस आदमी की याद आती जिसके साथ वह अब रहना नहीं चाहती थी।
जन्मदिन पर अदिति बड़ा सा केक लाई। खाने के बीच माँ का फोन आया। उन्होंने घर देखने को कहा।
तारा ने कैमरा खोला। रसोई दिखाई, बालकनी दिखाई, पुरानी खरीदी टेढ़ी अलमारी दिखाई। फिर फोन पानी की बोतल से टिकाकर अदिति के पास बैठ गई।
“थोड़ा पास आ,” माँ ने कहा। “तस्वीर में आधी ही दिख रही है।”
तारा ने कुर्सी खिसकाई।
इस बार कैमरा चालू हुआ तो उसमें उसकी भी जगह थी।