Yono VIP — कमीज़ उधार की थी, आँसू उसके अपने
Yono VIP

Yono VIP — कमीज़ उधार की थी, आँसू उसके अपने

काल्पनिक कहानी · पात्र और घटनाएँ कहानी का हिस्सा हैं।

“पिता का नाम बोलने से पहले रो सकते हो?” फरहान को लगा निर्देशक मजाक कर रहा है। कैमरे के पीछे खड़े आदमी ने मुस्कराने की कोशिश भी नहीं की। उसने हेडफोन नीचे किए…

“पिता का नाम बोलने से पहले रो सकते हो?”

फरहान को लगा निर्देशक मजाक कर रहा है।

कैमरे के पीछे खड़े आदमी ने मुस्कराने की कोशिश भी नहीं की। उसने हेडफोन नीचे किए और फर्श पर बने निशान की तरफ इशारा किया, जहाँ फरहान को पैर रखने थे।

“जल्दी करो, लाइट जा रही है।”

सुबह के दस बजे थे। वे स्टूडियो के अंदर थे।

फरहान ने ऋषभ को देखा। वही उसे यहाँ लाया था। ऋषभ ने अपनी छाती पर दो उँगलियाँ रखीं। थोड़ा सब्र रखो।

“बस याद करो कि कितनी मुश्किल थी।”

फरहान को बहुत कुछ याद था।

अस्पताल की सीढ़ी, जहाँ फोन में नेटवर्क आता था। उसके पिता के कपड़ों वाली प्लास्टिक की थैली पर रखी माँ की हथेली।

लैंप घुमा रहे आदमी का उन यादों में कोई हिस्सा नहीं था।

फरहान ने वाक्य फिर शुरू करने की कोशिश की।

“नहीं, नहीं।” निर्देशक ने हाथ उठा दिया। “पहले थोड़ा भाव लाओ।”

जैकेट के नीचे पहनी कमीज़ दूसरे खिलाड़ी नीरव से माँगी थी। पहनते समय गला ढीला लग रहा था।

अब गले से थूक भी नहीं उतर रहा था।

* * *

साल की शुरुआत में प्रायोजन मिलना साँस लेने की जगह मिलने जैसा लगा था।

फरहान छब्बीस साल का था। सूरत की एक कपड़ा कार्यशाला में तैयार कपड़े जाँचता और ऑर्डर पैक करता था। इंडियन रमी की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता था।

अपने नतीजों के आधार पर क्षेत्रीय प्रतियोगिता शृंखला में जगह बना चुका था। लेकिन हर आयोजन में पहुँचने लायक बचत नहीं थी।

खराब ज़िप से पार्सल रुकता था। काम की एक पाली छूटने से यात्रा का बजट बिगड़ जाता था।

घरेलू सामान बेचने वाली कंपनी सेठी लिविंग ने छह महीने के समझौते में प्रवेश शुल्क, यात्रा और निश्चित भत्ता देने की बात की।

बदले में साक्षात्कार और कुछ कार्यक्रमों में उपस्थिति चाहिए थी।

फरहान ने तारीखें पढ़ीं। बड़ी बहन सना ने भुगतान की शर्तें पढ़ीं।

यह दान नहीं था। तय कार्यक्रमों में उसे जाना था। कंपनी सहमति से बनाई गई सामग्री इस्तेमाल कर सकती थी। बदले में तय खर्च मिलना था।

पहली मुलाकात में वह अभ्यास की समय-सारणी वाली कॉपी ले गया।

ऋषभ ने उसके पिता के बारे में पूछा।

फरहान ने बताया।

पिता सिलाई मशीनें ठीक करते थे। उनके जाने के बाद परिवार को मुश्किल हुई थी। माँ अब भी घर से कपड़ों की फिटिंग और मरम्मत करती थीं। सना जाँच केंद्र में काम करती थी।

ऋषभ ने अभ्यास वाली कॉपी बिना पढ़े बंद कर दी।

“यही है तुम्हारी कहानी।”

* * *

पहला वीडियो देखकर लोग भावुक हुए।

फरहान ने कार्यशाला के बाहर फोन पर देखा। संगीत के बीच अपने चेहरे की धीमी की गई तस्वीरें देखकर अजीब लगा।

वीडियो में पुरानी टपकती छत थी। मशीन पर माँ के हाथ थे। पिता की तस्वीर थी।

हाल में हुई छत की मरम्मत उसमें नहीं थी।

यह भी नहीं था कि माँ ने तीन पड़ोसिनों को कपड़ों की फिटिंग सिखाई थी। काम ज्यादा हो तो अब उन्हें भेज देती थीं।

अभ्यास पर हुई बातचीत पूरी गायब थी।

माँ उसके पास बैठकर देख रही थीं।

“कमरे में इतना अँधेरा क्यों कर दिया?”

“कैमरे के लिए होगा।”

वह थोड़ा और पास झुकीं।

“और मैं बस किसी की विधवा हूँ?”

फरहान जवाब नहीं दे पाया।

बधाई के संदेश आए। कंपनी के पेज पर लिखा था कि उन्होंने एक बेसहारा युवक को नई उम्मीद दी है।

माँ ने उसी सुबह बिजली का बिल भरा था।

उन्होंने फोन उलटा रख दिया और ब्लाउज पर निशान लगाने लगीं।

* * *

कार्यक्रमों में लोग पहचानने लगे।

खेल के बारे में कम पूछते थे।

एक महिला ने उसका हाथ पकड़कर कहा कि उसका संघर्ष देखकर वह रो पड़ी थीं। फरहान ने धन्यवाद दिया। उनकी नीयत अच्छी थी।

कंपनी का एक प्रतिनिधि मेहमानों से उसका परिचय करवाता था, “हमारा वह लड़का, जिसके पास कुछ नहीं था।”

फरहान वहीं खड़ा था। पैरों में वे जूते थे जो उसने कंपनी से मिलने से पहले अपने पैसे से खरीदे थे।

उसने तस्वीर के लिए मुस्करा दिया।

बाद में ऋषभ ने कहा, “इसीलिए तो यह सब काम कर रहा है। लोग जुड़ रहे हैं।”

फरहान ने पूछा कि अगले साक्षात्कार में अभ्यास की बात हो सकती है क्या।

“बिलकुल।”

वह एक शाम उदाहरण तैयार करता रहा।

शूट में उसने बताया कि खराब नतीजे के बाद प्रशिक्षक लीला ने उसे बहाने गिनाने से रोका था। उस निर्णय को देखने के लिए कहा था जिसे वह टाल रहा था।

साक्षात्कार लेने वाली ने सिर हिलाया।

फिर पूछा, उसका परिवार कितनी रात भूखा सोया था।

फरहान ने कहा कि मुश्किल थी, लेकिन वह कोई ऐसी गिनती नहीं देगा जो उसे मालूम नहीं।

उसने थोड़े अलग शब्दों में वही सवाल फिर पूछा।

* * *

उस महीने भत्ता समय पर नहीं आया।

हिसाब विभाग को फोन किया तो बताया गया कि प्रचार सामग्री की मंजूरी रुकी है।

ऋषभ ने कहा, दफ्तर की प्रक्रिया है। व्यक्तिगत बात नहीं।

तीन दिन बाद स्टूडियो का समय आ गया।

फरहान की सफेद कमीज़ पर तेल का हल्का दाग था। धोने पर भी नहीं निकला। नीरव ने अपनी साफ कमीज़ दे दी।

दोनों प्रतिद्वंद्वी थे। गहरे दोस्त नहीं थे।

नीरव ने देते समय कहा, “कफ का एक बटन नहीं है। ध्यान रखना।”

फरहान ने धन्यवाद दिया।

स्टूडियो में कपड़े सँभालने वाले ने जैकेट से कफ ढक दिया।

फिर आँसू माँगे गए।

फरहान अपने पिता की कोई दूसरी बात बताना चाहता था। उनकी सारी जिंदगी अस्पताल में नहीं बीती थी।

बताया कि ठीक की हुई मशीन लौटाने से पहले कैसे चलाकर देखते थे। एक ही खराबी के लिए ग्राहक से दो बार पैसे नहीं लेते थे।

निर्देशक ने ऋषभ की तरफ देखा।

“उनके संघर्ष वाली बात पर लौटें?”

फरहान का गला भर आया।

कैमरा चलता रहा।

किसी ने बहुत धीरे कहा, “अच्छा है। ऐसे ही रहो।”

* * *

उसने कमीज़ धोकर, इस्तरी करके लौटाई।

नीरव अपने सफर के कागज देख रहा था।

“कैसा रहा?”

“ठीक।”

नीरव ने ऊपर देखा, मगर और नहीं पूछा।

घर पहुँचकर फरहान माँ की मेज के पास फर्श पर बैठ गया। माँ आस्तीन काट रही थीं। उसके हाथ में अब भी वही कागज का थैला था जिसमें कमीज़ लाया था।

कुछ देर बाद माँ ने मशीन बंद की।

“क्या हुआ?”

उसने सब बता दिया।

माँ चुपचाप सुनती रहीं। उन्होंने उसे तुरंत गले लगाकर रोने के लिए नहीं उकसाया। वह जब तक बोलना चाहता था, बोल सकता था। उस समय उसे यही चाहिए था।

आखिर उन्होंने कहा, “तुम्हारे अब्बा चाय भी बहुत खराब बनाते थे।”

फरहान ने सिर उठाया।

“हर चीज में इलायची डाल देते थे। दूध कम हो तब भी।”

फरहान के मुँह से अचानक हँसी निकली।

माँ ने फिर सुई में धागा डाला।

“वह भी याद रखा करो।”

* * *

रोने वाला वीडियो अगले हफ्ते आया।

अंत में कंपनी का लोगो आया। उसके नीचे दावा था—हमने इसे भविष्य दिया।

फरहान ने आखिरी हिस्सा दो बार देखा।

फिर वह कॉपी खोली जो पहली मुलाकात में ऋषभ ने बंद कर दी थी।

नतीजे थे। रद्द हुए अभ्यास थे। यात्रा के खर्च थे। सुधार थे। कुछ पन्ने वह किसी को दिखाना नहीं चाहता था। उनमें एक ही गलती पर बार-बार निशान लगे थे।

भविष्य उन पन्नों में कई साल से लिखा जा रहा था।

सना ने उसे रसोई की मेज पर बैठा पाया।

“उनसे मैं बात करूँ?”

“नहीं।”

“फिर क्या चाहते हो?”

जवाब देने में वक्त लगा।

“समझौते में जो काम बचा है, कर दूँ। फिर नहीं।”

दोनों ने समझौता दोबारा पढ़ा।

तीस जून को खत्म होना था। आगे के लिए नया समझौता जरूरी था।

दो कार्यक्रम अभी बाकी थे।

फरहान ने तारीखें कैलेंडर पर लिख दीं।

सना ने बकाया भत्ते के बारे में हिसाब विभाग को भी लिखा। तय भुगतान की तारीख और पूरे हो चुके काम की जानकारी साथ भेजी। पैसे बारह दिन देर से आए। फरहान ने रकम मिलाई, फिर यात्रा के लिए लिया उधार चुकाया। दोबारा माँगने से डर रहा था, जैसे जरूरत जताने से पैसे पर उसका हक कम हो जाता हो।

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* * *

वह दोनों में गया।

पहले कार्यक्रम में मंच संचालक ने जिंदगी के सबसे बुरे दिन का वर्णन करने को कहा।

फरहान बोला, “परिवार के बारे में पहले बात कर चुका हूँ। आज अगले आयोजन की तैयारी बता सकता हूँ।”

संचालक ने ऋषभ की तरफ देखा।

फरहान बोलता रहा।

उसने तैयारी समझानी शुरू कर दी। बीच में ऋषभ की तरफ देखने के बजाय सामने बैठे लोगों से बात करता रहा।

बाद में ऋषभ उसे एक तरफ ले गया।

“जरा-से लोग पहचानने क्या लगे, नखरे शुरू हो गए?”

फरहान इतना थका था कि लगभग माफी माँग देता।

इसके बजाय उसने पूछा कि अगला तय कार्यक्रम कितने बजे शुरू होगा।

दूसरा कार्यक्रम चार बजे खत्म हुआ। वह चार बजे तक रहा। तय तस्वीरें पूरी कीं और चला आया।

तीस जून को उसने छोटा संदेश भेजा। आगे नया समझौता नहीं करेगा।

दस मिनट में ऋषभ का फोन आ गया।

* * *

नया प्रस्ताव बड़ा था।

ज्यादा कार्यक्रम। बेहतर यात्रा। एक और फिल्म।

ऋषभ ने कहा कि इस बार टीम उसकी कहानी ज्यादा संवेदनशील तरीके से सँभाल सकती है।

फरहान ने पूछा कि आखिरी वीडियो तैयार होने पर उसकी मंजूरी ली जाएगी क्या।

“तुमसे बात करेंगे।”

“यह समझौते में लिख सकते हैं?”

कुछ क्षण आवाज नहीं आई।

फिर ऋषभ बोला कि दूसरे लोग उसके दिमाग में बातें भर रहे हैं।

सामने कागज पर दो रकम थीं। एक उसके पास मौजूद पैसे, दूसरी बाकी सीजन का खर्च। नए समझौते के बिना खर्च पूरा नहीं हो रहा था।

उसने फिर भी मना कर दिया।

फोन रखने के बाद बहादुरी महसूस नहीं हुई।

पेट में मरोड़ जैसा हुआ।

शाम को एक यात्रा रद्द की, जिसका खर्च अब नहीं उठा सकता था। लीला को बताया कि एक वैकल्पिक अभ्यास आयोजन में नहीं पहुँच पाएगा।

उन्होंने पूछा, “गुरुवार वाली तुम्हारी कुर्सी रखें?”

उसने हाँ कहा।

* * *

अगले कुछ महीने हर खर्च काट-छाँटकर चलना पड़ा।

कमरा साझा किया। घर से खाना ले गया। वे आयोजन चुने जहाँ जाने के लिए आधे हफ्ते की कमाई नहीं छोड़नी पड़ती थी।

अभ्यास समूह के तीन परिचितों ने कुछ यात्राओं के लिए थोड़े पैसे दिए।

कार्यशाला के साथी ने पाली बदल ली।

स्थानीय अभ्यास समूह में सामान्य शुल्क पर जगह मिलती रही।

फरहान लिखता था कि कौन-सी रकम मदद है, कौन-सी उधार है और किसके बदले काम करने का वादा किया है।

मदद स्वीकार की, पर उसकी शर्तें पूछीं। परिचितों से भी पूछते समय संकोच होता था। अक्सर थका रहता था। उसके साथ रहना भी हमेशा आसान नहीं था।

एक बार बस देर से पहुँची तो अभ्यास छूट गया।

एक बार सना ने सिर्फ खाना खाने को पूछा और वह उस पर चिल्ला पड़ा।

रात के खाने के बाद माफी माँगी।

सना ने माफ किया। फिर बरतन धोने को कहा।

उसने धोए।

* * *

रिकॉर्डिंग एक झगड़े से शुरू हुई।

लीला ने कहा कि एक हफ्ते बाद उसे अपनी गलतियाँ कुछ और तरह याद रहती हैं।

फरहान झुँझला गया। “आपको मेरी गलतियाँ ही याद रहती हैं।”

“तो दोनों की याददाश्त के अलावा भी कुछ रख लेते हैं।”

सहमति से चुने हुए अभ्यास सत्रों में पुराना फोन स्टैंड पर रखा गया।

दूसरे खिलाड़ी चाहें तो कैमरे में आने से मना कर सकते थे। निजी बातें रिकॉर्डिंग से बाहर रखी जाती थीं।

शुरू में फरहान को खुद को देखना बहुत बुरा लगा।

दिखा कि बहाना कितनी जल्दी तैयार हो जाता है। लीला की बात कितनी बार काटता है।

एक पूरा सत्र ऐसा था जिसमें चेहरा शांत था, मगर सुन लगभग नहीं रहा था।

एक रिकॉर्डिंग में उसने कुर्सी पीछे धकेली और कहा, उससे नहीं होगा।

अगली सुबह की रिकॉर्डिंग में वही कुर्सी खींचकर मेज के नीचे कर रहा था।

कोई संगीत नहीं था।

छत का पंखा बीच-बीच में खटखटाता था।

* * *

सना ने फाइलें व्यवस्थित करने में मदद की।

वह फिल्म बनाने वाली नहीं थी। फोल्डर का नाम ऐसा रखना जानती थी कि जरूरत की चीज मिल जाए।

तैयारी के एक कठिन दौर को चुना। ग्यारह मिनट का क्रम बनाया।

स्क्रीन पर तारीखें रहीं। खराब सत्र खराब ही रहा। असहमति के बाद वह बातचीत भी रखी गई जिसमें दोनों ने अपनी बात समझाई थी।

कुर्सी पर लौटने वाला हिस्सा रखा।

फरहान चाहता था कि माफी माँगने वाला भाग निकल जाए।

सना ने वीडियो रोक दिया।

“निजी बात है इसलिए हटवाना है, या खुद को देखकर अच्छा नहीं लग रहा?”

उसने फिर देखा।

“खुद को देखकर।”

वह हिस्सा रहा।

जितने लोग दिखाई दे रहे थे, उन्होंने अपने हिस्से देखे। इस संस्करण को दिखाने पर सहमति दी।

जिसे फिल्म दिखाई जानी थी, उसके बारे में भी सबको बताया गया।

फिल्म का नाम रखा, गुरुवार, फिर अगला गुरुवार।

फरहान ने आयोजक को भेजा। सीजन के अंत के मीडिया कार्यक्रम में जगह हो तो इस्तेमाल कर सकते थे।

उस रात दो बार ईमेल देखा। फिर खुद से कहा कि अब रहने दे।

* * *

दो हफ्ते बाद जवाब आया।

अंतिम नतीजों के बाद ग्यारह मिनट की जगह थी। फाइल सही चली तो पूरी फिल्म दिखाई जा सकती थी।

फरहान ने जाँची हुई प्रति भेज दी। माँ और सना ने फिल्म देखने आने का तय कर लिया। वह किसी भी स्थान पर रहे, दोनों आने वाली थीं। सना ने दोपहर की छुट्टी भी माँग ली थी।

फरहान फिर तैयारी में लग गया।

फिल्म तैयार थी, लेकिन अंतिम प्रतियोगिता का पहला दौर फिर भी खराब गया।

खेल इतना खराब रहा कि लीला ने परिणाम की चर्चा छोड़कर पूछा, अगला सत्र शुरू हो तो उस पर ध्यान दे पाएगा?

उस रात नींद अच्छी नहीं आई।

नीरव भी उसी सस्ते लॉज में ठहरा था। इस्तरी माँगने आया।

फरहान ने दे दी।

एक पल सोचा कि पुरानी कमीज़ और स्टूडियो की सारी बात बता दे।

फिर पूछा, “कफ का बटन लगाया?”

“अब भी नहीं है। उसे मशहूर मत कर देना।”

फरहान हँस पड़ा।

अगली सुबह अकेलापन कुछ कम था।

* * *

वह धीरे-धीरे ऊपर आया।

सत्रों के बीच कमरे में कागज और खुले टिफिन की मिली-जुली गंध थी। फरहान बार-बार अंकतालिका देखना चाहता था, जबकि नया नतीजा आया ही नहीं था। लीला ने कार्यक्रम की पर्ची रखवाई और पहले खाना खाने को कहा।

नीरव अंतिम समूह तक नहीं पहुँचा।

रात की पाली के लिए जाना था। शुभकामना देकर निकल गया।

लीला रहीं।

आखिरी नतीजे जाँच लिए गए तो फरहान श्रृंखला जीत चुका था।

उसने कुल अंक खुद पढ़े। फिर पूछा, पुष्टि हो गई है?

हो गई थी।

उसने माँ को फोन किया।

तीसरी बार में उठाया।

“दरवाजा पीछे छूट गया,” माँ ने कहा। “सना ड्राइवर को गाड़ी मोड़ने को बोल रही है।”

“मैं जीत गया।”

कुछ पल चुप्पी रही। फिर माँ सना से बोलीं कि गेट की बात छोड़ो।

“वह जीत गया। ड्राइवर को भी बताओ, जीत गया!”

वह एक साथ हँसने और रोने लगा।

किसी ने दोबारा करने को नहीं कहा।

* * *

मीडिया कार्यक्रम से पहले ऋषभ आ गया।

कई महीनों बाद मुलाकात हुई थी।

हाथ में पेन ड्राइव थी। वह ऐसे आया जैसे बाकी इंतजाम उसी को ठीक करने हों।

“फिल्म ले आए। बिल्कुल सही मौके पर!”

फरहान ने ड्राइव देखी।

ऋषभ बोला कि पुराने प्रचार वीडियो में नया अंत जोड़ दिया है।

साथ खड़े प्रतिनिधि के पास कंपनी के निशान वाला उपहार बॉक्स था।

पुराने आँसू और कंपनी का उसे बचाने वाला दावा फिर तैयार था। अब जीत की तस्वीर जोड़नी थी।

फरहान के हाथ काँपने लगे।

उसने दोनों हथेलियाँ मेज पर रख दीं।

“कार्यक्रम में फिल्म पहले से है।”

“प्रेस के लिए यह बेहतर रहेगी।”

“आयोजक के पास फाइल है।”

ऋषभ ने आवाज धीमी की।

“शुरुआत में कौन साथ खड़ा था, भूल मत जाना।”

फरहान ने उसे देखा।

“कुछ भी नहीं भूला हूँ।”

* * *

आयोजक ने कार्यक्रम का क्रम देखा।

जगह फरहान की भेजी फिल्म के लिए थी। बदलने की कोई सहमति नहीं हुई थी।

ऋषभ ने पूछा कि कंपनी का बॉक्स मंच पर दे सकते हैं क्या।

फरहान ने कहा कि वह आज कंपनी के साथ कोई नई साझेदारी नहीं कर रहा।

बॉक्स बंद रहा।

माइक पर उसने सीजन में मदद करने वाले लोगों का धन्यवाद किया।

पुराने पूरे हो चुके समझौते से मिली सहायता का भी उल्लेख किया। जून के बाद के महीनों का खर्च कंपनी ने उठाया था, ऐसा नहीं कहा।

फिर फिल्म शुरू करवाई।

“पहले लगता था कि खराब अभ्यास वाले हिस्से छिपाने चाहिए।”

उसने लीला की तरफ देखा।

“लेकिन इन्होंने सारे सबूत सँभाल रखे हैं।”

कमरे में हल्की हँसी हुई।

रोशनी धीमी कर दी गई।

* * *

ग्यारह मिनट तक कोई उसे बचाने नहीं आया।

वह अभ्यास में हारा।

बहस की।

ठीक से नहीं सुना। फिर बेहतर सुना।

अगली सुबह वापस आया।

पहली पंक्ति में बैठी माँ उस बेटे को देख रही थीं जो सिंक के पास गंदे कप छोड़ देता था। जो बीस मिनट यह समझाने में लगा सकता था कि वह जिद नहीं कर रहा।

यह उनका जाना-पहचाना बेटा था।

अंत में उसने कुर्सी मेज के नीचे खिसकाई।

कॉपी खुली थी। किनारे पर सुधार लिखा था।

लीला ने पूछा, तैयार हो?

उसने कहा, “रुकिए। यह फिर देखना है।”

फिल्म यहीं खत्म हुई।

एक पल कमरा शांत रहा।

फिर तालियाँ बजने लगीं।

* * *

पहले पत्रकार ने रिकॉर्ड हुई बहस के बारे में पूछा।

फरहान ने जवाब दिया।

दूसरे ने पूछा कि प्रायोजन खत्म होने के बाद तैयारी बदली थी क्या।

उसने छोटे कार्यक्रम, खर्च, मदद करने वाले लोग और छूटे हुए अभ्यास के बारे में बताया।

फिर किसी ने पूछा कि कंपनी ने उसके परिवार को बचाया था क्या।

माँ बिल्कुल स्थिर बैठी थीं।

फरहान ने माइक पास किया।

“समझौते के दौरान तय यात्राओं और कार्यक्रमों का भुगतान उन्होंने किया। जो मदद वास्तव में मिली, उसका आभारी हूँ। उस समझौते से पहले भी मेरी माँ काम करती थीं। बहन काम करती थी। मैं भी।”

वह रुक गया।

दरवाजे के पास ऋषभ इंतजार कर रहा था। फरहान ने उसकी तरफ से नजर हटाकर सवाल पूछने वाले को देखा।

एक और हाथ उठा।

इस बार सवाल खेल के बारे में था।

* * *

बाद में माँ ने ट्रॉफी के पास तस्वीर खिंचवाई।

सना से कहा, पूरी साड़ी आनी चाहिए।

“पिछली बार किनारा काट दिया था। वह मैंने खुद सिला है।”

फरहान उनके साथ खड़ा हुआ।

कमरे के पीछे ऋषभ फोन पर बात कर रहा था। वह नाराज है या अगली योजना बना रहा है, जानने के लिए फरहान रुका नहीं।

ट्रेन पकड़नी थी।

अगले सोमवार वह कार्यशाला पहुँचा।

पर्यवेक्षक ने बधाई दी। फिर पार्सलों की सूची पकड़ा दी।

खाने के समय नीरव का वीडियो आया।

वही उधार दी हुई कमीज़ पहनी थी। एक कफ खुला लटक रहा था।

नीचे संदेश था—चैंपियन, अब तो मेरा बटन लगवा सकते हो।

फरहान ने पैकिंग मेज के पास रखे छोटे सिलाई डिब्बे की तस्वीर भेजी।

गुरुवार को ले आना।

गुरुवार को नीरव कमीज ले आया। पुराना बटन अलग रंग का था, इसलिए फरहान ने एक जैसे दो बटन खरीद लिए थे। अभ्यास के कमरे के बाहर बैठकर उसने दोनों कफ के बटन बदले।

काम पूरा हुआ तो नीरव ने कलाई आगे की।

“कस रहा है?” फरहान ने पूछा।

उसने हाथ मोड़ा। “ठीक है।”

धागा काटने से पहले फरहान ने दूसरा कफ भी जाँचा। उसके पिता मशीन ठीक करके दो बार चलवाते थे। एक बार खुद, एक बार ग्राहक से। यह याद आई तो उसमें अस्पताल कहीं नहीं था।

अंदर से लीला ने आवाज दी। नीरव ने आस्तीन नीचे कीं और उसके साथ कमरे में चला गया।

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